विलक्षण रचनाकार हैं वैद्य गुरुदत्त

रवि शंकर
आजकल एक शब्द काफी प्रचलन में है जेनरेशन गैप यानी पीढ़ियों का अंतर। आखिर यह जेनरेशन गैप क्या है? क्यों आज की पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से स्वयं को अलग मानने लगी है? यह अंतर कब से आने लगा है? क्या प्राचीन काल से नई पीढ़ियाँ इसी प्रकार पुरानी पीढ़ियों को इसी प्रकार नकारते रही थीं? इस बात को समझना हो तो हमें वैद्य गुरुदत्त के साहित्य को पढ़ना चाहिए। वैद्य गुरुदत्त एक लंबे समय तक देश की परिस्थितियों, इतिहास, समाज, राजनीति आदि सभी के अन्वेषक रहे हैं, उन्होंने काफी नजदीक से हरेक चीज को देखा है, उसका अध्ययन किया है और उस पर विश्लेषणात्मक टिप्पणियाँ की है। देश के वर्तमान के साथ-साथ वे देश के अतीत से भी परिचित हैं। अपने शास्त्रों का उन्होंने गंभीरता से अध्ययन किया है और वे भारत के उस वैशिष्ट्य से भी भली-भाँति परिचित हैं, जिससे आकर्षित होकर पूरा विश्व शिक्षा ग्रहण करने यहाँ आया करता था और जिसकी चर्चा मुस्लिम कवि इकबाल इन शब्दों में करते हैं – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
वास्तव में वैद्य गुरुदत्त अपने समकालीन इतिहासकारों, राजनीतिक विश्लेषकों, समाजविज्ञानियों, साहित्यकारों आदि से इस एक बात के कारण ही अलग दिखते हैं। आमतौर पर इतिहासकार शास्त्रों से परिचित नहीं होता, उनकी जानकारी के लिए वह दूसरों के अनुवादों पर निर्भर होता है। राजनीतिक विश्लेषक इतिहास और शास्त्रों की समझ नहीं रखते, वे इसके लिए दूसरों पर निर्भर होते हैं, समाजविज्ञानी को आधुनिक विज्ञान और भारतीय शास्त्रों की समझ नहीं होती, वह भी इसके लिए दूसरों के निकाले निष्कर्षों पर निर्भर होता है। वैद्य गुरुदत्त की विलक्षणता यही है कि वे न केवल भारतीय इतिहास से भली-भाँति परिचित हैं, बल्कि वे आधुनिक विज्ञान के भी उतने ही अच्छे ज्ञाता हैं। उन्होंने उस समय रसायनशास्त्र में एमए की पढ़ाई की थी। आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ भारतीय शास्त्रों पर भी उनकी जबरदस्त पकड़ है और सामाजिक मनोविज्ञान को उनसे बेहतर तो कोई समझ ही नहीं सकता।
इसलिए वैद्य गुरुदत्त का साहित्य केवल 1894 से लेकर 1989 तक के उनके 95 वर्ष के कालखंड के भारतवर्ष में हुई उथल-पुथलों की ही जानकारी नहीं देता, बल्कि वह हमें उसके कारणों की मीमांसा करना भी सिखाता है, उनके सुधार के उपाय भी बताता है। इस पूरे कालखंड में ही वे परिस्थितियाँ निर्माण हुई हैं जिनके कारण आज हम समाज में जेनरेशन गैप की समस्या से दोचार हो रहे हैं। वास्तव में यह जेनरेशन गैप नहीं है, यह एक प्रकार का सभ्यतागत संघर्ष है। हरेक नई पीढ़ी एक नई सभ्यता को और अधिक तत्परता से अपनाने और अपनी पुरानी सभ्यता को छोड़ने के लिए प्रयास कर रही है और पुरानी पीढ़ी अपनी पुरानी सभ्यता को पकड़े रखने और नई सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को तथा अपने परिवार को बचाने के लिए प्रयासरत है। इन दो विरुद्ध प्रयासों से उनमें जो टकराव यानी सभ्यतागत संघर्ष पैदा हो रहा है, उसे ही हम साधारण भाषा में जेनरेशन गैप कह देते हैं।
