लोकगीतों में सुरक्षित है भारत की परंपरा

-सोमदत्त शर्मा, समन्वयक, लोक सम्पदा विभाग, आकाशवाणी, नई दिल्ली


करीब पैंतीस वर्ष से आकाशवाणी में कार्यरत श्री सोमदत्त शर्मा लोकगीतों के रूप में देश की संस्कृति के संरक्षण हेतु बनाए गए लोक सम्पदा विभाग के समन्वयक हैं। लोक सम्पदा परियोजना 2014 नवम्बर में आरम्भ हुई। इसकी परिकल्पना सोमदत्त जी ने ही रखी थी। लोकसभा में इस कार्य को विशेष महत्व मिला। सम्पूर्ण सदन ने इसकी प्रशंसा हुई। सोमदत्त शर्मा जाने-माने कवि भी हैं और साथ ही दक्षेस संस्कृति नामक पत्रिका के सम्पादक रहे हैं। इससे पहले वे लखनऊ से निकलने वाली मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म के उपसम्पादक भी रहे हैं। लोक सम्पदा संरक्षण के कार्यों के बारे में भारतीय धरोहर के कार्यकारी सम्पादक रवि शंकर ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश

आमतौर पर आकाशवाणी समाचार और संगीत के प्रसारण से जुड़ा समझा जाता है। आकाशवाणी के लोकसंपदा विभाग का का क्या कार्य है?
लोकसंपदा विभाग का मुख्य काम लोकगीतों का संकलन और संरक्षण है। देश में लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है। इस समय देश में तकरीबन 6100 जातियां और उपजातियां है। इसके अलावा 1951 की जो जनगणना है, उसके अनुसार देश में लगभग 1652 भाषाएं बोली जाती हैं। वास्तव में देश में कितनी भाषाएं, बोलियां और उपबोलियां हैं, ये एक शोध का विषय है। लेकिन हम यह मानकर चलते है कि 1652 के आस-पास बोलियां होनी चाहिए क्योंकि लेटेस्ट सर्वें यही कहता है। ये 1652 भाषाऐं और बोलियों का उपयोग 6000 जातियों के लोग करते हैं। इन सभी जातियों के लोग कुल मिलाकर आठ धर्म से जुडे है ये आठ धर्म ये है – सनातन धर्म, इस्लाम, ईसाई, सिख, बौद्ध, यहूदी, पारसी और जैन धर्म। हर धर्म में जो भी जातियां हैं, उन सभी में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुछ संस्कार होते हैं। इन संस्कारों से जुड़े बहुत सारे रीति-रिवाज है। उन रीति-रिवाजों के साथ कुछ गीत जुड़े रहते है। समय के साथ ये सारी चीजें खत्म हो रही हैं। ये सारी परंपराएं, इनसे जुड़े रीति-रिवाज, इनसे जुड़े गीत सभी खो रहे हैं।

इन परंपराओं तथा लोकगीतों के खोने का क्या कारण हैं?
इसके बहुत सारे कारण हैं। जैसे विकास अपने आप में सबसे बड़ा कारण है। विकास ने आपकी गति बढ़ा दी। उसके कारण आपकी गतिशीलता बढ़ गई। नौकरी हो या फिर व्यवसाय, इनके कारण आप दूर-दूर शहरों में जाते हैं। नया समाज, नया वातावरण, नये लोग, नई व्यवस्थाऐं। ऐसे में आपको बहुत सारी चीजें छोडनी पड़ती हैं। व्यस्तता एक और बड़ा कारण है जो इस विकास की ही देन है। इस व्यस्तता के कारण भी कई तीज-त्यौहार हम छोड़ते जा रहे हैं। जब त्यौहार ही छूट गए तो उनसे जुड़े गीत भी हम भूलने लगे। अंनत चतुर्दशी, देवोत्थान एकादशी, रक्षाबंधन के बाद मनाया जाने वाला गाज का त्योहार जैसे कई त्यौहार हम भूलते जा रहे हैं।

इन त्यौहारों, परंपराओँ तथा लोकगीतों को भूलने से क्या नुकसान है?

