भारतीय संस्कृति में नदी कैसा हो हमारा व्यवहार?

अरुण तिवारी
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।


भारतीय संस्कृति में नदी को काफी महत्व दिया गया है। उसके प्रति हमारा व्यवहार कैसा हो, यह भी विस्तार से बताया गया है। मूल रूप से पूर्व में गंजाल नदी तथा पश्चिम में हिरनफाल तक का नर्मदा घाटी क्षेत्र निमाड कहलाता है। मघ्य प्रदेश के इस निमाड क्षेत्र में बोली जाने वाली निमाडी बोली में एक कहावत है – नदी किसी की निजी संपत्ति नहीं होती। श्री कृष्ण गोपाल व्यास ने जल चौपाल के माध्यम से समेटे अपने अनुभवों को कलमबद्ध करते हुए इसका जिक्र किया है।
एक ओर इस लोक कथन को रखें और दूसरी ओर छत्तीसगढ राज्य द्वारा 21वीं सदी के शुरु में ही शिवनाथ नदी को एक निजी कपंनी को बेच देने का प्रकरण को रखें। तीसरी ओर से राजस्थान के फिशरी एक्ट को देखें, जो नदी के प्रत्येक जीव पर राजस्थान के मत्स्य विभाग का अधिकार बताता है। आप किसे उचित ठहरायेंगे?
गौर करने की बात है कि नदी, जंगल आदि सरकार के हैं; इसी तथ्य ने लोगों की निगाह में नदी-जंगल को पराया बना दिया। हालांकि लोगों को समझना चाहिए कि कानूनन भले ही यह सभी सरकार के हों, लेकिन अंतत: इनका लाभ तो उन्हीं को ही मिलता है। हमारे नदी परियोजना निर्माताओं ने यह समझने की कोशिश नहीं की कि आखिर क्यों लोग शासकीय नदी परियोजनओं में स्वेच्छा से सहभाग नहीं करते?
मनुस्मृति के अनुसार पंचतत्वों का पंचतत्वों से संपर्क जरूरी है और जल का रस अग्नि और वायु के योग से होता है। व्यापक संदर्भों में यह माना गया है कि प्रत्येक जीव का निर्माण पंचतत्वों के योग से होता है। अत: जीव की जीवतंता बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि उसका पंचतत्वों से संपर्क बना रहे। यह बात नदी पर भी समान अर्थ में लागू होती है।
समुद्र मंथन का पौराणिक प्रसंग विष को अमृत से अलग करने के कठिन प्रयास का एक उदाहरण है। यह प्रसंग निर्देश देता है कि विष और अमृत को अलग-अलग रखें उन्हें कभी मिलाया न जाये। और यदि कभी ऐसा हो भी जाए तो सभी मिलकर अमृत को विष से अलग करें। भगवान नीलकण्ठ के समान जिसमें स्वयं और दूसरे का क्षय किए बगैर विष धारण करने की शक्ति हो, वह जगत् के कल्याण हेतु विष को धारण करें। अमृत, उन्हे दिया जाये, जो प्रकृति और समाज को देेते ज्यादा हैं, लेते कम हैं। ऐसी शक्तियों को देवता कहा गया है। जो प्रकृति और समाज से लेते ज्यादा हैं, देते कम हैं, भले ही वह महाविद्वान ब्राह्मण रावण ही क्यों न हो, उसे दानवों या राक्षसों की श्रेणी में रखा गया। आज हम क्या कर रहे हैं? अमृत को विष से अलग करने की बजाय, अमृतरूपी नदी जल में अपना खुद का विषैला मैला मिला रहे हैं।
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है – हे पृथ्वी, मैं जो कुछ तुझसे लंूगा, वह उतना ही होगा, जिसे तू पुन: पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल यानी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करुंगा। अथर्ववेद का यह निर्देश पृथ्वी के सभी संसाधनों के उपयोग पर समान रुप से लागू होता है। नदी के मामले में भी हमें इसकी पालना करनी चाहिए। क्या हम पालना कर रहे हैं? इसी भांति नदी को मां मानने का सांस्कृतिक निर्देश भी हमें बताता है कि नदी से कितना लेना चाहिए। नदी मां से मनुष्य उतना ही लेने के अधिकारी है, जितना एक शिशु को मां के स्तनों से दूध; वह भी तब तक, जब तक कि शिशु बाह्य भोजन को स्वयं ग्रहण करने योग्य न हो जाये। नदी को मां का संबोधन हमें इस दायित्व बोध से भी जोडता है कि जब नदी मां बीमार अथवा क्षीण हो जाये, तो उसका इलाज कराना, उसकी सेवा करना प्रत्येक संतान का दायित्व है। क्या नदी मां के साथ हम इस दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं?
