भाषाएँ और एकात्मता

भाषाएँ और एकात्मता

प्रो. हेमराज मीणा दिवाकर
लेखक केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व प्राध्यापक हैं।
भारत के सात बहन-राज्य पूर्वाेत्तर में हैं। असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा और मेघालय। दुर्भाग्य यह है कि आज के सूचना क्रांति और यातायत साधनों की प्रचूरता के युग में भी ये सातों राज्य भारत से कटे हुए से दिखते हैं। हालांकि बावन शक्तिपीठों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ कामाख्या देवी पीठ असम में ही है। इसलिए इन क्षेत्रों में अलगाववादी ताकतें पूरी तरह से सक्रिय हैं। अरुणाचल प्रदेश पर चीन तो दावा ठोक ही रहा है, भारत के शेष हिस्सों में पूर्वाेत्तर के लोगों को चीनी या नेपाली ही समझ लिया जाता है। यह काफी दुखद है। ऐसे में हमें उन सूत्रों को तलाशना और उन्हें उभारना होगा, जो उन्हें भारत से जोड़ती हैं। उन सूत्रों को हमें मजबूत करना होगा। ऐसा ही एक सूत्र है भाषा और बोलियां।
पूर्वोत्तर भारत में भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत चार मुख्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। असम राज्य में असमिया तथा बोडा, मणिपुर में मणिपुरी तथा त्रिपुरा व असम की बराक घाटी में बांग्ला भाषा का प्रयोग मुख्य भारतीय भाषा के रूप में किया जाता है। मणिपुरी भाषा-भाषी समाज असम और त्रिपुरा में काफी संख्या में रहता है। बांग्ला भाषा-भाषी समाज पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों में निवास करता है कदाचित इसीलिए पूर्वोत्तर भारत की सभी मुख्य भाषाएं बांग्ला से प्रभावित रही हैं। बहुत लम्बे समय तक पूर्वोत्तर की कई जनजातीय भाषाओं जैसे खासी और गारो को बांग्ला लिपि में लिखा जाता था।
पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं का संगम क्षेत्र है। 1971 ई. की जनगणना के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में बोली जानेवाली 130 भाषाएँ भोटी-चीनी परिवार की हैं। संस्कृति संगम उत्तर पूर्वांचल नामक कृति में डॉ. विजय राघव रेड्डी ने लिखा है, ”सिक्किम, असम, मेघालय, नगालंैड, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में भारोपीय परिवार की असमिया, बांग्ला, हिंदी और नेपाली के अतिरिक्त आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की कुछ भाषाएँ तथा तिब्बती चीनी परिवार की भाषाएं एवं बोलियाँ बोली जाती हैं। यहां एक और भारोपीय परिवार की चकमा भाषा बोलने वाले चकमा जनजातीय वर्ग में माने जाते हैं, तो कुकी चीनी समूह की भाषा मणिपुरी बोलने वाले मणिपुरी या मैते लोग जनजातीय माने जाते हैं।”
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तथा स्वतंत्र राज्यों के गठन के बाद लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति लगाव जागृत हुआ है इसीलिए सभी लोग अपनी-अपनी भाषाओं और बोलियों को बढ़ावा देने लगे हैं। अधिकांश जनजातीय भाषाओं में साहित्य सृजन भी प्रारंभ हो चुका है। सिक्किम में नेपाली भाषा के अलावा भोटिया तथा लेप्चा, तामांग, लिम्बू भाषाएं भी बोली जाती हैं। नगा जनजातीय भाषाओं का प्रयोग नगालैंड के अतिरिक्त अरुणाचल, असम, और मणिपुर में भी किया जाता है, जैसे, अरुणाचल में वांगचो, असम तथा मणिपुर में माओ, जिमी एवं कबुई। असमिया भाषा का जन्म पूर्वी मागधी अपभ्रंश से हुआ है। यह भाषा अहोम जाति की भाषा से भी प्रभावित रही है। अहोम भाषा का अब अस्तित्व नहीं है। ऊपरी असम में अहोम असमिया जाति का ही अस्तित्व है। असम में असमिया भाषा के अलावा निम्नांकित जनजातीय भाषाओं और बोलियों का प्रयोग किया जाता है-
