लोक का सम्मान ही है सच्चा लोकतंत्र

देश में चुनाव चल रहे हैं जिसे लोकतंत्र का महापर्व कहा जा रहा है। परंतु यदि हम भारत की प्राचीन परंपरा को देखें तो पता चलेगा कि भारत में लोकतंत्र का अर्थ कुछ और ही रहा है। यहाँ लोकतंत्र का अर्थ चुनाव नहीं, बल्कि शासन में लोक और उसकी भावनाओं के महत्व से रहा है। देश में अनेक प्रकार की विधाओं से राज्य चलते थे और इतिहास में इंद्र, विक्रमादित्य, भोज जैसे पदनामों से भी वर्षो राज्य व्यवस्थाओं का संचालन होता रहा है। परंतु इन सभी विधाओं का उद्देश्य केवल जन आकांक्षाओं की पूर्ति ही होता था। वेद दुनिया के सबसे पुराने तथा पहले ग्रन्थ हैं और उनमें गणतंत्र तथा लोकतंत्र दोनों का ही स्पष्ट उल्लेख पाया जाता है। इसप्रकार गणतंत्र व्यवस्था का जनक भी भारत है। ऋग्वेद में सभा और समिति का जिक्र, है जिसमें राजा, मंत्री और विद्वानों से विमर्श करने के बाद ही निर्णय लेता है। दुर्भाग्यवश आज, सफल, समृद्ध लोकतंत्र की प्राचीन भारतीय छाया 1950 से लागू संविधान और व्यवस्था में नहीं दिखाई देती। उधार की धाराओं से देश चलाने का प्रयास किया जाता रहा है और आज भी वही हो रहा है। यदि आर्ष ग्रन्थों में वर्णित सिद्धांतों के आधार पर संविधान बनता तो फिर सेकुलर तथा समाजवाद जैसे विदेशी शब्दों को अलग से जोडऩे की आवश्यकता नहीं पड़ती।
बुद्ध साहित्य में सबसे पुरानी महा—परिनिर्वाण सुतांता के अनुसार बुद्ध प्रजातांत्रिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध थे। इस सम्बन्ध में एक कहानी भी है। मगध का राजा अजातशत्रु लिच्छवी गणराज्य को जीतना चाहता था। उसने अपने मंत्री वसाकारा को भेज कर बुद्ध की राय जानने और पूछने को कहा कि क्या वो अपने मकसद में सफल हो सकता है। बुद्ध ने मंत्री को सीधे कुछ न कहते हुए शिष्य आनंद से कहा – आनंद क्या तुमने सुना है कि लिच्छवी गणराज्य में पूर्ण और निरंतर आम सभा की बैठकें होती हैं। आनन्द ने कहा – हां भगवान मैंने ऐसा सुना है। तब बुद्ध ने कहा जब तक आम सभाएं और इसकी बैठके होती रहेंगी तब तक इस राज्य में सिर्फ समृद्धि ही आएगी कभी इसका पतन नहीं होगा। बुद्ध न्याय और धर्म के प्रति अपने व्यक्तिगत विचारों की बात नहीं करते। इसका आधार भारत की वह लोकतांत्रिक परम्परा है जिसमें बड़े पैमाने पर राजनीतिक अधिकार के बंटवारे की बात हो। प्राचीन भारतीय इतिहास में स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की मजबूती का एक और तथा पुख्ता उदाहरण कांचीपुरम जिले में स्थित उत्तीरामेरूर की दीवारों पर अंकित है। इस मंदिर की दीवार पर सातवीं शताब्दी के मध्य में प्रचलित ग्राम सभा व्यवस्था का संविधान लिखा है। इसमें चुनाव लडऩे की आवश्यक योग्यता, चुनाव की विधि, नामांकित उम्मीदवारों के कार्यकाल, उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराए जाने की परिस्थितियों में जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकने की व्यवस्था आदि सभी वर्णित है।
वैदिक काल में प्रशासन की आधार इकाई गांव थे। जब तक गांवों की विकेन्द्रित व्यवस्था कायम रही, गांवों से पलायन नहीं होता था। आज बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है जिसका मतलब है कि गांव आर्थिक और सामाजिक तौर पर असुरक्षित होते जा रहे हैं। संविधान कोई भी हो और कहीं का भी हो, वे धर्म के दस सूत्रों की व्याख्या ही होते हैं। इन सूत्रों को लेकर समाज चले, तभी रामराज्य की परिकल्पना साकार होती है। वेद, मनु, वृहस्पति, शुक्र तथा चाणक्य से लेकर गांधी तथा दीनदयाल उपाध्याय तक के बताए गए रास्ते उसी प्राचीन परंपरा के पालन का आग्रह करते है और वही भारत के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में पिछले 70 वर्षों से चल रही वर्तमान शासन प्रणाली विकास के मापदण्डों पर खरी नहीं उतरी, जिसका एक ही कारण है ग्राम विकेन्द्रित व्यवस्था का कमजोर होना। दुर्भाग्यवश वर्तमान व्यवस्था और सत्ता भी केंद्रीकरण के व्यामोह से मुक्त नहीं है।