माहिष्मती का सच जब चौहानों ने हराया था असुरों को

मनीषा सिंह
लेखिका युवा इतिहासकार हैं।


प्रसिद्ध फिल्म बाहुबली से लोगों को माहिष्मति नामक साम्राज्य से परिचय हुआ और लोगों को वहाँ के प्रतापी सम्राटों की भी जानकारी मिली। परंतु सभी लोगों को यह एक काल्पनिक कहानी ही प्रतीत हुई। कहानी काफी कुछ काल्पनिक थी भी और इस कारण लोगों ने अनुमान तो बहुत लगाए कि माहिष्मति साम्राज्य वास्तव में यदि रहा होगा तो कहाँ रहा होगा, परंतु अधिकांशत: यही मान लिया गया कि कहानी की भाँति यह साम्राज्य भी कल्पना की ही उपज है। सच तो यह है कि माहिष्मति साम्राज्य इतिहास में वास्तव में था और वहाँ चौहानों का राज्य हुआ करता था जो फिल्म में दिखाई गई कहानी की ही भाँति ही शूरवीर और प्रतापी थे। माहिष्मति चेदि जनपद की राजधानी थी, जो नर्मदा के तट पर स्थित थी। इस माहिष्मति साम्राज्य को आज जिला इंदौर, मध्य प्रदेश में स्थित महेश्वर नामक स्थान से जाना जाता है। उन पर हमला करने वाले असुर थे।
इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के अनुसार असुर वे हैं जिन्हें यूरोपीय असीरियन कहते हैं। प्राचीन यूनानी उन्हें असुरियन कहते थे और स्वयं अपने को अश्शूर कहते थे। प्राचीन वैदिक भारतीय उन्हें असुर और उनके देश को असूर्या अथवा असूर्य कहते थे। यूनानी स के स्थान पर श का उच्चारण करते थे। असुरों का साम्राज्य ही असीरिया (असूर्या) था। असीरिया फरात और दजला नदियों के मध्य अवस्थित था जो कि मोसापोटामिया और बेबिलोनिया के ध्वंसावशेषों पर खड़ी थी और जिसे आज हम सीरिया के नाम से जानते हैं।
असुर कितने बर्बर और क्रूर थे, इसका अधिक वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। यह केवल असुरराजा नासिर पाल के 859 ई.पू के अभिलेख से ही ज्ञात हो जाएगा जिसमें वह लिखता है कि उनके तीन हजार सैनिकों को मैंने मौत के घात उतार दिया, बहुत से बन्दियों को मैंने आग में जला दिया, कुछ की मैंने अंगुलियां काट डालीं और कुछ के नाक-कान काट डाले, बहुतों की मैंने आंखे निकाल ली, मैंने एक ढेर जीवित शत्रुओं के सिरों का तथा एक ढेर मृत शत्रुओं के सिरों का लगवाया, बहुतो के सिरों को नगर में काष्ठ के स्तंभों में लटकवा दिया और उनके युवतियों को मैंने जिन्दा जलवा दिया।
असुर वंश का संस्थापक तीलजद था जिसे अंग्रेजी में टिगलथ पिलेसर कहते हैं। उसने 745-727 ई. पू. में राज्य किया। सेनाकेरिब के पुत्र असुर्दन (681 ई. पू. से 669 ई.पू.) ने सीडोन नगर का विध्वंस करते हुए 671 ई.पू. में सम्पूर्ण मिश्र पर अधिकार कर लिया था। असुर्दन का पुत्र असुर वणिपाल 669 ई.पू. से 626 ई.पू. असुर साम्राज्य का सबसे अधिक शक्तिशाली सम्राट था। इसने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर में चीन तक, पश्चिम में मिश्र-यूरोप तक और पूर्व में भारत के सिंधु प्रदेश तक कर लिया था। इसके अत्याचारों से भयभीत होकर शक, यवन, सुमेरियन, मीड, किमपिरियन जैसी आक्रान्त जातियां भी भाग खड़ी हुईं और उन्होंने अपने प्रदेश से भागकर भारत की शरण ली। ये सभी जातियां भारतीय मूल की ही थीं जो क्षत्रियों की व्रात्य जातियों में गिनी जाती थीं। व्रात्य जाति अर्थात् जो क्षत्रिय जाति अपने क्षत्रिय वर्ण धर्म से भटक कर असुरों के समान व्यवहार करने लगे, उन्हें व्रात्य क्षत्रियों में गिना जाता है। मनुस्मृति में इसका उल्लेख पाया जाता है। यूनानी साक्ष्यों से ज्ञात होता है 650 ई.