लोक संस्कृति का पर्याय है लोकगीत

लोक संस्कृति का पर्याय है लोकगीत

शशिप्रभा तिवारी
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

लोक भारत का एक अनुभवजन्य रूप है। ‘लोक‘ का अर्थ है – जो यहां है। लोक का विस्तृत अर्थ है – लोक में रहनेवाले मनुष्य, अन्य प्राणी और स्थावर, संसार के पदार्थ, क्योंकि ये सब भी प्रत्यक्ष अनुभव के विषय हैं। यह लोक अवधारणा मात्रा नहीं है, यह कर्मक्षेत्रा है। प्रत्येक कर्मकांड में लोक दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण है-एक तो लोक में जो वस्तुएं सुंदर हैं, मांगलिक हैं उनका उपयोग होता है। सात नदियों का जल या सात कुओं का जल, सात स्थानों की मिट्टी, सात औषधियों, पांच पेड़ों के पल्लव, धरती पर उगनेवाले कुश, कुम्हार के बनाए दीए व बरतन, ऋतु के फल-फूल-से सब उपयोग में लाए जाते हैं। दूसरे लोककंठ में बसे गीतों और गाथाओं, लोकाचार के क्रमों ओर लोक की मर्यादाओं का उतना ही महत्व माना जाता है, जितना शास्त्रा विधि का है। लोकाचार और लोक जीवन का अपना स्थान है। ऐसा हिंदी साहित्य के विद्वान डॉ विद्यानिवास मिश्र मानना था।
दरअसल, लोक जीवन से जुड़े ये लोक गीत हमारी संस्कृति की ही संगीतमय अभिव्यक्ति हैं। इन गीतों के जरिए कोई भी इंसान जीवन से सीधे जुड़ जाता है, चाहे वह दुनिया के किसी कोने में हो। वह सहज ही पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से सहज जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि जिन फिल्मों में भी लोकाचार के दृश्य या गीत होते हैं, वो फिल्म हिट भी होते हैं, और सालों-सालों के बाद भी लोग उसे दर्शक याद रखते हैं। यह लोकगीतों के रंग में भीने गीत-‘मैं तो छोड़ चली बाबुल के देश‘, ‘पान खाए सैंयां हमार‘, ‘जब तक पूरे ना हो फेरे सात‘, ‘कहे तो से सजना‘, ‘रेलिया बैरन‘ ‘ससुराल गंेदा फूल‘ को हर पीढ़ी के दर्शक-श्रोता सुनते।
बहरहाल, हमें यह शहरी और गंाव दोनों जीवन का आनंद लेने का सौभाग्य मिला। याद आता है, बचपन के वो दिन जब गांव में घर के आस-पास के घरों से सुबह-सुबह गीत मंगल के सुर कानों में गंूजने लगते थे। गेहूं या दूसरे अनाजों को जांता यानि चक्की में पीसते हुए, उन गीतों को गुनगुनाती थीं। उन दिनों तो यह सहज ही लगता था। पर आज गांव के वो गीत मौन हो गए हैं। क्योंकि, वहां भी जीवनशैली बदल गई है। जंतसार का एक गीत कानों में कुछ इस तरह गूंजता है- राम बगिया में पांच पेड़ अमवा,
पचीस गो महुअवा बाड़े हो राम।
राम तबहूं ना बगिया गमदेले,
एकली बेइलिया बिनु हो राम।
प्चीस गो सोपरिया खइलों में पान ना,
राम तबहू ना मुंह भइले लाल,
त एकली खबरिया बिनु हो राम।
राम सेर भरि सोनवा पहिरलों,
पसेरी भरि चनिया हो राम।
राम तबहूं ना देहिया सोहावनि,
एकली सेनुरिया बिनु हो राम।
राम सासु घरे पंाच गो देवरवा,
पचीस गो भसुरवा बाड़े हो राम।
राम तबहू ना ससुरा सोहावन,
एक रे सैंया बिनु हो राम।
UP_Malini Awasthi (slideshow).jpg--कहीं-न-कहीं इन गीतों को गाते हुए, ये ग्राम वधुएं अपने श्रम को भूल जाती होंगी। उनके पसीने का नमकीन अनाज को मीठास प्रदान कर देता होगा। शायद, वह लोकगीतों की मधुरता की मीठास ही होगी, जो घर, आंगन, रसोई यानि घर के हर कोने-कोने को गुंजायमान कर जाती थी।