जब ये सारी चीजें गायब हुईं, तो एक पूरी पंरपरा गायब हो गई। उत्तर प्रदेश में एक गीत गाया जाता है महल पर कागा बोला है। यह गीत पूरे घर की व्यवस्था पर है। एक बहु है जो अपने घर में नई नई आई है और उसको देवरानी, ननद और सासुमां सभी छेड़ते हैं और वह सभी को उत्तर देती है। गीत में वह कहती है – ऐ सासु जी, ऐसी बिड़ही ना बोलो, अभी तो मेरा ससुरा प्यारा है। यानी ससुर के होते आप कैसे मालिक बन सकती हो। जेठानी से बोलती है – ऐ जेठनी जी, ऐसी बिड़ही ना बोलो, अभी तो मेरा आधा साझा है। ननद को कहती है – ऐ ननदी जी ऐसी बिड़ही न बोलो, अभी तो परघर जाना है। इस गीत में न केवल परिवार की व्यवस्था है, बल्कि बहु के सम्मान की रक्षा और परंपरा सभी हैं। ऐसे ढेर सारे गीत हैं।
एक और उदाहरण हरियाणा के एक लोकगीत के रूप में देखें। हरियाणा में एक गीत विवाह के अवसर पर भात के समय पर गाया जाता है। रोहतक से 100 किलोमीटर दूर चले जाएं शेखावटी की ओर तो उधर इस गीत में बहन कहती है भैया मेरे बच्चे की शादी में आओ। तुम भात लेकर आओ या ना आओ लेकिन आओ जरूर ताकि मेरा मान रह जाये। परंतु रोहतक से केवल 50 किलोमीटर के आसपास के इलाकों में वही बहन गाना गाती है – देखो भैया, मेरे बेटे की शादी है तुमको आना है। आना तो है ही मेरे जेठानी के बच्चे की जब शादी थी तब उसके घर से ये ये समान आया था। तुमको भी ये लाना है और इससे कम मत लाना। वहीं रोहतक में वही बहन गाती है – मेरे बच्चे की शादी है और ये-ये समान लेकर आना और अगर नहीं लेकर आये तो ये मत भूलना कि पिताजी की संपत्ति में हक मेरा भी है। गीत एक ही समय का है और एक ही महिला का है और तीन अलग अलग स्थान पर और तीन अलग अलग भाव व्यक्त करता है। ये गीत क्षेत्रों का इतिहास, परंपरा और स्वभाव सभी बताते हैं। ये जो चीजें है धीरे धीरे करके समाज से गायब हो रही है इनको बचाने के लिए ही लोकसंपदा विभाग है। हमारा मानना है कि ये अगर ये खो जायें तो हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो जायेगा।

लोकगीतों में इतिहास, परंपरा आदि सबकुछ है। क्या आप इन लोकगीतों के संग्रह का ऐसे कुछ आधारों पर वर्गीकरण भी कर रहे हैं?
बिल्कुल। लोकगीतों के संरक्षण के इस काम के तीन हिस्से है। पहला है जिसमें हम खाली जन्म से मृत्यु तक के संस्कार के गीतों को लेते हैं। हिन्दुओं के 16 संस्कारों को आधार बनाया है। सबसे व्यवस्थित हिंदुओं में ही संस्कारों तथा गीतों की परंपरा मिलती है। दूसरा हिस्सा है अन्य परम्परिक गीत। जैसे वृक्षों, पर्वतों, नदियों, खेल, पर्व-त्यौहार, मेलों आदि से जुड़े गीत हैं। कृषि, श्रम से जुड़े गीत हैं, बच्चों की लोरियां हैं और युद्ध से जुड़े गीत हैं। जितने भी प्रकार के गीत प्रचलन में हैं और परंपरा से जुड़े हैं, हम उन्हें रिकॉर्ड कर रहे हैं।
तीसरा हिस्सा ये है कि हर जाति में उपजाति में हर मानव समुदाय में उनके पूर्वजों के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों की गाथा है। उसमें उनका इतिहास है। जैसे आल्हा उदल, हीर रान्झा, जाहरवीर, नरसिंह भक्त आदि हैं। इस तरह की बहुत सारी गाथाएं हैं। इन्हें भी हम संग्रहित कर रहे हैं। 19वीं शताब्दी में भोजपुरी भाषा-भाषी लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनाके मारीशस, त्रिनिदाद, फिजी, सूरीनाम, अफ्रीकी देशों में ले जाया गया था। उनमें भोजपुरी भाषी भी है और बाद में पता चला कि अवधी भाषी लोग भी हैं। उन्होंने यहा से अधिक शुद्धता से वहां अपनी परंपरा को सुरक्षित रखा है। इनको संग्रहित करना चौथा हिस्सा है।
यह संग्रह लंबे समय तक सुरक्षित रहे, इसके लिए रिकॉर्ड करने की व्यवस्था है फिर उनके शुद्ध स्क्रिप्ट लिखा जाता है। साथ ही इनका हिन्दी तथा अंग्रेजी अनुवाद भी किया जाता है। इन गीतों की स्वर लिपी भी तैयार की जाती है। जिस प्रकार वह गीत आज गाया जाता है समाज में, बिलकुल उसी रूप में हम अगली पीढी को सौंप सकें, इसलिए स्वर लिपि लिखी जा रही है। फिर वह गीत किस समय गाया जाता है, कैसे गाया जाता है, क्यों गाया जाता है और क्या इसमें कहा गया है, इन सभी बातों को भी लिखा जा रहा है।


