विकास के लिए धरती का सौदा

विकास के लिए धरती का सौदा

विकास के लिए धरती का सौदा

जवाहर लाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
वायुमण्डल में गर्मी के बढ़ने से दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है, यह सबसे अधिक पश्चिम के सम्पन्न देशों में दिख रहा है। ऐसा नहीं कि और देशों के वातावरण में इस तापवृद्धि से कोई हानि नहीं होगी, होगी अवश्य और शायद पश्चिम से अधिक ही होगी, लेकिन विकासशील देश कल की बात पर कम ही चिंतित होते हैं। अभी तो उन्हंें आज की परेशानियों ने घेर रखा है। इनमें से भी जो देश सोचते हैं या सोचने का आभास देते हैं, वे भी पश्चिम जैसी कुछ सुविधाएँ पाने के उद्देश्य से ही। उनमें हमारा देश भी शामिल है। अभी अभी हमारे प्रधानमंत्राी संयुक्त राष्ट्र में अपने कुछ सुझाव दे कर आए हैं। अमेरिका में आम आदमी को तो यही समझ में आता है कि इस मौसम की गड़बड़ी का कारण वे गरीब देश हैं जो अपने विकास की धुन में विश्व का तापमान बढ़ा रहे हैं और सारी मानव जाति को खतरे में डाल रहे हैं। लेकिन अगर आम आदमी भारत-जैसे विकासशील देश का हो, तो उसे बताया जाता है कि पश्चिम के विकसित देशों ने धरती को नोच-नोचकर अपनी आर्थिक हालत तो सुधार ली पर अब जब हमारी बारी आ गई तो हमें रोक रहे हैं। है क्या यह सार्वभौमिक ताप, क्यों धरती को बुखार चढ़ रहा है?
बात सीधी सी है कि करोड़ों वर्षो के विकास में इस धरती ने वातावरण में एक तरह का संतुलन बनाया है। हमारे कुछ कामांें से काफी मात्रा में जीवनदायिनी गैस ऑक्सीजन खर्च हो जाती है और दूसरी गैसों में बदल जाती है जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है कार्बन-डाई-ऑक्साइड। प्रकृति अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया से उस कमी की पूर्ति करती रहती है। लेकिन कालांतर में मानव ने अपनी सुविधा के लिए अपने कामों को इतना बढ़ा दिया कि आक्सीजन को छोड़कर अन्य गैसों का दबाव बढ़ने लगा। हमने बड़ी मात्रा में धुआँ बनाना आरम्भ कर दिया। पहले तो केवल खाना पकाने या स्वयं को गरम रखने के लिए ही हम धुआँ पैदा करते थे, अब हमने तरह-तरह की सुविधाएँ विकसित कर ली, हम कारखानों में, रेल गाड़ियों से और अपने लिए बिजली बनाने से भी धुआँ पैदा करने लगे। हमारे यहाँ महानगरों में पेड़ों की छतरी इतनी कम है कि धूल से वातावरण भर जाता है। जाड़ों में दिल्ली में जो काले बादल वातावरण पर छा जाते हैं, वह केवल धुआँ नहीं होता, धुएं पर तैरते धूलकण होते हैं जो भारी होने के कारण नीचे आते हैं और हमारे घरों, मोहल्लों और हमें भी अपने विषैले आलिंगन मंेे लपेट लेते हैं।
