भारतीय संस्कृति में नदी विज्ञान व व्यवहार


अरुण तिवारी

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण के बारहवें स्कन्ध के चौथे अध्याय के पृष्ठ खोलते ही प्रलयकाल के आगमन के लाक्षणिक विज्ञान से परिचय होता है। यह विज्ञान शुकदेव और राजा परीक्षित के संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके अनुसार, एक बार मेघों ने 100 वर्षों तक वर्षा नहीं की। प्रजा व्याकुल हो गई; इतनी व्याकुल कि एक-दूसरे को खाने लगी। (एक-दूसरे को खाने का एक तात्पर्य एक-दूसरे के संसाधनों को हड़प लेना भी है।) धीरे-धीरे प्रजा क्षीण हो गई। सूर्य ने पृथ्वी का सारा रस सोख लिया। सूर्य ने पृथ्वी के विशेष रस-गंध को ग्रस लिया। अग्नि प्रकट हुई। वायु का वेग तीव्र हो गया। इस कारण नीचे के सातों लोक नष्ट हो गए। प्रचण्ड वायु सैकड़ों वर्षों तक चलती रही। एक ओर आकाश धुएं और धूल से भरा रहने लगा, तो दूसरी ओर आकाश में रंग-बिरंगे बादल दिखाई देने लगे। इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक वर्षा हुई। सब कुछ जल में लय हो गया यानी प्रलय आ गई।
प्रलयकाल का संदर्भ मैने इसलिए प्रस्तुत किया; ताकि सांस्कृतिक इतिहास में दर्ज लक्षणों को सामने रखकर हम वर्तमान स्थितियों का आकलन कर सकें और स्वयं से यह पूछ सकें कि क्या प्रलय आगमन के प्रारम्भिक लक्षण दिखने शुरु हो गए हैं? वैश्विक तापमान में होती वृद्धि, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, भूजल का गिरता स्तर, अनिश्चित होती वर्षा, बदलता ऋतु चक्र और खासकर नवंबर के महीने में दिल्ली के वायुमण्डल को लेकर पिछले कुछ वर्षों से मच रही हायतौबा को सामने रखें, तो किसी का उत्तर हां में ही होगा। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर दुनिया के विकसित देशों द्वारा आर्थिक तौर पर गरीब माने जाने वाले देशों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के वर्तमान दौर को सामने रखें, तो भी उत्तर हां में ही होगा।
ध्यान देने की बात है कि संस्कृति एक तरह का निर्देश है और सभ्यता कालखण्ड विशेष में सांस्कृतिक निर्देशों के अनुकूल किया जाने वाला व्यवहार। पुरातन संस्कृति में नदियों को मां मानने का निर्देश था। आज इस 21वीं सदी में हम नदियों को मां कहते ज़रूर हैं, लेकिन नदियों को मां मानने का हमारा व्यवहार सिर्फ नदियों की पूजा मात्र तक सीमित है। असल व्यवहार में हमने नदियों को कचरा और मल ढोने वाली मालगाड़ी मान लिया है।
यदि यह असभ्यता है, तो ऐेसे में क्या स्वयं को सभ्य कहने वाली सज्जन शक्तियों का यह दायित्व नहीं कि वे खुद समझें और अन्य को समझायें कि वे क्या निर्देश थे, जिन्हें व्यवहार में उतारकर भारत अब तक अपनी प्रकृति और पर्यावरण को समृद्ध रख सका? हमारे व्यवहार में आये वे कौन से परिवर्तन हैं, जिन्हें सुधारकर ही हम अपने से रूठते पर्यावरण को मनाने की वैज्ञानिक पहल कर सकते हैं?
