भव्य राम मंदिर बनाना ही है राजधर्म

रामेश्वर प्रसाद मिश्र पंकज
लेखक वरिष्ठ विचारक हैं।


हमें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि राम मंदिर संबंधी मुद्दे के मूल में हमारे राज्य के आधारभूत स्वरूप और संरचना के नीतिगत प्रश्न निहित हैं। गांधी जी ने कहा था कि धर्म, सत्य और हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म परस्पर पर्याय हैं। उसे ही आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि धर्मनिष्ठ राज्य और भव्य राम मंदिर का गौरव परस्पर सम्बन्ध हैं।
वस्तुत: विचार योग्य विषय तो यह है कि अपना स्वतंत्र सार्वभौम गणराज्य बन जाने पर भी हिन्दू अपने उपासना केन्द्रों पर किए गए अत्याचार को इस तरह विवश होकर सहने के लिये बाध्य क्यों किए गये हैं और किन व्यवस्थाओं और प्रावधानों के अन्तर्गत किये गये हैं? इसलिए यह स्वयं एक आश्चर्य का विषय होना चाहिए कि श्रीराम जन्म भूमि, श्री कृष्ण जन्मभूमि और भगवान शिव की नगरी में ज्ञानव्यापी पर कोई भी गैरहिन्दू आधिपत्य क्यों है और कैसे हैं? अर्थात इस आधिपत्य को समाप्त करने में कौन कौन से तत्व बाधक हैं और भारत का राज्य ंिहंदू धर्म के प्रति अपने स्वाभाविक कर्तव्य को निभाने में अक्षम और असमर्थ क्यों बना हुआ है?
यह विचित्र बात है कि अपने इन सर्वोच्च श्रद्धा केन्द्रों और पूजा स्थलों में पुन: अपनी उपासना अबाधित रखने के लिये हिन्दुओं को ऐसे चित्र-विचित्र तर्क देने पड़ रहे हैं जो मुसलमान या ईसाई कभी भी नहीं देते और कोई उनसे मांगता भी नहीं। श्रीराम जन्मभूमि के विषय में हिन्दुओं के अतिरिक्त और कौन प्रमाण हो सकता है? जो भी राज्यकर्ता या राज्य का जो भी अंग इस विषय में किसी प्रकार का प्रश्न करता है, वह श्रद्धा केन्द्रों सम्बन्धी विश्वव्यापी सत्य और परंपराओं से पूरी तरह अनजान है।
ईसाइयत के प्रवर्तक जीसस के जन्म के विषय में स्वयं यूरोप में सर्वानुमति नहीं है और यूरोप के प्रबुद्ध लोगों का बहुत बड़ा भाग यह मानता हेै कि जीसस नामक महापुरूष कभी पैदा ही नहीं हुए। उनका केवल प्रचार किया गया। परतुं इस पर भी ईसा को केन्द्र मानकर उन पर रचित उपासना स्थलों को लेकर और ईसा के वचन बताए जा रहे संकलनों को लेकर विश्व के किसी भी राज्य ने अभी तक कोई प्रश्न नहीं उठाया है और कोई बाधा उत्पन्न नहीं की हैं। उस विषय में ईसाइयों का कथन ही पर्याप्त मान लिया जाता है। इसी प्रकार मोहम्मद साहब स्वप्न में जिस घोड़े पर या घोड़ी पर सवार होकर किसी एक किसी एक मस्जिद में बीच में रूके थे, उसके बाद वहां से अल्ला ताला से मिलने गए थे, उस मस्जिद के विषय में भी मुसलमानों की अडिग आस्था है कि वह वैसी पवित्र है जैसा हम मानते हैं। ऐसी अन्य अनेक बातें हैं जिनके विषय में केवल आस्थावान समूहों का मानना ही पर्याप्त प्रमाण माना जाता है।

