वकीलों जैसी दलील देते थे उपन्यासकार गुरुदत्त


डॉ. शशिभूषण सिंहल
हिन्दी उपन्यासकारों में वैद्य गुरुदत्त का नाम अपने विशिष्ट सन्देश, विपुल रचना परिमाण और असाधारण लोकप्रियता के कारण विशेष उल्लेखनीय है। सन् 1942 में, अड़तालीस वर्ष की आयु में गुरुदत्त का सर्वप्रथम उपन्यास स्वाधीनता के पथ पर प्रकाशित हुआ था। इतनी प्रौढ़ावस्था में उनका कलाकार एकाएक स्फुरित होकर फिर मन्द नहीं हो गया वरन् उत्तरोत्तर अधिक प्रबल होकर रचना क्षेत्र में छा-सा गया। उनकी लेखनी ने अथक यात्रा करते हुए लगभग सौ बृहदाकार उपन्यासों को जन्म दिया। उनकी इस सृजन सामथ्र्य का स्रोत विचारणीय है। गुरुदत्त की यह सामथ्र्य दो बातों में निहित है। एक है, उनका सुस्पष्ट प्रखर दृष्टिकोण, जो उनके कलाकार की मूल प्रेरक है। दूसरी है, उनकी प्रबल रचना शक्ति जो थकना नहीं जानती।
संयोगवश हिन्दी साहित्य क्षेत्र में अभी तक गुरुदत्त के कृतित्व का उल्लेख बहुत कम हुआ है। उनके रचना परिणाम से आतंकित लोगों को आलोचकों द्वारा उन्हें पढऩे-समझने का साहस न करना, स्वाभाविक जान पड़ता है। साथ ही उनकी असाधारण लोकप्रियता को साहित्यिक क्षेत्र से बाहर का लक्षण मान कर, वे उन्हें साहित्यिक मान्यता देना अनावश्यक समझते हों तो आश्चर्य नहीं।
प्रस्तुत लेख में गुरुदत्त के उपन्यासों की लोकप्रियता पर विचार किया जा रहा है। गुरुदत्त एक कर्मठ व्यक्ति रहे हैं। जीवन में उनकी दृष्टि सर्वथा व्यावहारिक रही है। वे कला को जीवन के प्रति उत्तरदायी मानते हैं। इसलिए उनके सभी उपन्यास सोद्देश्य हैं। अपने जीवनसम्बन्धी संदेश को पाठक समाज तक पहुंचाने का उत्तम साधन गुरुदत्त को उपन्यास रूप में प्राप्त हुआ है। अपनी बात को वकील जैसी जोरदार दलीलों के रूप और रोचक ढंग से प्रस्तुत कर देने में उनका कलाकार पूर्णकाम हो जाता है। फिर उसे औपन्यासिक शिल्प की अतिरिक्त सूक्ष्मताओं के पीछे भटकने का अवकाश नहीं रहता। गुरुदत्त की यही विशेषता उनके उपन्यासकार की सामथ्र्य और सीमा दोनों है।
गुरुदत्त की रचना विधा के विश्लेषण के प्रसंग में, सामान्य रूप से उपन्यास रचना प्रक्रिया यहां विचारणीय है। उपन्यास रचना के आधार तत्व तीन है— ये है कथ्य, कथा और पात्र। कथ्य वह दृष्टि है जिससे उपन्यासकार जीवन को देखता है, समझता है और प्रस्तुत करता है। इस कथ्य को साक्षात् प्रस्तुत करने वाला मानव प्रतिनिधि, उपन्यास में पात्र है और, पात्रों के चरित्र के फलस्वरूप विकसित होने वाली परिस्थिति कथा है। उपन्यासकार प्राय: किसी उपन्यास की रचना के निमित, सर्वप्रथम बीज—रूप में इन तीनों में से किसी एक तत्व का अपने अन्त:करण में साक्षात्कार करता है। फिर वह शेष दो तत्वों को उनके आधार पर अपने चेतन या अचेतन मन में पल्लवित करके उपन्यास का सूक्ष्म मानसिक ढांचा तैयार करता है। जैसे यदि किसी उपन्यासकार को पहले कोई कथा या प्रमुख घटना सूझती है तो फिर वह उसमें उपयुक्त पात्रों को संजोता है और कथ्य को व्यक्त करके उपन्यास की सृष्टि करता है।