1. बोडो-कछारी
2. सोनोवाल-कछारी
3. सोनोवाल-कछारी
ये तीनों बोलियाँ कछारी भाषा के नाम से भी जानी जाती हैं। बोडो भाषा का प्रयोग कोकराझार, कामरूप, शोणितपुर, उदालगुडी, दरंग तथा नलबाड़ी क्षेत्रों में किया जाता है तो सोनोवाल-कछारी का प्रयोग दीमापुर क्षेत्र के अतिरिक्त नार्थ लखीमपुर, धेमाजी, डिफू और हाफलांग में भी किया जाता है।
4. देउरी
5. कारबी
6. लालुंग (तिवा)
7. मिसिंग (मिरी)
8. राभा
असम की जनजातीय भाषाओं या बोलियों में असमिया भाषा का सर्वाधिक प्रभाव राभा भाषा ने ग्रहण किया है।
9. बर्मन क्षेत्र- बराक घाटी
10. हमार या मार- बराक घाटी, जिरिघाट
11. कुकी- मणिपुर, नगालैंड़
12. रेंगमा-नगा
13. जिमी-नगा
14. हाजोंग
15. गारो
16. खासी
17. जयन्तिया
वैसे तो गारो, खासी, जयन्तिया मेघालय राज्य की मुख्य जनजातीय भाषाएं हैं किन्तु इन तीनों भाषाओं के बोलने वाले काफी तादाद में असम राज्य में भी निवास करतेे हैं। असम सरकार द्वारा प्रकाशित ‘ट्राइब्स ऑफ असम’ नामक ग्रंथ में इसका प्रामाणिक विवेचन किया गया है। खासी भाषा मन-खामेर समूह की भाषा है। कुछ भाषाविद् मानते हैं कि मध्य भारत की मुंडा भाषा (मुंडारी) का भी इसमें समावेश हुआ है। खासी भाषा का क्षेत्र इंडो-आर्यन और तिब्बती-बर्मा भाषा के बीचवाला क्षेत्र हैं, इसलिए इसका प्रभाव भी इसपर पड़ा है। प्रारंभ में ईसाई मिशनरी चेरापँूजी में ही आकर बसे थे इसलिए खासी लोकभाषा को का-किटीयन-सोरा’ कहा गया। सोरा चेरापूँजी का ही मूल नाम है। जीबन राय (जीवन राय) खासी भाषा के पहले विद्वान थे जिन्होंने ‘रामायण’ और ‘बुद्धदेव चरित’ का खासी में भाषांतर करके हलचल मचा दी थी। इसी प्रकार कालाचांद शास्त्री ने सम्पूर्ण महाभारत का मणिपुरी भाषा में अनुवाद कर एक क्रांतिकारी कदम उठाया। पं. राधामोहन शर्मा ने उपनिषदों का मणिपुरी भाषा में अनुवाद किया था। गारो भाषा का प्रयोग वेस्ट गारो हिल्स (तूरा), ईस्ट गारो हिल्स (विलयम नगर) तथा साउथ गारो हिल्स (बाघमारा) में किया जाता है। ये तीनों जिले गारो हिल्स के नाम से जाने जाते हैं। गारो भाषा तिब्बती-बर्मा परिवार की भाषा है। खासी का प्रयोग नांगस्टोन तथा नाअंगपोंग तथा शिलांग क्षेत्र में किया जाता है। इस क्षेत्र को खासी हिल्स से जाना जाता है। 1868 ई. में आईग्टान खारकोगोर ने आठ हजार शब्दों का खासी शब्दकोश तैयार किया था। पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग में खासी और गारो का अध्ययन-अध्यापन एम.ए स्तर पर किया जा रहा है। जयंतिया बोली मन-खामेर समूह की ही एक बोली है जो खासी के निकट है। इसका प्रयोग जोवाई क्षेत्र में किया जाता है जिसे जयंतिया हिल्स के नाम से जानते हैं।
अरुणाचल प्रदेश में कुल 25 भाषाओं और बोलियां का प्रयोग किया जाता है-
(1) आदी, (2) अका, (3) आपातानी, (4) देवरी या देउरी, (5) हिलमिरी, (6) मेंबा, (7) खांबा, (8) खामती, (9) खोवा, (10) मिजी (धम्मई),(11) मिशिंग (मिसिंग), (12) मोंपा और उसकी बोलियाँ, (13) मिशमी डिगारू, (14) मिशमी ईदू, (15) मिशमी मीजू, (16) बैंगनी, (17) निशी (निशिंग), (18) नोक्टे या नोक्टे, (19) शेरदुक्पेन, (20) सिंहफो, (21) सोलुंग, (22) तागिन, (23) वाचू, (24) तागंसा, (25) योबिन।