ईशोपनिषद का कथन ईशावास्यमिदं सर्वं प्रकृति के साथ व्यवहार का संतुलन बनाये रखने का सर्वश्रेष्ठ निर्देश है। इसका तात्पर्य है कि प्रकृति का हमारे ऊपर जो ऋण है, उसे उतारने का सबसे बढिया तरीका यही है कि जितना प्रकृति से लें, अधिक नहीं तो कम से कम उतना तो प्रकृति को वापस अवश्य करें। मेरा मानना है कि जलोपयोग करने वालों पर जैसे ही यह सिद्धांत लागू होगा; जल संबंधी कई संकटों का समाधान स्वत: हो जायेगा। उदाहरण के तौर पर उद्योगों को उनके द्वारा दोहन किए जल की मात्रा के बराबर वर्षाजल संचयन के लिए जैसे ही बाध्य किया जायेगा, स्थानीय इलाके भूजल की उतरती गहराई के संकट से बच जायेंगे और कंपनियां/उद्योग किसी गरीब का हक मारने के दोषी नहीं ठहराये जायेंगे। यह कायदा सभी पर बराबर लागू होना चाहिए; किसान पर भी, नगर नियोजकों पर भी और पानी का व्यावसायिक उपयोग करने वाली कंपनियों पर भी। बोतलबंद पानी, शीतल पेय, बीयर, शराब आदि बनाने वाली कंपनियां पानी का व्यावसायिक उपयोग ही तो करती हैं।
नदी संपर्क में आने से पूर्व तन-मन शुद्ध करके आयें- भविष्य पुराण में पूजन, अर्पण, तर्पण, मुण्डन, छेदन, श्राृद्ध आदि कई कर्मों से पहले शुद्ध होने के प्रावधान बताया गया है। तद्नुसार, जलाशय अथवा नदी में स्नान करके शुद्ध होना सर्वश्रेष्ठ है। जहां नदी न हो, वहां संस्कार कर्मों से पूर्व एक कलश में सात नदियों अर्थात् गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी के जल का आह्वान कर उनके द्वारा स्वयं को शुद्ध करने का निवेदन करने का प्रावधान है:
आप पूछ सकते हैं कि सात नदियों का ही आह्वान क्यों? भारतीय संस्कृति में सात के अंक का विशेष महत्व है – सप्तऋषि, सप्तखण्ड, सप्तसागर, सप्तद्वीप, सप्तपाताल, सप्तसरिता, सप्ततत्व, सप्तदिवस। यहां तक कि गीता, रामायण, श्री रामचरितमानस जैसे ग्रंथों के सार भी सात-सात श्लोकों में लिखे गये हैं।
खैर, शुद्धि के लिए नदी में स्नान करने आने से पहले के लिए भी कुछ निर्देश हैं; मसलन, अन्यत्र शौच-स्नानादि करके ही नदी में स्नान करने आयें। इस बारे गंगा रक्षा सूत्र के निर्देश में काफी व्यापक हैं: गंगा में मल-मूत्र त्याग, मुख धोना, दंतधावन, कुल्ला करना, बदन को मलना आदि वर्जित है। जलक्रीडा अर्थात स्त्री-पुरुषों को जल में रतिक्रीडा नहीं करनी चाहिए। पहने हुए वस्त्र को छोडना, जल पर आघात करना या तैरना भी नहीं चाहिए। बदन में तेल मलकर या मैले बदन होकर गंगाजी में प्रवेश नहीं करना चाहिए। गंगा के किनारे झूठ बोलना या बकवास नहीं करना चाहिए। गंगाजी के प्रति कुदृष्टि रखना या अभक्तिक कर्म करना और उसे न रोकना, दोनो ही पाप हैं। धर्मपुराण में कहा ही है कि नदी गर्भ, नदी तीर और नदी क्षेत्र में कोई गलत काम न करें। एक अन्य संदर्भ में परिक्रमा करते हुए नदी को लांघने को अनुचित माना गया है।