गुरुदत्त की उपन्यास रचना प्रक्रिया के विषय में निश्चित रूप में कहा जा सकता है कि उन्हें उपन्यास का कथ्य पहले सूझता है। उस कथ्य या जीवन दृष्टि को एक सुनिश्चित ढांचा देकर वे उसे किसी विशिष्ट प्रसंग में व्यक्त करते हैं। यह प्रसंग सूत्र ही उनकी कथा बन जाता है। इस प्रसंग सूत्र के विधिवत् विकास के लिए वे अपेक्षित पात्रों की रचना करते हैं। पात्र एक प्रकार के कथ्य और कथा के अधीन रहते हैं। इसलिए उनके उपन्यासों में (कथ्य के कारण) वैचारिक सुस्पष्टता और (कथा और कारण) कुतूहल तत्व की प्रधानता रहती है। चारित्रिक सूक्ष्मता और चित्रण कौशल गौण रहने के कारण ही उनके पात्र अपनी स्वतंत्र, अविस्मरणीय छाप पाठकों पर कम छोड़ पाते हैं।
गुरुदत्त का कथ्य इंसान है। वे इंसान को इंसान के रूप में देखना चाहते हैं। इंसानियत या मानवता से तात्पर्य है, मनुष्य की वह स्थिति जिस में उनकी भावना,बुद्धि और कार्य शक्ति में समुचित सामंजस्य है। सच्चा मानव जो कुछ करता है, उस कर्म में विवेक और सहदयता का तत्व रहता है। गुरुदत्त ने मानव जीवन की जो समस्याएं उठाई हैं, वे विशेष रूप से भारत देश और उसके वर्तमान युग के संदर्भ में देखी—परखी गई है। एक युग और एक देश की चेतना से प्रतिबद्ध होने के कारण उनके उपन्यासों का स्वर राजनीतिक तथा सामाजिक, नैतिक मूल्यों का है। वस्तुत: मानवीय मूल्यों का संबंध युग—युग तथा देश—देश की चेतना से रहता है। फिर भी गुरुदत्त की युगीन चेतना मानवीय मूल्यों के विरुद्ध नहीं पड़ती, वह अपनी सीमा—रेखाओं में रहते हुए भी अन्ततोगत्वा उन्ही का अनुसरण करती है।
गुरुदत्त भारत के राष्ट्रीय और सामाजिक प्रश्नों को अपने उपन्यासों में उभारते है। फिर वे उन प्रश्नों, समस्याओं को संघर्षात्मक रूप प्रदान करते है। संघर्ष के अन्तर्गत समस्या को उलझाने वाले क्रमश: दो विरोधी पक्ष स्वत: आ प्रस्तुत होते है। समस्या को सुलझानेवाले पक्ष की सहृदयता, विवेक दृष्टि और अनवरत संघर्ष सामथ्र्य के कारण पाठक उससे सहज सहानुभूति अनुभव करने लगता है। यह पक्ष उपन्यासकार का अपना है। पाठक इससे तादात्म्य स्थापित करके इसे अपना पक्ष बना लेता है। अपने पक्ष की तर्क संगति तथा उससे उद्भूत पौरुष को वह विशेष महत्व से देखने लगता है। यह अपनापन उसे उपन्यास से अलग नहीं होने देता। उसका मन समस्या में लिपट—लिपट कर संघर्ष की गहराई में उतरता चलता है। समस्या उसके लिए चुनौती है, और संघर्ष प्रक्रिया उसके दिवा स्वप्नों को अभिनव घटनाओं के रूप में चरितार्थ करती चलती है। उपन्यास में निहित यह चुनौती और गति पाठक को प्रारंभ से अन्त तक जकड़े रहती है।
गुरूदत्त ने भारत देश की सम्पूर्ण स्थिति पर बड़ी गंभीरता से विचार किया है। उनकी दृष्टि उसके वर्तमान में निहित कारणों का अन्वेषण करते करते इसके सुदूर अतीत तक चली गई है। उन्होंने देश के विगत और वर्तमान को पढ़कर उसकी समूची परम्परा को निरन्तर एक सूत्र में आबद्ध पाया है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में, समस्या मूल रूप से एक ही उनके सामने है कि देश का राष्ट्रीय जीवन कैसे निर्दोष और सुगठित हो। यह संगठन हो जाने पर उस में बल और गति स्वत: आ जाएगी। इस दृष्टि से प्रेरित होकर उन्होंने सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है। इन उपन्यासों में राजनीतिक तथा सामाजिक प्रश्नों की प्रधानता रहती है। ये प्रश्न अपना हल खोजते हुए हमारे विराट् सांस्कृतिक रूप की ओर ही इंगित करता है।