ऐसे में श्रीराम जन्मभूमि को लेकर किसी भी बात का विवाद चलाना और उसे भारतीय राज्य के एक अंग न्यायपालिका द्वारा विचार योग्य विषय मानना स्वयं में इन विश्वव्यापी सार्वभौम परंपराओं की उपेक्षा और अवमानना है। वस्तुत न्यायालय इस समय भारत राज्य के अंग हैं और राज्य को इस विषय में किसी परीक्षण का अधिकार होना ही नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा परिक्षण यदि राज्य का कार्य है तो वह सभी समूहों पर समान रूप से लागू होगा और तक गैर हिन्दूओं के उपासना स्थलों और मान्यताओं के विषय में भी निर्णय राज्य को करना होगा जिसे गैर हिन्दू कभी स्वीकार नहीं करेंगे। अत: राज्य का केवल हिंदुओ के मामले में इस विषय में पडऩा ही उसे पक्षपाती और अन्यायी बना देता है। भारत के राज्यकर्ताओं को इस सत्य की ओर ध्यान अवश्व देना चाहिए कि वे किसी भी प्रकार हिन्दू धर्म के प्रति भेदभाव करने वाले न बने और न दिखें।

इस संबंध में कुछ अन्य तथ्य भी महत्वपूर्ण हैं। पहली बात तो यह है कि एक ओर यह तर्क दिया जाता है कि बाबर या औरंगजेब या किसी भी मुसलमान जागीरदार या राज्यकर्ता ने जो भी तोडफ़ोड़ मंदिरों में किये, वह एक राजनैतिक दुष्कर्म था, उसका इस्लाम मजहब से कोई रिश्ता नहीं था। दूसरी ओर उन सब तोडफ़ोड़ के चिन्हों और अवशेषों की रक्षा मुसलमानों का मजहबी फर्ज बताया जाता है। यह दोनों एक साथ कैसे संभव हैं? अगर बाबर या औरंगजेब या किसी भी मुसलिम शासक ने अपने राज्य में या अपने राज्य से बाहर मंदिरों को तोडऩे सहित कोई भी पाप मजहब के नाम पर किया है तो उस पाप के लिये तौबा करना और माफी मांगना उस मजहब को मानने वाले सभी लोगों के लिये पहला कर्तव्य हो जाता है। तभी वे ऐसे राज्य में रहने के अधिकारी हो सकते हैं जिस राज्य में अन्य समाज भी बराबरी से रह रहे हों।

दूसरी बात यह है कि अगर यह तर्क दिया जाए कि ऐसी हर एक मस्जिद की रक्षा करना मुसलमान का फर्ज है क्योंकि वह कुरान शरीफ में लिखा हुआ है तो फिर यह बहुत वजनदार तर्क हो जाता है। इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इस विषय में कुछ और महत्वपूर्ण प्रश्न और पक्ष उभरते हैं। पहला प्रश्न यह है कि मुसलमान कौन हैं? क्या वे जो कुरान शरीफ को पवित्र ग्रंथ माने और आसमानी किताब माने तथा उसके आदेशों और निर्देशों का पालन सर्वोपरि माने तथा जो हजरत साहब के बताए रास्ते पर चले और वे ही काम करें जो वे उचित ठहरा चुके हैं? इस दृष्टि से ऐसा कोई भी व्यक्ति मुसलमान नहीं माना जा सकता जो मूंछे रखता हो क्योंकि हजरत मुहम्मद ने मूंछे नहीं रखने की हिदायत दी है। इसी प्रकार ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता जो अल्लाह की बनायी हुई इस कायनात में जितनी चीजें हैं, उनकी नकल करता हो अर्थात जो मनुष्यों और पशु पक्षियों आदि की तस्वीर बनाता हो और जो स्वयं अपनी तस्वीर बनाता हो या जो अपनी प्रतिमा बनाता या बनवाता हो। ऐसा भी कोई व्यक्ति मुसलमान नहीं माना जा सकता जो संगीत या नाटक या फिल्मों आदि में मनुष्य या जानवर जैसी तस्वीर बनाये या बनवाये या किसी भी प्रकार प्रकृति की बनी हुई चीजों की नकल करें या उनका चित्रण करें। इसी तरह संगीत और फिल्म की दुनिया में काम करने वाले गायक, नर्तक, नर्तकियां और अभिनेता तथा अभिनेत्री आदि लोग मुसलमान कदापि नहीं माने जा सकेंगे।। अत: वे मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकते और मुसलमान के नाते किसी स्थान पर कोई दावा नहीं कर सकते। केवल सामान्य नागरिक के नाते अपनी बात रख सकते हैं।