नदियों को देवी मां मानते हुए भारतीय संस्कृति नदियों के पूजन का निर्देश देती है। नदी पूजन हेतु तीन कार्य बताये गये हैं – स्नान, पान और दान। कोई-कोई पुरोहित नदी के अभिषेक को नदी पूजन का कर्म बताते हैं। विशेष बात यह है कि हमारे संास्कृतिक ग्रंथों में मूर्ति का विसर्जन जल में किए जाने का उल्लेख तो मिलता है, किंतु नदी में मूर्ति विसर्जन के लिए बाध्य करने वाला कोई उल्लेख मेरे संज्ञान में नहीं आया है। अत: नदियों की वर्तमान दुर्दशा तथा मूर्तिंयों के निर्माण में लगने वाली रासायनिक व अन्य अहितकारी सामग्री को देखते हुए नदियों में मूर्ति विसर्जन की जिद्द नहीं करनी चाहिए।
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के श्लोक संख्या-163 में नदी के बहाव को दूसरी ओर ले जाना अथवा उसके प्रवाह को रोकना अपराध घोषित किया है। ऐसा अपराध करने वाले को श्राद्धादि कर्म से त्याज्य बताया है। इसी प्रकार मनुस्मृति अध्याय तीन के 281वें श्लोक मेें सर्वसाधारण के उपयोग हेतु बने तालाबों के जल को खराब करने, उस पर कब्जा करने तथा आगे के रास्ते को रोकने को अपराध कर्म मानते हुए राजा को निर्देश दिया है कि ऐसे अपराध के लिए प्रथम साहस का दण्ड दे। चूंकि तालाबों का जल भी नदी को सिंचित करता है। अत: तालाबों के प्रति किए गये अपराध को भी नदी के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से किया गया अपराध ही मानना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में नदी के प्रति उचित व्यवहार करने हेतु जहां एक ओर दण्ड का प्रावधान है, वहीं दूसरी ओर नदी को इतना महत्व की स्थिति में प्रस्तुत किया गया ताकि समाज उचित व्यवहार के लिए स्वयं प्रेरित हो। समाज नदियों से कैसा व्यवहार करे? इसे तय करने के लिए प्रत्येक नदी के उद्गम से संगम तक मठ-मंदिर बनाये। मठ-मंदिरों में साधुओं को नदी को गुरुभाव वाला चौकीदार बनाकर बैठाया। नर्मदा किनारे इतने मंदिर बनाये गये, जितने शायद ही किसी अन्य नदी के किनारे हों। नदी के प्रवाह को संस्कृति का प्रवाह कहा।
दो नदियों के संगम को दो संस्कृतियों का संगम बताते हुए स्कन्द पुराण ने यदि गंगा को तीर्थ कहा, तो पद्य पुराण के अनुसार जिस नदी के तीर्थ का नाम ज्ञात न हो, उसे विष्णुतीर्थ कहें। प्रसाद के रूप में वितरित किए जाने वाले पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद के अतिरिक्त गंगाजल को मिश्रित किए जाने का निर्देश है। क्या महर्षि व्यास, क्या वाल्मीकि, शुक, कालिदास और भवभूति आदि अनेकानेक कवियों ने नदियों की स्तुति में काव्य रचे। संस्कृति ने नदी के पत्थरों तक को शंकर जैसा मान दिया। कंकर-कंकर में शंकर की उक्ति प्रथम बार नर्मदा के पत्थरों के लिए कही गई। निर्देश दिया गया कि शिवलिंग के पत्थर नर्मदा के ही हों; वैष्णवों के शालीग्राम गंडकी नदी के हों। एक अन्य निर्देशानुसार, जब तक प्रजा चार समुद्र और सात नदियों को जल लाकर राजा का अभिषेक नहीं करती, राजा को राज करने का अधिकारी नहीं माना जाये।