भारतीय संस्कृति मूल रूप से वैदिक संस्कृति है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद – वैदिक संस्कृति के चार मूल ग्रंथ हैं। ये ग्रंथ ईश्वर के सर्वव्यापी निराकार रूप को मानते हैं। इन ग्रंथों से स्पष्ट है कि वैदिक संस्कृति भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर (भगवान) यानी पंचतत्वों में ईशतत्वों की उपस्थिति मानते हुए तद्नुसार व्यवहार करने का निर्देश देती है। कालांतर में भारत के भीतर ही कई मतों और संप्रदायों का उदय हुआ। मंगोलिया, यवन, ईसाई और पारसी जैसी विदेशी संस्कृतियां भी भारतीय संस्कृति के संसर्ग में आईं।
हजारों सालों के सांस्कृतिक इतिहास वाले भारत की खासियत यह रही कि यहां के मत, संप्रदाय व जातियां अपनी विविधता को बनाये रहते हुए भी साथ-साथ रहे। किसी एक ने दूसरे को पूरी तरह खत्म करने का प्रयास नहीं किया। भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी जाति, मत अथवा संप्रदाय का पूरे भारत पर एकाधिकार रहा हो। हां, ऐसा अनेक बार अवश्य हुआ कि भिन्न वर्ग एक-दूसरे के विचारों और संस्कारों से प्रभावित हुए। मंगोलियाई शासकों पर असम की अहोम संस्कृति का प्रभाव तथा हिंदू संप्रदायों पर यवन व ईसाई संस्कृति के प्रभाव इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। तकनीकी के आधुनिकीकरण द्वारा संस्कृतियों को प्रभावित करने प्रमाण स्वयंमेव स्पष्ट हैं ही। ये प्रमाण, इस बात के भी प्रमाण हैं कि संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं है; संस्कृतियों का भी विकास होता है। भारतीय संस्कृति, स्वयं की विविधता को बनाये रखते हुए अन्य से ग्रहण करने की संस्कृति है।
अथर्ववेद के तीसरे काण्ड के तेरहवें सूक्त के प्रथम मंत्र में कहा है – हे सरिताओं, आप भली प्रकार से सदैव गतिशील रहने वाली हो। मेघों से ताडि़त होने, बरसने के बाद, आप जो कल-कल ध्वनि नाद कर रही हैं; इसीलिए आपका नाम नदी पड़ा। यह नाम आपके अनुरूप ही है। सनातनी हिंदू संदर्भ इसकी पुष्टि करता है। तद्नुसार, नाद स्वर की उत्पत्ति, शिव के डमरू से हुई। इसी नाद स्वर से संगीत की उत्पत्ति मानी गई है और इसी नाद स्वर की भांति ध्वनि उत्पन्न करने के कारण जलधाराओं को नदी का संबोधन प्रदान किया गया। लोक संस्कृतियों ने जलधाराओं को स्थानीयता और लोक बोली के अनुरूप संबोधन दिया। नदी शब्द की उत्पत्ति के उक्त सांस्कृतिक संदर्भ से नदी के दो गुण स्पष्ट हैं: पहला – सदैव गतिशील रहना और दूसरा – गतिशील रहते हुए नाद ध्वनि उत्पन्न करना। स्पष्ट है कि ऐसे गुण वाले प्रवाहों को ही हम नदी कहकर संबोधित कर सकते हैं। गौर करें कि जो गुण किसी नदी को नहर से भिन्न श्रेणी में रखते हैं, उनमें से प्रमुख दो गुण यही हैं। इन गुणों के नाते आप नदी को दुनिया की ऐसी प्रथम संगीतमयी यात्री कह सकते हैं, जो सिर्फ समुद्र से मिलने पर ही विश्राम करना चाहती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से गौर करने लायक तथ्य यह है कि यदि नदी का पानी अपनी गति खो बैठे, तो उसका पानी सडऩे लगता है। यह गतिशीलता ही है, जो नदी को अपना पानी स्वयं स्वच्छ करने की क्षमता प्रदान करती है। ऐसे में सावधानी बरतने की बात यह है कि हम किसी भी नदी प्रवाह के प्रवाह मार्ग और किनारों पर कोई अवरोध न खड़ा न करें। क्या आज हम ऐसी सावधानी बरत रहे हैं? विचार कीजिए।
ध्यान दें कि कोई भी जल प्रवाह तभी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न कर सकता है, जब उसमें पर्याप्त जल हो; उसका तल ढालू हो; उसके तल में कटाव हों। जल की मात्रा से उत्पन्न दबाव, तल के ढाल से प्राप्त वेग तथा कटाव के कारण होने वाला घर्षण – इन तीन क्रियाओं के कारण ही नदी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न करती है। इन तीनों क्रियाओं के जरिए नदी में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया निरन्तर बनी रही है। ऑक्सीकरण की यह सतत् प्रक्रिया ही जल को एक स्थान पर टिके हुए जल की तुलना में अधिक गुणकारी बनाती है। पहाड़ी नदियों में बहकर आये पत्थर ऑक्सीकरण की इस प्रक्रिया को तेज करने में सहायक होते हैं। पत्थरों के इस योगदान को देखते हुए ही कंकर-कंकर में शंकर की अवधारणा प्रस्तुत की गई।
स्पष्ट है कि यदि नदी जल में कमी आ जाये, तल समतल हो जाये अथवा तल में मौजूद कटाव मिट जायें, पहाड़ी नदियों में से पत्थरों का चुगान कर लिया जाये तो नदियां अपने नामकरण का आधार खो बैठेंगी और इसके साथ ही अपने कई गुण भी। विचार कीजिए कि नदी के मध्य तक जाकर किए जा रहे रेत खनन, पत्थर चुगान और गाद निकासी करके हम नदी को उसके शब्दिक गुण से क्षीण कर रहे हैं अथवा सशक्त?