जिस प्रकार असम में बोडो भाषा के लिए देवनागरी लीपि का प्रयोग होता है उसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश की जेमी के लिए देवनागरी को अपनाया गया है। अरुणाचल प्रदेश में समस्त जनजातीय भाषाओं के मध्य संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग होता है। अरुणाचल में कामेंग और तवांग जिले कि निवासी मोन्ना भाषा बोलने हैं। यह भाषा तिब्बती भाषा से मिलती-जुलती है। इी प्रकार वांगचो भाषा अरुणाचल के वांगचो नगाओं की भाषा है जिसके बोलने वालेे लगभग 30 हजार हैं।
पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषाओं के संदर्भ में यह तथ्य जानने योग्य है कि यहाँ जितनी जनजातियाँ हैं उतनी ही जनजातीय भाषाएँ हैं। पूर्वोत्तर भारत को जनजातीय भाषाओं के स्तर पर तोडऩे का कुचक्र चल रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी सभी जनजातीय भाषाओं के मध्य समन्वय का सेतु निर्मित कर इस कुचक्र को तोड़ सकती है। पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषाओं तथा पूर्वोत्तर की संविधान स्वीकृत भाषाओं के सन्दर्भ में संपर्क भाषा की चर्चा भी आवश्यक है। सभी आठ राज्यो में हिन्दी मुख्य संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है। हिंदी को मुख्य संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने में सूचना प्रौद्योगिकी और मीडिया का स्थान मुख्य है। रेडियो से बोडो अनुष्ठान तथा कार्बी अनुष्ठान का प्रसारण प्रारंभ हो चुका है।
पूर्वोत्तर की भारतीय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद कार्य तथा कोश निर्माण कार्य से भी हिन्दी का संपर्क भाषा के रूप में विकसित होने का वातावरण निर्मित हुआ है। कोश निर्माण के क्षेत्र में नगालैंड भाषा परिषद् कोहिमा की भूमिका मुख्य रही है जिसने पूर्वोत्तर की लगभग सभी भाषाओं में 100 से अधिक कोशों का निर्माण और प्रकाशन किया है। नगालैंड में नगामीज मुख्य संपर्क भाषा है तथा अब हिन्दी भी वहां मुख्य संपर्क भाषा के रूप में स्थापित होती जा रही है। दीमापुर और कोहिमा में हिंदी में संवाद का अच्छा वातावरण निर्मित हो गया है। नगालैंड की राजधानी कोहिमा में ‘तेनिदिए’ अकादमी की स्थापना हो चुकी है। यह अकादमी कोहिमा के चारों ओर प्रचलित पांच नगा भाषाओं- अंगामी, सेमा, लोथा, आओ आदि को मिलाकर’तेनिदिए’ नामक नई भाषा को विकसित कर रही है। तेनिदिए में कोश निर्माण का कार्य हो चुका है। तेनिदिए व्याकरण भी देवनागरी में छप चुका है। भाषायी दृष्टि से यह कार्य एक सुखद संदेश प्रदान करता है। जनजातीय भाषाओं के संरक्षण की दिशा में यह मील का पत्थर जैसा कार्य है।
पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा राज्य में काकबरक का प्रयोग लगभग पांच जनजातियाँ (देववर्मा, जमातिया, रांखल, हालाम, आदि) करती हैं। काकबरक भाषा के अध्ययन-अध्यापन का कार्य तेजी से प्रारंभ हो चुका है। काकबरक में पाठ्य पुस्तक निर्माण का कार्य भी चल रहा है। त्रिपुरा में काकबरक भी जनजातीय समाज का मुख्य संपर्क भाषा है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा काकबरक भाषा का शब्दकोश प्रकाशित कर चुका है। कछार क्षेत्र तथा त्रिपुरा राज्य में विष्णुप्रिया भी सुव्यवस्थित भाषा के रूप में विकसित हो रही है। विष्णुप्रिया मणिपुरी भाषा के साथ मणिपुरी शब्द का प्रयोग करना चाहिए या नहीं यह विवाद का विषय बना हुआ हैं।