हम और भी बहुत से काम करते हैं जो प्रदूषण का कारण होते हैं। हमारे जेनरेटर, हमारे फ्रिज और ए.सी. भी यही काम करते हैं। ये गैसें धरती के चारों ओर एक शामियाना तान देती हैं और उसे तपा देती हैं। धरती में पैदा होने वाला ताप बाहर नहीं भाग सकता है। इसे ग्रीन हाऊस प्रभाव कहते हैं।
जब पूरे भूमण्डल का तापमान बढ़ जाएगा तो धरती पर बड़े स्तर पर बदलाव आरम्भ होंगे और ये बदलाव विनाशकारी ही होंगे। उदाहरण के लिए हमारे ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगेंगे और अंत में समाप्त हो जाएँगे। अधिकतर नदियाँ इन्हीं हिमराशियों से जन्म लेतीं हैं। जंगल सूख सकते हैं, अन्नाभाव होगा। वनस्पतियों की विभिन्नता कम होगी। ध्रुवों का हिम पिघल जाने से समुद्र का स्तर उठेगा। समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ देगा तो धरती पर बहुत से देश ही पानी के नीचे चले जाएँगे। यह कोई कपोल कल्पना नहीं है क्योंकि ऐसा होने लगा है। लेकिन क्या पूरी धरती और उस पर रहने वाली सभी जीव-प्रजातियों के लिए इतने बड़े संकट के बारे में मानव को पहले से कोई आशंका नहीं थी, आसन्न संकट की कोई आहट मानव का सुनाई नहीं दी? सुनाई तो दी लेकिन हम अपने तरीकों को भूलकर पश्चिम के तौर-तरीके अपनाने में इतने मगन थे कि प्रकृति की चेतावनियांें पर ध्यान देने की हमें फुर्सत ही नहीं थी।
भूमण्डलीय ताप की बात तो कुछ ही दशक से होने लगी है। कुछ ही दशक पहले ही विश्व स्तर पर पर्यावरण-नियंत्राण के तौर-तरीके खोजने के लिए सम्मेलन आयोजित होने लगे। पश्चिम के विकसित देशों को तब चिंता होने लगी जब उन्हें लगा कि पर्यावरण के असंतुलन से उनके विकास की दर ही कम होगी और उनकी सम्पन्न जीवनशैली के लिए खतरा पैदा होगा। उन्होंने ऐसी तकनीक का आविष्कार किया है कि पुराने तौर-तरीकों की उन्हें आवश्यकता नहीं है। लेकिन जिन्हांेेने विकास का वही मॉडल अपनाया तो उनके लिए उनकी नकल करके वही तकनीक भी अपनानी आवश्यक थी। मुश्किल यह थी कि तकनीक पर पश्चिम कब्जा कर चुका था और इस तकनीक की नयी जागीरदारी पर ही पश्चिम की सम्पन्नता टिकी है। विकासशील देश समय रहते उसे उन्नत नहीं कर पाए। उनके पास उतने साधन नहीं थे कि तकनीक के जागीरदारों को पर्याप्त पैसे देकर इस मामले मे उनके बराबर आ जाएँ।
पश्चिमी जागीरदारों का हित इसमंे था कि विकासशील देश केवल खरीददार बनकर ही रहें तभी उनका धंधा चलता रहेगा। लेकिन हम, जो प्रकृति की पूजा करते हैं, वन-वनस्पति, नदी, पानी, हवा, धरती सबमें देवत्व देखते हैं, इस बात से अनभिज्ञ क्यों थे कि जो कुछ हम कर रहे हैं, उससे वही रुष्ट हो जाएँगे जिनकी हम अर्चना करते नहीं ंथकते?