उत्तर प्रदेश में कई लोकभाषाएं प्रचलित हैं, जैसे-भोजपुरी, अवधी, कनउजी, ब्रज और कौरवी। उत्तर प्रदेश जहां एक ओर पूर्वी क्षेत्रा में भोजपुरी के लोकगीत गूंजते हैं, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बृज के बृजभाषा के लोकगीत गाए जाते हैं और अवध में अवधी के लोकगीत। एक नजर में देखने पर सब एक जैसे ही लगते हैं। इसलिए, यह सहज स्वीकार किया जा सकता है कि एक लोक में विभिन्न समाजों के निवास के कारण ही नहीं, भाषा तथा मानव भावनाआंे के बदलने का कारण भी, अनेक विधि के लोकगीत हमें मिलते हैं। इन गीतों के विविध रंगों को देखकर लगता है कि हर प्रदेश के लोकगीत से परिचित होना असंभव तो नहीं पर मुश्किल जरूर है। भारतीय भाषाओं के संदर्भ में कहा जाता है कि कोस-कोस मंे पानी बदले, कोस-कोस पर बानी बदले।
लोकगीत में संवेदना, अनुभूति और अभिव्यक्ति की उद्दीप्त तीव्रता का समावेश होता है। हालांकि, लोकगीत कब पहली बार गाया गया, किसने गाया या किसने परिकल्पना की होगी। यह शोध का एक अलग विषय हो सकता है। पर वह गीत जरूर अनुभूति नितांत लौकिक होगी। तभी तो कहा जाता है कि लोकगीत जीवन-संस्कृति से जुड़े हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। खेतों में का करते हुए या मजदूरी करके लौटते हुए, श्रमिक वर्ग की महिलाएं और पुरूष अपनी थकान मिटाने के लिए गाते-बजाते रहे हैं। सावन के बरसते बूंदों के बीच भींगती महिलाएं सोहनी के गीत को कुछ इन शब्दों में गुनगुनाती हैं-
‘ननदी अंगनवां लंवग गाछि बिरवा हो,
लवंग चुएला सारी रात हो राम।
लवंग बीनि बीनि सेजिया डंसवली हो
सेवन चलेले कुंवरवां हो राम।‘
इसी तरह धान के बीजड़े को रोपने के दौरान भोजपुरी में रोपनी के गीत कुछ इस तरह गुनगुनाती हैं-
‘बाबा मोर रहितें त नीक बर खोजीतें
भइया खोजलें वर गदेलवा हो राम।
से हो गदेलवा देखि धइलीं धीरजवा,
कुछ दिन में उगइलें परदेसवा हो राम।
लोक साहित्य की रचनाकार डॉ शांति जैन ने भोजपुरी गीतों को खूब लिखा। उन्होंने चैती, कजरी, बारहमासा, व्रत व त्योहार के गीतों की विशेषतौर पर रचना की है। डॉ शांति जैन कहती हैं कि इनदिनों भोेजपुरी लोकगीतों में बहुत ज्यादा अश्लीलता आ गई है। लोग ऐसे गीत लिखने और गाने लगे हैं, जिनका हमारे संस्कारों और संस्कृति से कोई वास्ता नहीं है। यह दुखद स्थिति है। दरअसल, लोक तो जीवन का आनंद का दूसरा नाम है। हमें उस आनंद की प्राप्ति के लिए खुद अच्छा संगीत सुनने के संस्कार को विकसित करना चाहिए। विंध्यवासिनी देवी, शारदा सिन्हा जैसी कलाकारों ने इसे लोकप्रियता के साथ सभ्य लोगों के बीच पराकाष्ठा पर पहुंचाया है। इसको कायम रखना बहुत जरूरी है।
उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में वीर रस से ओत-प्रोत ‘आल्हा‘ गायन की परंपरा रही है। आल्हा और ऊदल की वीरता की कहानी को रागों और तालों में पिरोकर, आज भी गांवों में लोक कलाकार गाते हैं। आल्हा के मशहूर कलाकारों में डॉ लल्लू वाजपेयी का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। उनकी शिष्या युवा आल्हा गायिका शीलू सिंह राजपूत हैं। शीलू और उनके भाई पवन सिंह मिलकर आल्हा-ऊदल की कहानी को बहुुत प्रभावकारी अंदाज में गाते हैं। लोकगायिका शीलू सिंह कहती हैं कि आल्हा मुख्यतः उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में गाया जाता है। गांव में मैं बचपन से आल्हा सुनती रहीं हूं। लेकिन, जब