आइये, आगे बढ़ें। अन्य संदर्भ देखें तो हिमालयी प्रवाहों को अप्सरा तथा पार्वती का संबोधन मिलता है। श्री काका कालेलकर द्वारा लिखित पुस्तक जीवन लीला में नदी नामकरण के ऐसे कई अन्य संदर्भों का जिक्र है।
अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के चौबीसवें सूक्त के तीसरे मंत्र में जलधाराओं को समुद्रपत्नी का नाम दिया गया है। वहां नदियों को संबोधित करते हुए कहा गया है – आप समुद्र की पत्नियां हैं। समुद्र आपका सम्राट हैं। हे निरन्तर बहती हुई जलधाराओं, आप हमें पीड़ा से मुक्त होने वाले रोग का निदान दें, जिससे हम स्वजन निरोग होकर अन्नादि बल देने वाली वस्तुओं का उपभोग कर सकें।
गीता के दूसरे अध्याय के सत्तरवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने नदी-समुद्र संबंध की तुलना आत्मा और परमात्मा संबंध से करते हुए कहा है कि जैसे नाना नदियों का जल सब ओर परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में विचलित न करते हुए समा जाते हैं, वैसे ही जो सब भोग स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है; भोग चाहने वाला नहीं।
हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक नदी अंतत: जाकर समुद्र में ही मिलती है। नदी अपने उद्गम पर नन्ही बालिका-सी चंचल और ससुराल के नजदीक पहुंचने पर गहन-गंभीर-शांत दुल्हन की गति व रूप धारण कर लेती है। जाहिर है कि अपने इसी गहन गंभीर रूप के कारण वह समुद्र को विचलित नहीं करती। इसी कारण नदियों को सिन्धुपत्नी कहा गया है। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि यदि नदी सिन्धुपत्नी है तो नदियों का जल बहकर समुद्र तक जाने को व्यर्थ बताकर नदी जोड़ परियोजना की वकालत करने वालों तथा बांध बनाने वालों से क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि पति समान समुद्र के मिलन मार्ग में क्यों उत्पन्न कर रहे हैं? यह प्रश्न पूछते हुए हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नदी व्यर्थ ही समुद्र तक नहीं जाती। समुद्र मिलन से पूर्व नदियां कई दायित्वपूर्ण कार्य संपन्न करती हैं। इस दौरान नदियों को अपनी ससुराल यात्रा मार्ग में मैदानों का निर्माण करना होता है; निर्मित मैदानों को सतत् ऊंचा करना होता है; डेल्टा बनाने होते हैं; मिट्टी तथा भूजल का शोधन करना होता है; भूजल का पुनर्भरण करना होता है; समुद्री जल के खारेपन को नियंत्रित करना होता है। नदी-समुद्र मिलन में बाधा उत्पन्न करना, नदी के दायित्वपूर्ण कार्यों में बाधा उत्पन्न करना है। क्या इसे आत्मा-परमात्मा मिलन में बाधक पापकर्म के स्तर का पापकर्म नहीं मानना चाहिए?
