महाशक्ति, आर्थिक विकास और चीन के मिथक

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अजीत कुमार

लेखक सेंटर फॉर सिविलाइजेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं।

क्या आप जानते हैं कि क्षेत्रफल में भारत से तीन गुणा बड़ा चीन कभी भारत से छोटा भी रहा है? यह जानना हमारे लिए थोड़ा आश्चर्यजनक हो सकता है, लेकिन यदि हम 2000 वर्ष के चीन के इतिहास को देखें कुछ वर्षों को छोड़कर प्रथम शताब्दी से लेकर 1280-1290 तक सम्पूर्ण चीन का क्षेत्राफल भारत की अपेक्षा बहुत कम और कुछ समय तो आधे से भी कम रहा है। आइये नजर डालते हैं चीन के कुछ ऐसे ही मिथकों पर।
चीन जनसँख्या की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा देश है, आर्थिक दृष्टि से दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तथा क्षेत्राफल की दृष्टि से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश है। सामरिक दृष्टिकोण से भी चीन आज विश्व की महाशक्तियों में गिना जाता है। इस प्रकार आर्थिक, सामरिक रूप से एक सशक्त देश होने के बावजूद भी चीन की छवि वैश्विक पटल पर एक अविश्वसनीय और गैरजिम्मेदार राष्ट्र की बन चुकी है।
भारत सहित लगभग सभी पडोसी देशो के साथ इसके सम्बन्ध बहुत कड़वे हैं। क्योंकि चीन अपने लगभग सभी पडोसी देशों की सीमा का न सिर्फ अतिक्रमण करता रहता है बल्कि वर्तमान सीमाओं को मानने से भी इनकार करता रहता है। इसके इस प्रकार के व्यवहार से सभी अचंभित हैं, परन्तु अगर चीन के इतिहास को देखे तो पाते हैं कि चीन का रवैया सदा से ही विस्तारवादी रहा है। अपनी विस्तारवाद की लिप्सा में चीन ने कई राष्ट्रों को पूरी तरह से अपने कब्जे में कर उन्हें चीनी भूभाग का एक अंग बना दिया है। साथ ही कुछ राष्ट्रों के भूभागों पर भी अवैध अधिकार किया हुआ है। अगर और विस्तार से देखे तो पाते हैं कि वर्तमान चीन जिसका क्षेत्राफल लगभग 96 लाख वर्ग किलोमीटर है, यह मूल चीन, तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान (शिक्यांग), इनर मंगोलिया और मंचूरिया का सम्मिलित स्वरुप है। इसमे तिब्बत का क्षेत्राफल 20 लाख वर्गकिलोमीटर, शिक्यांग का क्षेत्राफल लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर, इनर मंगोलिया का क्षेत्राफल 12 लाख वर्ग किलोमीटर तथा मंचूरिया का क्षेत्राफल लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर है।
इस प्रकार मूल चीन का क्षेत्राफल अविभाजित भारत के लगभग समान ही है। इतिहास के अलग अलग कालखंडों में देखा जाए तो चीन का क्षेत्राफल वर्तमान भारत के क्षेत्राफल से भी काफी कम रहा है। हान वंश जिसका शासनकाल लगभग 450 वर्षों (206 ईसा पूर्व से 280 ई. सन्) तक रहा और जिसे चीन के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है, के दौरान चीन का अधिकतम क्षेत्राफल 60 लाख वर्ग किलोमीटर रहा।