इसी प्रकार हजरत मुहम्मत साहब ने कभी भी ईटों या पत्थरों की कोई मस्जिद नहीं बनावायी थी। उनके समय तो ऐसी कोई मस्जिद बनी ही नहीं थी। क्योंकि तब तक अरब में ऐसे कोई भवन थे ही नहीं। इसलिये आधुनिक किस्म का कोई भवन किसी भी रूप में मस्जिद कहा ही नहीं जा सकता और मुहम्मद साहब के उपदेशों तथा उनके कामों तथा कुरान शरीफ में उतरी आयतों में जिसे ईमान नहीं है और जो उनका पालन नहीं करता, ऐसा कोई व्यक्ति मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकता। इस तरह सर्वप्रथम तो यह निर्णय होना आवश्यक है कि भारत में सचमुच में मुसलमान कौन है? और साथ ही यह निर्णय भी होना चाहिए कि ईंट गारे पत्थर आदि से बनायी हुई मस्जिदें मुहम्मद साहब के द्वारा की गयी किस व्यवस्था के अंतर्गत या किस प्रावधान के अंतर्गत मस्जिदें कही जा सकती हैं?

इस्लाम के सभी अनुयायी मानतें हैं कि मस्जिद मजहबी फर्ज के लिये जरूरी जगह है ही नहीं। कुरान शरीफ में और हदीसों में भी मस्जिद को मजहबी फर्ज के लिये अपरिहार्य स्थान नहीं बताया गया है और इसी प्रावधान के अंतर्गत मुसलमानों के समूह पार्कों में या खुली सड़क में या कहीं भी खाली जगह पर या ट्रेनों और बसों में तथा हवाई जहाज में भी नमाज पढ़ते देखे जाते हैं। इसलिये नमाज पढऩे के लिये मस्जिद का होना आवश्यक नहीं है जबकि भगवान की मूर्ति की पूजा के लिये मंदिर का होना आवश्यक है। यहाँ तक कि घरों में भी हिन्दू छोटा सा मंदिर या पूजा का विशेष कक्ष बनाकर उसमें ही मूर्ति की पूजा करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जन्मभूमि स्थल पर किसी भी मस्जिद के होने का आग्रह या दावा एक प्रकार से राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन है। उसका मजहबी फर्ज से कोई रिश्ता नहीं है।

इसके साथ ही यह बात भी स्पष्ट होनी आवश्यक है कि स्वाधीन और सार्वभौम भारतीय गणराज्य में हिन्दुओं को अपमानित करने के उद्देश्य से किये गये पापों को बनाये रखने का आग्रह करना और पाप के उन चिन्हों को बनाये रखने का अपना अधिकार जताना मुसलमानों के लिये किस आधार पर उचित है। मूल प्रश्न यही है। साथ ही सार्वजनिक रूप से इस पर निर्णय होना चाहिये कि यदि किसी भी पंथ के मानने वाले भारतीय नागरिक को अपने ही पंथ की पुस्तक के अनुसार चलने का अधिकार प्राप्त है और उन्हीं पुस्तकों से प्रेरित दण्ड विधान तथा अन्य प्रावधान उन्हें स्वीकार हैं तो फिर हिन्दुओं को भी अपने शास्त्रों के अनुसार जीवन जीने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?

अगर भारत के न्यायालय मुसलमानों की मांग के संदर्भ में उनकी कुरान शरीफ आदि को ही प्रमाणिक संदर्भ ग्रंथ मानते हैं तो हिन्दुओं की मांग के संदर्भ में हिन्दु धर्मशास्त्रों को प्रमाणिक संदर्भ क्यों नहीं मानना चाहिए? संपत्ति, विवाह और उत्तराधिकार तथा दायं भाग के संदर्भ में धर्मशास्त्र ही प्रमाण हैं। अत: हिन्दुओं को भी अपने धर्म शास्त्र के अनुसार आचरण करने का उतना ही अधिकार क्यों नहीं होना चाहिये, जितना गैर हिन्दुओं को प्राप्त है?