पहली बार गुरू जी डॉ लल्लू जी को सुनी तो रोमांचित हो गई। मैंने उनसे इस विधा को सीखने की इच्छा जाहिर किया तो उन्होंने कहा कि यह तो लड़के गाते हैं, इसमें ताल ठोंकना पड़ता है, मूंछ पर ताव देनी होती है और तलवार भाजना होता है। मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने मुझे सिखाया। उनके सानिध्य में वर्ष 2010 से 2013 तक रही। पहले तो इसे सिर्फ गांव के लोग ही सुनते थे। पर आज कल शहर के युवा भी इसे खुशी से सुनते हैं।
लोकगीत लोक जीवन में आनंद की सृष्टि के लिए हैं। गंाव व कस्बों में अलग-अलग पर्व-त्योहार के अवसर पर हाटों व मेलों का आयोजन होना एक आम बात होती थी। हर वर्ग की और हर उम्र की महिलाएं समवेत स्वर में गाती हुई दिखती हैं, तब ऐसा लगता है कि मानों, स्वर्ग ही पृथ्वी पर उतर आया है। उनकी भाषा, उनकी वेशभूषा, उनके गीतों की लय और संगीतात्मक ध्वनि हमारे आनंद का सहज कारण बन जाती है। औरतें घर की परेशानी और आपाधापी से दूर इन मेलों में अपने को तरो-ताजा करतीं थीं। इसलिए, मेलों के दौरान भी वह अपनी संगियों के साथ गाती थी-
‘धई देत्यो राम हमारे मन धीरजा,
सबके महलिया राम दियना बरतु है,
हरि लेत्यो हमरों अंधेरे, हमारे मन धीरजा।
धई देत्यो राम हमारे मन धीरजा।
वास्तव में, इन लोकगीतों में लोक संस्कृति ही मुखरित होती है। लोकगीतों का मुख्य उद्देश्य जीवन को अधिक आनंदमय बनाना है। संस्कृति की समावेश व्यक्ति के जन्म से लेकर अंतिम क्षण तक संस्कार रूप में हुई। आमतौर पर लोकगीत जीवन में रचा-बसा हुआ था। इन गीतों को सीखने के लिए महिलाआंे को किसी विशेष तालीम की जरूरत नहीं पड़ती। बल्कि, वह अपने काम करते हुए, घर के आयोजनों में शामिल होते हुए, अपनी अग्रज या संगी-सहेलियों को सुर लगाते हुए, सुन-सुनकर सीख लेती हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सहज ही हस्तांतरित हो जाती है। सच, इसलिए तो लोकगीतों को जीवन रेखा कहा जाता है।
शायद, यही कारण है लोकगायिका मालिनी अवस्थी कहती हैं कि लोकगीत-लोक संस्कृति, लोक इतिहास और लोक जीवन के आदर्श पक्ष के अनुगान हैं। वह कहती हैं कि यह अनुराग लोक जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक हैं, जितनी ‘लोक संस्कृति‘ के लिए। जिस दिन लोक संस्कृति से कट जाएगा, उस दिन वह लोकगीतों से भी कट जाएगा। लोकगीतों की गतिशीलता संस्कृति की अविछिन्न परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है। जिस दिन लोकगीत नहीं रहेंगें, संस्कृति की गतिशीलता खुद नष्ट हो जाएगी। लोकगीतों का अधिष्ठान संस्कृति होती है।
लोकगीतों का सीधा संबंध हृदय से है, बुद्धि से कम। क्योंकि, अगर बौद्धिकता आ जाती है, तो एक अलग तरह का शहरीपना अहंकार भी आ जाता है। कुछ ऐसा ही विचार बिरहा गायक मन्नू यादव व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि बिरहा गायक डॉ मन्नू यादव मानते हैं कि काशी संगीत की नगरी रही है। काशी में सदियों पुरानी संगीत के विविध शैली की गायन शैलियां प्रचलित रही हैं। कजरी, सावनी, लावनी, ठुमरी, दादरा, भजन-कीर्तन, बिरहा सब गायकी के हिस्से हुआ करते थे। आज भी लोग गाते हैं, पर अब जीवन प्रकृति के उतना करीब नहीं रहा जैसे पहले हुआ करता था। पहले तो खेत में बीज या धान के पौधे या काम करते हुए किसान और उसके साथी गाते थे, पर अब तो