पू., 633 ई.पू. और 630 ई.पू. में असुरों की राजधानी निनेवे पर आक्रमण हुए थे। फिर 623 ई.पू. में जो आक्रमण हुआ उसमें असुर साम्राज्य तहस-नहस हो गया जिससे बेबिलोनिया भी उनके शिकंजे से मुक्त हो गया।
चौहान का वंश परिचय- भविष्यपुराण,
पृथ्वीराजरासो, पृथ्वीराज विजय, हम्मीर रासो, वंश-भास्कर, प्रबन्धकोश, सुरजन चरित्र, चौहान चन्द्रिका, वंशप्रकाश, बेदला के चौहानों के सिसाडा अभिलेख तथा लूणसिंह देव के आबू अभिलेख आदि चौहान के आविर्भावकाल के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूत्रों का ज्ञान कराते हैं। उक्त स्रोतों से ज्ञात होता है कि कलियुग में भगवान् विष्णु के बुद्धावतार 1175 ई.पू. से 1055 ई.पू. के पश्चात् जब भारतवर्ष में असुरों के आक्रमण होने लगे तब उनके त्राण दिलाने हेतु वसिष्ठ नामक ब्राह्मण ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया जिसमें भारतीय क्षत्रियों की व्रात्य जातियों शक, यवन सुमेरियन, मीड, किम्परियनों को भारतीय सनातन धर्म की धारा में लाकर असुरों के विरुद्ध लोहा लेने के लिए चार क्षत्रिय जातियां प्रतिहार, चालुक्य, परमार और चाहमान जिन्हें चौहान भी कहा जाता है, को नेतृत्व के लिये तैयार किया। पूरे क्षत्रियों के दल की अगुयायी करने के कारण ये चार क्षत्रिय जातियां अग्निकुलीन कहलाईं।
प्राचीन चन्द्रवंशी राजा यदु के पुत्र वृजिनिवान का अवंती में जोकि अब मध्य प्रदेश में है, राज्य था जिसकी राजधानी माहिष्मति थी। इस वंश में हैहय, कार्तिवीर्य अर्जुन वीतिहोत्र आदि हुए थे। यदु को सूर्यवंशी राजा हर्यश्व ने गोद ले लिया था इसलिये यदु चन्द्रवंश के साथ सूर्यवंश में भी गिने जाने लगे। यदुवंशी द्वामुष्यायण कहलाये, इसीलिए चौहानों के अभिलेखों में सूर्य और चन्द्र दोनों वंश का उल्लेख है। इसी परम्परा में चलकर 7 वीं शती ई.पू. में महिष्मती के नरेश चौहान हुए जिन्हें वसिष्ठ ने असुरों के विरुद्ध युद्ध करने भेजा।
प्रथम अभियान मरुक्षेत्र के राजा प्रतिहार के नेतृत्व में 650 ई.पू. में असुरों की राजधानी निनेवे पर हुआ किन्तु सफलता नहीं मिली। निनेवे के अकेले की सेना संख्या 9.5 लाख थी और इधर प्रतिहार की सैन्य संख्या कुछ हजार में थी। ये अश्शूर जाति इतनी बर्बर थी कि कोई भी युद्ध नियमों का पालन नहीं करती थी एवं युद्ध पर विजय प्राप्त करने के लिए बर्बरतापूर्ण तरीके से विपक्षी राजा का हत्या कर देती थी। प्रतिहार राजा और अशुरों के बीच कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। संख्या बल में कम होने एवं असुरों के अत्यंत बर्बरता से युद्ध करने के कारण प्रतिहार वंश के राजा की पराजय निकट प्रतीत होने लगी। प्रतिहार राजा ने जब देखा कि उनके सैन्यबल को बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतारा जा रहा है तब उन्होंने युद्ध से भाग कर मेसोपोटामिया से अपने जीवित एवं घायल सैनिकों की रक्षा करते हुए आर्यावर्त सुरक्षित लौट आये। द्वितीय अभियान 634 ई.