आकाशवाणी जो संग्रह तैयार कर रही है, वह क्या आम जनता को भी उपलब्ध होगा? यदि हाँ तो कैसे?

सबसे पहले तो हम इसके प्रकाशन की व्यवस्था भी हम कर रहे हैं। इसके लिए राष्ट्रीय बुक ट्रस्ट से बात हुई है। साहित्य अकादमी से भी बात हुई है। यह आम लोगों को भी उपलब्ध हो सकेगा। पुस्तकें तो उपलब्ध होंगी ही। जो गीत को सुनना चाहेंगे, उन्हें भी यह यहाँ पर उपलब्ध होगा। इसलिए गीतों को पूरी तकनीक के साथ सुरक्षित रखा जा रहा है।
इन गीतों को हम समय-समय पर प्रसारित भी करते हैं। जो भी अवसर होता है, उसके अनुसार लोकगीतों का हम प्रसारण करते हैं। इसमें मैं एक बात बताना चाहूंगा। लोकगीतों को गाने वाले जो भी लोककलाकार हैं, उन्होंने इसकी मौलिकता को कहीं न कहीं समाप्त किया है। गाँवों में जो गीत होते हैं, उनमें सामान्यत: वाद्य नहीं होते। परंतु यदि उन्हीं गीतों को कलाकार गाएंगे तो उसमें सिंथेसाइजर, हारमोनियम, तबला आदि सभी देसी-विदेशी वाद्य होंगे। वाद्यों के जुड़ते ही उसकी बीट बदल जाएगी और उस गीत की मौलिकता समाप्त हो जाएगी। इसलिए हम इन गीतों को उनके वास्तविक रूप में ही सुरक्षित रख रहे हैं।

लोकगीतों की परंपरा तो काफी विशाल और बिखरी हुई है। इनका संग्रह कैसे कर रहे हैं?
लोकगीतों के रूप में भारतीय संस्कृति, परंपरा और इतिहास को सुरक्षित रखने के इस प्रयास में आकाशवाणी का पूरा तंत्र लगा है। पूरे देश में हमारे 214 स्टेशन हैं। 214 में 128 प्राइमरी स्टेशन है जिसमें से 33 कैपीटल स्टेशन हैं। शेष 86 स्टेशन एलआरएस स्टेशन है। एलआरएस स्टेशन का मतलब लोकल रेडियो स्टेशन। ये सभी स्टेशन इस काम में जुटे हुए हैं। ये देश के सभी हिस्सों में हैं, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक। संग्रह करने वाले आकाशवाणी के लोग होते हैं। हमने उनसें कहा है कि जिस राज्य का गीत रिकॉर्ड किया जा रहा है, उसी राज्य-समुदाय के किसी व्यक्ति को आप संयोजक बनायें। दूसरी व्यवस्था यह बनाई गई है कि संग्रह किए जाने के बाद उस समाज के किसी विशेषज्ञ व्यक्ति को वह दिखाया जाए। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि ये पारंपरिक लोकगीत ही हैं, फिल्मों के आधार पर नहीं बनाए गए हैं।
इसके बाद स्टेट केन्द्रों के स्तर पर एक और समिति बनाई गई है जिसमें चार व्यक्ति होते हैं। एक स्टेशन का प्रोग्राम हैड होगा, दूसरा संगीत का अधिकारी होगा और एक भाषा का व्यक्ति होगा और एक परंपरा को जानने वाला व्यक्ति भी होगा। जिस आदमी ने रिकॉर्डिग कराई है, वह भी वहां होगा। इस प्रकार यह हमारी राज्य के स्तर पर अकादमिक जाँच की व्यवस्था है। इसमें जो दो लोग बाहर के होते हैं, वे विश्वविद्यालय या फिर किसी सांस्कृतिक संस्था आदि से लिये जाते हैं। इसप्रकार गीतों की कई स्तर पर जाँच हो जाती है।

