रणजीत सिंह की रक्षानीति को भारत भूल गया

गोविंद सिंह जी के पश्चात सिखों में काफी समय तक एकता को बनाए वाला नेतृत्व नहीं रहा। सिख अनेक गुटों में बंट गए। पंजाब में कई सरदारियां या मिस्लें बनी जिनके नेता कहने को तो सरबत खालसा के अंतर्गत काम करते थे लेकिन व्यवहार में उन पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं रह गया था। सभी स्वतंत्र आचरण करते थे। अपनी अपनी मिस्ल के अधिकार क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए आपसी रंजिशे और टकराव भी आम बात हो गई थी। इस का लाभ अफगानिस्तान और सीमावर्ती क्षेत्रों के कबाइलियों ने उठाया और वे आए दिन आक्रमण करने लगे थे। उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत के इन आक्रमणेां का  सशक्त प्रतिकार करना आसान नहीं था। अफगान हमलों को रोकने के लिए छोटी छोटी मिस्लें अकेले सफल नहीं हो सकती थी। इस के लिए इन को एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता थी। देश में ऐसी कोई बड़ी राजनैतिक शक्ति नही बची थी। मुगल साम्राज्य समाप्त हो चुका था,मराठा शक्ति भी कमजोर हो चुकी थी। अंग्रेजों ने अपने पांव जमा लिए थे और बाकायदा कम्पनी का राज स्थापित हो चुका था। राजपूत बिखर गए थे। उत्तर पश्विम सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कोई संगठित शक्ति नहीं थी।

    ऐसे ही वातावरण में गुजरांवाला में एक छोटी सी मिस्ल के सरदार,महासिंह के घर में एक बालक का जन्म हुआ, जिस का नाम बुध सिंह रखा गया जो पश्चिम से आने वाले पठानों और अन्य कबाइली जिरगों के खतरों से भारत को बचाने की मुहिम का सरदार बना। हालांकि माता की भयंकर महामारी में बालक की एक आंख जाती रही फिर भी जो नियति उस के जन्म से ही तय हो गई थी उस ने रणजीत सिंह को सचमुच अनेक रण जीतने वाला नायक ही बना दिया। महासिंह को लगा था कि उस का बेटा महानायक बनेगा क्योंकि उस के जन्म के कुछ समय बाद पिता को खबर मिली कि चत्तर क्षेत्र के कबाइली सरदार पीर मोहम्मद को उन के सैनिकों ने पराजित कर दिया है। विजय के इस समाचार पर प्रसन्न हो कर महासिंह ने अपने नवजात पुत्र का नाम बदल कर रणजीत सिंह रखा।

    इसलिए रणजीत सिंह ने सभी मिस्लों को जोड़ कर एक बड़े राज्य की स्थापना का फैसला कर लिया। लाहौर की मिस्ल पर अधिकार करने के बाद ही उन्हें एक राजा के रूप में देखा जाने लगा था। 1812 तक रणजीत सिंह ने सिख सरदारों को संगठित कर लिया था और अब उन के लिए उन दर्रो पर अधिकार करना आवश्यक था जो भारत पर आक्रमण करने के लिए आने के दरवाजे थे। अट्टक इस सब से महत्वपूर्ण द्वार था। लेकिन इस के लिए यूसयुफजई और कर्जई कबीलों को काबू करना था।  यूसुफजई परंपरा से बहुत ही जुझारू और क्रूर कबीला रहा है। 1813 में रणजीत सिंह के सेनापति दीवान मोखम चंद के नेतृत्व में शाह मोहम्मद की सेनाओें को परास्त कर दिया और फिर अट्टक के दर्रे को अपने अधिकार में कर लिया। यूसुफजई कबाइलियों के साथ सब से भयंकर जंग 1823 में ही हुई जब हरि सिंह नलवा ने काबुल को घेर लिया और न केवल अफगान सेनाओं को पराजित किया अपितु दूसरे कबीलों को भी उन की मदद के लिए आने नहीं दिया। हरि सिंह नलवा ने काबुल मे फिर दस्तक दी और यहां के शाह दोस्त मोहम्मद खान को पराजित कर दिया। नलवा का अंतिम युद्व भी रणजीत सिंह की सेनाओं ने ही जीता लेकिन वापस आते हुए भागती हुई अफगान टुकड़ी के हाथों नलवा मारे गए। इस तरह अफगान दुरानी शक्ति को तोड़ कर रणजीत सिंह ने इस दिशा से देश को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया।

