विकास की भेंट चढ़ते तालाब

विकास की भेंट चढ़ते तालाब

फेसबुक पर आनंद कुमार

जब जोर शोर से विकास की बात होती है तो अंग्रेजीदां एनजीओ-बाज से सस्टेनेबल डेवलपमेंट का जुमला भी उछालते हैं। ये सस्टेनेबल डेवलपमेंट, उस विकास को कहते हैं जो स्थायी हो। इस सस्टेनेबल डेवलपमेंट के आने से समृद्धि तो आती है, लेकिन ये भारतीय कुबेर टाइप नहीं होता, कुछ कुछ लक्ष्मी जी टाइप होता है। इसके आने पर पुराना कुछ जाता नहीं, नया आकर परंपरागत में और जुड जाता है, एक्स्ट्रा हो जाता है। शुरू के सालों में इसे अपना कर खुश होने वाले दस साल बाद ग्रीन रिवोल्यूशन में खुश हो रहे किसानों जैसा अपना सर नहीं धुन रहे होते। आत्महत्या भी नहीं करते।
ये एक आश्चर्य ही है कि साहित्य, कला, फिल्मों में जब किसानों का शोषण करने वाले ठाकुर-लाला-पंडित कि तिकडी होती थी उस दौर में किसान खुद-कशी करता नहीं सुनाई देता था। पता नहीं कैसे कोआपरेटिव, बैंक, उन्नत बीजों वाली विदेशी कंपनियों और बिजली से सिंचाई के दौर में वो मरने भी लगा है। किसानों के खेती छोडने और शहरों की ओर पलायन में भी बढत ही होती रही है। कहा जा सकता है कि विकास तो हुआ मगर ये विकास की नहर कुछ चुनिन्दा फार्म हाउस से होती निकली है, आम गरीब किसान तक इसका पानी नहीं पहुंचा। उस से भी मजेदार है कि भारत की करीब पचास प्रतिशत आबादी को खेती पर निर्भर बताने वाले अखबारों के पहले पन्ने पर खेती से जुडा कुछ भी नहीं छपता।
सच कबूलने की हिम्मत ना होने की वजह से सस्टेनेबल डेवलपमेंट कैसे विकास की भेंट चढता है ये देखना हो तो तालाब ढूंढिए। परंपरागत रूप से तालाब गावों या शहरों में मंदिर की सम्पति होती थी। उसके रखरखाव का जिम्मा भी स्थानीय पुजारी का ही होता था। अब जब ज्यादातर को पाट कर उसपर बहुमंजिला इमारतें बन चुकी हैं तो उसका नुकसान भी साफ साफ दिख गया होगा। ये हुआ कैसे ? सबसे पहले तो 1810 के दौर में अंग्रेजों ने मंदिरों की संपत्ति को सरकारी संपत्ति घोषित कर के कानूनी तौर पर हडपना शुरू किया। स्थानीय ब्राह्मण / पंडित के पास जब तालाब के अधिकार नहीं रहे तो जिम्मेदारी भी नहीं बची। जमीन उसके पास पहले ही नहीं थी, तो वो शहरों की तरफ पलायन करने लगा।
जैसे जैसे अंग्रेजों के पास भारत का ज्यादा हिस्सा आता गया वैसे वैसे तालाब और जलस्रोत गायब होते गए। इसका नतीजा भयानक अकालों के रूप में भारत ने झेला भी, लेकिन उस दौर में ऐसे विषयों की कोई जांच होती नहीं थी। फिरंगियों को भी भूखे मरते हिन्दुस्तानियों से कोई लेना देना नहीं था तो बात आई गई हो गई। आजादी मिलने के फौरन बाद की एक घटना ने एक क्षेत्र विशेष पर अपना असर दिखाया। गांधी की हत्या हो गई थी और मारने वाले के नाम में गोडसे था। महाराष्ट्र के ब्राह्मणों पर फौरन इसका असर पडा। अहिंसावादी गाँधी के अनुयायियों के कहर से बचने के लिए ब्राह्मण अपना घर-संपत्ति छोडकर, जैसे तैसे जान बचाकर भागे। बेकार इनकार मत कीजिये, गाँधी की हत्या के बाद के ब्राह्मण विरोधी दंगे रिकार्डेड हिस्ट्री होते हैं।
इसका नतीजा ये हुआ कि अचानक से नहरों, तालाबों और जलस्रोतों के रखरखाव के लिए गावों में कोई नहीं बचा। विदर्भ-महाराष्ट्र के इलाकों के दर्जनों मालगुजारी तालाब सूख कर खत्म हो गए। पालीवाल ब्राह्मणों के जल संरक्षण के डिजाईन को खादीन कहा जाता था, और ये जैसलमेर के इलाकों में शुरू हुआ था। गुजरात और महाराष्ट्र में भी इसी का थोडा सा बदला रूप इस्तेमाल होता था, जो अब नहीं मिलेगा। थोडा ढूँढने का मन हो तो धुले और नासिक जिलों में तापी नदी के इलाकों छोटी नदियों को देखा जा सकता है। पंझारा, मोसम जैसी नदियों पर एक किस्म का चेक डैम बनाया जाता था जो कि स्थानीय समुदाय बनाता था और वही देखभाल भी करता था। अब गायब हो चले हैं, लेकिन मिल जायेंगे।
ट्रेन से जब पानी महाराष्ट्र भेजा जाता है तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होता। मिशनरी फण्ड खाकर किसी कल्पित विकास की दौड लगाईं गई है। समाज के हर हिस्से का अपना योगदान होता है ये भूलकर सिर्फ मेरा घर कैसे भरे भी नहीं, पडोसी कैसे भूखा मर जाए, ये सोचने में समय और मेहनत खर्च हुई। अगले सौ साल कैसे कटेंगे ये सिर्फ महाराष्ट्र को ही नहीं सोचना, पानी की कमी लगभग पूरे भारत के मैदानी क्षेत्रों में शुरू हो चुकी है। ये पूरे भारत के लिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट का नहीं अब सस्टेन करने का मामला है।