लोहड़ी की मिटती परम्परायें

लोहड़ी पंजाबियों का एक प्रमुख त्योहार है। इसे माघ महीने में जबकि शीत पूरे जोवन पर होती है हजारों सालों से पंजाब में मनाया जा रहा है। इसके साथ एक लोक कथा जुड़ी हुई है। मेरे बचपन में बच्चे जिनमें किशोर-किशोरियां दोनों शामिल होते थे घर-घर लोहड़ी मांगने जाते थे। लोहड़ी मांगने वाले एक लोकगीत गाते थे। इस गीत के बोल होते थे “दुल्ले दी धी ब्याही सेर शक्कर पायी कुड़ी दा कौन विचारा दुल्ला भट्टी वाला“ यह एक लम्बा लोकीगत था जिसे किशोर-किशोरियां घर-घर जाकर गाया करते थे और इस गीत के समाप्त होने के बाद बच्चे मोह माई (लोहड़ी) मांगते थे। लोकगाथा के अनुसार मुगलों के काल में एक ब्राह्मण की सुन्दर बेटी थी जिसे लाहौर का मुस्लिम सूबेदार विवाह से दो दिन पूर्व जबरन उठाकर ले अपने महल में ले गया था। ब्राह्मण ने जब सूबे के दरबार में जाकर फरीयाद की तो उसे वहां से मार-पीटकर भगा दिया गया। ब्राह्मण रोता-पीटता मुगल शासकों के खिलाफ संघर्षशील एक स्थानी डाकू दुल्ला भट्टी नामक एक डाकू के पास जा पहुंचा और उसे अपनी व्यथा कह सुनाई। दुल्ले ने अपने साथियों सहित उस महल पर हमला किया। खूब मार-काट हुई जिसमें ये मुगल सूबेदार भी मारा गया। मगर दुल्ला इस लड़की को सुरक्षित बचा लगाया। विवाह के निश्चित दिन दुल्ला भट्टी ने उसकी धूमधाम से शादी की और सारा खर्च खुद उठाया। लोकगाथा के अनुसार यह घटना मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में हुई थी। पंजाबी मुगलों के इस अत्याचार को हमेशा याद रखने के लिए सदियों से इस गीत को गाते चले आ रहे हैं। हालांकि वो अब इसकी पृष्ठभूमि नहीं जानते।

पंजाब में लोहड़ी के अवसर पर एक लकड़ी का अलाव जलाया जाता है जिसमें रेवड़ियां और मक्के के भूने हुए दाने डाले जाते हैं। गुड़, शक्कर को रेवड़ियों और फुल्लों (पापकाॅर्न) के साथ लोगों में बांटा जाता है। इस अवसर पर लोग जिनमें औरतें, मर्द और बच्चे शामिल हैं खूब भांगड़ा, गिद्दा जैसे लोकनृत्य किए जाते हैं। अब यह पुरानी परम्परा लगभग खत्म होती जा रही है।