पू. में में पाटन, गुजरात के राजा प्रतिहार के नेतृत्व में हुआ। इन्होंने भी असुरों की राजधानी निनेवे पर आक्रमण किया किन्तु इस बार भी सफलता प्राप्त न हो सकी। तृतीय अभियान 630 ई.पू. में आबूधार के राजा परमार के नेतृत्व में असुरों की राजधानी निनेवे पर हुआ किन्तु सफलता इस बार भी नहीं मिली।
युद्ध में सफलता ना मिलने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि हिन्दू राजाओं ने हमेशा से ही अपने धर्मग्रंथों में वर्णित युद्ध नियमों का पालन किया और अशुर किसी भी नियमों का पालन करना नहीं जानते थे। अपने शत्रुपक्ष को हराने के लिए मासूम, निर्दोष जनता, स्त्री, बच्चों इत्यादि का सहारा लेना उनकी रणनीति थी। साथ ही अश्शूर राजा युद्धभूमि में अपने लाखों के सैन्यबलों की दीवार बनाकर उनके पीछे छिपकर रहा करते थे। कायरों की भांति अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने सैनिकों को भेड़ बकरियों की तरह कटवा देते थे।
बाहुबली फिल्म के प्रथम अध्याय में असुर काल्केया को लाखो सेना के साथ महिष्मती पर आक्रमण करते हुए जिस दृश्य के इतिहास को दिखाया गया है, वो क्षत्रिय राजा और अश्शूरों के बीच हुए चतुर्थ युद्ध का असली दृश्य प्रदर्शित करता है। यह चतुर्थ अभियान महिष्मती यानी वर्तमान मध्य प्रदेश के राजा चौहान के नेतृत्व में 626 ई.पू. में असीरिया की राजधानी पर किया गया। राजा चौहान का आक्रमण इतना विध्वंसक था कि असुर साम्राज्य खण्ड-खण्ड हो गया और असुरों से बेबीलोनिया साम्राज्य स्वतंत्र हो गया और स्वयं राजा चौहान के हाथों असुरों का सबसे शक्तिशाली सम्राट वणिपाल मारा गया।
पंचम अभियान चौहानों द्वारा 614 और 610 ई.पू. में असुरों पर किया गया। यह आक्रमण इतना भयावह था कि अंग्रेजी इतिहासकार अर्नाल्ड जे. टॉयनबी लिखते हैं, 614-610 ई.पू. में असुर सैनिक शक्ति की जो पराजय हुई, वह इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण पराजय थी । चौहान के 610 ई.पू. के विजय अभियान ने विश्व के राजनैतिक मानचित्र पर से असुरों का चिह्न सर्वदा के लिये मिटा दिया और इस पराजय से केवल आसुरी सैनिक तन्त्र का ही विनाश नहीं हुआ बल्कि असुर साम्राज्य और असुर जाति का भी विनाश हो गया। इनके कुछ वंशज इन भू-भागों में ही रह गए और ये मिश्र से लेकर तुर्क, मंगोल और ईरान तक फैल गए।
माहिष्मती के राजा चौहान की यह विजयगाथा विश्वसाहित्य में दी गयी है। बाइबिल में इनका उल्लेख मीडास के शासन के नाम से पांच स्थानों पर हुआ है। असुरों के अभिलेख में भी इनका उल्लेख मीडास नाम से किया है। ईरान के इतिहास में असुरों पर हुई इस विजय को राजा अजमीढ़ की विजय कहा गया है जो कि चन्द्रवंशी और कौरव-पांडवों के पूर्वज थे। सम्भव है कि अजमीढ़ वंश से ईरानियों का संबंध भी रहा हो।