नदियों के किनारे विशेष मौकों पर विशेष स्नान व मेलों के आयोजन के निर्देश हैं। भैया दूज, गंगा दशहरा आदि तो पूर्णरूपेण नदी पर्व हैं। कुंभ आयोजन के चार स्थान बताये गये: हरिद्वार इलाहाबाद प्रयाग, उज्जैन और नासिक। तर्कयह है कि जब बृहस्पति ग्रह, शनि की खास राशि कुंभ में प्रवेश करता है तथा सूर्य और चन्द्रमा मंगल की राशि मेष में आ जाते हैं, तब इनका प्रभाव बिंदु हरिद्वार का गंगा तट माना गया है। जब बृहस्पति ग्रह, शुक्र की राशि वृष में प्रवेश करता है तथा सूर्य और चन्द्रमा का शनि की मकर राशि में प्रवेश होता है, तो प्रभाव बिंदु इलाहाबाद संगम पर केन्द्रित होता है। जब बृहस्पति ग्रह, सूर्य की राशि सिंह में प्रवेश करता है तथा जब तक सूर्य चन्द्रमा सहित सिंह राशि में बना रहता है, तब तक प्रभाव बिंदु महाराष्ट्र में नासिक स्थित गोदावरी तीर पर केन्द्रित होता है। इसी तरह जब बृहस्पति सिंहस्थ हो, सूर्य मंगल की मेष राशि में हो तथा चन्द्रमा शुक्र की राशि तुला में पहुंच जाये, तो प्रभाव क्षेत्र महाकाल की नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी का तट बनता है। उक्त प्रभाव बिंदु केन्द्रों के अनुसार ही अलग-अलग समय में कुंभ आयोजन के स्थान तय किए गये हैं। खास स्थानों को तीर्थ स्थापना के पीछे भी विशेष समय पर स्थान विशेष पर ग्रहों के विशेष प्रभाव को आधार माना गया है।
ऐसे प्रेरक प्रावधानों और वैज्ञानिक तर्कों का एक समय ऐसा अच्छा असर हुआ कि प्रेरित लोक ने भी नदियों के पर्याप्त महत्व देते हुए नदी दर्शन, स्नान, पान और दान को आस्था के रूप में स्थान दिया। तमाम कष्ट के बावजूद आज भी अधिकांश लोग पैदल, कुछ नंगे पैर और कोई-कोई तो लेटकर नदी परिक्रमा करते हैं। लंबे समय से वे ऐसा ही करते आ रहे हैं। यह नदी के प्रति लोगों की आस्था का प्रमाण है। श्रीराम वनवास के दौरान मां सीता द्वारा गंगा पार करते वक्त सकुशल वापस लौटने पर पूजन की मनौती का प्रसंग सर्वविदित ही है। गंगा मैया तोहे पियरी चढइबै, भोजपुरी लोकगीत के ये शब्द आज भी नदियों को मनोकामना पूर्ण करने वाली शक्ति मानने का प्रमाण हैं। मृत्यु पूर्व दो बूंद गंगाजल की आज भी कायम लोक आकांक्षा से परिचित हैं ही। मातायें आज भी जानती हैं कि जिनके भी पेट में गर्मी होती है, सिर पर जल डालते ही उन्हे मूत्र त्याग की इच्छा होती है। अत: वे खासकर छोटे बच्चों को शौचादि कराकर ही नदी, तालाब आदि में स्नान के लिए लाती हैं। पूछा जा सकता है कि यदि लोग इतने ही आस्थावान हैं, तो आज हमारी नदियों की ऐसी हालत कैसे हो गई?
