राजारानी मंदिर और संगीत महोत्सव

aman-ayan-1शशिप्रभा तिवारी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।
ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने और उन्हें आकर्षण का केंद्र बनाने के लिए देश के अलग-अलग प्रदेशों में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। इसके मद्देनजर जहाँ एक ओर खजुराहो में खजुराहो नृत्य समारोह, बोधगया में बोधि महोत्सव, राजगीर में राजगीर महोत्सव, पुराना किला नृत्य समारोह जैसे आयोजन हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उड़ीसा के प्राचीन मंदिरों के पृष्ठभूमि में मुक्तेश्वर नृत्य समारोह, कोणार्क नृत्य समारोह, राजारानी संगीत समारोह आयोजित किए जा रहे हैं।
उड़ीसा प्रदेश के पर्यटन विभाग की ओर से प्रत्येक वर्ष जनवरी महीने के अठारह से बीस तारीख को राजारानी संगीत समारोह का आयोजन किया जाता है। वर्ष-2002 में इस समारोह की शुरूआत हुई थी। भुवनेश्वर म्यूजिक सर्कल की ओर से इस समारोह का पहला आयोजन हुआ था। फिर, इसे पर्यटन विभाग ने अपने जिम्मे ले लिया। इस आयोजन के संबंध में कला समीक्षक नीता विद्यार्थी बताती हैं कि उड़ीसा में पदस्थापित तत्कालीन आईएएस ऑफिसर अशोक त्रिपाठी ने बहुत मेहनत करके राजारानी मंदिर प्रांगण का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर के आस-पास बालू के ढेर और काफी झाड़-झंखाड़ थे। उन्होंने इस मंदिर प्रांगण के चारों तरफ तरह-तरह के पेड़-पौधे और घास लगवाकर इसका सौंदर्यीकरण करवाया। वास्तव में, वर्ष 2006 में पहली बार मुझे राजारानी संगीत समारोह में आने का मौका मिला तो मैं समारोह स्थल के रौनक को देखकर आश्चर्यचकित रह गई थी।
पंचरथ शैली में निर्मित राजारानी मंदिर का निर्माण ग्यारहवीं सदी में हुआ था। यह मंदिर लाल और पीले बलुआ पत्थर से बना हुआ है। मान्यता है कि इस मंदिर के गर्भ गृह में कभी भगवान शिव की मूर्ति हुआ करती थी। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर सर्प, द्वारपाल, मत्स्य कन्याओं की मूतियंा शोभायमान हैं। इसकी दीवारों पर शिव विवाह के दृश्य, नटराज, पार्वती, नायिकाओं के अनेक भाव-भंगिमाओं की सुंदर आकृतियां सुशोभित हैं। मंदिर के शिखर पर आमलक ओर कलश सुसज्जित हैं। मंदिर की स्थापत्य कला मनोहारी है और बरबस की ध्यान आकृष्ट करती है। बहरहाल, यह मंदिर मूर्तिविहीन है। यहां किसी तरह की पूजा-अर्चना नहीं होती है। पर यह सराहनीय है कि स्थापत्य कला की अनूठी इबारत इस मंदिर को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।
राजारानी मंदिर प्रांगण व पेड़-पौधों को रंगीन लड़ियों, तोरण, छतरियों, मिट्टी की रंगीन कलशों से सजावट की गई थी। मंदिर को पृष्ठभूमि रखकर मंच तैयार किया गया था। राजारानी संगीत समारोह का आयोजन में उड़ीसा संगीत नाटक अकादमी और उड़ीसा टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड का भी सहयोग मिला था।
वास्तव में, यह समारोह उड़िया, कर्नाटक और हिंदुस्तानी शास्त्राीय संगीत का संगम और सम्मिलन समारोह है। इस वर्ष समारोह का प्रारंभ उड़ीसा की युवा गायिका महापात्रा मिनाती भंज के गायन से हुआ। उन्होंने राग आनंद भैरवी में लोकनाथ पटनायक की रचना से गायन आरंभ किया। अमृतसर के गुरू की वडाली के रहने वाले वडाली बंधुओं ने अपनी सूफी संगीत से राजारानी संगीत उत्सव को गुंजायमान किया। संगीत उत्सव की दूसरी शाम संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा और कर्नाटक संगीत के कलाकार टीएम कृष्णा ने अपने संगीत से रोशन किया। गायक टीएम कृष्णा ने संत त्यागराज की कृति ‘जगदानंद कारक जय जानकी प्राणनायक‘ पेश किया।
राजारानी मंदिर के शिखर पर कबूतरों का झुंड इकट्ठा रहता है। हर शाम श्रोताओं के हुजूम के साथ पंछियों का यह दल भी संगीत का आनंद लेता। चांदनी रात और हल्की ठंढ़ी हवा के झोंकों से सहलाते संगीत के सुर सुकून देते थे। संगीत के साथ ही, उड़ीसा का पारंपरिक मधुर पाक ‘पीठा‘ और गरम चाय का श्रोताओें ने आनंद लिया। समारोह का संचालन कला जगत की जानी-मानी आर्शिया सेठी और गायिका व रीडर संगीता गोंसाईं ने बहुत सुघढ़ तरीके से किया।