यहां संस्कृति शब्द का अर्थ स्पष्ट कर देना उपयुक्त होगा। संस्कृति के दो पक्ष हैं, बाह्य और आभ्यन्तर। इसके बाह्य और आभ्यन्तर परस्पर संबद्ध है और बराबर एक दूसरे को प्रभावित करते रहते है। वास्तव में, संस्कृति का बाह्य पक्ष उसके भीतरी पक्ष का ही प्रकट प्रतीक है। इस बाह्य पक्ष को सुविधा के लिए, सभ्यता और भीतरी पक्ष को संस्कृति कहा जाता है। सभ्यता किसी मनुष्य—जाति की जीवनयापन की संपूर्ण विधि है। इसके अन्तर्गत लोगों के भोजन, वस्त्र, निवास, व्यवहार आदि की सभी विशेषतायें आ जाती है। इस जीवनयापन विधि को जो मान्यता प्रभावित तथा संचालित करती है, वह संस्कृति है। सभ्यता यदि जीवनयापन विधि है, तो संस्कृति उस विधि की मानसिक भूमि है।
गुरुदत्त का उपन्यासकार एक जीवनयापन—विधि (सभ्यता) का चित्रण करने निकलता है। वह उसके समर्थक तथा विरोधी दोनों पक्षों को ला खड़ा करता है और दोनों में द्वन्द्व प्रक्रिया में वह प्रक्रिया में वह विधि स्पष्ट होती जाती है। और साथ ही उसका मूलभूत बौद्धिक पक्ष (संस्कृति) निखर कर ऊपर आता जाता है। उपन्यास की द्वन्द्व गति, उसका कुतूहलप्रद घटना चक्र तथा प्रसंग वैचित्र्य और प्रतिपादित तत्व से पाठक की अनिवार्य आत्मीयता के कारण, गुरुदत्त अपने गरिष्ठ कथ्य को साधारण पाठक के भी गले उतार कर सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकारों की पंक्ति में जा खड़े हुए हैं।
गुरूदत्त ने अपने उपन्यास—साहित्य में भारतीय जीवन का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, उसका सार इस प्रकार है। भारत की प्राचीन वैदिक संस्कृति सार्थक थी, उसके अन्तर्गत यहां का व्यक्ति और समाज, परस्पर सहायक बनकर विकसित होते रहते हैं। बाद में इस संस्कृति के कुछ तत्व क्षयशील हो चले । इसमें सबसे अधिक वर्णाश्रम—व्यवस्था का तत्व हानिकर सिद्ध हुआ। यह व्यवस्था प्रारम्भ में समाज में क्रम—विभाजन का सुविधाजनक आधार लेकर चली थी। इसक अनुसार समाज के लोगों का उनके व्यवसायों के आधार पर चार प्रमुख वर्गों या जातियों में संगठन किया गया था। सिद्धान्त अपने मूल रूप में प्राय: निर्दोष होते हैं किन्तु मनुष्य को स्वभावगत अहम् और स्वार्थ कालान्तर में उन्हें कुछ का कुछ बना छोड़ता है। वर्णाश्रम व्यवस्था का भी यही परिणाम हुआ । सुविधा प्राप्त वर्गों की दृष्टि में शारीरिक श्रम का मूल्य घट गया। सेवा करने वालों को नीचा कहकर सेवा लेने वालों ने अपने को ऊॅंचा और बड़ा कहा। जो बड़े थे, वे प्रमादवश अपने कर्तव्य को बिलकुल भूल बैठे। उन्होंने अपना बडप्पन अपनी संतति में भी सुरक्षित रखने के लिए जाति भेद का आधार कर्म न मानकर मनुष्य के जन्म को निश्चित कर दिया।
इस मान्यता का अर्थ हुआ हुआ कि व्यक्ति अपने कर्म से अच्छा या बुरा कैसा ही क्यों न हो, फिर भी ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण और शूद्र का पुत्र शूद्र होगा। इस मनमानी व्यवस्था ने भारतीय समाज को अकर्मण्यता, शोषण, कटुता तथा विद्रोह की भावना से विषाक्त कर दिया। फल हुआ कि भारत का सांस्कृतिक आधार जर्जर हो गया। यहां के राष्ट्रीय जीवन के प्रमुख लक्षण पाखंड, विडंबना और पतन हो गए। देश का आन्तरिक संगठन सूत्र छिन्न हो गया। भीतरी दुर्बलता ने बाहरी आक्रमणों को इस सुखद भारत भूमि को लूटने और इस पर राज्य करने का आमंत्रण दिया।
