यूरोपीय सच्चाई का भारतीय संस्करण

जय प्रकाश सिंह
लेखक केन्द्रीय विश्वविद्यालय हि.प्र. में सहायक प्राध्यापक हैं।


भारतीय दस्तावेजों को यूरोपीय नजरिए से व्याख्यायित करने के औपनिवेशिक चलन को अब भारतीय अकादमिक जगत में सामान्य और आवश्यक शोध सिद्धांत के तौर पर स्वीकार किया जाता है। हम आज तक उन धरातलों को शोध नहीं कर पाए है, जिन पर भारतीयता अधिष्ठित है। इसलिए परम्पराओं की व्याख्या के भारतीय मानक भी विकसित नहीं हो पाए है। इंडोलॉजी के नाम पर बहुत मेहनत से किए जाने वाले शोधों में आसानी से यह तथ्य पकड़ में आ जाता है कि हमारी कोशिश पश्चिमी पैमानों पर भारत और उसकी परम्पराओं में अधिकतम अच्छाइयों का ढूंढना है। हो सकता है कि भारत में बहुत सारी ऐसी बातें होती भी रहीं हो, जो यूरोप में अच्छाई के नाम पर आज हो रही है। लेकिन इस क्रम में यह बात विस्मृत नहीं होनी चाहिए की भारतीय परम्पराएं एकांगी नहीं है, वह एक वृहद और गुंथी हुई प्रक्रिया का हिस्सा रही हैं, जिसके केन्द्र में स्व, सृष्टि, अध्यात्म और धर्म की गहरी अनुभूतियां निहित है। उस वृहद धरातल की पहचाने बिना उसमें अच्छाई ढूंढ निकालने का प्रयास करना खुद को छोटा बनाने का प्रयास जैसा है।
सभ्यता अध्ययन केन्द्र के निदेशक रवि शंकर की नई किताब ‘ भारत में यूरोपीय यात्री-उद्देश्य, वर्णन और यथार्थ’ का आकलन इस परिप्रेक्ष्य में करें तो यह इंडोलॉजी के क्षेत्र में एक नई मार्गदर्शिका के तौर पर उभर कर हमारे सामने आती है। यह यूरोपीय नजरिए से भारत के आकलन से न केवल मुक्त है बल्कि इससे भी एक कदम आगे जाकर भारतीय नजरिए से यूरोपीय सच्चाई की ईमानदार पड़ताल है। इस किताब की संकल्पना में रवि शंकर इस मान्यता के साथ आगे बढ़ते हैं कि इंडोलोजी की परिधि भारत तक ही सिमटी हुई नहीं है। भारतीयता खूबियों और खामियों का आकलन निर्वात में नहीं हो सकता, उसके लिए तुलनात्मक आधारों से हमारा वास्तविक परिचय भी होना चाहिए।
यह किताब भारत आने वाले यूरोपीय यात्रियों से हमारा वास्तविक परिचय कराती है। यूरोपीय यात्रियों के बारे में गढ़ी गई सच्चाइयों से रु-ब-रु कराने की यात्रा इतनी विस्तृत और रोचक है कि हम खुद कई पड़ावों पर हम खुद को शैक्षणिक ठगी का शिकार मानने को मजबूर हो जाते हैं। पुस्तक छ: अध्यायों में विभक्त हैं। किताब की शुरुआत यूरोप-भारत सम्बंधोंं की शरुआत से होती है। दूसरे और तीसरे अध्यायों को भी पृष्ठभूमि के तौर पर लिया जा सकता है। किताब के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका चैथा और पांचवा अध्याय है। इन अध्यायों में यूरोपीय यात्रियों के वास्तविक लक्ष्यों और उद्देश्यों की विवेचना की गई है। चैथे अध्याय में इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि यूरोपीय यात्रियों की भारत की तरफ यात्रा किसी ज्ञान पिपाशा के कारण नहीं थी, बल्कि यह सभ्यतागत आक्रमण और आर्थिक लूट के उद्देश्य से प्रारंभ की गई थी।
इसी तरह पांचवे अध्याय में उन बिंदुओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, जहां पर इन यात्रियों के उद्देश्यों और व्यक्तित्व को वर्णन पक्षपातपूर्ण ढंग से किया गया है। यह वर्णन भी नेत्रोन्मीलक है। किताब के समापन तक पहुंचते-पहुंचत प्रख्यात इतिहासकार और दार्शनिक धर्मपाल की उस स्थापना से खुद को सहमत पाते हैं कि यूरोप के बारे में सीमित और भ्रामक जानकारी भारतीयों को न तो यूरोप का सही आकलन करने देती है और न ही अपने बारे में सही निष्कर्ष तक पहुंचने देती है। पश्चिम को लेकर जो व्यामोह और सम्मोहन भारत में देखने को मिलता है,उसका बड़ा कारण यूरोप की साभ्यतिक रीति -नीति से हमारा अपरिचय ही है।
यह पुस्तक भारत आने वाले यूरोपीय यात्रियों के वास्तविक लक्ष्यों और बड़ी मेहनत से गढ़ी गई उनकी कृत्रिम मानवीय छवि के बीच के सच को पुस्तक बड़े करीने से पकड़ती है। इसी बहाने किताब यूरोप के सच से हमारा परिचय भी कराती है। अपनी सभ्यता को लेकर सजग हर व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।