लोकगीतों के संग्रह का आपका अभियान में कितनी सफलता मिल रही है? कितना कार्य अभी तक कर पाए हैं? आपका आगामी लक्ष्य क्या है?
अभी तक हमने 586 जिलों में से लगभग 125 जिलों में काम किया है। लगभग 20000 गीतों की हम अब तक रिकॉर्डिग कर चुके हैं। केवल संस्कार गीत ही नहीं अलग अलग तरीके के गीत हम रिकॉर्ड कर चुके हैं। 29 में से 28 राज्यों की रिकॉर्डिंग हम कर चुके है। यह काम कितना महत्वपूर्ण है, इसे हम केवल इस एक तथ्य से समझ सकते हैं कि देश के किसी भी एक संस्थान के पास 140 भाषाओं व बोलियों के गीत नहीं हैं। यह अकेले आकाशवाणी के पास है। ये हो सकता है कि किसी विश्वविद्यालय ने अपने क्षेत्र में काम किया हो या किसी व्यक्ति ने अपने स्तर पर कार्य किया हो। जैसे देवेन्द्र सत्यार्थी जी ने एक लाख गीत एकत्र किये थे। लेकिन आकाशवाणी का काम बिल्कुल अलग है। उसके पास मूल आवाज है और स्वर लिपी है और हिन्दी अंग्रेजी अनुवाद भी है ताकि कोई विदेशी भी आये तो वह पढ़ सकता है।
हमारा आगामी लक्ष्य है कि देश की सभी 1652 बोलियों के गीतों को संग्रहित कर सकें। अभी तक केवल 140 भाषाओं में है। अभी बहुत बडा लक्ष्य सामने है। अभी 20 प्रतिशत काम भी नहीं हुआ है। और अगर जाति समुदाय की दृष्टि से देखते है तो एक प्रतिशत भी काम नहीं हुआ है। इसमें काफी समर्पण और विशाल तंत्र की आवश्यकता है। हमारे पास तंत्र है परंतु उस रूचि के लोग नहीं है। सारी समस्याओं के बाद भी लोगों ने इतना काम किया है और कर रहे है। कुल मिलाकर 114 स्टेशनों की रिकॉर्डिग आए है।

