भारतीय गणित के आधुनिक विद्वान

धीप्रज्ञ द्विवेदी
लेखक सभ्यता अध्ययन केंद्र में वरिष्ठ शोधार्थी हैं।

भारतीय गणित की महान विरासत को अंग्रेजों की गुलामी समाप्त नहीं कर सकी। गुलामी के उस कालखंड में भी जबकि यूरोपीय गणित पर भरपूर जोर दिया जा रहा था, भारतीय विद्वानों की लंबी श्रृंखला रही है, जिन्होंने प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के काम पर नवीन शोध किए। स्वाधीनता के बाद भी जब पंडित नेहरू की सरकार में भारतीय ज्ञान-विज्ञान की भरपूर उपेक्षा की जा रही थी, अनेक महान विद्वान हुए, जिन्होंने भारतीय गणित की परंपरा को सामने लाने का स्तुत्य प्रयास किया। आज जब पूरी दुनिया में आधुनिक गणित का डंका बज रहा है, तब भी अनेक गणितज्ञ इसको स्मरण करने और उसके आधार पर गणित को अधिक सरल, रोचक और उपयोगी बनाने में जुटे हैं। यहाँ ऐसे ही कुछ गणितज्ञों को स्मरण किया जा रहा है।
मालुर रंगाचारी (1861-1916) : मद्रास के क्रिस्चियन कॉलेज से विज्ञान स्नातक थे, जो बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर बन गए थे। उन्होने महावीर के गणित सार संग्रह को अंग्रेजी अनुवाद और नोट्स के साथ संपादित किया (1912)। कोल ब्रुक के द्वारा 1817 में ब्रह्म गुप्त और भास्कर का अनुवाद के बाद यह भारतीय गणितीय काम का पहला विस्तृत विवरण था।
प्रबोध चंद्र सेनगुप्ता (1876-1962) : कलकत्ता के बेथुन कॉलेज में गणित के प्रोफेसर थे। उन्होने भारतीय गणित और खगोल विज्ञान पर प्रकाश डालने वाले कई लेख लिखे जिसमें यूनानी और भारतीय विधियों की विशिष्ट प्रकृति की तुलना प्रस्तुत किया और यह बताया कि भारतीय विधियां यूनानी विधियों से अलग कैसे हैं। उन्होंने आर्यभट्टीय (1927) का एक अनुवाद प्रकाशित किया और विस्तृत नोट्स और उदाहरणों के साथ खंडखाद्यका का अनुवाद (1934) किया। बाद में उन्होंने खंडखाद्यका को प्रथुदका की टिप्पणी के साथ संपादित किया (कलकत्ता 1941)। उन्होंने प्राचीन भारतीय काल क्रम (1947) पर भी लिखा था।
अट्टिप्पट्टू ए.कृष्णा स्वामी अय्यंगार (1891-1953) : पछाई आप्पा कॉलेज, मद्रास से शिक्षित थे और बाद में महाराजा कॉलेज, मैसूर में प्रोफेसर के रूप में काम किया। गणित पर अपने कई प्रकाशित लेखों में उन्होंने भारतीय गणितीय परंपरा के कई तकनीकी पहलुओं को उजागर किया। 1929-42 के बीच प्रकाशित लेखों की एक श्रृंखला में उन्होंने दिखाया कि चक्रवाला प्रक्रिया हमेशा वर्ग प्रकृति के समाधान की ओर ले जाता है और दिखाया कि यह विधि निरंतर भिन्न तरीकों से कैसे अलग है। उन्होंने यह बताया कि इस बिंदु पर आंद्रेवेइल ने ध्यान नहीं दिया था, जिन्होंने सोचा था कि भारतीयों की चक्रवाला पद्धति केवल एक ‘प्रयोगात्मक तथ्य’ थी और फर्मीट और लाग्रेंज निरंतर भिन्न समीकरण के लिये सामान्य सबूत देते हैं।
बिभुति भूषण दत्ता (1888-1958) : भारतीय गणित के इतिहासकार थे। इनकी शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई थी जहां से इन्होंने मिश्रित गणित में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की, साथ ही उन्हें एक शोध छात्र वृत्ति भी मिली। युवा अवस्था में ही इनका झुकाव सन्यास की ओर हो गया। 1920 में उनका नाम स्वामी विष्णु तीर्थ महाराज रखा गया। 1921 में हाईड्रोडाईनेमिक्स के क्षेत्र में शोध प्रबंध के लिये इन्हें डी एस सी की उपाधि मिली। उसके बाद प्रो गणेश प्रसाद के प्रभाव में आकर इनकी रुचि गणित के इतिहास की ओर हो गई।