सांग वंश तथा मिंग वंश के समय चीन का क्षेत्राफल अधिकतम क्रमशः 18 लाख तथा 65 लाख वर्ग किलोमीटर रहा है। मूल चीन की सीमाओं को समझने के लिए चीन की विशाल दीवार भी एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसको मिंग वंश (सन् 1368-1644) के शासन काल में लगभग अंतिम स्वरुप दिया गया था। उस समय तक मूल चीन के अतिरिक्त तिब्बत, शिक्यांग, आभ्यंतर मंगोलिया, मंचूरिया चीन के भाग नही थे। वर्तमान में भी मंचूरिया को छोड़कर शेष सभी स्वायतशासी प्रदेश हैं।

विस्तारवादी चीनी नीति
कब्जा किए गए प्रदेशों में चीन तेजी से वहां की संस्कृति आदि को बदलने का अभियान चला रहा है। उदाहरण के लिए तिब्बत का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। परंतु चीन में कम्युनिस्ट शासन के आने पर 1951 में चीन ने बलात् तिब्बत पर अपन अधिकार कर लिया। तिब्बत चीन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है जिसकी सीमाएं वर्तमान भारत, नेपाल, भूटान तथा म्यांमार से मिलती हैं। मूल रूप से तिब्बत तीन प्रदेशों में बंटा हुआ है यु-त्सांग, खाम और आम्दो। चीन आज जिस तिब्बत की बात करता है वह यु-त्सांग तथा खाम प्रदेश का कुछ भाग है। चीन ने यु-त्सांग तथा खाम के कुछ भाग को स्वायतशासी प्रदेश बना दिया तथा खाम के शेष भाग को सिचुआन तथा युन्नान प्रान्त में बाँट दिया तथा आम्दो प्रांत को गांसू, सिचुआन और क्विंघाई प्रांत में बाँट दिया। चीन ने स्वायतशासी तिब्बत का नाम जिजांग रखा है जिसका क्षेत्राफल 12 लाख वर्ग किलोमीटर है और अपना प्रभाव कायम रखने के लिए निरंतर वहां रणनीतिक रूप से हान जाती के लोगों को बसाता रहता है जिससे कि जनसँख्या संतुलन चीन के पक्ष में बना रहे।
इसी प्रकार पूर्वी शिक्यांग भी अल्प-काल के लिए हान वंश तथा तांग वंश के अधीन रहा परन्तु इस कालखंड के अलावा वह कभी भी चीन के अधिकार में नहीं रहा। तिब्बत की तरह यह प्रदेश भी सांस्कृतिक रूप से चीन से पूरी तरह से भिन्न रहा है। इसकी सीमाएं रुस, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत से मिलती हैं। इस प्रदेश में अधिकतर उइगर जाति के लोग रहते हैं। इस प्रदेश का एक बड़ा और महत्वपूर्ण नगर है खोतान, इसी नगर के कारण कभी इस पूरे प्रदेश को खोतान प्रदेश कहा जाता था।
मध्य एशिया में इस प्रदेश के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण ही इस प्रदेश पर चीन की कुदृष्टि हजारों वर्षों से रही है। प्रसिद्ध सिल्क रूट इसी प्रदेश से होकर जाने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। वर्ष 1934 के बाद कुछ समय के लिए यह प्रदेश सोवियत संघ के प्रभाव में भी रहा लेकिन इसी दौरान दो बार अल्प-काल के लिए ही सही यह एक स्वतंत्रा प्रदेश भी रहा। चीन में गृह युद्ध समाप्त होने तथा मूल चीन में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के बाद चीन ने सोवियत संघ के सहयोग से इस प्रदेश पर भी यहाँ के निवासियों के इच्छा के विरुद्ध अधिकार कर लिया। यहाँ के निवासियों के अपने प्रति आक्रोश और असंतोष को देखते हुए चीन ने षड़यंत्रापूर्वक इस प्रदेश में भी हान जातियों को बसाकर जनसँख्या संतुलन को अपने अनुरूप करने का प्रयास किया है। वर्तमान में इस प्रदेश में हान जाति के लोगों की संख्या इस प्रदेश की पूरी संख्या के लगभग 40 प्रतिशत के बराबर है।