नदियों के नामकरण के भिन्न आधार दिए गए हैं। अधिकांश नदियों का नामकरण उनके गुण, वंश अथवा उद्गम स्थल के आधार पर किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर कहा गया कि गं अव्ययं गम्यति इति गंगा अर्थात जो स्वर्ग को जाये, वह गंगा है। गंगा के विष्णुपदी, जाहन्वी, भागीरथी, त्रिपथगा आदि हजारों नाम हैं, जिनके अस्तित्व में आने की वजह भिन्न घटना, संबंध अथवा गुण बताये गए हैं। यम की बहन होने के कारण यमी नाम प्राप्त धारा ही कालांतर में यमुना कहलाई। कलिन्दज पर्वत से निकलने के कारण यमुना का एक नाम कालिंदी पड़ा।
एक कथा के अनुसार, पार्वती नदी के शरीर से निकली शिवा नदी को ही कालांतर में कौशिकी नाम मिला। एक दूसरी कथा के अनुसार, गाधिराज की पुत्री और ऋषि ऋचीक की पत्नी सत्यवती अपने पति का अनुसरण करते हुए स्वर्ग गई। सत्यवती का पृथ्वी पर पुर्नअवतरण एक जलधारा के रूप में हुआ। कुशिक वंश से संबंध होने के कारण इस जलधारा को कौशिकी नाम मिला। कौशिकी को ही हम आज बिहार की कोसी नदी के नाम से जानते हैं।
कोसी के नामकरण तथा कोसी के प्रति ऋषि विश्वामित्र की आस्था का जिक्र रामायण में है। ताड़का वध पश्चात् शोणभद्र (सोन नदी) की ओर प्रस्थान करते हुए स्वयं ऋषि विश्वामित्र ने अपनी बड़ी बहन सत्यवती और इसके पुर्नअवतरण का जिक्र राजकुमार राम-लक्ष्मण से किया है। रामायण में विश्वामित्र को गाधिराज का पुत्र बताया गया है। कोसी नामकरण पर विस्तृत जानकारी श्री दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक ‘दुई पाटन के बीच’ में भी उपलब्ध है।
किसी प्राणी के गुणों जैसे उनके गुण भ कुछ नदियों के नाम के आधार बने। गो-मती, गो-दावरी, साबर-मती, बाघ-मती आदि ऐसे ही नाम है। गौतम ऋषि के तप से प्रकट होने के कारण गोदावरी का एक नाम गौतमी गंगा भी है। सरीसृप जैसे घुमावदार प्रवाह मार्ग के कारण उत्तर प्रदेश की एक नदी का नाम सई है। नर्मदा, तापी, पेनमगंगा, कृष्णा, काली, तुंगभद्रा, से लेकर मूसी, मीठी, पेन्नर, पेरियार, अडयार, वेदवती, सुवर्णमुखी, कमला, मयूराक्षी, पुनपुन, घाघरा, ब्रह्मपुत्र जैसे तमाम नाम वाली धारायें भारत में हैें। स्पष्ट है कि इन जलधाराओं के नामकरण के आधारों को जानकर हम इनके गुण, संबंध तथा स्थानीयता के बारे में कुछ न कुछ जानकारी अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।
वृहद धर्मपुराण के ऋषि मनीषा कथन में लिखा है कि भाद्र कृष्ण चतुर्दशी को जितनी दूर तक गंगा का फैलाव रहता है, उतनी दूर तक गंगा के दोनो तटों का भू-भाग नदी गर्भ कहलाता है। नदी गर्भ के बाद डेढ सौ हाथ की दूरी का भू-भाग नदी तीर कहलाता है। नदी तीर से एक ग्वयूति यानी दो हजार धनुष की भूमि को नदी क्षेत्र कहा गया है। एक ग्वयूति यानी दो हज़ार धनुष यानी दो मील यानी एक कोस यानी तीन किलोमीटर। इस तरह दोनो नदी तीरों से तीन-तीन किलोमीटर की दूरियां नदी क्षेत्र हुईं।
नदी भूमि के इस विस्तार को जानना इसलिए भी ज़रूरी है, चूंकि उक्त संदर्भ सिर्फ नदी भूमि का विस्तार ही नहीं बताता, बल्कि इस विस्तृत भूमि में पापकर्म करने से भी मना करता है। पापकर्म यानी जो कर्म नदी जैविकी के किसी भी अंग अथवा क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हों। नदी भूमि के उक्त विस्तार को सामने रखकर यदि हम अपनी नदी के नदी गर्भ क्षेत्र, तीर क्षेत्र और नदी क्षेत्र में चल रही गतिविधियों की सूची बनायें, तो यह आकलन करना आसान हो जायेगा कि नदी के साथ हम पापकर्म कर रहे हैं या पुण्य कर्म?