यह भी बड़े ही आश्चर्य की बात है कि हिन्दुओं के कुछेक नेताओं ने भांति-भांति के तर्क देकर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि हमारे मंदिर तोड़ कर जो मस्जिदें बनायी गयीं, उनमें से एक-दो या तीन पर हमें पुन: मंदिर बनाने का अधिकार होना चाहिये। यह समझ नहीं आता कि ऐसी मांग किस आधार पर की गयी है क्योंकि पुरातत्व विभाग के जो सर्वमान्य अभिलेख हैं उनमें तीस हजार से अधिक मंदिरों को तोड़कर वहां मस्जिदें बनाने का विवरण हैं। अत: न्याय का पहला आग्रह यह होना चाहिये कि वे तीस हजार मंदिर हिंदुओं को पुन: सौंपे जाये और भारत के मुसलमान उन पापकर्मा लोगों से अपना कोई संबंध न होने की घोषणा करें। यदि ऐसी कोई घोषणा नहीं की जाती तो फिर उन्हें उन सब गलत कामों को अपने ही पूर्वजों द्वारा किये गये काम मानकर व्यापक हिन्दू समाज को शताब्दियों से इस प्रकार निरन्तर अपमानित करने के गुनाह के लिये कुछ तौबा करने और हर्जाना देने का विचार करना चाहिये क्योंकि न्यायसंगत और सामंजस्यपूर्ण जीवन का यही आधार हो सकता है।

शिक्षा और संचार माध्यमों के द्वारा निरन्तर धर्म विरोधी प्रचार को विशेष राजकीय संरक्षण दिये जाने के कारण समाज में एक परिवेश यह बन गया है कि हिन्दुओं को अपने स्वभाविक अधिकारों का स्मरण ही नहीं रह गया है। हिन्दुत्व की बात करने वाले विविध संगठन भी हिन्दुओं की वीरता और गौरव तथा स्वाभिमान और आत्म गौरव का उल्लेख बहुत कम करते हैं। केवल उन पर हुए अत्याचारों का वर्णन करते हैं और अत्याचार करने वाली शक्तियों को मानों अपराजेय और अत्यंत बलशाली बताते हैं जो एक काल्पनिक गाथा मात्र है। क्योंकि इतिहास का तथ्य यह है कि हिन्दू एक अद्वितीय वीर हैं और उन्होंने सदा आततायियों के वध को अपना धर्म माना है। अत: प्रश्न केवल यह बचता है कि क्या यह धर्म अब हिन्दुओं का धर्म नहीं रह गया? और क्या किसी भी राज्य द्वारा हिन्दुओं को स्वधर्म पालन से रोकना उसमें बाधा डालना उचित है?

बहरहाल जब इस विवाद में विश्व में सर्वमान्य परम्परा से हटकर हिंदुओं की श्रद्धा के इस पवित्र स्थान को ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में देखने की एक प्रवृत्ति चलाई जा रही है, तब उस पर एक नजर डाल लेना उचित होगा। यद्यपि सबसे पहले तो यह बात उठानी आवश्यक है कि यदि इस्लाम के संदर्भ में उनके मजहबी लोग और ईसाइयत के संदर्भ में उनके पादरी लोग ही अधिकारी माने जाते हैं तो हिन्दू धर्म से जुड़े किसी भी प्रश्न पर परम्परागत हिन्दू धर्माचार्यों को ही प्रमाण क्यों नहीं मानना चाहिए? इस्लाम और ईसाइयत को क्रमश: मजहब और रिलीजन मानकर केवल हिन्दू धर्म को एक लौकिक और भौतिक विचार की वस्तु बना डालना हिन्दू धर्म के साथ एक भयंकर अन्याय तो हैं ही, स्वाधीन भारतीय गणराज्य में अपने नागरिकों के साथ यह दोहरे मानदण्ड और ऐसा खुला पक्षपात शोभा देता है क्या?

