वाइरस को रोकते हैं फलियां और बीज

वाइरस को रोकते हैं फलियां और बीज

जवाहर लाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
बहुत से लोग कुछ खाद्य पदार्थोंं से इतने अभिभूत होते हैं कि वे यह घोषणा करने से भी नहीं चूकते कि अमुक अनाज, फल, शाक या फली ही सम्पूर्ण आहार है, उसे खाने के पश्चात कुछ और खाने की आवश्यकता ही नहीं रहती। कुछ पदार्थों को अमृत तक कहा जाता है। लेकिन यह केवल अतिरंजना ही है। ऐसा इसलिए होता है कि प्रकृति में बहुत सी वनस्पतियों में इतने सारे गुण होते हैं कि लगता है कि और कुछ खाने की आवश्यकता ही क्या। लेकिन प्रकृति ने अभी तक ऐसा कोई आहार विकसित नहीं किया है, जिसमें शरीर के सर्वांगीण विकास के सारे तत्त्व उसी मात्रा में हों जिसमें उनकी आवश्यकता होती है। इसलिए संतुलित आहार बहुविधि ही होगा।
शरीर के लिए आवश्यक बहुत सारे महत्त्वपूर्ण तत्त्व किसी एक प्राकृतिक उत्पाद में भले न हों, परंतु किसी एक वर्ग में अवश्य देखे गए हैं। जैसे, गिरियांें, बीजांे और फलियों को एक ही वर्ग माना जाए तो यह बात स्पष्ट होगी। लुइसियाना, अमेरिका के राजकीय विश्वविद्यालय के चिकित्सा केंद्र के डाक्टर पेलेयो कोरिया ने एक सर्वेक्षण किया और पाया कि जिन देशों में विभिन्न प्रकार की फलियों जैसे मटर, बीन्स आदि अनेक तरह के बीज और अखरोट, बादाम, मूंगफली आदि का अधिक उपयोग होता है, उन देशों में आंतांे, फेफड़ांे और प्रोस्टेट के कैंसर की बीमारी बहुत कम होती है। उन्होंने यह सर्वेक्षण 41 देशों में किया था। इससे उन्हें कोई हैरानी नहीं हुईं क्योंकि अमेरिका के ही डाक्टर वाल्टर ट्रॉल ने फलियांे और गिरियों के चमत्कार के बारे में महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किया था। वे तो आरम्भ में अरहर जैसी दाल से ही बडे़ प्रभावित थे। यह हमारे लिए दाल हो लेकिन है तो बीज ही। लेकिन जापान जाने के बाद उन्हें पता चला कि यह तो केवल शुरुआत ही है, इस वर्ग में मटर से लेकर सोयाबीन और राजमा जैसी फलियों से लेकर मूंग दाल भी शामिल है। मूंग मूल रूप से फली ही होती हैं। फिर इस में गिरियां, अखरोट, बादाम और मूंगफली भी शामिल हो गईं।
ट्राल मुख्य रूप से पर्यावरण विशेषज्ञ हैं। उन्होंने पाया कि इन पदार्थों में कई प्रकार के रासायनिक तत्त्व होते हैं जिन्हें उन्होंने प्रोटईज कहा। यह पदार्थ खाने के साथ अंतड़ियों में जाते हैं। आमाशय और आंतों के पाचक द्रव्यों के कारण ये दालें, फलियां या गिरियां चूर चूर हो जाती ह,ेैं लेकिन इनके बीच कुछ तत्त्व ऐसे भी होते हैं जो टूटते नहीं। वे बहुत छोटे होते हैं लेकिन साबूत रहते हैं। ये इतने सख्तजान होते हैं कि जानवर जब इन पदार्थों को खाते हैं तो उनके पेट में भी वे नष्ट नहीं होते, बीट के साथ बाहर आते हैं और वनस्पति को पुनर्जीवन प्रदान करते हैैं। पीपल के पौधे को किसी दीवार या खंडहर में उगते देख हैरानी होती हैं वहां बीच में किसने बोया होगा। उसे मनुष्य ने नही बोया, उसे बोने वाले कबूतर होते हैं जिनकी बीट में वह बीज होता है जो उस फल का होता है, जिसे उन्होंने कई दिन पहले खाया था। प्रजाति की निरंतरता को बनाए रखने का प्रकृति का यह अपना तरीका है।
