भावी विज्ञान और तकनीक की भाषा होगी संस्कृत

भावी विज्ञान और तकनीक की भाषा होगी संस्कृत

संस्कृत को दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा कहा जाता है। कहा तो यहां तक भी जाता है कि संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। वैश्विक भाषाओं पर काम करने वाले शोधार्थियों का भी मानना है कि दुनिया की 97 प्रतिशत भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव है। चूँकि संस्कृत को सबसे प्राचीन भाषा का स्थान मिला हुआ है, इसलिए आज उसके साथ अपना नाता जोडऩे को सभी उत्सुक दिखाई दे रहे हैं। 17 से अधिक देशों में संस्कृत पढ़ाई जाती है। केवल जर्मनी में ही 14 विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाया जाता है। जिन ताड़पत्रों पर लिखी पांडुलिपियों को सड़ी हुई रद्दी के भाव हमारे देश में बेच दिया जाता है या चूल्हे में लकडिय़ों की तरह जलाने के काम लाया जाता है, ऐसी ही 60 हजार पांडुलिपियों पर जर्मनी में शोध हो रहा है। उन पर दिये ज्ञान को खंगालने का काम हो रहा है। किन्तु भारत संस्कृत में दिये ज्ञान से दूर हो जा रहा है। मैकाले ने तो केवल कहा था कि भारत को स्वाभिमान शून्य बनाना है तो उन्हें उनकी अपनी अमृत भाषा संस्कृत से दूर कर दो फिर उन्हें जैसा कहोगे वे वैसा ही करेंगे। आज हम वही देख रहे है। पश्चिम कहता है कि योग अच्छा है तो यहां सभी योग करते हैं। पश्चिम कहता है कि घी खाना नुकसानदायक है तो भारत घी खाना छोड़ देता है। कितना हास्यास्पद लगता है यह सब पर है तो सच। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत की अपनी सरकारों की उपेक्षा सहते सहते देववाणी जैसे थक गई हो। जिस भाषा को दुनिया भर के वैज्ञानिक, विद्वान समझने की कोशिश कर रहे है, भारत सरकार के अधिकारी उसे ही कठिन और अनुपयोगी भाषा कह कर छोडऩे की बात करते हैं।

लंदन और आयरलैण्ड में वहां की शिक्षा में शामिल होने वाली संस्कृत अपनी ही जमीन पर तीसरी भाषा के स्थान पर स्वीकार की गई है। भारत की वर्तमान एवं भावी पीढ़ी अत्यंत संवेदनशील है। उन्हें संस्कृत की महानता समझने और समझाने की जरूरत है। अगर स्मृति तीव्र करना हो तो, ब्लड सर्कुलेशन संतुलित करना हो तो और जीभ की मांसपेशियों का व्यायाम कराना हो तो, सभी स्थितियों में संस्कृत शब्दों का उच्चारण करना चाहिए। 102 अरब 78 करोड़, 50 लाख शब्दों की भाषा का खिताब प्राप्त है इसे। चर्चा में कई बार लोग कहते है कि विश्व में बड़ा बनना है तो अंग्रेजी का ही सहारा लेना पड़ेगा और कोई रास्ता नही है। ऐसा सोचने वाले को आज नही तो कल अपना विचार बदलना पड़ेगा। कहते हैं बुद्धिमान लोग दूसरो की गलतियों से सीख लेते हैैं जबकि मूर्ख अपनी गलतियों से। देवभाषा को जो सम्मान आज विश्वभर के विद्वान दे रहे हैं, वह उसे भारतभूमि पर मिले, इसके लिए आवश्यक है कि संस्कृत हमारी दैनिक व्यवहार का अभिन्न अंग बन जाए। हम कर्मकाण्ड, मन्दिर आदि में चाहे अनचाहे जिन शब्दों का उच्चारण कर जाते हैं या करते हैं उनका भाव समझने का प्रयास आरम्भ कर दें, यहीं से संस्कृत का उत्थान प्रारम्भ हो जाएगा।
लोगों में इसकी स्वीकार्यता आज भी है, आवश्यकता केवल सरकार द्वारा इसे महत्व दिये जाने की है। सरकारी कामकाज में शामिल करने से स्वत: ही संस्कृत की उपयोगिता बढ़ जाएगी। ऐसा करने से समाज को भी संस्कृत को अपनाने में सरलता होगी। वह दिन दूर नहीं है जब पूरी दुनिया में संस्कृत का उपयोग बढऩे वाला है। आगामी 20 से 30 वर्षों में सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा होने के कारण संस्कृत विज्ञान और तकनीक की भाषा बनने जा रही है। यदि हम अभी से अपने पूर्वजों की इस धरोहर को संभाल लेंगे तो एक बार फिर पूरी दुनिया को शिक्षा देने की स्थिति में रहेंगे।