मुगलिया सल्तनत के समय तक नदियों के साथ छेडछाड के प्रमाण नहीं मिलते हैं। नदियों के इतिहास में भारत की किसी नदी के अमृत जल में विष मिलाने के अनैतिक कर्म की शुरुआत अंग्रेज कमिश्नर लॉर्ड हॉकिन्स ने की। उसने बनारस के नालों को नदी से मिलाने के आदेश दिया। और अब हाल यह है कि हमारी सारी नगरपालिकायें, नगर निगम और जिला पंचायत अपने नालों को नदियों में बेरोक-टोक मिला रहे हैं।
बांधों को आधुनिक भारत का मंदिर बताकर नदियों के प्रवाह मार्ग में बाधा पैदा करने को नदी विपरीत दूसरा कर्म माना गया। नदी की चिंता किए बगैर बनाये बैराजों, नदी किनारे बनाये तटबंध, राजमार्ग, एक्सप्रेस-वे तथा रेलवे लाइनों भी इसी श्रेणी के नदी प्रवाह में बाधक कर्म हैं। तीसरे, नदी विपरीत कर्म के रूप में हरिद्वार में गंगा पर बैराज बनाकर स्नान घाटों को जलापूर्ति करने वाली धारा को नहर का नाम दिया गया। बकौल प्रख्यात पर्यावरणविद् स्वर्गीय श्री अनुपम मिश्र, अंग्रेजों ने रुडकी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना ही इसीलिए की, ताकि नदियों पर अधिकाधिक बांध-बैराज बना सकें और नदियों से नहरें निकालकर ज्यादा से ज्यादा राजस्व वसूल सकें।
दु:खद यह है कि आजाद भारत में नदी विपरीत दुष्कर्मों में कमी आने की बजाय, तेजी ही आई। नदियों का शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण करने की प्रवृति बढी। शासन और प्रशासन ने बाजार और ठेकेदारों के साथ मिलकर नदियों का व्यावसायीकरण कर डाला। संत और शेष समाज ने भी हमें क्या फर्क पडता है, वाले अंदाज में नदियों की परवाह करनी बंद कर दी। स्वयंसेवी संगठनों ने विरोध तो बहुत किया; किंतु एकजुटता के अभाव में उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती से अधिक कुछ साबित नहीं हुई। अदालतों ने नदियों को लेकर कई अच्छे आदेश दिए, लेकिन उनकी पालना कराने हेतु जिम्मेदार एजेंसियां नाकारा साबित हुईं।
नतीजा, यह है कि हमारी नदियां, बाजार, शासन, प्रशासन और ठेकेदारों के लिए आज खुला चारागाह बन गई हैं। जितना चाहें, कमायें; कभी प्रदूषण मुक्ति, कभी गाद मुक्ति, कभी बाढ मुक्ति, कभी बाढ राहत, तो कभी बिजली उत्पादन और जल परिवहन के नाम पर। बीमारी बनी रहे, इलाज चलता रहे; नदी प्रदूषण मुक्ति का बाजारू फार्मूला यही है। हमारी सरकारें आज इसी का अनुसरण कर रही हैं।
हमने अपनी नदियों को संस्कृति विपरीत सभ्यता के असभ्य विकास की भेंट चढऩे को मजबूर कर अवश्य दिया है; किंतु लोगों को अभी भी विश्वास है – गंगा मैया सब ठीक कर लेगी। यह सच है। प्रकृति अपना नियमन करना जानती है। एक दिन कोई झटका आयेगा और नदियां अपने साथ हो रहे शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण को एक झटके में ठीक कर ही लेगी। आखिरकार कोई मां अपनी संतान के अत्याचार को कितना बर्दाश्त करेगी? अत: हमें चिंता अपनी नदियों की नहीं, नदियों के बहाने अपनी सेहत और समृद्धि की करनी है; वह भी समय रहते। नदी विनाशक शक्तियां एकजुट हैं। अत: एकजुट तो नदी हितकारी शक्तियों को भी होना ही होगा। वर्तमान समय का असल कुंभ यही होगा। भारतीय संस्कृति का यही निर्देश है। सभ्यता पालना करे। स्वयं को तभी सभ्य कहें; वरना् भारत की नदी संस्कृति के आइने में हमारी तसवीर एक असभ्य की तो है ही।