लोकगीतों के संरक्षण के माध्यम से आप देश की संस्कृति के संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। इन गीतों में भारत की संस्कृति की कैसी झलक दिखी?
इन गीतों को अगर आप सुनेंगे तो पाएंगे कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर उत्तर तक जनता के सोचने की जो दिशा है, वह लगभग एक जैसी है। भाषा, बोली, जाति, संप्रदाय चाहे जो भी हों। जिस मूल दृष्टियों को लेकर समाज की रचना गई है, वह मूल दृष्टि आपको सब जगह एक जैसी मिलेगी। उदाहरण के लिए जैसे मुसलमानों में ये कहा जाता है कि उनके यहां गाने बजाने की परंपरा नहीं है लेकिन फिर भी उनमें पारंपरिक गीत मिलते हैं। हमारे पास मलयालम मुसलमानों के गीत हैं, कश्मीरी मुसलमानों के गीत है।
उदाहरण के लिए कश्मीर में एक लोकगीत है जिसमें एक विवाहित युवती की अपने पति से जुदाई की पीड़ा को बताया गया है। वह मख्खन बनाते हुए अपने जीवन की कठिनाइयों का वर्णन करती है और मन ही मन अपने पति की वापसी की प्रार्थना करती है। एक लोकगीत मेंहदी की रसम पर आधारित है। मेंहदी की रसम को ये लोग स्वीकार नहीं करते हैं परंतु वहाँ यह गीतों में है। इसकी जो महेंदी की रसम है जो ये साचुवक के नाम से होती है। इस गीत में कहा गया है कि विभिन्न शहरों से चुनिंदा मेंहदी खास दुल्हन के लिए लाई गई है। यह मेहनत भरा काम है और इससे दुल्हन को आनंद मिलता है।
एक और उदाहरण देखें। जैसे अपने यहाँ पायल पहनने की प्रथा है। कश्मीर का ही एक लोकगीत एक जोड़े के रिश्ते को दर्शता है। अनुरागी अपने आशना को जो एक सुनार की बेटी है, की तारिफ करते हुए उसकी कलाईयों के साथ उसकी चूडिय़ों का और गले के साथ हार का और पैर के साथ पायलों का चित्रण करता है। यह गीत भारतीय मुसलमानों के भारतीय संस्कृति और रिवाजों से जुड़े होने को प्रमाणित करता है। इसी प्रकार बार बार ये कहा जाता है कि हमारा देश सोने की चिडिय़ा था। अगर आपको इसका प्रमाण देखना है तो आप लोकगीतों में जाये। लोकगीतों में आपको सोने की थालियों में भोजन परोसने का उल्लेख मिल ही जाएगा। आप को लगभग हर गीत में जहां भोजन का उल्लेख आएगा वहा आपको सोने की थाली भी मिलेगी।
लोकगीतों में भारतीय दर्शन भी व्यापक रूप से समाया मिलता है। जैसे लगून का गीत यानि की सगाई का गीत होता है उत्तर प्रदेश में। इस अवसर पर गाया जाता है – रघुनन्दन फुले ना समाये, लगून आई हरे हरे। रघुनन्दन नाम ले कर उसने पूरे परंपरा को सामने रख दिया। अपने बेटे की तारीफ भी कर दी और ये बता दिया कि बेटे रघुनन्दन के समान है। उसने पारिवारिक, सामाजिक और व्यक्तिगत मर्यादा सबका पालन किया है। इसमें इतिहास, परंपरा सब शामिल है। फिर आगे कहते है कि ताउ सज गये चाचा सज गये सज गई सबरी बारात, रघुनन्दन तो ऐसे सज गये जैसे श्री भगवान। यह उदाहरण है लोक में दर्शन के व्यापक होने का।

लोकगीतों के संग्रह से क्या लाभ देखते हैं?
इस काम का सबसे बड़ा लाभ तो यह होगा कि इसके माध्यम से हम अपनी परंपरा को सुरक्षित रख सकते है और दूसरा लाभ यह होगा कि भारत की एकता में अनेकता का सिद्धांत स्थापित होगा। तीसरा यह पता चलेगा कि हमारे यहां जो जो परंपरा थी, यह हमें पता चल जायेगा। इतिहास भी मिलेगा और उसके अनेकविध प्रमाण भी। जैसे हमने स्थल-गीत एकत्र किए हैं। स्थल-गीतों में स्थान विशेष की जानकारी होती है। जैसे कि बनारस है, वहाँ के बहुत सारे गीत आपको मिल जाएंगे। इन गीतों में बहुत सारी जानकारी मिल जाएगी। उस स्थान का वह नाम क्यों पड़ा, वहाँ की विशेषताएं क्या है, क्या ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है। लोकगीतों में विज्ञान भी मिलेगा। वृक्षों, ओषधियों, जल का विज्ञान गीतों में भरा पड़ा है। मौसम के बारे में, लोक व्यवहार के बारे में, मनोविज्ञान के बारे में अपार ज्ञान इन लोकगीतों में हमें मिलेगा।