संस्कृति के इस विघटन—काल में बौद्ध मत का विकास हुआ। बौद्ध मत ने संकीर्णता को समाप्त कर उदारता और वैमनस्य को हर कर उदारता का प्रसार करना चाहा था। उसने वैदिक आदर्शों को संशोघित करते—करते उन्हें समूल नष्ट कर दिया। इस नयी दृष्टि ने समाज को वैदिक कर्मकांड के जंजाल तथा ब्राह्मणों की मनमानी से छुटकारा तो दिलाया, किन्तु बदले में कोई व्यावहारिक विधान ने जुट पाने के कारण इससे देश को हानि ही हुई। बौद्धों के प्रभाव से संघर्ष और कर्मठता की रही—सही प्रवृत्ति जन—मन से लुप्त हो गई। निर्वाण के फेर में जन—मानस अपने पौरूष से हाथ घो बैठा। हर व्यक्ति अपने आप में अकेला हो गया। उसकी संघ शक्ति और संघर्ष प्रवृत्ति निरीह निवृत्ति में परिणत हो गई। साथ ही बौद्ध—विहारों का आन्तरिक बल चुक गया। वहां निर्वाण—लिप्सु भिक्षुणियां अपनी अतृप्त वासनाओं की होली खुल खेलने लगे। फिर बौद्धों को अपना सामाजिक प्रभाव अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कुचकों, षड्यन्त्रों द्यारा राजनीति पर अधिकार करने की सूझी सम्प्रदाय का स्वार्थ राष्ट्रीय हितों से ऊपर हो गया। साधारण जन भाग्यवाद का, अतिभौतिक शक्तियों का काल्पनिक सहारा लेकर दिन काटने लगा। राज्यों के संगठन समाप्त होने और छोटे गण राज्यों के बढ़ते जाने से देश काटने लगा। राज्यों के संगठन समाप्त होने और छोटे गण राज्यों के बढ़ते जाने से देश का संगठन शिथिल हो गया। क्षेत्रीय भावना राष्ट्रीय भावना की स्थानापन्न हो गई। परिणाम हमारे सामने है। सम्राट् हर्षवर्धन के बाद देश में अराजकता और आपाधापी की जो आंधी चली उसके अंघेरे में हजार वर्षों से भी अधिक काल तक भारत लुट पिट कर दास बना रहा।
आज भी हमारा देश उन्ही ह्रासशील प्रवृत्तियों से पीडि़त है। वही स्वार्थपरता, संकीर्णता, विमूढता, अकर्मण्यता,अकर्मण्यता, शिथिलता हमारे राष्ट्रीय जीवन की क्षमताओं को धुन की भांति खाये जा रही है। हमारा क्या राष्ट्रीय और क्या सांस्कृतिक, सम्पूर्ण जीवन ही थोथे कल्पित आदर्शों और अन्तविरोध के तनाव को न सह सकने के कारण टूटा जा रहा है। मनुष्य—मनुष्य की तरह नहीं जी पा रहा। साम्प्रदायिक हित उसके नैसर्गिक कुशल—क्षेम को चट कर गए हैं।
आखिर यह अन्तविरोध और तनाव की स्थिति के छुटकारा कैसे मिले? इस चिर—प्रश्न का समुचित उत्तर भी गुरुदत्त के उपन्यास देते हैं। वे सम्पूर्ण कलह को दूर करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के धर्मपालन पर बल देते हैं। धर्म शब्द बड़ा पुराना है और रूढिय़ों के बीच घिसटने—घिसटने खासा घिस गया है। गुरुदत्त की व्यावहारिक सतर्क दृष्टि ने इस शब्द का बिलकुल सहज, स्वाभाविक अर्थ लिया है। धर्म का अर्थ उन्होंने कर्तव्य किया है। व्यक्ति का अपने विकास और समाज—रक्षक के लिए जो करना उचित है, वही उसका कर्तव्य है। इस कर्तव्य का जो पालन करता है। वह धर्म को धारण करता है। इस कर्तव्य की व्यावहारिक सार्वभौम कसौटी है— दूसरों से वही व्यवहार करो, जो स्वयं अपने लिए अनुकूल समझते हो। यही मान्यता मनुष्य को जियो और जीने दो का अनिवार्य पाठ पढ़ाती है।
