विकासवाद विज्ञान या परिकल्पना

रवि शंकर, कार्यकारी संपादक


औरंगाबाद, महाराष्ट्र में आयोजित राष्ट्रीय वैदिक सम्मेलन में पिछले दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के विकासवाद पर प्रश्नचिह्न लगा कर देश के विद्वत जगत को एक मौका देने का प्रयास किया था कि वह विज्ञान के नाम पर अंधविश्वास को फैलाए जाने के प्रयासों की ठीक से समीक्षा कर सके। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा राज्य मंत्री के इस बयान के विरोध में एक राजनैतिक सरीखी कवायद, जिसमें कि इन्हें महारत हासिल है, के तहत बारह सौ विज्ञानियों ने एक पिटीशन केंद्रीय मानवसंसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भेज दी। यह देखना दिलचस्प था कि केवल डेढ़ दिन में राजनेताओं के साथ ताल मिलाते हुए इन विज्ञानियों ने एक पिटीशन पर हस्ताक्षर कर दिए। इन विज्ञानियों का विज्ञान में योगदान कुछ भी न हो परंतु देश की राजनीति में उनकी रुचि अप्रतिम है। याद रखें कि दो वर्ष पहले पीएम भार्गव जैसे विज्ञानी भी मोदी सरकार को तानाशाह साबित कर रहे थे। एक विज्ञानी को राजनीति की इतनी चिंता होती है। इस पर जावड़ेकर ने भी अपने सहयोगी मंत्री सत्यपाल सिंह को इस झमेले में न पडने की सलाह दे दी और कहा कि मंत्रालय इस विषय पर किसी सेमीनार का आयोजन नहीं करेगा।
अच्छा होता कि विज्ञानी इस विषय पर अपने वैज्ञानिक शोध के साथ सामने आते न कि एक मंत्री की शिकायत करने दूसरे मंत्री के पास चले जाएं। समझने की बात यह भी है कि यदि सत्यपाल सिंह ने विकासवाद को पाठ्यक्रम से बाहर करने की बात की तो भी पाठ्यक्रम का निर्माण अंतत: विद्वानों को ही तो करना था। ऐसे में यदि एक स्वस्थ बहस विकासवाद पर चलती है, तो इसमें विज्ञानियों को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?
प्रश्न उठता है कि देश में विकासवाद पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? दुनिया में विकासवाद पर बहस चल रही है। ढेरों विज्ञानी हैं जो विकासवाद को नहीं मानते, उसका खंडन करते हैं। तर्क, अनुभव और प्रयोगशालाओं में विकासवाद खरा उतरता भी नहीं है, फिर ऐसी विवादित परिकल्पना को एक निश्चित सिद्धांत के रूप में बच्चों को पढ़ाए जाने का औचित्य क्या है? यदि देश के विज्ञानियों तथा बुद्धिजीवियों ने इस पर चर्चा की होती तो संभवत: मंत्री सत्यपाल सिंह को बयान देने की आवश्यकता ही नहीं होती।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि पूरी दुनिया में विकासवाद की कठोर आलोचना होती रही है। अगासीज जैसे अनेक जैवविज्ञानियों ने विकासवाद को एक मिथ्या सिद्धांत साबित किया है। चाल्र्स हैपगुड ने अपनी पुस्तक मैप्स ऑफ एनशिएंट सीकिंग्स में विकासवाद पर आधारित पाषाणयुग, कांस्ययुग, लौहयुग आदि की अवधारणा को सिरे से खारिज किया है। स्वयं चाल्र्स डार्विन के बेटे जार्ज डार्विन ने भी अमेरिकी नेशनल साईंस कांग्रेस में अपने पिता की परिकल्पना को एक दिवास्वप्न कहा था। केवल अपने देश में ही इस विषय पर प्रश्न उठाने को अवैज्ञानिक और पोंगापंथ माना जाता है। क्या यह एक प्रकार का कठमुल्लापन नहीं है?
