विश्व को भारत की देन है परिवार व्यवस्था

कुछ वर्षो पूर्व अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के भारत प्रवास के अवसर पर एक वक्तव्य समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे संपन्न राष्ट्र है क्योंकि यहां वह संपत्ति है जो विश्व में किसी के पास नही है। वह संपत्ति है यहां की परिवार व्यवस्था। हमारा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है जब इस प्रकार की बातें विदेशियों के द्वारा कही जाती हैं। वास्तव में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां परिवार इकाई पर इतनी गहराई से विचार किया गया है। न केवल विचार किया गया है अपितु इसका व्यावहारिक पालन भी किया गया है, इसे जीवन में आत्मसात किया गया है। व्यक्ति से समष्टि की साधना भारत के रक्त में समाहित है। भारतीय परिवार की कल्पना केवल रक्त सम्बन्ध तक ही सीमित नही है अपितु व्यक्ति के भावनाओं का विस्तार परिवार के विस्तार के साथ जुडा हुआ है। इसीलिए हमारे परिवार की कल्पना में सम्पूर्ण वसुधा है। इसलिए वसुधैव कुटुम्बकम् हमारा मंत्र बना।
सम्पूर्ण सृष्टि का प्राकट्य एक ही प्राण तत्व से हुआ है। इस नाते हमारे मूल में एक ही सत्व है। वह सत्व आत्मा और परमात्मा के रूप में है। आत्मा व्यक्तिगत है और परमात्मा समष्टिगत है। ज्यों-ज्यों आत्मा का विस्तार होता है, वह परमात्मा के स्वरूप में प्रकट होता है। इसी प्रकार ज्यों-ज्यों व्यक्ति के स्वरूप का विस्तार होता है, वह व्यक्ति से समष्टि की ओर और समष्टि से परमेष्टि की ओर विस्तृत होता है और यही उसका वैश्विक परिवार है।
आज परिवार की परिकल्पना बदलती जा रही है। परिवार को व्यक्तिवाद तक संकुचित करने का कार्य विभिन्न प्रकार से किया जा रहा है। चाहे वह हम दो हमारे दो के भाव का निर्माण हो या फिर संयुक्त परिवार के रूप में हो। संयुक्त रूप में कोई परिवार नहीं हो सकता, परिवार सिर्फ परिवार होता है। परिवार के साथ संयुक्त शब्द जोड़कर परिवारों को तोडने का या संकुचित करने का षडयन्त्र किया गया है।
वास्तव में परिवार एक सार्वभौमिक और स्थायी संस्था है जिसे भारतीय संस्कृति ने अपने मूल स्वभाव से पल्लवित पुष्पित किया है। यह कोई भौतिक स्वरूप मात्र नहीं है। यह आत्मिक संबन्धों से अभिसिक्त सनातन जीवन पद्धति है। इसी परम्परा ने समाज और राष्ट्र का निर्माण किया है। परिवार का समाज के प्रति अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति ने विकसित किया है, क्योंकि इससे ही सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: का भाव निर्माण हुआ है। इसी का विस्तार ही विश्व परिवार है। इसी शाश्वत सत्य को व्यक्ति को समझने की आवश्यकता है। इसी से भारत का अभिज्ञान है। इस सनातनता को परिपुष्ट करना, अपने स्वरुप की रक्षा करना हमारा कत्र्तव्य हो। भारत की यह अमूल्य धरोहर ही भारत को विश्वगुरु का पद प्रदान करेगी।