नदी आधार पर भूमि के अन्य विभाजन देखिए। जिस भूमि पर की जाने वाली कृषि पूरी तरह वर्षा पर आधारित हो, उसे देवमातृक भूमि की श्रेणी में रखा गया। जो भूमि कृषि के लिए नदी जल पर आधारित हो, उसे नदीमातृक भूमि की श्रेणी में रखा गया। गंगा-यमुना दो नदियों के बीच की भूमि को दोआब कहा गया। दो-आब यानी जिस भूमि के दोनो ओर सतही जल प्रवाह हो। कई इलाकों की स्थानीय बोली में नदी किनारे की भूमि को तराई या तिराई शब्द का प्रयोग किया गया है। नदी आधार पर भूमि नामकरण के अन्य संदर्भ खोजने चाहिए। उन्हें जानकर यदि श्रेणी बदल गई है, तो हम अपनी भूमि की श्रेणी के बदलाव के इतिहास से परिचित हो सकेंगे।
यहां एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि भारतीय सांस्कृतिक ग्रथों ने किसी प्रशासनिक सीमा को उत्तर और दक्षिण भारत की विभाजन रेखा के रूप में उल्लिखित करने की बजाय, नदियों को इसका आधार बनाया है। दक्षिणी क्षेत्र को गोदावरी दक्षिण तीरे तथा उत्तरी क्षेत्र को रेवा उत्तर तीरे तथा उत्तर भारत को रेवाखण्ड कहा है। रेवा यानी नर्मदा नदी।
नदियों को आधार बनाकर किए भूमि विभाजन से पता चलता है कि भारतीय संस्कृति का नदियों से कितना गहरा परिचय था। इसे आप नदी आधार के जरिए लोगों को उनकी भू-सांस्कृतिक विविधता से गहराई से परिचय कराने की कोशिश भी कह सकते हैं।
ऋषि संतानों द्वारा ऋषियों के नाम पर गोत्र नामकरण की प्रथा काफी पुरानी तथा सर्वविदित है। कहा जाता है कि कौशिक यानी ऋषि विश्वामित्र के वंशज होने नाते एक वर्ग ने अपने गोत्र का नाम कौशिक रखा। किंतु नदी संदर्भ के अनुसार कौशिकी नदी के नाम पर कौशिक गोत्र तथा ब्राह्मणों के एक वर्ग का नामकरण हुआ। इसी तरह सरस्वती नदी के नाम पर सारस्वत गोत्र के नामकरण की बात सामने आती है। संदर्भ है कि पण्डे-पुरोहितों के वर्ग ने स्वयं को सरस्वती की संतान मानते हुए स्वयं के गोत्र को सारस्वत का नाम दिया। इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश की सरयू नदी के पूर्व दिशा में रहने वाले ब्राह्मणों ने कभी अपने को सरयूपारिण ब्राह्मण कहकर संबोधित किया।
संदर्भ मिलता है कि लोगों ने अपनी ही नहीं, अपने मवेशियों तक की पहचान को नदियों से जोडऩा श्रेयस्कर समझा। श्री काका कालेलकर ने अपनी पुस्तक जीवन लीला में इसका जिक्र करते हुए सिंधु तट के घोड़ों को सैंधव, महाराष्ट्र की भीमा नदी के टट्टुओं को भीमाथड़ी के टट्टू और हरियाणा की गाय को यमुनापारी नामकरण का उल्लेख किया है। गौर कीजिए कि अंग्रेजों ने कृष्णा नदी के इलाके की सुंदर गायों को कृष्णा वैली ब्रीड का नाम दिया।
ये नामकरण प्रमाण हैं कि भारतीय समाज के एक वर्ग ने नदी से जुड़ाव को गौरव का विषय समझा। यह जुड़ाव हमेशा रहे, इसी उद्देश्य से नदी के नाम को अपने गोत्र अथवा वर्ग नाम के रूप में अपना लिया। इसी तरह कुहुल का प्रबंधन करने के कारण ही एक वर्ग के नाम के साथ कोहली जुड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या आज कौशिक, सारस्वत, सरयूपारिण ब्राह्मण नदियों से तथा कोहली कुहुलों से अपने गौरवपूर्ण जुड़ाव को व्यवहार में कायम रख सके हैं?