विष्णुप्रिया पर बांग्ला और असमिया का व्यापक प्रभाव है। अभी तक विष्णुप्रिया को स्वतन्त्र भाषा का दर्जा नहीं मिला है। काकबरक भाषा के अध्ययन -अध्यापन की सुविधा त्रिपुरा रवीन्द्र परिषद्, अगरतला में प्रारंभ हो चुकी है। पूर्वोत्तर भारत की मुख्य-मुख्य भाषाओं में कोश निर्मित हो चुके हैं तथा हो रहे हैं। बोड़ो-हिंदी-अंग्रेजी कोश का संपादन भारतीय भाषा परिषद्, मैसूर के नेतृत्व में तैयार किया गया था। उसका प्रकाशन देवनागरी लिपि में बोडो साहित्य सभा, गुवाहाटी ने किया है। डॉ. रविप्रकाश श्रीवास्तव का मिजो-हिंदी कोश तथा डॉ. सी.ई.जीनी का मिजो-हिंदी कोश एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। श्री सी. कामलोवा संपादित मिजो कोश भी नई उपलब्धि है। इसी प्रकार असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी ने देवनागरी लिपी में एक विशाल असमिया हिंदी कोश का प्रकाशन किया है। मणिपुरी-हिंदी पर दो कोश देवनागरी में प्रकाशित हैं- एक है अरिबम पं. राधामोहन शर्मा का हिंदी-मणिपुरी कोश तथा नगालैंड भाषा परिषद् कोहिमा द्वारा प्रकाशित हिंदी-मणिपुरी कोश। पं. नारायण शर्मा ने भी मणिपुरी-हिंदी कोश बनाया था। केन्द्रीय हिंदी संस्थान की हिंदी-मणिपुरी द्विभाषी कोश निर्माण परियोजना पर कार्य हो चुका है। जिसमें मैतै लोन की प्राचीन और मणिपुरी की स्वीकृत लिपी मैतै मयेक का प्रयोग नहीं हो पाया हैं।
मणिपुरी भाषा में पहले 18 वर्ण थे किन्तु इस भाषा के लिए अब 27 वर्ण का प्रयोग होता है। मैतै मयेक ब्राह्मी लिपी की तरह स्वर और व्यंजन में विभक्त है। इसे मात्रा लिपी भी कहते हैं। मणिपुरी राज्य में 65 प्रतिशत जनता मणिपुरी भाषा का प्रयोग करती है। मणिपुरी भाषा के अतिरिक्त कुल 29 जनजातीय भाषाओं के प्रयोन के आंकड़े 1981 की जनगणना एवं भाषा सर्वेक्षण में मिलते हैं। मणिपुर राज्य मं प्रचलित जनजातीय भाषाएँ मुख्य रूप से 7 ही हैं। आधुनिक भाषाविद् भी 7 भाषाओं को ही मुख्य भाषा मानते हैं।
मणिपुरी भाषा की कई बोलियां हैं- जैसे फयेंग, सेकमाई, अन्द्रो, ककचिंग क्षेत्र में चकमा तथा जिरिबाम, जिरी घाट और कछार क्षेत्र में कछारी मणिपुरी। मणिपुर में प्रचलित जनजातीय भाषाओं को दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-
(क) पहली, नगा समूह की भाषाएँ-
1) कबुई (जेलईरोंग)
अ. जेमैं,
आ. लैंगमे,
इ. रोंगमै
2) तादुखुल
3) (माओ-माओ, पाओ)
(ख) दूसरी, मिजो समूह या कुकी वर्ग की भाषाएँ-
1) कुकी
अ. पाइते
आ. वाइफै
इ. थादौ
ई. खोद्जाई
चांदेल ककचिंग और पलेल क्षेत्र में अनाल मरिद्द जनजातीय भाषाओं का प्रयोग भी किया जाता हैं।
अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में चकमा भाषा- भाषी और असम और त्रिपुरा में संथाली भाषा-भाषी भी काफी तादाद में निवास करते हैं
नगा भाषाओं का भारत की अन्य भाषाओं से गहरा संबंध है। नगा भाषाओं में सेमा, खेजा, खिममदन, कोन्या, लोथा, चाड्, फोम, साड्न्तम, लियदमाइ, आओ, जेमी, छोक्री, पोचुरी, अंगामी, रेड्न्मा, यिमचिदर आदि प्रमुख जनजातीय भाषाएँ हैं। अधिकार भाषाविद् कुकी भाषा को नगा भाषा मानते हैं। किन्तु इस विषय में भी काफी विवाद है।
पूर्वोत्तर भारत के निवासियों के विषय में एक विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि वहां सूचना संसाधित उपकरणों का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है विभिन्न जनजातीय संगठन अपनी-अपनी भाषाओं और बोलियों को इस नये दौर से जोड़कर भाषायी पहचान के प्रति जागरूक हैं। मेरे पास पूर्वोत्तर भारत की समस्त भाषाओं और बोलियों पर पर्याप्त सामग्री संकलित है जिसका प्रयोग सूचना संसाधित उपकरणों के लिए किया जा सकता है। पूर्वोत्तर भारत की प्रमुख जनजातीय भाषाओं पर व्याकरण और कोश ग्रंथ निर्मित करने की जरूरत है। साथ ही वाचिक साहित्य के संकलन, संपादन, स्पांतरण और लिप्यंतरण तथा प्रकाशन की भी जरूरत है।