हम सभी जानते हैं कि जन्म स्थल पर हुई खुदाई में इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलें है कि वहां भगवान राम का मंदिर था और इसके भी प्रमाण मिलें हैं कि इस स्थान पर मीर बांकी ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवायी थी। 1528 ईसवी में यह दुष्कर्म किया गया था। छह दिसम्बर 1992 को जो ढंाचा टूटा, उसमें से बीस पंक्तियों वाला जो शिलालेख मिला है उसमें लिखे श्लोक स्पष्ट रूप से यह बताते हैं कि पूर्व में वहां जो मंदिर था और जिसे सालारमसूद ने हमला करके नुकसान पहुचां दिया था, उसका पुनर्निर्माण बारहवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में राजा गोविंद सिंह गढ़वाल जी ने कराया।

स्वयं पुरातात्विक अभिलेखों के अनुसार तथा भारत के पुरातत्व के द्वारा सर्वसम्मति से मान अभिलेखों के अनुसार वर्तमान भारतीय क्षेत्र में मंदिरों को मुसलमानों के एक या दूसरे समूह द्वारा नष्ट करने का प्रमाणिक विवरण बारहवीं शताब्दी ईसवीं से ही मिलता है। वर्तमान क्षेत्र से बाहर अफगानिस्तान से बांग्लादेश तक फैले क्षेत्र में तो और भी पहले से इन पापों के किये जाने के प्रमाण मिलते हैं। तथ्य तो यह है कि किसी समय स्वयं मक्का में एक भव्य शिवालय था और काबा में अभी तक शिवलिंग ही पूजित है भले ही उसे संगे-असवद या संगे-अजवद कहा जाता है। साथ ही तीन महादेवियों सहित तीन सौ साठ अन्य देवी देवताओं की पूजा उस महान शिवालय परिसर में होती थी। वहां मक्केश्वर महादेव या मक्खेश्वर महादेव का मंदिर होने का प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्य भारत में विद्यमान है। इसके साथ ही अरब क्षेत्र में हिन्दू धर्म के प्रचार प्रसार के विपुल ऐतिहासिक साक्ष्य प्राचीनकाल में मिलते हैं। साथ ही समस्त मध्य एशिया शताब्दियों तक पहले हिन्दू और फिर बौद्ध रहा है और भगवान बुद्ध की मूर्तियों को ही अरबों ने बुद्ध या बुत कहा और उसे तोडऩे को ही बुतशिकनी कहा तथा इसे मजहबी फर्ज बताया। इस तरह अरब से लेकर समस्त मध्य एशिया में हिन्दू मंदिरों और बौद्ध विहारों तथा भगवान बुद्ध के श्रीविग्रह को अलग-अलग मुस्लिम समूहों द्वारा तोड़े जाने के प्रचुर साक्ष्य विद्यमान हैं जो मानवता के साथ क्रूर और भयंकर अपराध हैं।

सन् 1611 ईसवी में विलियम फिन्च नामक अंग्रेज उत्तरी भारत में घूमने आया। उसने अयोध्या में भगवान रामचन्द्र के महल के अवशेष देखे और उनका वर्णन किया। उसने अपने विवरण में किसी मस्जिद का उल्लेख नहीं किया जबकि अंग्रेज लोग मस्जिदों के विषय में परिचित रहे हैं। अत: यदि वह मस्जिद देखता तो उसका उल्लेख अवश्य करता। 1634 ईसवीं में थामस हल्र्बट भी भारत आया था और उसने भी एक स्मरणीय महल के अवशेषों का उल्लेख किया था। 1672 ईसवीं में लालदास ने अवध विलास ग्रंथ लिखा जिसमें जन्मभूमि का उल्लेख तो है परंतु मंदिर या महल का उल्लेख नहीं है, इसलिये ऐसा माना जाता है कि उस समय शायद कोई मस्जिद जैसा ढंाचा रहा हो सकता है जो सामान्य दैनिक नमाज की जगह नहीं थी।