नदी गुण
1. निरन्तर प्रवाह : ऋग्वेद के सातवें मण्डल में नदी के निरन्तर प्रवाह की स्तुति की गई है। स्पष्ट है कि प्रवाह की निरन्तरता किसी भी नदी का प्रथम एवम् आवश्यक गुण है।
गौर कीजिए कि नदी प्रवाह की निरन्तरता बहुआयामी होती है। किसी एक भी आयाम में हम निरन्तरता को बाधित करने की कोशिश करेंगे; नदी अपना प्रथम और आवश्यक गुण खो देगी। इसके दुष्प्रभाव कितने व्यापक हो सकते हैं; इसका आकलन आज हम कोसी, गंगा, नर्मदा जैसी कई प्रमुख नदियों के आयामों में मनुष्य द्वारा पैदा की गई बाधाओं के परिणामस्वरूप नदी जल की गुणवत्ता तथा जल, रेत, गाद, वेग तथा नदी के बदले रुख से समझ सकते हैं।
2. बलवान-गुणवान ऊंची तरंगें : यजुर्वेद के नौवें अध्याय के चौथे मंत्र में बताया गया है कि जल के अन्त:स्थल में अमृत तथा पुष्टिकारक औषधियां मौजूद हैं। अश्व यानी गतिशील पशु अथवा प्रकृति के पोषक प्रवाह इस अमृत और औषधिकारक जल का पान कर बलवान् हों। हे जलसमूह, आपकी ऊंची और वेगवान तरंगे हमारे लिए अन्न प्रदायक बनें।
वैज्ञानिक दृष्टि भी यही कहती है कि नदी तभी बलवान होती है, जब उसका जल मृत न हो यानी प्रवाह में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया सतत् होती रहे। गुणवान होने के लिए औषधियों से संसर्ग करने आने वाले जल का नदी में आते रहना जरूरी है। तरंगों के ऊंची होने का मतलब है, नदी में बाढ़ आने लायक शक्ति का होना। यदि बाढ़ न आये तो नदियों के मैदान न बनें। वे सतत् ऊंचे न हो। नदी अपने किनारे के इलाकों में भूजल शोधन तथा पुनर्भरण न करे। नदी अपने आसपास की भूमि को उर्वरा बनाने में कोई योगदान न कर सके।
नदी की शुद्धि को लेकर चाणक्य नीति में स्पष्ट कहा गया है कि नदी का वेग बना रहना चाहिए। इसके बगैर नदी जल की शुद्धता की कल्पना करना भी व्यर्थ है। गंगा कार्य योजना से लेकर नमामि गंगे परियोजना तक में क्या हमने कोई ऐसा कार्यक्रम शामिल किया, जो नदी के प्राकृतिक वेग को बनाये रखने में पूरी समग्रता के साथ सहायक होगा?
3. क्रियाशीलता : मनुस्मृति के तृतीय समुल्लास में नौ द्रव्य बताये गए हैं। इनमें से पृथ्वी, जल, तेज, वायु, मन और आत्मा को ऐसा द्रव्य बताया गया है, जिनमें गुण भी हैं और क्रियाशीलता भी है। आकाश, काल और दिशा को अक्रियाशील द्रव्य माना गया है। नदी, सिर्फ जल नहीं है; लेकिन जलमय होने के कारण नदी में जल जैसी क्रियाशीलता मौजूद होगी ही। अत: क्रियाशीलता को नदी के दूसरे गुण के रूप में सूचीबद्ध करना चाहिए।
4. सृष्टि की मूल सक्रिय तत्व की उपस्थिति: अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के तेरहवें सूक्त के प्रथम मंत्र में जलधाराओं में सृष्टि के मूल सक्रिय तत्व का आह्वान किया गया है। सृष्टि के शाब्दिक अर्थ पर जायें तो सृष्टि शब्द का मतलब ही है, रचना करना। शाब्दिक अर्थ को सामने रखें, तो रचनात्मक सक्रियता को नदी का एक अपेक्षित गुण मानना चाहिए। सृष्टि कर्म देखें तो सृष्टि में रचना के बाद विनाश और विनाश के बाद रचना, सतत् चलने वाले कर्म हैं। इस दृष्टि से नदी में रचना और विनाश तत्व की सक्रिय मौजूदगी अपेक्षा करनी चाहिए। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि नदी में जहां एक ओर शीतल तत्व मौजूद होते हैं, वहीं ऊर्जा उत्पन्न करने लायक ताप और वेग भी मौजूद होता है। नदीजल जीवन भी देता है और आवश्यक होने पर विनाश करने की भी शक्ति रखता है।