विकासवाद को वैज्ञानिक सिद्धांत कहने और मानने वाले लोगों से पूछा जाना चाहिए कि इस सिद्धांत को देने से पहले चाल्र्स डार्विन ने कौन से प्रयोग किए थे? किसी को भी यह जानकर हैरानी हो सकती है कि चाल्र्स डार्विन ने कोई प्रयोग नहीं किए थे। उन्होंने अफ्रीका में घूमते समय नए-नए जानवरों को देखा, जंगलों में रहने वाले कबीलाई लोगों को देखा और कूद कर इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि जानवरों में एक प्रकार की सूत्रबद्धता है और वह इससे ही आई होगी कि एक प्रजाति दूसरे से विकसित हुई हो। इसको उन्होंने मनुष्यों पर भी लागू किया, क्योंकि उन्हें यह भी साबित करना था कि गोरे-चिट्टे यूरोपीय इन कबीलाइयों से अधिक विकसित और सभ्य हैं, जोकि वे थे नहीं।
बाद के विज्ञानियों ने डार्विन की इस कल्पना को साकार करने के लिए बहुत मेहनत की। समस्या उन्हें चेतन तत्व के साथ आती थी। सारी कवायदों के बाद भी वे चेतन तत्व के रहस्य को नहीं समझ पाए। वे यह नहीं समझ पा रहे थे और आज भी समझ नहीं पा रहे हैं कि अमीनो एसिड आदि सभी बिल्डिंग ब्लाकों को बना चुकने के बाद भी वे चेतन तत्व क्यों नहीं बना पा रहे हैं? स्वयं डार्विन को भी अपने सिद्धांत पर पूरा भरोसा नहीं हो पा रहा था। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि आँखें जैसी जटिल संरचनाएं यूँ ही नहीं विकसित हो सकतीं। ऐसी संरचनाओं का निर्माण एक बुद्धिमत्तापूर्ण चेतन द्वारा ही किया जाना संभव है।
इतना ही नहीं, उत्तर इस बात का भी नहीं है कि जब प्रजाति म्यूटेट हो रही थी, तो पूरी प्रजाति म्यूटेट क्यों नहीं हुई। आखिर कुछ बंदर तो मनुष्यों में बदल गए, शेष वैसे ही क्यों रह गए? बकरियों की कुछ नस्लें तो जिराफ बन गईं, शेष बकरी ही क्यों रह गई? वे यह भी नहीं बता पा रहे हैं कि प्रारंभिक जीव तो अभी भी उपलब्ध हैं, उनसे विकसित हुए जीव भी आज उपलब्ध हैं, फिर उनकी बीच की कडिय़ां ही क्यों गायब हैं? जब वातावरण बदला और प्रलय जैसे हालात हुए तो वे प्रारंभ की अविकसित प्रजातियां क्यों नहीं नष्ट हुईं, बीच वाली जिन प्रजातियों की ये कथित विज्ञानी कल्पना करते हैं, वे क्यों नष्ट हो गईं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये बीच की कडिय़ां केवल कल्पनाएं मात्र ही हैं, उनका कोई वास्तविक अस्तित्व कभी रहा ही नहीं है? प्रश्न बहुतेरे हैं, जिनपर कोई विज्ञानी ही विचार कर सकता है।
वर्तमान स्थिति यह है कि आधुनिक विज्ञान अपनी तमाम प्रगति के बाद भी विकासवाद को सत्यापित नहीं कर पाया है। इसके विपरीत भारतीय अवधारणा जिसे कि पाश्चात्य विज्ञान के अंधानुगामी भारतीय विज्ञानी विचारणीय तक नहीं मानते, क्रमश: सही साबित होते जा रही है। उदाहरण के लिए वेद और बाद में सांख्य दर्शन स्पष्ट रूप से अंतरिक्ष से जीवन के पृथिवी पर आने की बात करते हैं। आज का विज्ञान भी इसे स्वीकारने लगा है। वे यह मानने लगे हैं कि आरएनए अंतरिक्ष से ही पृथिवी पर आए हैं।
पंडित रघुनंदन शर्मा, वैद्य गुरुदत्त जैसे अनेक भारतीय विद्वानों ने विकासवाद की गहरी समालोचना की है। वैदिक संपत्ति में पंडित रघुनंदन शर्मा ने लुप्त जंतुशास्त्र, तुलनात्मक शरीर रचना शास्त्र जैसे कई विभागों के आधार पर विकासवाद पर जो प्रश्न वर्ष 1932 में खड़े किए थे, आज का विज्ञान अभी तक उन पर निरुत्तर ही है।
मानव सभ्यता का इतिहास भी विकासवाद को गलत साबित करता है। आज से तीन सौ वर्ष पहले तक बाइबिल की सीमा में बंधा यूरोप का विद्वत् वर्ग दुनिया की आयु केवल 6000 वर्ष की मानता था। जब उन्हें यह पता चल गया कि पृथिवी की आयु इससे अधिक है तो उन्होंने मानव सभ्यता का इतिहास 6-7 हजार वर्षों में समेट दिया। इसमें विकासवाद काम आया, क्योंकि विकासवाद के अनुसार 10-12 हजार वर्ष पहले मानव विकसित स्वरूप में था ही नहीं। परंतु भारत की परंपरा के अनुसार मानव सभ्यता का इतिहास लाखों और करोड़ों वर्षों का बताया जाता है। ऐसे में भारतीय परंपरा के इतिहास के अनुसार विकासवाद एक अशुद्ध परिकल्पना ही साबित होता है।
इसलिए पाश्चात्य विद्वानों ने सबसे पहले भारतीय इतिहास को ही मिथक साबित करने की पूरी कोशिश की। हालांकि विज्ञान की आधुनिक प्रगतियों ने बाइबिल पर आधारित समयसीमा को मिथ्या साबित कर दिया है, परंतु यूरोपीय विद्वान अभी भी मानव सभ्यता के इतिहास को 10-12 हजार वर्ष में बाँधने के असफल प्रयास में जुटे हुए हैं। इसमें उनका अंतिम सहारा विकासवाद ही है। इसके मिथ्या साबित होते ही भारत की ऐतिहासिक परंपरा की सत्यता स्थापित हो जाएगी। इसलिए आवश्यकता है कि मंत्री सत्यपाल सिंह जी के कथनानुसार सरकार एक दो अथवा तीन दिवसीय सेमीनार का आयोजन कराए, जिसमें डार्विन के विकासवाद पर गहरी चर्चा की जा सके।