योग: कर्मसु कौशलम्

योग: कर्मसु कौशलम्

कर्मों में कुशलता का नाम योग है। भारत की प्रचीन धरोहरों में योग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान आध्यात्मिकता से युक्त हैं। कर्म को पूजा भाव से करने की परम्परा भारतीय समाज का अंग रहा है। भगवान श्री कृष्ण ने समाज को कर्म की प्रेरणा गीता में दी है। श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है। कर्म की कुशलता ही योग है। कर्म करने का साधन शरीर है। शरीर को स्वस्थ रखना हमारा कर्तव्य है। शरीर को स्वस्थ रखने के उपाय भी कर्म का ही एक अंग है। भारतीय ऋषि परम्परा में आत्मा के साथ शरीर को भी स्वस्थ और निर्मल पर बल दिया गया है। क्योंकि कर्म को सम्यक प्रकार से करने के लिए शरीर का स्वस्थ होना भी आवश्यक है सभी प्रकार के कर्मों का माध्यम शरीर ही है। योग की सिद्धियों का माध्यम भी शरीर ही है।
भारतीय ऋषियों ने योग की अनेक सिद्धियाँ अर्जित की थी। एक समय था भारत का योग विज्ञान चरम पर था इसका प्रत्यक्षीकरण रामायण और महाभारत में होता है।
योग का अर्थ है जोडऩा। अपने को प्राणिमात्र में देखना तथा प्राणिमात्र को आत्मवत् देखना अर्थात् भिन्नता में अभिन्नता का अनुभव करना ही योग है। दूसरे शब्दों में यदि कहा जाय तो आत्मा और परमात्मा के सम्मिलन की अद्वैत अनुभूति योग कहलाती है।
हमारे ऋषियों ने योग के द्वारा शरीर, मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के आठ प्रकार के साधन बताये हैं, जिन्हें अष्टाङ्ग योग कहा जाता है। ये साधन हंै यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनके निरन्तर अभ्यास से ही योग की दुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती है।
शारीरिक मानसिक बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योग ही सवेत्तिम पद्धति है। विश्व में ऐसी कोई भी अन्य पद्धति नहीं है। भारत की इस प्राचीन धरोहर ने ही समाज में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव निर्माण किया था। सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:’ का वैश्विक स्वरूप भी इसी की देन है। इसके अभाव के कारण ही समाज में स्वार्थ एवं मानवीय मूल्यों का संकुचन हुआ है।
आज पुन: भारत की प्राचीन योग पद्धति विश्व पटल पर अपने प्राचीन स्वरूप को स्थापित करने के लिए उद्धत है। विश्व ने इसके महत्त्व को समझा है। 21 जून ‘विश्व योग दिवस’ के रूप में सम्पूर्ण विश्व के द्वारा आयोजित किया जाना इसका प्रमाण है। भारत की प्राचीन योग विज्ञान पद्धति विश्व को आज की अनेक समास्याओं का समाधान दे सकती है। आज पुन: भारत को अपने विश्व गुरुत्त्व का परिचय देकर भारत की प्राचीन धरोहर योग को वैश्विक मान्यता प्रदान करानी है।