भारतीय परंपराओं से कटी है न्याय व्यवस्था

भारत की एक विलक्षण धरोहर है उसकी परिवार व्यवस्था। भारतीय लोक व्यवस्था के प्राणाधार हैं परिवार। यह एक इतिहास है कि पश्चिमी ईसाई आक्रांताओं विशेषकर अंग्रेजों ने हमारी इस परिवार व्यवस्था को तोडऩे के अथक परिश्रम किया। शिक्षा प्रणाली से लेकर नौकरी की व्यवस्थाएं तक ऐसी बनाई गईं कि व्यक्ति परिवार से दूर हो जाए। परिणाम यह हुआ कि आज संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं और सर्वत्र एकल परिवार ही दिखते हैं। परंतु यह भारतीय लोकमानस का ही दम था कि इसके बाद भी उन्होंने विभिन्न आयोजनों तथा उपायों से परिवार को बचा कर रखा। तब इस भारतीय धरोहर को नष्ट करने के लिए कानूनी प्रावधान किए जाने लगे। यह भी एक इतिहास ही है कि हिंदू कोड बिल के रूप में परिवार व्यवस्था पर एक बड़ा आघात किया गया। इससे भी काम नहीं बना तो फिर स्त्री अधिकारों के नाम पर विभिन्न पारिवारिक कानून बनाए जाने लगे, जिनकी ड्राफ्टिंग साधारणत: विदेशी संस्थाएं अथवा विदेशी चंदों पर पलने वाली संस्थाएं करती थीं।
पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जो कुछ निर्णय दिए हैं, वे भी परिवार रूपी भारतीय धरोहर पर एक बड़ा आघात ही हैं। धारा 497 के मामले में न्यायालय का निर्णय न केवल कानून तथा संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है, बल्कि इसके बचाव में उन्होंने जो तर्क दिया वह और भी हास्यास्पद है। न्यायाधीशों ने कहा कि स्त्रियों को भी अपने देह पर हक है, इसलिए इस कानून को समाप्त किया जाए। परंतु स्त्रियों को तो इस धारा में सजा होती ही नहीं थी, सजा तो केवल पुरुषों को ही मिलती थी। ऐसे में दोनों को सजामुक्त कर देना न्याय का अपमान ही तो है।
इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक और निर्णय शबरीमला मंदिर के मामले में दे दिया। देश में हजारों, लाखों मंदिर हैं। अलग-अलग मंदिरों की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। ऐसा तो है नहीं कि स्त्रियों को किसी भी मंदिर में जाने की छूट नहीं है, फिर सर्वोच्च न्यायालय ने जबरन शबरीमला मंदिर में उन्हें प्रवेश दिलाने का जो निर्णय दिया है, वह उसके भारतीय मानस से कटे होने का प्रमाण है। इसका एक ही तात्पर्य है कि हमारे न्यायाधीश अपनी ही भारतभूमि को न तो जानते हैं और न ही समझते हैं। ऐसे में भारतीय परंपरा के मामलों में उनका निर्णय देना एक अनुचित और विदेशी हस्तक्षेप है। प्रश्न है कि क्या निर्णय देने वाले न्यायाधीश संस्कृत वांग्मय और भारतीय परंपराओं के ज्ञाता हैं? यदि नहीं हैं तो उन्हें इस मामले को सनातन धर्म के प्रमुखों को सौंप देना चाहिए था। उन्होंने यह एक अनुचित काम किया और इसका परिणाम क्या हुआ? इसका परिणाम यह हुआ कि एक नास्तिक अहिंदू स्त्री मंदिर में ऐसी वस्तु लेकर गई जिसे हमारी सनातनधर्मी स्त्रियां घरों में भी यत्र-तत्र नहीं फेंकती। ऐसे में एक पवित्र मंदिर में जो यह घृणित कृत्य किया गया, क्या हमारे न्यायाधीश इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रायश्चित करेंगे?
किसी भी देश की न्याय व्यवस्था को वहां के बहुसंख्यक समाज की मान्यताओं, परंपराओं और आस्थाओं का पता होना चाहिए और उसे इसका सम्मान तथा संरक्षण करना चाहिए। यह देखना दु:खद और चिंताजनक है कि भारत की न्याय व्यवस्था को न तो देश के बहुसंख्यक सनातनधर्मी समाज मान्यताओं, परंपराओं और आस्थाओं का पता है और न ही उनके मन में इनके प्रति कोई सम्मान है। ऐसे अनेक प्रसंगों पर उन्होंने अमर्यादा का परिचय दिया है। देश के राजनीतिक नेतृत्व को चाहिए कि वह इस पर विचार करे और इसका समाधान निकाले।