भारत की अमूल्य संपदा हैं लोकगीत

किसी भी राष्ट्र की गहराई उसके इतिहास से नापी जाती है, ऐसा वर्तमान इतिहासकारों का मत है। परन्तु भारतीय दर्शन इसे पूर्णत: स्वीकार नहीं करता। वास्तव में देखा जाए तो इतिहास से कहीं अधिक गहरी लोक परम्पराएं होती है। प्रत्येक प्राचीन देश की कोई न कोई परम्परा होती है जो वहां के सांस्कृतिक मूल्यों का परिचय कराती है। इतिहास भी मन में बैठा होता है पर उतना नहीं जितनी कि वहां की परम्पराएं। परम्पराओं को विकसित होने में हजारों वर्ष लग जाते है। और वह समाज का अंग बन जाती है। हजारों वर्षों के सैकड़ों पीढिय़ों से अविच्छिन्न रूप से चले आ रहे संस्कार उनके रीति रिवाज उस राष्ट्र और समाज जीवन में एकरस हो जाते है। यही अटूट परम्परायें समाज को एक सूत्र में बांधती है। सात ही वे समाज और राष्ट्र की गहराई को बताती हैं। इस प्राचीन परम्परा के इतिहास को लिखा नहीं जा सकता, यह कब आई और कब समाज का अंग बन गयी, कोई नहीं जानता। ये परम्पराएं पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जाती हैं, कुछ कालबाह्य परम्परायें छूटती जाती हैं, कुछ और गहरी होती जाती हैं। युगानुकूल नई परम्पराओं को निर्माण होता है, परन्तु इनका मूल तत्व हमेशा सुरक्षित रहता है।
इसलिए किसी भी राष्ट्र या समाज की गहराईयों को जानने के लिए वहां की लोक परम्पराओं को जानना आवश्यक है। ये लोक परम्पराये लिखित साहित्य के रूप में नहीं होतीं, परन्तु वे समाज जीवन का अभिन्न अंग होती हैं। ये परम्पराएं समाज के तीज-त्योहारों में, संस्कारों में रची बसी होती हैं। यह लोक सम्पदा उस राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर है। भारत की जड़ों तक पहुचने के लिए इस लोक सम्पदा को जानना आवश्यक है। यह लोक सम्पदा लोक में प्रचलित गीतों में मिलती है। यह समाज की गहराई का परिचय तो कराती ही है, साथ ही सामाजिक सांस्कृतिक एकत्व का भी परिचय कराती है।
भारतीय परम्परा में जन्म के पूर्व से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कार किए जाते हैं। इन संस्कारों के अवसर पर लोक गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है ये परम्परा कब से आरम्भ हुई, कोई नहीं जानता है। इन गीतों में सामाजिक एकता के सूत्र है, सामाजिक मर्यादाओं की सीमा है, परिवार परम्परा की गहराई है, पारिवारिक सम्बन्धों की अभिव्यक्ति है। भारत एक उत्सवप्रधान देश है। यहां के उत्सव सामाजिक परम्पराओं और सम्बन्धों को सुदृढ़ करते हैं।
समेकित रूप में मनाये जाने वाले इन उत्सवों में जो गीत प्रचलित हैं, उन गीतों में न केवल सामाजिक चिन्तन है, अपितु प्रकृति के साथ एकात्म होकर जीवनयापन का संस्कार भी शामिल है। वृक्षों की पूजा, नदियों की पूजा, गंगा स्नान का महत्व, कुआं पूजन, तुसली विवाह आदि न जाने कौन—कौन सी परम्पराये लोक में प्रचलित है जो प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित तो करती ही है, साथ ही प्रकृति के साथ आत्मिक सम्बन्ध भी स्थापित करती है। भारत की परम्पराओं में धर्म और संस्कृति का संयुक्त रूप मिलता है, जिसने व्यक्ति और समाज का कार्य सुचारू रूप से करने का मार्ग प्रशस्त किया है। इन परम्पराओं का संरक्षण राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत जीवन को स्वयं संवारने के लिए आवश्यक है।