1717 ईसवीं में मिर्जा राजा जयसिंह ने जब जन्मभूमि और उसके आसपास के इलाकों को उसके मालिकों से खरीदा तो उन कागजात में वहां एक मस्जिद का उल्लेख है। जेसूइट पादरी जोसेफ टिफेनथेलर 1770 ईसवीं के आसपास अयोध्या आया था और उसने लिखा है कि 1698 से 1707 ईसवी के बीच कभी औरंगजेब ने रामकोट का किला नष्ट करके जन्मस्थल पर एक मस्जिद बनाई। साथ ही उसने यह भी लिखा है कि कुछ लोगों के अनुसार यह मस्जिद बाबर के समय बनाई गई थी।

भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री किशोर कुणाल जो अयोध्या प्रकरण से घनिष्ठता से जुड़े रहे हैं। वे बताते हैं कि उस जगह बाबरी ढाँचे के होने के जो भी अभिलेख पाये जाने का दावा किया जाता है, वे सब के सब अभिलेख वस्तुत: 1813 ईसवी के आस-पास फर्जी ढंग से रचे गये हैं। 15 अगस्त 1947 ईसवी तक उस जगह को जन्मस्थल मस्जिद या मस्जिद जन्मस्थान कहा जाता था और राजस्व अभिलेखों तथा अन्य शासकीय दस्तावेजों में इसे मस्जिद जन्मस्थान ही लिखा गया है। 1897 ईसवी के आस-पास शेख मुहम्मद अजमल अजीज काकोरवी ने लिखा कि बाबरी मस्जिद अवध में जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर बनाई गयी थी। यही बात 1870 ईसवी में फैजाबाद जिला गजेटियर के संपादक एच आर नेवले ने लिखी है कि श्री राम जन्म स्थान मंदिर को बाबर ने नष्ट किया और मंदिर की जगह एक मस्जिद बना दी। यह जन्मस्थान रामकोट में था और यह भगवान राम का जन्म स्थान है। बाबर एक सप्ताह के लिये अयोध्या आया और उसने इस प्राचीन मंदिर को नष्ट कर वहां मस्जिद बनाये जाने का हुक्म दिया।

इस जन्मस्थान पर मस्जिद होने के विरूद्ध सारे ही तर्क भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिबद्ध और समर्पित लेखकों और कलमकारों ने प्रस्तुत किये हैं जिनमें श्री रामशरण शर्मा मुख्य हैं। यह देखते हुये कि संभवत: अठारवीं शताब्दी ईसवीं में ही जन्मस्थल पर मस्जिद का ढंाचा बनाया गया, श्री रामशरण शर्मा जैसे प्रतिबद्ध इतिहास लेखकों ने यह किस्सा रचा कि हिंदुओं के बीच 18वीं शताब्दी के बाद ही यह बात फैलाई गई कि यह मस्जिद का ढंाचा जन्मभूमि स्थल पर है, उससे पहले यह बात नहीं थी, यह बात अत्यधिक हास्यपद है और श्री रामशरण शर्मा जैसे लोग ही इतने बड़े झूठ का दुस्साहस कर सकते हैं। वस्तुत: ऐसा लगता है कि यह ढांचा श्री रामजन्मभूमि पर 19वीं शताब्दी ईसवी में ही कभी तैयार किया गया और निश्चय ही इसमें अंग्रेजी कूटनीति का प्रोत्साहन है क्योंकि किशोर कुणाल का यह कहना एक उच्च पुलिस अधिकारी के पास एकत्रित गोपनीय जानकारी पर ही आधारित होगा कि तथाकथित मीरबांकी या बाबर के द्वारा यहां कोई ढांचा रचे जाने की बात 19वीं शताब्दी ईसवी में गढ़े गये फर्जी अभिलेखों की जालसाजी मात्र है।

यह बात ऐतिहासिक प्रमाणों से पुष्ट होती है कि 19वीं शताब्दी ईसवी में ही कभी यहां अंग्रेजों की शह पर मंदिर के एक हिस्से में कुछ मुसलमानों ने जबरन कब्जा कर नमाज शुरू की जिसकी खबर लगते ही निर्माही अखाड़े के संतों ने उन्हें मार भगाया और उस जगह के सामने डेरा डाल लिया। यह 1853-54 ईसवी की बात है। अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी योजना के अनुसार अचानक बीच-बचाव किया और उस हिस्से को दो भागों में बांटकर एक भाग मुसलमानों को और एक भाग हिंदुओं को सौंप दिया। अंग्रेजी फौज की मौजदूगी में अखाड़े के संत उन मंदिर पर जबरन कब्जा किये बैठे बदमाश मुसलमानों को मारकर भगाने से बचते रहे। परंतु हिन्दू लगातार वहां फिर से मंदिर का पूजापाठ शुरू करने का प्रयास करते रहे जिसे अंग्रेज शासन ने कभी भी अनुमति नहीं दी। इस पर अखाड़े के लोगों ने तथा अन्य लोगो ने वाद दायर की जो अस्वीकार हो गया और यथास्थिति बनाये रखने का आदेश जारी हो गया यह स्थिति बनी रही।

दिसम्बर 1949 ईसवी में उस स्थल पर भगवान श्रीराम और जगत जनिनी सीतामाता की मूर्तियां हिन्दुओं को दिखीं और उन्होंने उनकी पूजा का आग्रह किया। मुसलमानों ने उसका प्रतिरोध किया जिस पर प्रशासन ने उसे विवादित स्थल कहकर ताला जड़ दिया। इसके बाद अनेक समूहों ने अदालत में वाद दायर कर मूर्ति वाले स्थल को मंदिर की तरह पूजा के काम में लाने की अनुमति मांगी। श्री राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रीत्व के काल में उस स्थल में पूजा की हिंदुओं को अनुमति दे दी तबसे जन्मभूमि स्थल पर मंदिर बनाने का आंदोलन चलता रहा और साथ ही अदालती कार्यवाही भी चलती रही। 6 दिसंबर 1992 को आंदेालनकारियों ने धार्मिक उत्साह से भरकर उस ढांचे को तोड़ दिया और श्री रामलला वहीं एक शिविरनुमा मंदिर ने विराजित रहे तथा उस पर ध्वज फहराता रहा।

माननीय न्यायालय के आदेश से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उस स्थल की खुदाई की और वहां भगवान के मंदिर के अनेक चिन्ह पाये गये। कम से कम दसवीं शताब्दी ईसवी में वहां भव्य राममंदिर होने के अनेक चिन्ह और अवशेष मिले परंतु मुख्यत: कम्युनिस्टों ने और उनके उकसाने पर कतिपय मुस्लिम समूहों ने भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के खुदाई के दौरान हिन्दू मंदिरों के अवशेष मिलने के दावों को संदेह के घेरे में लाना शुरू किया जिससे कि स्थिति अस्पष्ट हो जाये और धुंध फैल जाये। 2010 में माननीय न्यायालय ने आदेश दिया कि पौने तीन एकड़ के उस क्षेत्र को तीन भागों में बांटा जाये जिसमें से एक भाग रामलला को मिले, एक तिहाई भाग निर्मोही अखाड़े को मिले और एक तिहाई भाग सुन्नियों को मिले। उसके विरूद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपील लंबित है।

कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने मुसलमानों के पक्ष में तथा हिंदुओं के विरूद्ध 20वीं शताब्दी के आरंभ से जारी अपने अभियान के अंग के रूप में जन्मभूमि स्थल को विवादित बनाने के लिये कई उछलकूद किये हैं और झूठ का जाल बिछाया है। पहला तर्क तो उन्होंने यह दिया कि अयोध्या कोई तीर्थ स्थल रहा ही नहीं है और इसमें उन गोस्वामी तुलसीदास को साक्षी बनाने की कोशिश की जिन्होंने स्वयं अयोध्या पुरी को ही परम पवित्र तीर्थ के रूप में स्वयं भगवान श्रीराम के मुख से प्रतिपादित किया है – ‘पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि।।’