चूंकि पश्चिम में कैंसर की चुनौती बहुत बड़ी चुनौती मानी जाती है, इसलिए अधिकांश वैज्ञानिक हर प्रकार के अनुसंधान में इस चुनौती का जवाब खोजने का ही प्रयास करते रहते हैं। डाक्टर ट्रॉल का ध्यान भी इसी ओर गया। उन्होंने पाया कि ओंकोजीन्स जो आम तौर पर हर सामान्य कोशिका मंे निवास करते हैं, तब तक कुछ हानि नहीं पहुंचाते जब तक वे सक्रिय न हो जाएं। उनकी सक्रियता का मतलब होता है कि उनमें कुछ कोशकीय परिवर्तन होने लगता हैै। सक्रिय ओंकोजीन कैंसर सेल में बदल जाता है। प्रोटईज मे इस कार्रवाई को कम करने की प्रभावशाली क्षमता है। जब यह अनुसंधान हुआ उस समय चिकित्सक मानने लगे थे कि एक बार जब कैंसर के कारण कोशिकाओं का डीएनए क्षतिग्रस्त हो जाता है तो कैंसर को रोकना असंभव हो जाता है। लेकिन ट्रॉल के अनुसंधान से यह सिद्ध हुआ कि अगर हम इस यथास्थति को भी वहीं रोक सकते हैं तो हम कैंसर से बच सकते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं ने यह भी पाया कि जो काम प्रोटईज कैंसर के बारे में करता है, वही काम वह अन्य सभी प्रकार के वाइरस के विरुद्ध भी कर सकता है। वाइरस के बारे मंे एक दिलचस्प बात है कि वह एक प्रकार के आवरण में रहता है। इसे वैज्ञानिक ‘कोट’ कहने लगे हैं। किसी स्वस्थ कोशिका में प्रवेश करने के लिए उसे यह कोट उतारना पडता है। प्रोटईज उसके रास्ते में ऐसी बाधा पैेदा करता है कि वह कोशिका मे जा ही नही सके। वह उसे अपना कोट उतारने ही नहीं देता। बैक्टीरिया के विपरीत वाइरस अपने आप नहीं फैलता, उसे अनेक बनने के लिए कोशिका की आवश्यकता होती है। कोशिका की सुविधाओं का प्रयोग करके ही वह बहुगुणित होता रहता है। यदि वह कोशिका में नहीं जा पाए तो निष्क्रिय हो जाता है।
जॉन होप्किन्स मेडिकल स्कूल के अनुसंधानकर्ताओं ने डाक्टर ट्रॉल और दूसरे वैज्ञानिकों के इस दावे को पहले चूहों पर जांचा और फिर वास्तविक मानव रोगियों पर परीक्षण किया। प्रयोगों से पाया गया कि प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले प्रोटईज बाजार में बिकने वाली अधिकांश वाइरस प्रतिरोधी दवाइयों से अधिक प्रभावी हैं। एलोपैथिक औषधियों में एक खतरा बना रहता है। ये औषधियां कोशिकाओं के भीतर से काम करती हैं। यानी इससे इस बात का खतरा हो जाता है कि लंबे समय तक उनके उपयोग से कहीं कोशिकाओं की दीवारें कमजोर न हो जाएं और उससे कोशिकाओं की संरचना ही क्षतिग्रस्त न हो जाए। ऐसा होगा तो वाइरस से कोशिका को बचाने के बदले दवा उसे कोशिका के भीतर जाने में और सहायता दे देगी। लेकिन प्राकृतिक प्रोटईज कोशिका की दीवारों को इस सेंधमारी से बचाते हैं। यानी प्राकृतिक तरीका शांतिपूर्ण और अधिक सुरक्षित है।
मारक रोगांे को पैदा करने वाले वाइरस के विरुद्ध प्रकृति ने पर्याप्त आयुध बना रखे हैं, लेकिन उनका उपयोग करने के लिए धैर्य और अनुशासन की आवश्यकता होती है। हमारे देश में बाजार वाइरसरोधी औषधियो से परिपूर्ण प्राकृतिक पदार्थ से भरे पड़े रहते हैं। विभिन्न फलियां जैसे राजमा, चाहे लाल हो या चितरी, काली हो किडनी राजमा, मूंग, मटर और अन्य प्रकार की दालें जैसे अरहर, सोयाबीन आदि के साथ, बादाम, अखरोट, मूंगफली का दाना, जौ, गेहूं, चावल, मक्का, जैसे अनाज और पालक, मेथी जैसे शाकों में से हम संतुलित आहार बना सकें तो मान लीजिए कि हमें कैंसर समेत अनेक वाईरसजनित रोगों के विरुद्ध कवच मिल जाएगा।