इस कर्तव्य या धर्म के निर्विवाद लक्षण गुरुदत्त ने स्वीकार किए हैं। वे मनुष्य के मन और शरीर को संतुलित बनाना चाहते हैं। मनुष्य शारीरिक रूप से स्वच्छ हो, स्वस्थ हो। वह अपनी इन्द्रियों के वश में न होकर अपने विवेक द्वारा उन्हें संचालित करने का सामथ्र्य रखता हो। विवेक को पुष्ट करने के लिये जीवन और साहित्य का अध्ययनशील हो। अपनी जीवन यात्रा में वह सहजभाव से गतिशील हो, उसमें धैर्य हो उसका व्यवहार संयमित हो। वह अपने परिश्रम फल पर निर्भर रहे, लोभ के वश होकर दूसरों की उपलब्धियों का अपहरण न करे। दूसरों की भावना के प्रति उसमें सहशीलता हो और अपनी कामना न पूरी होने की दशा मे भी वह क्षुब्ध न हो।
जन—जन में एकता का दर्शन कर सद्भाव स्थापति करने वाले इस शुद्ध आचरण को गुरुदत्त हमारे देश की संस्कृति या परम्परा का सार मानते हैं। इसे वे हिन्दू धर्म कहते हैं। वस्तुत: वह मानव धर्म है। वे इसे भारत के संदर्भ में हिन्दू हिन्दुस्तानी या भारतीय धर्म का नाम देना उचित समझते हैं। इस धर्म का पालन भारत देश में रहने वाले सभी मताबलम्बी बेखटके करके सुखी रह सकते है। सम्प्रदाय बुद्धि भेद का विषय है किन्तु धर्म एक ही है। धर्म मनुष्य का आत्म परिचय कराता है, वह आत्मा का विषय है सांप्रदायिक अर्थ में हिन्दू, मुसलमान,सिख, ईसाई आदिमत अपना पृथक् अस्तित्व रख सकते हैं किन्तु उनका लक्ष्य धर्म एक ही है। धर्म सम्प्रदाय भेद को बढाता नहीं है। सभी सम्प्रदायों की गति इसी केन्द्र की ओर होनी चाहिए।
गुुरुदत्त भारतीय धर्म की छाया में सभी सम्प्रदायों को फलता—फूलता देखना चाहते हैं। यहां की राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था से वे अपेक्षा रखते हैं कि उनके द्वारा सभी भले लोगेां का अधिक से अधिक कल्याण हो। देश में धर्मपालक व्यवस्थाप्रिय लोगों को उनकी सौजन्यता के कारण निरीह समझ कर, कोई उन्हें कष्ट पहुंचाये,यह विषमता उपन्यासकार गुरूदत्त को असह्य है। वे दुष्ट को दण्ड देना सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य मानते हैं। एक स्थान पर वे लिखते हैं – दुष्टों के आगे घुटने टेकना, उन्हें बढ़ावा देना है। किसी थोथे आदर्श की आड़ में उन्हें तुष्ट करने की नीति देशघातक सिद्ध होगी। देश के सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में संतुलन आने पर दृष्टिकोण राष्ट्रीय होगा। हमारा राष्ट्र आन्तरिक सामथ्र्य प्राप्त करने पर ही अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान पा सकेगा। अन्यथा हमारे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय नारे विडम्बना मात्र बनकर रह जायेंगे।
गुरुदत्त का यह कथ्य उनके प्रत्येक उपन्यास में किसी न किसी रूप में प्राप्त है। वे प्रकरण वैभिन्न्य से अपनी बात नये—नये रूपों में रखते है। उनके चिन्तन तथा कला से परिचित होने के लिए पाठकों को ये प्रतिनिधि उपन्यास पढऩे के लिए सुझाये जा सकते है। इतिहास तथा परम्परा विषयक उनके उपन्यास हैं — पत्रलता, लुढ़कते पत्थर, खंडहर बोल रहे हैं तथा जमाना बदल गया। वर्तमान राष्ट्रीय समस्याओं को स्पष्ट करने में सहायक उपन्यास स्वाधीनता के पथ पर पथिक विश्वासघात तथा देश की हत्या है। हमारी पारिवारिक सामाजिक व्यवस्था पर प्रकाश डालने वाले श्री गुरुदत्त के प्रमुख उपन्यास गुठन तथा मानव है।