भारत में आज कितनी ही नदियां ऐसी हैं कि जिनमें इतना अतिरिक्त जल नहीं है कि किसी बाह्य कार्य के लिए उसकी निकासी की जा सके। कितनी नदियां ऐसी हैं, जिनमें बाढ़ आना बीते कल की बात हो चुकी है। कितनी नदियां ऐसी हैं, जिनके सिर्फ निशान मौजूद हैं। उनमें न जल है और न जीवन। वे न किसी बाह्य रचना में योगदान दे सकती हैं और न किसी विनाश में। कई नदियां तो ऐसी हैं, हमने पहले उनके गुणों को मिटाया और फिर उनके नाम से नदी शब्द ही हटा दिया। जयपुर की द्रव्यवती नदी का नाम आज सरकारी रिकॉर्ड में अमानीशाह नाला और अलवर से चलकर दिल्ली आने वाली साबी नदी का नाम दिल्ली के रिकॉर्ड में नजफगढ़ नाला है। यह परिवर्तन विचारणीय है कि नहीं? सोचिए।
5. अन्य में क्रियाशक्ति उत्पन्न करने में सक्षम: अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के तेरहवें सूक्त के दूसरे मंत्र में जलधाराओं से कामना की गई है कि वे क्रियाशक्ति उत्पन्न कर उन्हे हीनता से मुक्त करेंगी तथा प्रगतिपथ पर शीघ्र ले जायेंगी। इसका मतलब है कि नदी इतनी सक्षम होनी चाहिए कि वह हमारे भीतर ऐसा कुछ करने की शक्ति पैदा कर सकें, जिससे हमारी हीनता यानी कमजोरी मिटे और हम प्रगति पथ पर अग्रसर हों। इस नदी गुण को हम कृषि, उर्वरता वृद्धि, भूजल पुनर्भरण, भूजल शोधन तथा मैदान व डेल्टा बनाने वाले में नदी के योगदान से जोड़कर देखें।
6. प्रेरक शक्ति की मौजूदगी: अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के तेरहवें सूक्त के तीसरे मंत्र में कामना करता है कि सविता देवता की प्रेरणा से हम लौकिक व पारलौकिक कार्य कर सकें। यह नदी के गुणों का अध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष है। नदी कर्म में निरन्तरता, शुद्धता, उदारता व परमार्थ तथा वाणी में शीतलता की प्रेरणा देती है। नदियों से सीखने और प्रेरित करने के लिए कवियों ने संस्कृत से लेकर अनेक भाषा व बोलियों में रचनायें रची हैं। कभी उन्हे देखना चाहिए।
7. रूपवती, रसवती, स्पर्शवती, द्रवीभूत, कोमलांगी: मनुस्मृति में कहा है – रूप, रस, स्पर्शवान, द्रवीभूत तथा कोमल जल कहलाता है; परन्तु इसमें जल का रस अग्नि और वायु के योग से होता है। स्पष्ट है कि ये सभी गुण, नदी के गुण हैं। नदी कोमलता का आभास देती है। नदी तरल होती है। नदी स्पर्श करने योग्य होती है। नदी में रस यानी जल होता है। नदी का अपना एक रूप होता है।
विचारणीय तथ्य यह है कि जल के ये गुण अग्नि और वायु के योग के कारण होते हैं। यह तथ्य हमें सावधान करता है कि जल हो या नदी, वायु और ताप से इनका संपर्क टूटने न पाये। पानी से बिजली बनाने वाली परियोजनाओं में नदी को सुरंगों में डाला जाता है। सोचिए कि क्या उस दौरान नदी का वायु और ताप से पर्याप्त संपर्क बना रहता है? यदि नहीं, तो नदी के उक्त गुण सुरंग से निकले नदी जल में बचे रहने का दावा हम कैसे कर सकते हैं?
