भूकंपरोधी कोटि बनल भवन

ललिता जोशी
लेखिका आकाशवाणी के समाचारसेवा प्रभाग में सहायक निदेशक हैं।


यदि हम इतिहास को देखें तो हमें पूरे भारत में ऐसे किले और इमारतें मिल जाएंगी जो प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए आज भी अटल खड़ी हैं। अब आजकल मकानों में भूकंपरोधी तकनीक के प्रयोग पर ध्यान दिया जाने लगा है, जबकि हमारी पुरानी इमारतों में इस पर पहले से ही ध्यान दिया जाता रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उत्तरांखड की एक हजार वर्ष पुरानी कोटि बनल इमारतें। उत्तराखंड का उत्तरकाशी भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवदेनशील है। उत्तरकाशी में आए भूकंपों ने इस क्षेत्र के हजारों मकानों को धराशायी और बाकी बचे घरों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। लेकिन इसी उत्तरकाशी में कोटि बनल भवन इन आपदाओं के बावजूद भी शान से खड़े रहे।
अपनी पुरातनता और अनूठी निर्माण शैली के लिए दुनिया भर में पहचान बना चुके इन बहुमंजिला मकानों पर उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र (डीएमएमसी) द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि मकान बनाने की यह निर्माण शैली कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी है। यह वास्तुकला स्थान चयन से लेकर मकान निर्माण तक एक वृहद प्रक्रिया पर आधारित है। रोचक बात यह है कि यह शैली आज की आधुनिक और वैज्ञानिक मानी जाने वाली भूकंपरोधी तकनीक से भी कहीं ज्यादा मजबूत है। इसके लिए उस जमाने के लोगों ने लकड़ी और पत्थर जैसी स्थानीय निर्माण सामग्री का ज्यादा इस्तेमाल किया। कोटी बनल वास्तु कला शैली का ले आउट बहुत सादा है और इसमें जटिलता नहीं है। कोटि बनल टिकाऊ स्थापत्य कला के सर्वोत्कृष्ट नमूने है। उत्तरकाशी के कई गांवों में ऐसे कई मकान आज भी देखने को मिलते हैं। राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला कहते हैं, ‘यह हमारी भूकंपीय सुरक्षा का एक अच्छा उदाहरण है जिसमें शानदार पारंपरिक बहुमंजिला संरचना पायी जाती है। हमने पाया है कि 1000 साल पहले ही लोगों ने भूकंपरोधी तकनीक अपनाना शुरू कर दिया था।Ó
इन भवनों का विन्यास सामान्य: आयताकार भवन निर्माण योजना के तहत किया गया है। ये भवन एकल या दो इकाइयों वाले होते हैं। भीतरी दीवारें सिर्फ दो इकाइयों वाले भवनों में होती हैं जो पिछले हिस्से के मुख्य रिहायशी स्थल को सामने स्थित ड्योढ़ी से अलग करती हैं। ऊपर की दो मंजिलों में बाहर की तरफ लकड़ी की बनी बालकनी (बरामदा) होती है, जिस पर लकड़ी की रेलिंग लगी होती है और यह पूरे मकान के चारों ओर से होती है। इन बालकनी को सहारा देने के लिये लकड़ी के बड़े-बड़े लठ्ठे लगे होते हैं।
निचले हिस्से में दीवारें लम्बवत रखे लकड़ी के लठ्ठों से बनी होती हैं जो जोड़ों पर लकड़ी के पिनों (गुजा खुंता) से आपस में जुड़ी होती हैं। दीवार के उपरी हिस्सों में लकड़ी के इस ढांचे का उपयोग नहीं होता, यहां पत्थरों का इस्तेमाल होता है। दीवारों की मोटाई समानांतर रखी गयी लकड़ी की दो बल्लियों की मोटाई से तय होती है। अधिकांशत: ये बल्लियां 50 से 60 सें.मी. के बीच की होती हैं। कोटि बनल के मकानों में आमतौर पर एक छोटा प्रवेश द्वार होता है और इनसे भी छोटे अन्ये झिरके होते हैं जिन्हें लकडिय़ों से मजबूती दी जाती है। निचले तल के निर्माण में कोई खिड़कियां नहीं होती। इन भवनों में लकड़ी के शहतीर और उपलब्ध पत्थर पटार का प्रयोग किया गया है। दीवार बनाने के लिए सीमेंट या गारे का प्रयोग नहीं हुआ है। पत्थरों को एक के ऊपर एक रखा गया और उनकी चूना, गुड़ और पिसी हुई उड़द की दाल से चिनाई की गई है। पहाड़ों की जलवायु के अनुकूल इन भवनों में शहतीर वहीं मिलने वाली लकड़ी की बनी होती है।