1926-35 की अवधि के दौरान दत्ता ने पचास से अधिक शोध पत्रों को प्रकाशित किया, जिनमें उन्होने भारतीय गणित के विभिन्न पहलुओं एकत्र कर के उनका अध्ययन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में पांडु लिपियां तैयार हुयीं जिन्होने हिंदू गणित का इतिहास जैसी पुस्तक का आधार तैयार किया। 1929 में दत्ता ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया,1934 में इसके बारे में प्रोफेसर कार्पिनस्की को एक पत्र में उल्लेख करते हुये लिखा कि ब्राह्मण में रहने वाले एक वेदांति अर्थात् ‘अनंत स्व’ के जीवन की आकांक्षा के लिये उन्होंने त्यागपत्र दिया था। 1931 में, कुछ समय के लिये वे विश्वविद्यालय में लौट आये, प्रो गणेश प्रसाद की इच्छाओं के सम्मान के लिए कई व्याख्यान दिए जो कि ‘शुल्व के विज्ञान’ के रूप में प्रकाशित किए गए थे (1932)। 1933 में वे विश्वविद्यालय से सेवानिवृत हो गए और 1938 में उन्होने स्वामी विद्यारण्य के नाम से सन्यास ले लिया। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी वर्ष पुष्कर में बिताये जहां उन्होने भारतीय दर्शन पर बंगाली में बहुत सी पुस्तकों को लिखा। 1929 में विश्वविद्यालय छोडऩे के पहले उन्होंने हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथेमेटिक्स: ए सोर्स बुक पुस्तक की हस्तलिपि को अपने कनिष्ठ सहयोगी अवधेश नारायण सिंह को दिया जिन्होने उसको दो भागों में अंक गणित एवम् बीज गणित में क्रमश: 1935 और 1938 में प्रकाशित करवाया।
अवधेश नारायण सिंह (1901-1954) : ने लखनऊ विश्वविद्यालय से गणित की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद उन्होने कलकत्ता विश्वविद्यालय के गणित विभाग में कार्यभार ग्रहण किया। 1954 में उनकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु के समय वे दत्त और सिंह के तीसरे खंड को पूरा करने के काम में लगे हुये थे जिसमे ज्यामिति, त्रिकोणमिति और कलन के इतिहास को शामिल किया गया था, साथ ही उसमें माया वर्ग, श्रृंखला और क्रम संचय और संयो जन सिद्धांत एवं अन्य विषयों को शामिल करना था जिसका उल्लेख प्रस्तावना में किया गया है।
जब पुस्तक को 1961 में पुनर्मुद्रित किया गया तब भी तीसरे खंड को शामिल नहीं किया गया। ऐसा लगता है कि 1958 में उनकी मृत्यु से पहले स्वामी विद्यारण्य ने तीसरे खंड की पांडुलिपि को कृपा शंकर शुक्ल को दी। एक प्रतिलिपि 1979 में एस सी गुप्ता द्वारा एस एन सिंह से प्राप्त की गई थी जो अवधेश नारायण सिंह के पुत्र हैं। बाद में शुक्ला ने तीसरे खंड का एक संशोधित संस्करण सात लेखों की एक श्रृंखला के रूप में इंडियन जर्नल ऑफ हिस्ट्री ऑफ साइंस में 1980-1994 के दौरान प्रकाशित किया।
राम वर्मा मारुथम्पुरन ने अखिलेश्वरैया के साथ मिलकर ज्येष्ठ्देव लिखित युक्तिभाष्य (मलयालम) के गणित खंड का प्रकाशन विस्तृत गणितीय व्याख्या के साथ मलयालम में 1948 में किया जिसने युक्तिभाष्य पर आगे के सभी कार्यों का आधार तैयार किया।
विज्ञान के इतिहास के लिए भारतीय राष्ट्रीय आयोग का गठन 1965 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी द्वारा किया गया था। आयोग सक्रिय रूप से भारत में विज्ञान के इतिहास पर अनुसंधान को बढ़ावा देता है।1971 में, अकादमी ने एक संक्षिप्त विज्ञान इतिहास प्रकाशित किया था। यह इस क्षेत्र में एक ऐतिहासिक प्रकाशन डी. एम. बोस, एस एन सेन और बी बी सुब्बाराप्पा द्वारा संपादित था। वर्ष 2009 में सुब्बाराप्पा ने पर्याप्त परिवर्धन के साथ एक संशोधित संस्करण प्रकाशित कराया। 1966 में, अकादमी ने इंडियन जर्नल ऑफ हिस्ट्री ऑफ़ द साइंस का प्रकाशन आरम्भ किया जो बहुत सफल रहा है और भारत के प्रमुख जर्नल में गिना जाता है।
कदंबट्टूर तिरूवेन्क्टचारलू राज गोपाल(1923-1978) ने प्रारम्भ में मद्रास क्रिस्चियन कॉलेज में पढ़ाया और 1951 में रामानुजन संस्थान में शामिल हो गए। उन्होंने श्रृंखला और सन्योजन पर काम किया। 1944 के आसपास से प्रकाशित शोधपत्रों में राजगोपाल और उनके छात्र, के मुकुंदमारार, ए वेंकटरमन, टी वी वेदमूर्थी अय्यर और एम.एस. रंगाचारी, पहली बार, युक्तिभाष्य एवं केरल स्कूल के अन्य कार्यों को प्रमाण सहित पूर्ण रूप से प्रकाश में लाये।
चिकमंगलुर नारायण अय्यंगार श्रीनिवास आयंगर(1901-1972) ने कलकत्ता में एम एस सी प्राप्त की और मैसूर, बैंगलोर और धारवाड़ में पढ़ाया, अवकलन समीकरणों पर उनके शोध पर 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्हें डीएससी प्राप्त हुआ। गणित के इतिहास में गहन रुचि रखते थे।1958 में गणितशास्त्रदा-चरित्र (कन्नड़) में प्रकाशित किया था और प्राचीन भारतीय गणित का इतिहास 1967। उन्होंने धुलिपलाअर्का सोमायजी के शोधप्रबंध ‘प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान का समालोचनात्मक अध्ययन (1971) का पर्यवेक्षण किया। सोमायाजी ने बाद में सिद्धांत शिरोमणी के ग्रहगणितवाले हिस्से का एक अनुवाद गणितीय नोट्स के साथ प्रकाशित किया।
टेक्कथाअमायन्कोथकलाम सरस्वती अम्मा(1918-2000) ने मद्रास विश्वविद्यालय में वीराघवन के साथ काम किया और फिर रांची और धनबाद में शिक्षण किया। उनके शोध के आधार पर ही प्राचीन और मध्यकालीन भारत में ज्यामिति (1979) पर पहला प्रामाणिक और व्यापक अध्ययन प्रकाशित हुआ। उन्होंने आर सी गुप्ता के ‘प्राचीन और मध्यकालीन भारत में त्रिकोणमिति’ नामक शोध प्रबंधक पर्यवेक्षण भी किया।
समरेंद्र नाथ सेन (1918-1992) भौतिकी में स्नातक थे और इंडियन एसोसिएसन फॉरकल्टीवेशन ऑफ साइंस के रजिस्ट्रार के रूप मे लगभग 3 दशक तक काम किया। 1947-49 के दौरान वेयूनेस्को के साथ थे और वहां यूसुफ निधम के प्रभाव में 1950 में उन्होंने बांग्ला भाषा में विज्ञानेर-इतिहास लिखा।विज्ञान के इतिहास पर आई एन एस ए आयोग के सक्रिय सदस्य भी रहे।1966 में सेन नेए के बेग और एस आर शर्मा की सहायता से खगोल विज्ञान और गणित के संस्कृत भाषा के ग्रंथों की एक ग्रंथ सूची का प्रकाशन किया। सेन और बेगने 1983 में शुल्व सूत्रों अनुवाद का प्रकाशित किया। सेन ने के.एस. शुक्ला के साथ भारत में खगोल विज्ञान का इतिहास(1985) भी संपादित किया।
कृपा शंकर शुक्ला (1918-2009) ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर की उपाधी प्राप्त की, और लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित विभाग में कार्य भार ग्रहण किया। 1955 में, ए एन सिंह के पर्यवेक्षण में उन्होंने भास्कर-। एवम उनके कार्यों पर पी एचडी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होने महाभास्करीय (1960), लघु भास्करीय (1963) का नये संस्करणों के साथ अनुवाद किया साथ ही भास्कर के आर्यभटीय भाष्य का भी अनुवाद किया (1976)। शुक्ला ने कई अन्य ग्रंथों के नये संस्करण पर कार्य किया साथ ही उनका अनुवाद भी प्रकाशित किया। उदाहरण स्वरूप परमेश्वर की टीका के साथ सूर्य सिद्धांत (1957), श्रीधराचार्य लिखित पति-गणित (1959) धीकोटिदाकरण (1969), बीजगणिततम्स(1970), आर्यभट्टीय (1976 केवीशर्मा के साथ), लघुमानस (1985) इत्यादि।
शुक्ला ने एस एन सेन के साथ मिलकर ‘भारत में खगोल विज्ञान का इतिहास’ भी संपादित किया(1985)। 1980-1994 के दौरान उन्होंने एक श्रृंखला के रूपदत्ता और सिंह का ‘हिंदु गणित का इतिहास’ (1918- 2009) के अप्रकाशित तीसरे खंड के विभिन्न अध्यायों को भी संपादित और प्रकाशित किया।
कृष्ण वेंकटेश्वर शर्मा(1919 -2005) ने त्रिवेन्द्रम से संस्कृत में एम ए किया था, और बाद में वीरा घवन के साथ मद्रास विश्वविद्यालय में न्यूकैटलॉग कैटलॉगोरम परियोजना में शामिल हो गए। शीघ्र ही वह केरल खगोल विज्ञान से सम्बंधित कार्य पर लग गए। उन्होने बहुत से महत्वपूर्ण पुस्तकों का सम्पादन किया। उदाहरणस्वरूप हरि दत्त की ग्रहकरणी बंधन, नीलकंठ का सिद्धांत दर्पण, माधव की गोला दिपिका इत्यादि। इस अवधि के दौरान, शर्मा ने प्रसिद्ध विद्वान टी एस कुप्पना शास्त्री के साथ वाक्याकरण (1961) के एक संस्करण के लिये काम किया।1975-80 के दौरान शर्मा को होशिरपुर के विश्वेश्वर नंद इंस्टीट्यूट में निदेशक के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया था। सेवा इस अवधि के दौरान, उन्होने कई महत्वपूर्ण कार्यों सहित 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित कीं जैसे केरल स्कूल के हिंदू खगोल शास्त्र का इतिहास, भास्कराचार्य का लीलावती, शंकर का क्रिया क्रम कारी, नील कंठ का तंत्र संग्रह, शंकर का युक्ति दीपक, नील कंठ का ज्योर्तिमीमांसा इत्यादि।
1983 में शर्मा मद्रास लौट आए, और 2005 में उनकी मृत्यु तक उनका कार्य सक्रिय रूप से जारी रहा। इस अवधि के दौरान उनके महत्वपूर्ण प्रकाशन शामिल हैं: बी वी सुब्बा रायप्पा के साथ ‘भारतीय खगोल विज्ञान: एक स्रोत पुस्तक’ (1985); वाराह मिहिर के पंच सिद्धांतिक के आधार पर टी ए सकुप्पना शास्त्री(1993) के साथ एक पुस्तक; और उनका सब से बडा काम युक्तिभाषा का अनुवाद और संस्करण, जो 2008 में के. राम सुब्रमण्यम, एम एस श्री राम और एम डी श्रीनिवास के नोट्स के साथ छपी।