8. मधुर रस: अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के चौथे सूक्त के पहले मंत्र के अनुसार माताओं-बहिनों की भांति यज्ञ से उत्पन्न पोषक धारायें यज्ञकर्ताओं को दूध या पानी के साथ मधुर रस पिलाती हैं। उक्त उल्लेख में गंगा की भांति जो धारायें मनुष्य के तप से उत्पन्न हुई हैं, उनके पोषक होने की बात कही गई है। स्पष्ट है कि पोषण करना, नदी का एक गुण है। दूसरा कथन है कि पोषक धारायें दूध या पानी के साथ मधुर रस पिलाती हैं। यह कथन बताता है कि पोषक धाराओं का जल उन गुणों से परिपूर्ण होता है, जो पानी तथा दूध से भी अधिक पौष्टिकता प्रदान करने में सक्षम हैं।
9. शीतलताएवम् शान्तिप्रदायक: अथर्ववेद में वर्णन है कि हिमाच्छिादित पर्वतों की जलधारायें बहती हुई समुद्र में मिलती हैं। ऐसी धारायें हृदय के दाह को शान्ति देने वाली होती है। गौर कीजिए कि ये दोनो गुण विशेष तौर पर हिम स्रोतों से उत्पन्न होने वाली नदियों में बताये गए हैं। अत: हमारा दायित्व है कि हिमधाराओं के ये गुण इनमें अंत तक कायम रहें। इसमें कोई बाधा न आये।
10. जीवंतता : आपो नारा इति प्रोक्त। आपो वै नर सूनव:। अयनं तस्यता: पूर्व तो नारायण स्मृत:।। अर्थात नर से उत्पन्न होने के कारण जल को नार कहा गया है। नार में अयन यानी निवास करने के कारण हरि का एक नाम नारायण भी है। सृष्टि से पूर्व नार ही मंगल हरि का निवास था। इसी में रहते हुए हरि ने सृष्टि के पुन: सृजन का विचार किया।
भारत के सांस्कृतिक ग्रंथों में जहां जल में ईश का वास माना गया है, वहीं नदियों को देवी तथा मां का संबोधन दिया गया है। पौराणिक कथाओं कहीं किसी नदी का उल्लेख किसी की पुत्री, तो किसी का किसी की बेटी, बहन अथवा अर्धांगिनी के रूप में आया है। नर्मदाष्टक में नर्मदा को हमारी और हमारी प्राचीन संस्कृति की मां बताया गया है। यह प्रमाण है कि भारत को सांस्कृतिक इतिहास नदियों को जड़ न मानकर, जीवित मानता है। सांस लेना, गतिशील होना, वृद्धि होना, अपने जैसी संतान पैदा करना – किसी के जीवित होने के इन जैविक लक्षणों को यदि हम आधार मानें, तो हम पायेंगे कि नदी में ये चारों लक्षण मौजूद हैं।
गौर करें कि तल, तलछट, रेत, सूक्षम एवम् अन्य जलीय जीव, वनस्पति, वेग, प्रकाश, वायु तथा जल में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया मिलकर एक नदी और इसके गुणों की रचना करते हैं। इसी आधार पर नदी वैज्ञानिकों ने प्रत्येक नदी को महज् जल न मानकर, एक सम्पूर्ण जीवंत प्रणाली माना है। इसी आधार पर न्यूजीलैण्ड और इक्वाडोर में नदियों को जीवित का दर्जा मिला। कहना न होगा कि उत्तराखण्ड के नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में गंगा-यमुना की जीवंतता को कानूनी दर्जा प्रदान करना भी भारतीय संस्कृति की नदी जीवंतता अवधारणा की पुष्टि ही है। हालांकि नैनीताल की जीवंतता का फैसले का दायरा उत्तराखण्ड की सीमा में ही लागू होता है; फिर भी इसके संदेश व्यापक हैं। नदी को जीवित का दर्जा दिए जाने का मतलब है, उसे वे सभी अधिकार दे देना, जो किसी जीवित प्राणी हो होते हैं। नदी का शोषण करने, नदी को बीमार करने और नदी को मारने की कोशिश करने जैसे मामलों में अब क्रिमिनल एक्ट के तहत् मुक़दमा चलाया जा सकता है। नदी पर किए गए अत्याचारों के मामले मानवाधिकार आयोग में सुने जा सकेंगे।