मशीन से खेती होने लगी है, वो बात बहुत कम नजर आता है। देश काल की नैतिकता को बनाए रखना और बुजुर्गों का सम्मान हमारी परंपरा हैं। हमारी संदेशवाहक संस्कृति को बिरहा को अपनाया है। इसे परिमार्जित करने की कोशिश कर रहा हूं। नए और युवा कलाकार इस क्षेत्रा में आते हैं, पर रातों-रात मशहूर होना चाहते हैं। यह बड़ा क्षेत्रा है। यह 12महीने आयोजित होने वाला है। बिरहा जन्म से मृत्यु तक के आयोजनों में गायन की परंपरा है। इसके प्रति लोगों की मानसिकता और सोच को बदलना चाहता हूं। दरअसल, लोक संगीत को लोग अशिक्षितों का संगीत मानते हैं। पढ़े-लिखों के लिए यह नहीं है। विकास की होड़ में हम पर इस तरह की सोच हावी हुई। इसलिए, सांस्कृतिक जीवन को संस्कार और जीवन से जोड़कर देखने की जरूरत है। हमारे लोक संगीत हमारे जीवन के लिए संजीवनी है।
बिरहा
दुखवा कै मोटरी उठाय परमेसरी
लेई चलु धोबिया दुआर
आधा दुखवा त् उहइ धोबी मेटि आवई
अधवा में सब संसार
लोकगीत में सिर्फ संस्कार, मौज-मस्ती, उत्सव-त्योहार के गीत ही शामिल नहीं हैं। बल्कि, इसे भारतीय स्वतंत्राता आंदोलन के समय लोगों ने अपने अंदाज में गाया। यह एक ऐसा लोकगीत है, जिसे धोबियों ने गाया है और इसमें दिल्ली की झांकी उपस्थित होती है। गीत में झलक मिलती है कि साधारण जनता किस तरह हसे विदेशी शासन से छुटकारा पाने के लिए आत्म बलिदान की भावना से प्रेरित हुई थी। इस गीत के बोल हैं-
बनी बनाई फौज बिगड़ गई आ गई उल्टी दिल्ली में।
शाह जफर का लुटा नसीबा रहने लगा हवेली में।
बृज क्षेत्रा में ‘मल्होर‘ कोल्हू गीत गाने की परंपरा थी। रात के सन्नाटे में कोल्हू पर काम करने वाले किसान का दिल रसासिक्त होकर, तान छेड़ता है-मल्होर के रूप में। वास्तव में, मल्होर ‘दोहा‘ छंद हैं-जिनमें विशेषकर श्रृंगार और नीति, उपदेश व ज्ञान के शीतल छींटें होती हैं। मेरठ के आस-पास के गन्ना प्रधान इलाके में पहले किसान ‘मल्होर‘ गाते थे। एक मल्होर के बोल हैं-
अंगिया तेरी रेसमी, लग्या हजारी सूत।
घंूघट के पट खोलिए, तेरा जीवे गोद का पूत।।
मेरा बावला मल्होर।
अंगिया मेरी रेसमी, ना लग्या हजारी सूत।
घंूघट के पट ना खुलें, चा मरो गोद का पूत।।
मेरा बावला मल्होर।
कृष्ण की जन्मभूमि ब्रज क्षेत्रा में तो कृष्ण की लीलाओं, राधा और गोपियों के साथ उनके रास और अन्य घटनाओं को लेकर कई तरह के आख्यान और संगीत प्रचलित हैं। ब्रज के संस्कृति कर्मी और कार्ष्णि कलाप के संपादक मोहन स्वरूप भाटिया कहते हैं कि ब्रज के तो कण-कण में संगीत है। कान्हा के जन्म, उनकी लीला और रास के हजारों लोकगीतों से आज भी ब्रज क्षेत्रा गंुजायमान है। यहां संस्कार, ऋतु, उत्सव, त्योहार, जाति, कर्म, भक्ति और मनभावन गीत प्रचलित हैं। लोकगीत की सरल धुन और शब्द अनुभूतिपूर्ण होने के कारण सहज ही जुबान पर चढ़ जाते हैं। वास्तव में, लोकगीत केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्कृति का सच्चा दर्पण होता है। होली का गीत के कुछ अंश देखिए-
आज बिरज में होरी रे रसिया।
होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया।।
उड़त गुलाल लाल भए बादर,
केसर रंग में बोरी रे रसिया।।