मंचूरिया भी सदा से एक अलग प्रदेश रहा है। क्विंग वंश के शासन कल में मांचुओं का पुरे चीन पर अधिकार था जो 1644 से लेकर 1912 तक रहा। बाद में कुछ समय के लिए मंचूरिया जापान के अधिकार में रहा जो 1945 के बाद से उसके हाथ से निकल गया और बहुत हद तक सोवियत संघ के प्रभाव में रहा। बाद में यह पूरा प्रदेश चीन के अधिकार में आ गया।
चीन ने मंचूरिया को निंग, किरिन, और हाई-लुंग तीन प्रान्तों में विभाजित कर दिया। आभ्यंतर मंगोलिया भी मंगोलिया का भाग रहा है न कि चीन का। चीन के विशाल दीवार को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मूल चीन की आखिरी सीमा उस क्षेत्रा में आभ्यंतर मंगोलिया के सीमा तक ही है परन्तु चीन ने इसे भी अपनी साम्राज्यवादी लिप्सा का शिकार बना लिया और यहाँ भी जनसँख्या संतुलन अपने अनुकूल कर लिया। आज इस प्रदेश में 60 प्रतिशत से ज्यादा हान जाति के लोग रहते हैं। मंगोल यहाँ अल्पसंख्यक हो चुके हैं। इस प्रकार चीन स्वभाव से ही विस्तारवादी रहा है। पड़ोसी राष्ट्रों के भूभागों पर इसकी कुदृष्टि सदा से ही रहती है। पड़ोसियों के प्रति चीन का व्यवहार हमेशा षड़यंत्रा और छल भरा रहा है।

विश्व आर्थिक इतिहास में चीन और भारत
भारतीय इतिहास लेखन में मैक्स वेबर (1864-1920) और मार्क्स(1818-1883) का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। भारत के इतिहास को लिखनेवाले अधिकतर इतिहासकार इनसे बहुत प्रभावित रहे हैं। इन दोनों पश्चिमी विद्वानों की विशिष्टता यह रही है कि अपने जीवन के कालखंड में ये दोनों भारत कभी नहीं आये और इनके समय में आज जैसी इन्टरनेट और अन्य सुविधाएँ भी नहीं थी। फिर भी इन दोनों विद्वानों ने भारत पर बहुत कुछ लिखा। मैक्स वेबर ने भारत और चीन के बारे में लिखा कि भारत और चीन का आर्थिक विकास इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि ये दोनों देश क्रमशः हिन्दू और बौद्ध मत को मानने वाले हैं और इनका हिन्दू और बौद्ध दर्शन इनके आर्थिक विकास में बाधक है।
इसी क्रम में 70 के दशक में भारत के एक अर्थशास्त्रा के विद्वान ने भारतीय आर्थिक विकास दर को “हिन्दू विकास दर” कहकर व्यंग्य किया और एक समृद्ध तथा गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति का उपहास किया। परन्तु कुछ ही समय के बाद एक बेल्जियन अर्थशास्त्राी पॉल बैरोक ने अपने आर्थिक इतिहास के अपने शोध में बताया कि 1750 में विश्व के सकल घरेलु उत्पाद में भारत का भाग 24.5 प्रतिशत था और चीन का 33 प्रतिशत। और उस समय इंगलैंड और अमेरिका का संयुक्त सकल घरेलु उत्पादन विश्व के सम्पूर्ण सकल घरेलु उत्पाद के केवल 2 प्रतिशत था। बैरोक के अनुसार वर्ष 1800 में भारत का भाग 20 प्रतिशत तथा वर्ष 1830 में 18 प्रतिशत था। एक अन्य आर्थिक इतिहासकार अंगस मेडीसन ने दुनिया के पिछले 2000 वर्ष के आर्थिक इतिहास पर किए गए अपने शोध में जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उसने पुनः सम्पूर्ण विश्व को चौंका दिया। अंगस मेडीसन के अनुसार पहली शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक केवल एक बार 17 शताब्दी को छोड़कर भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है तथा चीन दूसरे स्थान पर रहा है।