वैद्य गुरुदत्त ने अपने दो उपन्यासों में इसे विशेष रूप से दर्शाया है। पहला उपन्यास है दो लहरों की टक्कर और दूसरा उपन्यास है जमाना बदल गया। दोनों ही उपन्यासों में वर्ष 1870 में महर्षि दयानंद के अभियान से लेकर वर्ष 1960 तक के सौ वर्षों में भारत में किस प्रकार सभ्यतागत संघर्ष चलता रहा है, इसका बड़ा ही खुबसूरत वर्णन किया गया है। दो लहरों की टक्कर की भूमिका में ही वैद्य गुरुदत्त इस सभ्यतागत संघर्ष के बारे में बता देते हैं। वे लिखते हैं कि भारत में दो लहरें उठीं। एक लहर थी मैकाले, मैक्समूलर आदि के प्रयासों की जिसमें से राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, पंडित नेहरू ब्रह्म समाज, कांग्रेस जैसे लोग और संस्थाएं खड़ी हुईं। दूसरी लहर थी महर्षि दयानंद सरस्वती के प्रयासों की जिसके कारण लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला हंसराज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज जैसे लोग और संस्थाएं खड़ी हुईं। इन दो प्रयासों में टक्कर हुई। उस टक्कर में शासन बल के कारण पहली लहर प्रभावी होती गई। इस टक्कर की ही गाथा इन दोनों ही उपन्यासों में कही गई है।
वैद्य गुरुदत्त ने केवल उपन्यास लिख कर संतोष नहीं कर लिया। उन्होंने तात्कालिक समस्याओं पर भी पर्याप्त लिखा। उन्होंने इस सभ्यतागत संघर्ष में अपनी अस्तित्व की रक्षा के उपाय बताने के लिए भी अनेक पुस्तकें लिखी। इसके लिए उनकी एक पुस्तक स्व अस्तित्व की रक्षा अवश्य पढ़नी चाहिए। वैद्य गुरुदत्त जानते थे कि इस सभ्यतागत आक्रमण के हथियार हैं – इतिहास, विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीति आदि। इसलिए उन्होंने हरेक विषय पर पुस्तकें और उपन्यास दोनों ही बड़े पैमाने पर लिखे। इतिहास पर उनकी पुस्तकें इतिहास में भारतीय परंपराएं, भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास हैं और उनके ऐतिहासिक उपन्यासों की सूची तो बहुत ही बड़ी है, जिसमें प्रमुख हैं – विक्रमादित्य साहसांक, लुढ़कते पत्थर, पत्रलता आदि। विज्ञान पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें प्रमुख हैं – विज्ञान और विज्ञान, सृष्टि रचना आदि। समाजशास्त्र पर उनकी पुस्तकें हैं – धर्म तथा समाजवाद, स्व अस्तित्व की रक्षा, मैं हिंदू हूँ। समाजशास्त्र पर उनके उपन्यास कहीं अधिक संख्या में हैं – न्यायाधिकरण, धरती और धन, वाममार्ग, कला, विलोम गति, तब और अब, पूर्वग्रह, पंकज आदि। राजनीति भी वैद्य गुरुदत्त के लेखन से अछूती नहीं रही, उनकी राजनीतिविषयक पुस्तकें हैं – बुद्धि बनाम बहुमत, प्रजातांत्रिक समाजवाद, राष्ट्र और राज्य, वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान हिंदू राष्ट्र, अकाली विद्रोह, भारत गाँधी-नेहरू की छाया में आदि। इनके अलावा वैद्य गुरुदत्त ने भगवद्गीता, उपनिषदों और दर्शन ग्रंथों के भाष्य भी लिखे हैं। वेदों और वैदिक पदावली पर भी उनकी कई पुस्तकें हैं।
वैद्य गुरुदत्त में वैचारिक स्पष्टता कमाल की है। वे कम्युनिस्टों के घोर वैचारिक विरोधी हैं। उन्होंने कम्युनिस्ट सिद्धांतों का जैसी गंभीर और तथ्यपरक आलोचना की है, वैसा और किसी के लेखन में दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी कारण वे गाँधीवादी समाजवाद जैसे विरोधाभासी सिद्धांत का उद्घोष करने पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे व्यक्ति से भी विरोध ले बैठे। इसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे वृहद् संगठन की नाराजगी स्वीकार की परंतु सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका स्पष्ट मानना था कि समाजवाद जैसी विदेशी पदावली से अपने देश का विकास नहीं किया जा सकता। देश का विकास विशुद्ध भारतीय और वैदिक पदावलियों से ही संभव है।
वैद्य गुरुदत्त के इस सवा सौवें जन्मवर्ष पर हम उन्हें याद करें और उनके साहित्य का अध्ययन करें। उन्होंने एक आदर्श समाज का जो चित्र हमारे सामने रखा था, उसे साकार करने के उपाय करें, यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी।