भारतीय कृषि पद्धति से होगा देश का सर्वांगीण विकास

भारतीय कृषि पद्धति से होगा देश का सर्वांगीण विकास

श्याम बिहारी गुप्ता
लेखक दीनदयाल उपाध्याय उन्नत कृषि शिक्षा योजना के उत्तरी भारत के समन्वयक हैं।

मेरा काफी लम्बे समय से यह विश्वास रहा है कि कृषि पर देश में सर्वाधिक शोध होना चाहिए। मैंने स्वयं इस विषय में प्रयोग करके देखे हंै। मैं मानता हूंं कि भारत में कृषि कोई एक आर्थिक गतिविधि भर नहीं थी। यह एक जीवन पद्धति थी। भारत की कृषि पद्धति आध्यात्मिक पद्धति भी है। भारत ने पूरी दुनिया को कृषि सिखाई है। यदि हम कृषि की भारतीय पद्धति को लागू कर सकें तो भारत की अन्य सभी व्यवस्थाएं ठीक हो जाएंगी,
आध्यात्मिक कार्य होने के कारण कृषि में एक समग्र दृष्टि की भी आवश्यकता होती है। उस समग्र दृष्टि की जिसमें सभी पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, कीट-पतंगों सभी को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखती है। चूंकि मनुष्य की उत्पत्ति सबसे अंत में हुई है, इसलिए इस सृष्टि के लिए सभी का उपयोग है। गिद्ध से लेकर ततैये तक, सांप से लेकर नेवले तक सभी कृषि से जुड़े हुए हैं। यह एक चक्र है। यह कहीं से भी टूटेगा तो कृषि प्रभावित होगी। जैसे आज गिद्ध समाप्त हो रहे हैं, तो पशुओं के मरने से दूषण फैलता रहता है। पहले उसकी सफाई गिद्ध कर दिया करते थे। खेती एकाकी कार्य नहीं है। इसमें सभी प्रकार की जैवविविधता चाहिए।
यदि हम खेती या बागवानी करते हैं तो इसमें हमें इस समग्र दृष्टि और चक्र का पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए किसी एक फल का बागान उतना लाभकारी तथा गुणकारी नहीं होगा जितना कि अनेक फलों का बागान। इसलिए आधुनिक परंपरा के अनुसार केवल अमरूद या आम या फिर पपीते का बागान लगाना सही नहीं है। इसी प्रकार जंगलों में एक ही प्रकार के पेड़ लगाने से वहाँ की जैवविविधता से प्रभावित हो रही है। आप किसी भी प्राकृतिक रूप से बने जंगल को देखें। उसमें विभिन्न प्रकार के फलदार या अन्य वृक्ष होते हैं। इस विविधता को समझते हुए अपने देश में इसलिए हमेशा से ही विविध प्रकार के फलदार वृक्ष लगाए जाने की परंपरा रही है।
आध्यात्मिक कृषि का एक और आधार है सहजीवन। कृषि कोई व्यवसाय नहीं है। यह सहजीवन के अभ्यास का एक तरीका है। इसलिए यहाँ कीटनियंत्रक होते हैं, कीटनाशक नहीं। हम पक्षियों को खेतों से भगाते नहीं हैं। कीट और पक्षी कृषि के मित्र हैं, शत्रु नहीं। इससे पैदावार बढ़ती है। यदि हमें भारत की खेती को समझना है तो हमें 1857 के पहले की खेती को देखना होगा। उसके बाद तो उसे बिगाड़ा ही गया है। आज रासायनिक खेती से उतना धान पैदा नहीं किया जा सकता, जितना 1857 से पहले पैदा हुआ करता था। केवल धान ही नहीं, सभी फसलों के साथ यही बात है। ऐसा होता था सहजीवन के नियम के पालन करने से। किसान खेती के साथ-साथ पशु-पक्षियों का भी पालन करता था। इसलिए मानव जाति के साथ साथ पशुओं की भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। इसके लिए सभी गांवों में चारा बैंक होना चाहिए।
आज की एक और समस्या बीज की है। संकर बीजों में प्रजाति को आगे बढ़ाने की क्षमता नहीं होती। जिन बीजों में प्रजनन की क्षमता ही नहीं होगी तो उससे उत्पन्न अन्न को खाने से मनुष्यों में यह क्षमता कैसे आएगी? वास्तव में देखा जाए तो यह एक बड़े षड्यंत्र के समान दिखता है। दुनिया में युवाओं के देश के रूप में स्थापित अपने देश की युवाशक्ति को ही अक्षम बना देने का षड्यंत्र। इसलिए हमें संकर बीजों पर अपनी निर्भरता को समाप्त करना होगा और पैदावार बढ़ाने के लिए देसी बीजों को अपनाना होगा। इसके लिए प्रत्येक गांव में बीज बैंक बनाने की आवश्यकता है।
भारतीय खेती का एक और आधार भारतीय ज्योतिष भी है। आध्यात्मिक कार्य होने के कारण कृषि में हमें भारतीय गणनाओं का ही प्रयोग करना चाहिए। खेती जनवरी, फरवरी के आधुनिक कैलेंडर से नहीं की जा सकती। इसके लिए हमें भारतीय कालगणना का ही सहारा लेना होता है। नक्षत्रों के आधार पर ही ऋतु भी निर्भर होते हैं। इसका उपयोग करके आज नक्षत्रीय खेती विकसित की गई है। हालांकि उसमें भी बाजारवाद घुस गया है और उसके उत्पाद भी किसानों को आत्मनिर्भर नहीं बनाते, परंतु नक्षत्रों और भारतीय ज्योतिष पर आधारित उनके कृषि कैलेंडर अवश्य उपयोगी हैं।
इस आध्यात्मिक कृषि की सबसे बड़ी बात यह है कि इसे किताबों से नहीं सीख सकते। इसे करके ही सीखा जा सकता है। मैंने वर्ष 2006 में खेती प्रारंभ किया। मैंने एक गाय से शुरुआत की थी। मेरा खेत ऊसर था। लोग मेरा मजाक उड़ाते थे। मित्रों तथा परिवार को भी दुख होता था। मैंने भी जैविक खेती तथा वर्मी कम्पोस्ट से ही खेती करना शुरु किया था। बाद में मुझे प्राकृतिक खेती का पता चला और मैं बिजनौर में सुभाष पालेकर जी से मिला। मैं प्रारंभ से ही गौमूत्र का संग्रह तथा गोबरगैस का उत्पादन करता रहा था। यही दोनों मेरी सफलता के आधार भी हैं। गाय को बांधने के स्थान पर मैंने प्लेटफार्म बना दिया था। उसके पीछे नाली बनाकर नीचे पक्की होदी बना दी। उससे गौमूत्र तथा गोबर एकत्र होने लगा और उसमें कोई कंकड़-पत्थर नहीं होता था। वर्ष 2006 से ही मेरे घर में भोजन गोबरगैस पर ही बनता आ रहा है।
गोबर गैस आज के समय में इतना आवश्यक है जितना आज हरेक के लिए मोबाइल आवश्यक हो गया है। चाहे संसाधन कम हों, परंतु लोग मोबाइल अवश्य रखते हैं, उसी प्रकार लोगों को गोबर गैस का संयंत्र घर में बैठाना ही चाहिए। यह हमें प्रयास करना चाहिए कि जिस भी किसान के घर में पशु हैं, उसके घर में गोबर गैस का संयंत्र होना ही चाहिए। इससे वह कम से कम ईंधन के मामले में आत्मनिर्भर होता है। मैं तो गाँव-गाँव में युवाओं से यह आह्वान करता हूँ कि वे विवाह में दहेज में देसी गाय लें और गोबर गैस का संयंत्र बनवाएं। युवतियों से कहता हूँ कि वे ससुराल से यह मांग करें कि वहाँ गोबर गैस का संयंत्र अवश्य बनाया जाए। इससे हम आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ, स्वावलंबी, संस्कारवान, वीर्यवान तथा ज्ञानवान बना सकेंगे।
गोबर गैस स्वच्छता का सबसे सफल और व्यवहारिक प्रयोग है। मैंने प्रारंभ से ही शौचालय के निकास को गोबर गैस संयंत्र से जोड़ रखा था, परंतु उस शौचालय में सीट नहीं बिठवा पाया। खेत के मजदूर से लेकर घर के लोग तक, हर किसी ने शौचालय के मल के संयंत्र में जाने पर उस गैस का उपयोग करने का विरोध किया। वर्ष 2015 में मैं कनेरी मठ कोल्हापुर गया। वहाँ मैंने देखा कि उन्होंने शौचालय के निकास को भी गोबर गैस के संयंत्र से जोड़ रखा है। मेरी पत्नी भी वहाँ गई थी। हमने वहाँ देखा कि वहाँ के सभी 76 परिवारों अपने शौचालय के पाइप को गोबर गैस संयंत्र से जोड़ रखा है। किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। यह एक संत के प्रयास से संभव हुआ था। उसे देखने के बाद मैंने शौचालय का प्रयोग प्रारंभ कर दिया। वर्ष 2016 में मेरा शौचालय गोबर गैस संयंत्र से जुड़ गया।
गोबर गैस संयंत्र की स्लरी खेतों के लिए गोबर की खाद की उपेक्षा पांच गुना अधिक लाभकारी है। गोबर गैस संयंत्र रसोई गैस देने के साथ साथ खेती में भी उपयोगी होते हैं। इसलिए गोबर गैस संयंत्र का नाम बदल कर किसान कल्याण संयंत्र कर देना चाहिए। तीन घनमीटर का एक गोबर गैस संयंत्र चलाने पर किसान को तीन हजार रुपये प्रतिमाह और सरकार को चार हजार रुपये प्रतिमाह की आय होती है।
इन प्रयोगों के कारण ही मेरे खेत की ऊसर भूमि पर भी आज मैं आस-पास के सभी खेतों से अधिक पैदावार होती है। जिस खेत का नाम ही लोगों ने उसरन रख दिया था, उस खेत में आज इतनी उपज होती है। इस परिवर्तन के तीन आधार रहे। वर्षा जल संचय, गौमूत्र संचय और गोबर गैस संयंत्र। पहले मेरे खेतों में 27-28 फुट पर पानी मिलता था। वह भी काफी कम पानी होता था। आज मेरे खेतों में गर्मियों में भी भूजल-स्तर 10-11 फुट पर है। बरसात में चार फुट पर ही भूजल है। इसके लिए मैंने चार उपाय किए। खेतों की मेड़बंदी की। मेड़ के पहले ट्रेंच यानी खाई बनाई। खाई की मिट्टी को मेड़ पर डाल दिया और मेड़ पर पेड़ लगा दिए। इस प्रकार इस पूरे इलाके में वर्षाजल का संचय भी हुआ जिससे भूजल स्तर बढ़ा और मेरे ऊसर खेत उपजाऊ भी बन गए।
देशभर में चल रहे प्रयोगों को देख कर और अपने अनुभवों से मैंने किसान की आय में वृद्धि के लिए एक छह सूत्री कार्यक्रम बनाया है। इन छहों कार्यक्रमों को अपनाने से किसान की आय केवल दुगुनी नहीं, कई गुनी बढ़ जाएगी। पहला सूत्र है किसान खेत पर। आज की समस्या यह है कि किसान खेत पर कम समय देता है, उसे खेत पर अधिक समय देना चाहिए। खेती मजदूरों का नहीं किसानों का काम है।
दूसरा सूत्र है, खेत पर मेड़। खेतों पर मेड़ होने से स्वाभाविक रूप से खेतों में वर्षाजल का संचय होता है और खेतों में सूक्ष्मजीवी तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व बह कर नहीं निकल पाते। तीसरा सूत्र है, मेड़ पर पेड़ और खेत में पेड़। मेड़ों पर तो पेड़ लगाएं ही, खेत में भी 30-30 फुट की दूरी पर फलदार पेड़ लगाए जाने चाहिए। यह किसान की आय का अतिरिक्त स्रोत बनता है।
चौथा सूत्र है गौमूत्र संचय और गोबर गैस संयंत्र। मैंने अपने खेत में यह प्रयोग करके देखा है और अब मैं यह कह सकता हूँ कि आने वाले समय में यदि ठीक से योजना बनाई जाए तो गाँव में रसोई गैस गाँव की ही होगी, बाहर से एलपीजी लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी। गाँव में उपलब्ध सभी जैविक कचड़े, इसमें सब्जीमंडी, फलमंडी के अवशेष, मानव मल, पशुधन का मल-मूत्र और गोबर, इन सभी के आधार पर गोबर गैस से हम पूरे गाँव को रसोई के ईंधन की समस्या से मुक्त कर सकते हैं।
पाँचवा सूत्र है सहफसलों पर आधारित प्राकृतिक खेती, बागवानी और जड़ी-बूटियों का उत्पादन। जब तक किसान एक साथ पचास से सौ तरह की चीजें पैदा नहीं करेगा, तब तक आलू-गन्ना पैदा करके वह आत्महत्या की ओर ही प्रवृत्त होगा। किसान को अपने लिए खेती करनी चाहिए। इससे वह मालामाल हो जाएगा। आज का किसान अपने लिए खेती नहीं करता। वह चार चीजें पैदा करता है और सब कुछ बाजार से खरीदता है। तेल, मसाले, सब्जी आदि सब कुछ। किसान को पहले अपने और अपने परिवार के लिए खेती करनी चाहिए। घर के सारे मसाले, धनिया, मिर्च, हल्दी, अजवायन, जीरा, जहाँ जो-जो हो सकता है, वह सभी पैदा करना चाहिए। इसलिए एक नारा है – गाँव का पैसा, गाँव में। गाँव का पैसा शहर में नहीं, शहर का पैसा गाँव में। बिना बागवानी और पशुओं के खेती को खेती कहा ही नहीं जा सकता। पहले गाँवों में जाते थे तो पूछते थे कि खेती-बाड़ी कैसी है। अनपढ़ व्यक्ति भी जानता था कि खेती के साथ बाड़ी यानी कि बागवानी जुड़ी हुई है।
छठा और अंतिम सूत्र है कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और मार्केटिंग। आज किसान पैदा तो कर रहा है, परंतु पैकेजिंग और मार्केटिंग करके उससे लाभ कोई और कमा रहा है। किसान को तो उसकी लागत भी ठीक से नहीं मिल पा रही। यदि किसान अपने स्तर पर प्रसंस्करण करके उसके पैकेजिंग और मार्केटिंग कर सके तो उसकी आय कई-कई गुनी बढ़ सकती है।
समस्या यह है कि आज खेती के काम में देश का सबसे सबसे कम योग्य व्यक्ति को ही लगाया जाता है। स्वाधीनता के बाद इस देश मे यह गड़बड़ हुई है। किसी भी परिवार के सबसे बुद्धिमान बच्चे को इंजीनियर, डॉ., आईएएस अधिकारी आदि बनने के लिए लगा दिया जाता है। जो थोड़ा कम तेज होता है, वह निजी नौकरियों के लिए कोशिश करता है। जो पढऩे में उससे भी कम तेज होता है, व्यवसाय में जुट जाता है। अब जो सबसे कम प्रतिभाशाली बचता है, वह खेती करता है। होना तो यह चाहिए था कि सबसे प्रतिभाशाली बच्चे को खेती में लगाया जाता। प्राचीन काल से ही भारत में सर्वश्रेष्ठ कार्य कृषि को माना गया। तो सर्वश्रेष्ठ कार्य में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा लगनी चाहिए थी। परंतु यह नहीं हो रहा। यही गड़बड़ है। यह आज की आवश्यकता है कि देश की अच्छी प्रतिभाओं को कृषि, ग्रामीण विकास, कृषि आधारित उद्योग और ग्रामीण ऊर्जा पर काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसा हम कर पाए तो किसी को रोजगार की कोई कमी नहीं रहेगी। इतनी ही भूमि में दुनिया के लोगों को भी हम रोजगार दे पाएंगे।
मैं केवल 10 प्रतिशत ही किसान हूँ। किसान वह होता है जो पूरी तरह किसानी पर ही निर्भर हो। इतने दिनों की मेहनत के बाद मैं केवल 10 प्रतिशत किसान ही बन पाया हूँ। मैं एक प्रयोगधर्मी तो हूँ, परंतु किसान नहीं। मेरा मूल काम है खेती के तंत्र को समझना और उसको देश में लागू करने-करवाने का उपाय करना ताकि देश के सभी लोगों को हम स्वास्थ्यवर्धक भोजन दे सकें और दो लाख 69 हजार ग्राम पंचायतों में युवाओं को आध्यात्मिक खेती का प्रशिक्षण दे सकें।

भारतीय खेती के मेरे प्रयोग
वर्ष 1987 से 1994 तक मैं संघ का प्रचारक था। 1994 में मैं प्रचारक जीवन से वापस आया। उस समय मैं यह तय करके लौटा था कि मुझे गाय, गाँव, किसान और खेती पर काम करना है। यह समझ बनने के बावजूद मेरे पास व्यवहारिक ज्ञान शून्य था। हालांकि मैं गाँव में पैदा हुआ, लेकिन जाति से वैश्य होने के कारण परिवार में व्यवसाय था, खेती नहीं। इसलिए खेती का मुझे सीधा अनुभव नहीं था। मैंने कभी गाय को बांधा नहीं था। लेकिन मन में इच्छा शक्ति थी और मन में एक उमंग थी कि गाय हमारे लिए कहीं न कहीं कल्याण का मार्ग है। इसलिए यह संकल्प करके मैं अपने गाँव अमरोख जोकि उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में पड़ता है, वापस आया। गाँव की अपनी जमीन बेच कर मैंने झांसी से 18 किलोमीटर दूर ग्वालियर मार्ग पर अम्बावाय गाँव में ढाई एकड़ जमीन खरीदी। जमीन उस समय काफी सस्ती मिल गई थी। बचे हुए पैसों से मैंने पूरे देश में यात्राएं कीं। गाय और खेती पर हो रहे प्रयोगों को देखने के लिए मैं देश के लगभग सभी राज्यों में गया। सिक्किम से लेकर आंध्र प्रदेश और कर्नाटक तक।
सभी स्थानों में मेरा प्रयास होता था कि गाँव में ही रुक सकूं। किसी किसान के घर या फिर खेत पर रूकुं। ऐसे किसान के यहाँ रूकने को मैं प्राथमिकता देता था जो खेत में ही रहता था। वर्ष 1995 में हमने झांसी में एक गौशाला का प्रारंभ किया। झांसी के एक थानाध्यक्ष ने डेढ़ सौ गाएं पकड़ी थीं, उन्हें लेने वाला कोई नहीं था। तो गाय के लिए काम करने वाले लोगों, जिनमें मैं भी एक था, ने मिल कर गायों को पालने के लिए स्थान ढूंढना शुरु किया। एक मित्र ने सवा एकड़ जमीन दे दी और वह गौशाला स्थापित हो गई।
गौशाला का काम समझने के लिए मैं बनारस की रामेश्वर गौशाला में गया। वहाँ मैंने देखा कि एक-एक गाय 20-25 लीटर दूध देती है। वे सभी जर्सी, होलिस्टीन आदि गाएं थीं। मेरे मन में आया कि यदि जर्सी, होलीस्टीन आदि से अपने यहाँ की गायों को मेल कराया जाए तो हमारे यहाँ भी अधिक दूध देने वाली गाएं हो सकती हैं। इससे हमारे बुंदेलखंड में दूध की नदियाँ बहने लगेंगी। परंतु वर्ष भर के अंदर मुझे पता चल गया कि जर्सी, होलिस्टीन आदि गाय नहीं है उसके जैसा कोई अन्य ही पशु है। इनके दूध, दही, गोबर और गौमूत्र में वे गुण नहीं हैं जो भारतीय नस्ल की गाय के दूध, दही, गोबर और गौमूत्र में होते हैं। देसी गाय के दूध, दही, गोबर और गौमूत्र ही मानव और प्रकृति के लिए लाभकारी हैं, अन्यों के नहीं।
यह बात मुझे किताबें पढ़ कर पता नहीं चलीं, बल्कि मैंने जो प्रयोग किए, उनसे मुझे यह बात स्पष्ट हुई। उस समय मैं झांसी में पांच स्थानों पर गौमूत्र पीने के लिए स्टॉल लगवाता था। लगभग 250-300 लोग नित्य गौमूत्र पीने आते थे। मैं सुबह गौमूत्र पाँच रूपये लीटर खरीदता था और उसे आठ तह कपड़े से झान कर कंटेनर में भर कर पीने के लिए रख देता था। मुझे इसकी प्रेरणा उज्जैन से मिली थी। मुझे किसी ने बताया था कि एक सज्जन वहाँ सौ-डेढ़ सौ लोगों को गौमूत्र पिलाते हैं। मैंने स्वयं वहाँ जाकर इसे देखा। वही काम मैंने यहाँ झांसी में भी प्रारंभ किया। यहाँ पर भी बड़ी संख्या में लोग पीने लगे। उज्जैन में भी मैंने पीने वाले लोगों के अनुभव पूछे थे और यहाँ झांसी में भी लोगों को अच्छे अनुभव आए। इससे गाय के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ी।
इसके बाद मैंने जर्सी और देसी गाय के गौमूत्र के नमूनों की आईआईटी, खडग़पुर में रासायनिक जाँच करवाई। इससे मुझे विदेशी प्रजाति की गायों की बनिस्पत देसी गायों के अधिक लाभकारी होने का पता चला। अनुभव से भी कई बातें पता चलीं। जैसे कि जर्सी गाय का गौमूत्र अधिक दिन नहीं टिकता, उसमें शीघ्र ही कीड़े पड़ जाते हैं, परंतु देसी गाय के गौमूत्र को लंबे समय यानी कि वर्षों तक रखा जा सकता है। मानव स्वास्थ्य के लिए तो ताजे गौमूत्र का प्रयोग किया जाता है, परंतु खेतों तथा फसलों के लिए पुराना गौमूत्र अधिक उपयोगी होता है। गौमूत्र जितना अधिक पुराना होगा, उतना अधिक वह खेतों के लिए लाभकारी होगा। पुराना होने पर गौमूत्र के रंग में भी परिवर्तन आता है। वर्ष 2000 में मैंने गौमूत्र से दवाएं बनाना प्रारंभ कर दिया था। इससे लोगों को लाभ हो रहा था। श्वांस रोग, चर्म रोग, पेट के रोगों आदि में यह काफी लाभकारी था। सोराइसिस के भी कई रोगी ठीक हुए। इसके अलावा गोबर-गौमूत्र के और भी कई उत्पाद मैं बनाने लगा था।
इस बीच मैं गोबर खाद पर आधारित खेती के अध्ययन के लिए मैं और भी राज्यों में घूमने लगा। मैंने सुना था कि पूर्वोत्तर में चाय बागानों में पूरी तरह रसायनमुक्त खेती हो रही है। मुझे लगा कि वहाँ गोबर खाद की मांग अच्छी होगी। जैविक खेती के नाम पर वर्मी कम्पोस्ट तथा अन्य प्रकार के कम्पोस्ट आदि को प्रोत्साहन दिया जाता है। मैंने भी दस लाख रुपये लगा कर वर्मी कम्पोस्ट का काम प्रारंभ किया। परंतु उसमें प्रयोग में आने वाला केंचुआ देसी नहीं है। उसका खेती में लाभ भी नहीं है। उसमें काफी अधिक मेहनत करनी होती है और परिणाम कम आता है। साधारण किसान के लिए यह व्यवहारिक नहीं है। इसलिए यह एक असफल प्रयोग है।