प्रकृति अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखती है जिसमें हमारा स्वास्थ्य भी शामिल है। हम भी तो प्रकृति के ही अंग हैं। हम अपने को प्रकृति के मालिक नहीं पुत्रा मानते हैं। क्या हमने कभी ध्यान दिया कि प्रकृति क्या कह रही है? हिमानियों ने आज से हटना नहीं आरम्भ किया, पहले भी उनके हटने की घटनाएँ होती रहीं है। वास्तव में हिमानी या ग्लेशियर प्रकृति के स्वास्थ्य का मापक होता है। उसका पीछे हटना रोग का लक्षण है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस तरह के कई पैमाने खोजे हैं जो लगातार चेतावनियाँ देते रहते हैं कि सम्भलो, आगे खतरा है। इन पैमानों में एक है हिम रेखा। समुद्रतल से वह ऊँचाई जहाँ से ऊपर हिम पूरे वर्ष में कभी भी नहीं पिघलता है। हिमालय में यह रेखा कभी दस हजार फीट की ऊँचाई पर हुआ करता थी। लेकिन कालांतर में इस रेखा को ऊपर ले जाना पड़ा। अब तो यह रेखा हिमालय में कहीं एक हजार फीट ऊपर खिसक गई है और कहीं कई हजार फीट। हिम रेखा का ऊपर की ओर खिसकना बताता है कि धरती के उस क्षेत्रा में गर्मी बढ़ रही है। ग्लेशियरों का हटना पर्यावरण के ह्रास की बड़ी घटना है। हजारों लोग गंगोत्राी जाते हैं उनमें से सैकड़ों गोमुख तक भी जाते हैं। गोमुख ग्लेशियर ही गंगा का स्रोत है। ग्लेशियर पीछे हटता रहा है, यह शायद गंगोत्राी जाने वाले अधिकतर लोगांे ने कभी महसूस ही नहीं किया होगा, लेकिन कुछ ने अवश्य किया होगा।
गोमुख से पहले एक पड़ाव है भुजवासा या भोजवासा यानी भोजवृक्षों का घर। भोज का यह वन कभी वृक्षों से भरा रहता था। लेकिन अब वह वृक्षहीन है। गोमुख जाने वाले मार्ग पर एक अकेला भोज वृक्ष उस महावन की त्रासदी की कहानी कहता था। था इसलिए कि 1990 के पश्चात् मै वहाँ नहीं जा पाया और मैं नहीं जानता कि वह क्षीणकाय पेड़ अब भी खड़ा हैे कि नहीं। लेकिन पिछली एक शताब्दी के आँकड़े और दस्तावेज उपलब्ध हैं जिनसे हम भोजवासा के वास्तविक रूप और गोमुख ग्लेशियर की स्थिति का सही-सही अनुमान लगा सकते हैं।
हिम रेखा की तरह मधुरेखा भी होती है। मधुमक्खियाँ फूलों से मधु संग्रह करती हैं। वे अपने छत्ते से लगभग पाँच किलोमीटर की परिधि मंें घूम-घूमकर मधु और पराग आदि का संग्रह करती हैं। लेकिन अगर इस दायरे में वनस्पतियों का ह्रास आरम्भ हो जाए तो फूलों का भी अभाव हो जाता है। तब मधुमक्खियों को अपना स्थान छोड़कर और ऊपर जाना पड़ता है। यह पलायन उसी अनुपात में होता है जिसमंेे वनस्पतियाँ अपने मूल स्थान से हट गई हों। मधुसंग्रह की इस रेखा का अपने स्थान से हटना इस बात की चेतावनी है कि स्थानीय वनस्पति का ह्रास हो रहा है और यह ह्रास की प्रकिया लगातार बढ़ती जाएगी। कुछ विशिष्ट वन गायब हो रहे हैं, अनेक छोटी नदियाँ लुप्त हो गई हैं, कुछ झीलें इतिहास हो गई हैं। यह सब हम देखते रहे हैं लेकिन न तो हमने इस बारे में गम्भीरता से सोचने की आवश्यकता महसूस की और न ही हमारे कथित विशेषज्ञों ने प्रकृति के अनुकूल अर्थव्यवस्था का विकास करने का प्रयास किया। अब जबकि बनी-बनाई अर्थव्यवस्थाओं को अपनाया है, विकास की उन्हीं की व्याख्या को स्वीकार करने के अतिरिक्त चारा ही क्या है? उनके मानकों के अनुसार विश्व मंे प्रदूषण फैलाने के लिए हम ही दोषी हैं। वे तो धरती के संसाधनों का पूरा-पूरा उपयोग करके प्रगति कर चुके हैं, धरती का जितना संभव था, शोषण करके विकास के शिखर पर पहुँच गए हैं।
हमारे देश के कर्णधार और आर्थिक विशेषज्ञ उन्हीं की शर्तों को मानने के लिए मोहलत मांगते ही रहते हैं। इस उम्मीद में कि हम भी जल्द ही उस शिखर पर पहुँच जाएँगे। लेकिन आशंका है कि जिस रास्ते पर हम और हमारे साथ सैकड़ों विकासशील देश चल पड़े हैं, वह कहीं अंधी गली ही न सिद्ध हो जाए क्योंकि धरती शायद उतने शोषण को सहन ही न कर पाए।