उत्तर प्रदेश में लोकगीत चार प्रकार के प्रचलित हैं। ये लोकगीतों की इस श्रेणी में संस्कार गीत-जन्म, मुंडन, जनेऊ, विवाह आदि के अवसरों के गीत, ऋतु गीत-सावन, कजली, होली, चैता, बारहमासा आदि, क्रिया गीत-जंतसार, निराई, रोपनी, बआई के गीत, शिशु के क्रीड़ा गीत आदि। संस्कार के गीतों में मंगल की आकांक्षा सबसे अधिक बलवती होती है। अधिकतर उनमें समृद्धि के स्वप्न संचित रहते हैं। पूर्वजों से आशीर्वाद लेने की विनम्रता दिखाई जाती है, या जिस अवसर का यह गीत है, उस अवसर की सामाजिक व्यवस्था पर अत्यंत मधुर ढंग से भाव व्यक्त किया जाता है। क्रिया गीतों में प्रायः जो तान ली जाती है, वह संबंधित क्रिया के लय के अनुरूप होती है, जैसे जांते के गीत में जितना समय लगता है उतने में एक कड़ी पूरी उतर जाती है और गीत का विराम अत्यंत स्वल्प होता है। निराई की गीतों में बड़ी लंबी तान ली जाती है। रोपनी के गीतों में लय ऐसी चलती है कि मानों एक ऊंची लहर गिर रही हो और फिर उठ रही हो। आज भी भोजपुरी भाषा क्षेत्रा में विवाह से पांच दिन पहले पितृ निमंत्राण के रूप में भोर और संझा गाए जाने का रिवाज है।
भोर का गीत
ए भोर रे भइलें भिनुसार
चिरइया एक बोलेले मिरूग बन चंूगेले,
ए भोरे खेतवन हर लेके
चलें हरवहवा त बहुवर जांते।
संझा के गीत
कत्थी कई दियना, कत्थी कई बाती
कई तेलवा जरेला सारी राती।
सोने कई दियना, रूपै कई बाती
सरसों के तेलवा जरेला सारी राती।
जरिउ दीप जरिउ दीप सारिऊ राती
जलबे दुलहा दुलहिन खेलेंलें चौपर
जरी गइलें तेलवा संपूरन भइली बाती
जंघिया लागलि दुलहिन देई गइली अलसाई।
आजकल तो शादियां मैरिज हॉल या काम्यूनिटि सेंटर से होने लगी हैं। जबकि, पहले निजी घरों से शादी-विवाह होते थे। औरतें घर के बरामदे में बैठकर या खड़े होकर बारात का स्वागत करती थीं। उस दौरान वह बारात के स्वागत में द्वाराचार के गीत गाती थीं, मसलन-
बाजत आवेला रूनझुन बाजन, घुमरत आवेला निशान,
नाचत आवै पतरेंगवा समधिया, विहंसत दुलरू दमाद।
उत्तर प्रदेश में शिशु के जन्म के अवसर को विशेष महत्व दिया जाता है। उस समय सोहर गाने का रिवाज है। इसे घर-परिवार की औरतें मिलकर गातीं हैं। इससे आस-पड़ोस को पता चल जाता है कि माता और नवजात शिशु दोनों सुरक्षित हैं। वह अवसर उत्सव का उत्स बन जाता है। भोजपुरी की सोहर के शब्दों को काशीनाथ उपाध्याया भ्रमर ने गोरखपुर के तरगंवा गांव से संकलित किया था। इसके बोल हैं-
सूतल रहलीं अटरियां सपन एक देखेलीं
सासु सपना के करहु विचार सपन सुठि सुन्नर।
अवधी के हिंडोल गीत में परदेस जाते हुए पति द्वारा पत्नी के प्रति किया गया एक निश्छल व्यंग्य है। इसके बोल हैं-
गोरि गोरि बइयां सबुज रंग चुनरी,
पिया छेड़ि चलेनि दो परदेसवां
कहंरवा के बोल
पुरूब से आई रेलिया, पादिम से आई जहजिया
पिया के लादि लेई गई हो
रलिया होई गई मोरि सवतिया
पिया के लादि लेई गई हो
कलाविद् डॉ कपिल तिवारी कहते हैं कि लोक का सबसे लाक्षणिक अर्थ होगा-लोक की दिनचर्या, जिसमें जीवन का सिखाया ज्ञान, जीवन और प्रकृति के सानिध्य में सीखी और रची गई संस्कृति और इसी संस्कृति की धारा में जिए और रचे गए साहित्य और कला रूप स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। एक अर्थ में ‘यह संस्कृति‘, ‘जीवन की धन्यता‘ और जीवन की ‘जय और आनंद का मंगलगान है। भारत या कहें ‘लोक संस्कृति‘ के भौतिक रूपों के विकास की वह प्रक्रिया है, जिसे भारत की ज्ञान परंपरा के पुरोधाओं ने सत्य की समग्रता में रस का निरूपण कर के जन-मन के बीच प्रवाहित किया।