   भारतीय संस्कृति को सम्मान दिलाने और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा करने वाले महाराजा रणजीत सिंह तीसरे महानायक थे, जिन्होंने फिर से राष्ट्र के स्व को जगाने का काम लिया। उन से पहले छत्रपति शिवाजी और गुरू गोविंद सिंह के इस नई जागरूकता और पुनरूत्थान लहर पैदा कर चुके थे। गुरू गोविंद सिंह ने पंजाब में सिख समुदाय में नई फुर्ती और जुझारूपन का विकास कर के भारत में मुगलों के विरूद्व एक शक्तिशाली प्रतिरोध पैदा किया। यदि गुरू गोविंद सिह और शिवाजी में काल का थोड़ा अंतर न होता तो भारत का आधुनिक इतिहास भिन्न होता।

 सिकंदर से लेकर बाबर तक भारतीय इतिहास असंगठित राजाओं और अदूरदर्शी शासकों की राजनीति का ही इतिहास है। पंजाब के छोटे से राजा पुरू  को सिकंदर की विराट सेनाओं का सामना करना पड़ा लेकिन उत्तर भारत का कोई राजा उन की सहायता के लिए नही आया जब कि वे सब जानते थे कि सिकंदर एक एक कर के सभी छोटे राजाओं को परास्त कर के आगे बढ़ रहा था। पड़ौसी की विपत्ति से उदासीन राजाओं को इस बात का समरनैतिक एहसास नही रहता था कि जो विपत्ति पड़ौसी पर आ रही है वे शीघ्र ही उस के दरवाजे पर भी आने वाली है। यह सिलसिला लगातार बाबर के हमले तक चलता रहा। मुगल काल में भी राजपूताना का दृश्य छोटे राजाओं को बीच के टकराव और आपसी रंजिशों का ही था।

रणजीत सिंह जानते थे कि भारत की पश्चिमी सीमाएं हर समय बाहरी आक्रमणों के द्वार रही हैं, चाहे ईसा पूर्व में ईरानी रहे हो या यूनानी, ईसा के बाद अरब थे या पठान या फिर मंगोल और मुगल, सब के लिए यही सीमा अनुकूल साबित हई है। इसलिए देश की सुरक्षा के लिए सीमा के इन द्वारों की सुरक्षा आवश्यक है। यहां से आने हर हमलावर का पहला शिकार पंजाब की हुआ करता था। रणजीत सिंह के लिए आवश्यक था कि वे अफगानिस्तान से लगी सीमाओं के बारे में चौकस रहें ओैर अफगान कबीलों की गतिविधियों का लगातार मूल्यांकन करते रहे। पहले उन्होंने इस सीमांत के उन कबीलाई रजवाड़ों पर काबू किया जिन की सरहदी जनजातियों का मुख्य व्यवहार पड़ौसी राज्यों में लूट मार करना ही हुआ करता था। फिर उन्होंने काबुल और उस के आसपास के बड़े कबीलों के एकजुट होने के पहले ही उन को पराजित करके तितर—बितर कर दिया।

   पठानों की शक्ति को कमजोर करने का परिणाम यह हुआ कि इस क्षेत्र की तरफ से अगले दो सौ साल तक कोई हमला नहीं हुआ और तब हुआ जबकि यहां के शासक रणजीत सिंह की समरनीति को फिर से भूल गये थे। कश्मीर पर कबाइली हमला इसी का उदाहरण है। रणजीत सिंह को पंजाब और जम्मू कश्मीर से आगे भारत के दूसरे राज्यों में अपना विस्तार करने का मौका नहीं मिल पाया। इस का प्रमुख कारण था कि अंग्रेज भारत में अपनी सत्ता जमा चुके थे। ब्रिटिश भारत उन्हें पंजाब से आगे जाने नहीं देता। अग्रेजी साम्राज्य के साथ टकराने का सामथ्य किसी एक देसी रियासत में नहीं था और पंजाब को छोड़ कर सभी राज्यों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि वे अपनी सुरक्षा के लिए भी अंग्रेजों पर ही निर्भर हो गए थे।

रणजीत सिंह को हर बार पठान या दूसरे कबीलों के साथ लड़ना पड़ा जो कि सभी कट्टर मुसलमान थे। फिर भी उन्होंने मुसलमानों के विरूद्व प्रतिशोध की भावना नही अपनाई। सभी धर्मो के प्रति सदभाव उनके शासन का आधार रहा। उनके कई कमांडर मुसलमान थे। काबुल या अफगानिस्तान के अन्य कस्बों पर हमला करते समय उनकी सेनाओं कों विशेष हिदायत थी कि मस्जिदों को नुकसान न पहुंचाया जाए। महल तोड़ना पड़े तो भी उसमें बनी मस्जिद को बचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए।