विरासत सहेजने को ध्रुपद यात्रा

Baiju Bavara Utsavनाज खान
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।
चंदेरी की मनोरम शांत वादियां कभी बैजू बावरा के राग मल्हार में गाए ध्रुपद से गूंजा करती थीं। आज वही आवाज खामोशी से इन्हीं पहाड़ियों में सोई हुई है। संगीत की महान परंपरा के गवाह रहे चंदेरी पर उसी संगीतमयी माहौल का असर है कि यहां हवा की सरसराहट भी संगीत छेड़ती हुई लगती है, तो चिड़ियों की चहचहाहट से सुर निकलता सुनाई पड़ता है। लय-सुर-ताल का ऐसा ही संगम 13 फरवरी को चंदेरी में हुआ तो वादियां उमाकांत और रमाकांत गुंदेचा के ध्रुपद गायन से गूंज उठीं और एक बार फिर जैसे बैजू बावरा आलाप करते सुनाई दिए। अवसर था बैजू बावरा की पुण्यतिथि का और यादगार आयोजन था श्री अचलेश्वर फाउंडेशन का ‘प्रथम बैजू बावरा ध्रुपद उत्सव’।
संगीत सूर्य बैजनाथ प्रसाद मिश्र के नाम में बावरा लगे होने के पीछे कई किवदंतियां हैं। कहीं उनके पिता का विछोह उनके बावरे होने का कारण बताया गया, तो कहीं उल्लेख है कि उनके शिष्य गोपाल की उनसे दूरी उनके होशो-हवास खोने का कारण बनी और उन्हें बावरा कहा जाने लगा। हालांकि विश्वसनीय यही लगता है कि एक नर्तकी कलावती के प्रेम ने उन्हें बैजू बावरा बना दिया था और वह प्रेम को संगीत का आठवां सुर मानने लगे थे। 1952 में निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में भी बैजू के इसी प्रेम को पर्दे पर दिखाया गया था। मध्यकाल के कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज और ग्वालियर के जयविलास महल के साक्ष्य बताते हैं कि बैजू न सिर्फ एक महान संगीतज्ञ थे, बल्कि तानसेन जैसे महान संगीतज्ञ को हराकर उन्होंने अपने कला-कौशल का लोहा भी मनवाया था। अकबर के नवरत्नों में शुमार तानसेन की संगीत विलक्षणता के आगे कोई संगीतज्ञ टिक नहीं पाता था। बैजू बावरा ने इसे एक चुनौती के तौर पर लिया और तानसेन को संगीत प्रतियोगिता में सुरों से मात दी। संगीत सम्राट तानसेन के साथ बैजू की गायन प्रतियोगिता आगरा के वन में आयोजित हुई थी, जिसमें तानसेन ने राग तोड़ी गाया, तो बैजू ने मृगरंजिनी तोड़ी राग गाया और अंततः जीत बैजू को मिली। आज यह बात भले ही अतिश्योक्ति लगे, लेकिन कहा जाता है कि रागों में वह शक्ति है कि इंसान ही नहीं, बेजान वस्तुएं और जानवर भी इसकी गिरफ्त में आए बिना नहीं रह सकते। बैजू बावरा के रागों में भी ऐसी ही कशिश थी कि उनके मेघ मल्हार से आकाश में बादल छा जाते थे और वर्षा होने लगती थी। उनका राग मृगरंजिनी सुनकर जंगल से हिरन सम्मोहित होकर दौड़े चले आते थे, तो राग दीपक के सुर दीये जला देते थे। राग बहार से फूल खिल जाते थे और राग मालकौंस गाने से पत्थर पिघल सकते थे।
1542 ई. में चंदेरी में जन्मे बैजू बावरा को संगीत की शिक्षा स्वामी हरिदास ने दी थी। तानसेन भी हरिदास के ही शिष्य थे। बैजू ग्वालियर के राजा मान सिंह के जयविलास महल के दरबारी संगीतज्ञ रहे। यहां उन्होंने मान सिंह की रानी मृगनयनी को संगीत की शिक्षा दी। 71 साल की उम्र में 1613 ई. में बसंत पंचमी के दिन चंदेरी में ही बैजू बावरा की मृत्यु हुई। नौखंडा महल के पास बैजू बावरा का समाधि स्थल है। मध्य प्रदेश का छोटा-सा शहर चंदेरी, मालवा और बंुदेलखंड की सीमा पर बसा है, जो पौराणिक काल से लेकर आज तक अपनी विशिष्टता बनाए हुए है। चंदेरी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, अफगान, बुंदेल राजपूतों और सिंधिया वंश का शासन रहा। यही कारण है कि चंदेरी में अनेक नयनाभिराम मंदिर भी हैं, तो उम्दा नक्काशीदार मस्जिदें, मठ, सराय, मीनारें, मकबरे और बावड़ियां भी इस जगह का आकर्षण हैं। दरअसल, चंदेरी ग्वालियर रियासत में आता है और ग्वालियर की समृद्ध संगीत विरासत सदियों पुरानी है। राजा मान सिंह तोमर के शासनकाल या उससे पहले ही आरंभ हुए ग्वालियर घराने ने संगीत के क्षेत्रा में देश को एक-से-एक नायाब नगीने दिए हैं। बैजू बावरा ने ग्वालियर की इस संगीत परंपरा को और समृद्ध किया। उन्होंने ध्रुपद के साथ गुर्जरी तोड़ी, मंगलगुजरी आदि नए रागों का आविष्कार किया। साथ ही धमार ताल भी बैजू की ही देन है। उन्होंने होरी गायकी की नवीन प्रणाली का आविष्कार जयविलास महल में रहते हुए ही किया। संगीत की इस परंपरा को बनाए रखने और बैजू बावरा को अमर बनाने के मकसद से ही राजा मान सिंह ने ग्वालियर संगीत विद्यापीठ की स्थापना की थी। उर्दू इतिहासकार फरिश्ता ने अपनी किताब तारीखे-फरिश्ता के शुरुआती अध्याय में ही ग्वालियर की संगीत विरासत के संबंध में उल्लेख किया है, ‘एक मालचंद नामी संगीतज्ञ दक्षिण भारत से संगीत को ग्वालियर लाया और इस तरह तलिंगी संगीतकारों के वंशज पूरे उत्तर भारत में फैल गए।’ इससे जाहिर होता है कि ग्वालियर के संगीत की यह परंपरा बहुत पुरानी है।
तबकाते-अकबरी के इस उल्लेख से भी ग्वालियर की समृद्ध संगीत परंपरा का पता चलता है कि ‘तोमर वंशी राजा डूंगर सिंह और कश्मीर के राजा जैनुल आबेदीन के मध्य संगीत से संबंधित ग्रंथों का आदान-प्रदान हुआ था।’ ध्रुपद, धमाल, ख्याल, टप्पा, ठुमरी, दादरा, लेदा, गजल, तराना, त्रिपट और चतुरंग जैसी संगीत शैलियां ग्वालियर घराने की ही विशेषताएं हैं। इस संगीत घराने की खासियत यह रही कि इसने उत्तर भारत के लोक संगीत को न सिर्फ अंगीकार किया, बल्कि उच्च कोटि के वैविध्यपूर्ण संगीत के रूप में लोगों तक पहुंचाया। अबुल फजल ने आइने-अकबरी में 36 महान संगीतज्ञों का जिक्र किया है और इनमें 16 संगीतकार ग्वालियर के थे। सिंधिया शासकों के समय में भी संगीत कला खूब फली-फूली। इसी घराने के आश्रय में ख्याल शैली के प्रथम शास्त्राीय घराने का जन्म हुआ।
संगीत की इसी विरासत को सहेजने का एक प्रयास है ‘प्रथम बैजू बावरा ध्रुपद उत्सव।’ इस उत्सव का आयोजन श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर फाउंडेशन ने किया। 13 फरवरी को बैजू बावरा की पुण्यतिथि पर बसंत पंचमी की सांध्य बेला में जब यह आयोजन हुआ, तो माहौल ध्रुपद गायक पं. उमाकांत व रमाकांत (गुंदेचा बंधुओं) की जुगलबंदी से गूंज उठा। आयोजन स्थल चंदेरी में संगीत की इस सांध्य बेला से पूर्व ‘विरासत का अर्थ’ विषय पर कवि एवं कलाविद अशोक वाजपेयी, संगीत समीक्षक मंजरी सिन्हा ने व्याख्यान दिया। संगीत की इसी परंपरा से लोगों को जोड़ने की मुहिम चला रहे फाउंडेशन के सचिव चंद्रप्रकाश तिवारी कहते हैं, ‘इस वैदिक संगीत को अभिजात्य वर्ग से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाना और लोगों को इससे परिचित कराना ही मेरी इस ‘ध्रुपद यात्रा’ का मकसद है।’