हिमालयी राज्य उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील है। पिछले कई दशकों में आये भूकंपों से क्षेत्र की कई परिसंपत्तियां क्षतिग्रस्त हुई और जीवन अस्त -व्यस्त। वर्ष 1720 और 1803 में आये भूकंपों के अलावा हाल में वर्ष 1991 में उत्तरकाशी तथा वर्ष 1999 में चमोली में आए बड़े भूकंपों में प्रदेश में जान—माल की काफी हानि हुई थी। एक अध्ययन के अनुसार, उत्तरकाशी जिले में यमुना और भागीरथी नदी घाटी में बने चार-पांच मंजिला मकानों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। ये मकान भूकंपरोधी तकनीक से न बने होने के कारण भूकंप के झटके बर्दाश्त नहीं कर पाये और धराशायी हो गए। पहाड़ों में जीवन अत्यंत कठिन होता है। विषम, विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन करने वाले लोगों का यदि घर क्षतिग्रस्त हो जाये तो उन्हे फिर से बनाने में पूरा जीवन ही लगाना पड़ता है। लेकिन उत्तरकाशी के गांव कोटि बनल में आज से लगभग हजार वर्ष पहले बने ये मकान जस के तस खड़े हैं। विशिष्ट शैली से निर्मित कोटि बनल की बहुमंजिली इमारतें विश्वप्रसिद्ध हैं। पिछले हज़ार वर्ष में आए भीषण भूकंप भी कम से कम पांच मंजिला इन इमारतों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। इन मकानों की संख्या अभी भी अच्छी खासी है, लेकिन बाथरूम आदि की सुविधा न होने तथा अन्य कारणों के चलते इनमें रह रहे लोगों को अब यह उतनी पसंद नहीं आ रही है। गढ़वाल और कुमांऊ के पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप न होने के बावजूद सीमेंट और कंक्रीट से बने मकानों में रहने को लोग अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं और इसलिए पारंपरिक शैली से बने मकानों में रहने की बजाय उनमें रहना पसंद करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कम जागरूकता की वजह से इस शैली का उपयोग समय के साथ कम होता जा रहा है और आने वाले समय में इसके विलुप्त होने की आशंका है।
पहाड़ों में लकड़ी और पटार से बने ये भवन अपनी अटल मजबूती को लेकर आज खोज का विषय बन चुके हैं। यूनेस्को ने कोटि बनल भवनों को धरोहर स्थल भवनों की सूची में रखा है। आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केन्द्रों (डीएमएमसी), उत्तंराखंड ने इस स्थापत्य तकनीक पर विस्तृत शोध के लिए देश के दो जाने-माने वैज्ञानिकों डॉ. पीयूष रौतेला और डॉ. गिरीश चन्द्र जोशी के नेतृत्व में एक टीम बनाई है। लोगों को स्थापत्य कला के इस अनूठे नमूने से अवगत कराने के लिए देहरादून में इसकी एक प्रतिकृति भी बनाई जा रही है। डीएमएमसी ने इसके संरक्षण के लिए संस्कृति विभाग से निवेदन किया है जो इस संबंध में उचित कदम उठा सकता है। डीएमएमसी ने इस संबंध में अध्ययन किया है और इस वास्तुकला शैली के लाभ से लोगों को परिचित कराने के लिए अपने स्तर पर कार्यशालाएं की हैं।