पश्चिमी शोधों में दिए गए इन आंकड़ों को थोड़ा ध्यान से देखे जाने की आवश्यकता है। हमें चीन संबंधी विवरणों को पढ़ते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यूरोप और अमेरिका की दृष्टि भारत के प्रति एक उपनिवेश वाली और इस कारण हेय रही है। जबकि चीन के प्रति उनका प्रेम मार्काे पोलो के समय से चला आ रहा है। अपने इस प्रेम में वे चीन के प्रति पक्षपात बरतते हैं। यही कारण है कि चीन पर भारत के सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों की उपेक्षा कर दी जाती है और जबरन चीन को भारत से आगे दिखाने के प्रयास किए जाते हैं। इसका एक उदाहरण उपरोक्त आंकड़े भी हैं। अगर भारतीय श्रोतों को देखें तो हम पाते हैं की जो आंकड़े भारत और चीन के सन्दर्भ में बैरोक और मेडीसन ने दिए हैं इसमें बहुत अंतर दिखने की संभावना दिखने लगती है। समझने की बात यह है कि ये आंकड़े जिस काल के हैं, उन कालखंडों में चीन का विस्तार आज की तुलना में काफी छोटा और भारत का काफी बड़ा रहा है। इस कारण इन आंकड़ों में काफी फेरबदल किए जाने की संभावना शेष रह जाती है।
देखने की बात यह है कि आज जबकि चीन अपने विस्तारवादी स्वाभाव के कारण अपने मूल क्षेत्रा से कई गुना ज्यादा बढ़ गया है और भारत अपने मूल क्षेत्रा से काफी कम में सिमटकर रह गया है इसके बावजूद भी भारत में कृषियोग्य भूमि चीन की अपेक्षा बहुत अधिक है अगर हम बीसवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक की भी बात करें तो यह अंतर बहुत बड़ा हो जाता है। वस्त्रा उद्योग की बात करें तो 19वी सदी के पूर्वार्ध तक वस्त्रा उत्पादन और वस्त्रा उत्पादन की तकनीक विश्व में सर्वाेत्तम थी। भारतीय वस्त्रों का शताब्दियों से विश्व के अनेक देशों में निर्यात होता रहा।
रोमन इतिहासकार एरियन के अनुसार रोम में भारतीय वस्त्रों की मांग इतनी ज्यादा थी कि लोग भारतीय वस्त्रों को उनके वजन के बराबर सोना देकर खरीदते थे। एक अन्य रोमन विद्वान् प्लिनी के अनुसार भारतीय वस्त्रों के प्रति रोमन महिलाओं और नागरिकों के जूनून के कारण सारा सोना भारत को जा रहा है। यदि चीन के रेशम की इतनी मांग हुई होती तो इन विदेशी वर्णनों में भारत की बजाय चीन का उल्लेख होता। परंतु मार्काे पोलो के पहले के विवरणों में चीन जिसे वे कैथी कहा करते थे, का वर्णन न्यूनतम ही है।
इसी प्रकार इस कालखंड में अलग-अलग उद्योंगों के सन्दर्भ में देखें तो भारत और चीन के बीच काफी अंतर दिखने लगता है। इस कालखण्ड के अलग-अलग समय के दोनों देशों के नक्शों को देखें तो यह और स्पष्ट हो जाता है। भारतीय समाज की संरचना आर्थिक उत्पादन की दृष्टि में पूरे विश्व में अद्वितीय रही है। भारत में आर्थिक चिंतन की बहुत प्राचीन परंपरा रही है। यहां का स्पष्ट और व्यावहारिक आर्थिक सिद्धांत सम्पूर्ण विश्व में अद्वितीय रहा है। परंतु चीन में आर्थिक चिंतन की ऐसी कोई पुरानी परंपरा नहीं प्राप्त होती। इससे भी साबित होता है कि चीन आर्थिक दृष्टि से भी भारत का ही अनुयायी रहा है।