राधा चरण गुप्ता (जन्म: 1935) लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़े और उन्होंने रांची में सरस्वती अम्मा के निर्देशन में पीएचडी किया। उन्होंने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची में गणित प्रोफेसर के रूप में सेवा की। उन में गणित के इतिहास के लिए असाधारण जुनून है। भारतीय गणित के लगभग सभी पहलुओं साथ उन्होंने गणित के इतिहास पर लगभग 500 शोध पत्र प्रकाशित किया है। उन्होंने 1979 गणित भारती जर्नल की स्थापना की, जिस ने भारत में गणित के इतिहास पर शोध को बढ़ावा देने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। गुप्ता को गणित के इतिहास में महत्वपूर्ण काम करने के लिये 2009 में प्रतिष्ठित के ओ ओ मे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अमुल्य कुमार बाग (जन्म: 1937) आई एन एस ए आयोग की स्थापना के समय वह एस एन सेन जुड़े रहे हैं। विज्ञान के इतिहास के भारतीय जर्नल के साथ जुड़े रहे हैं और जर्नल के सफलता और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बाग ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत में गणित के बारे में एक सिंहावलोकन प्रकाशित किया है (1991 बनारस) और एस एन सेन के साथ शुल्ब सूत्र का अनुवाद भी किया है।
जॉर्ज घेवर्गीज यूसुफ का जन्म केरल में हुआ था, लेकिन अपना बचपन अफ्रीका में व्यतीत किया और बाद में इंग्लैंड में चले गए। वह यूरो-सेंट्रीसिज्म के खिलाफ बहस के मामले में सब से आगे रहे हैं। गणित के इतिहास से सम्बंधित उन की पुस्तक’द क्रेस्ट ऑफ द पीकॉक: नॉन-यूरोपीयन रूट्स ऑफ मैथेमैटिक्स’, सबसे पहले 1991 में प्रकाशित हुयी थी। इस पुस्तक को व्यापक प्रशंसा मिली और कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। हाल ही में यूसुफ ने ‘एपैसेजटूइन्फिनिटी: मेडिइवल इंडियन मै थेमैटिक्स फ्रॉम केरला एंड इट्सइंम्पैक्ट’ (2009)को प्रकाशित किया है।
सुद्युम्न आचार्य प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य हैं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एम ए अष्टस्वर्णपदक विजेता, डी फिल्, प्रोफेसर के रूप में 34 वर्षों का अध्यापन अनुभव। वर्तमान में वेद वाणी वितान प्राच्य विद्या शोध संस्थान सतना के निदेशक हैं। दर्शन-भौतिक विज्ञान, व्याकरण-भाषा विज्ञान, प्राचीन तथा आधुनिक इत्यादि विषयों पर अनेक ग्रन्थों के प्रणेता। उन्होंने भारतीय गणित का इतिहास लिखा है। उनकी पुस्तक इस प्रकार लिखी गई है कि उसे सीधे पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा उन्होंने श्रीधर के त्रिशतिका का अनुवाद भी किया है।
वेणुगोपाल डी हेरुर गुलबर्गा, कर्नाटक के रहने वाले हैं। पेशे से इंजीनियर वेणुगोपाल ने नौकरी करते हुए भारतीय गणित पर असाधारण काम किया है। उन्होंने भारतीय गणित के लगभग सभी संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी और हिन्दी में अनुवाद किया है। उन्होंने भारतीय गणित का इतिहास भी लिखा है और भारतीय गणित के इतिहास के अप्रतिम विशेषज्ञ डॉ. राधाचरण गुप्त के कार्यों पर भी एक पुस्तक लिखी है।
कृष्णमूर्ति रामसुब्रम्णयम् आईआईटी मुम्बई में मानविकी तथा समाजविज्ञान विभाग में संस्कृत में विज्ञान और तकनीकी प्रकोष्ठ में प्रोफेसर हैं। भारतीय गणित में उन्होंने काफी काम किया है और इसके लिए पाठ्यक्रम का भी निर्माण किया है।