तथ्य यह है कि कोई भी कम्युनिस्ट लेखक या तथाकथित इतिहासकार भारत में संस्कृत का विद्वान नहीं है और उसने संस्कृत की परम्परा में कोई अध्ययन नहीं किया है अत: वह प्रचीन इतिहास के विषय में और धार्मिक विषयों मे अनधिकारी है। तैत्तिरीय आरण्यक में तथा महाभारत में वनपर्व में अयोध्या की महिमा गायी गई है। अग्निपुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में भी इसकी महिमा बताई है। वायु पुराण तथा पद्म पुराण में भी अयोध्या का महत्व बताया है और 16वीं शताब्दी ईसवी के धर्मग्रंथ तीर्थप्रकाश में भी अयोध्या को एक पावन तीर्थ कहा गया है। अयोध्या का महत्व इसलिये भी है कि यहां स्वयं मनु ने अपनी राजधानी बनाई थी, अत: यह प्राचीनतम राजधानी है और सर्वमान्य तीर्थ है।

अरबी, फारसी के अध्येता और उसको ही मूल प्रमाण मानने वाले कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने 19वीं शताब्दी ईसवी के किसी पारसी ग्रंथ का हवाला देते हुये बताया है कि बाबरी मस्जिद सीता की रसोई के बगल में थी जो कि रामजन्मभूमि का हिस्सा है। यह उल्लेख देते हुये कम्युनिस्टों का तर्क है कि वह सीता की रसोई पर बनी मस्जिद अलग है जिसे हिंदुओं ने तोड़ा था और वहां मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाया तथा यह जन्मभूमि मस्जिद अलग है। स्पष्ट है कि यह केवल शब्दों का वितंडा है जबकि उक्त पारसी ग्रंथ का नाम भी आजतक नहीं बताया गया है। मुख्य बात यह है कि इस ढांचे को बाबरी मस्जिद केवल मुसलमान लोग कहते रहे हैं, राजस्व अभिलेखों में इसे जन्मभूमि मस्जिद कहा गया है और हिन्दू इसे सदैव से श्रीरामजन्म भूमि ही कहते रहे हैं।

एक तर्क कम्युनिस्टों ने यह दिया है कि उस पारसी ग्रंथ में लिखा है कि विवाद श्री रामजन्मभूमि पर को लेकर नहीं हनुमान बैठक को लेकर है। एक तो सभी भारतीय संदर्भ छोड़कर किसी पारसी संदर्भ को एकमात्र प्रमाण मानना मनोरंजक है परंतु साथ ही ये कम्युनिस्ट विद्वान यह देखने में असमर्थ हैं कि इससे केवल यह पता चलता है कि हनुमान गढ़ी या हनुमान फाटक पर भी कोई मस्जिद बनाने का प्रयास मुसलमानों ने किया था।

महत्व की बात यह भी है कि अनेक मुस्लिम लोग भी कम्युनिस्टों के तर्कों का बड़े जोश से सहारा लेते हैं परंतु वे कम्युनिस्ट तर्कों को अपनी सुविधा से ही अपनाते और छोड़ते हैं क्योंकि अगर वे कम्युनिस्टों के तर्क को पूरी तरह स्वीकार कर लें तो उनके वे सभी तथाकथित बादशाह जिनकी महिमा वे गाते हैं, वे सब केवल डाकू और लुटेरे सिद्ध होंगे क्योंकि कम्युनिस्ट उन्हें धन के लोभ में मंदिरों को लूटने और सोने चांदी की मूर्तियां लूटकर गलाने का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। जिससे कि मुसलमानों का यह दावा कि उनके बादशाहों ने मूर्ति पूजा रूपी कुफ्र को समाप्त करने के लिये मंदिर तोड़े, झूठा सिद्ध हो जाता है और उनके द्वारा सब प्रकार से सराहे गये और जय जयकार किये गये तथाकथित बादशाह केवल सोने चांदी और धन दौलत के पागलपन से भरे लोभ में लूटपाट और तोडफ़ोड़ कर रहे डाकू और लुटेरे ही सिद्ध होते हैं। अत: कम्युनिस्टों का तर्क स्वीकार करने वाले मुस्लिम नेताओं को स्वयं में यह स्पष्ट कर लेना चाहिये कि वे कम्युनिस्टों का तर्क मानते हैं या मजहब का पक्ष मानते हैं?

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव के समय केन्द्रीय शासन ने अयोध्या पर एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया था जिसमें लिखा था कि दिसम्बर 1949 से 6 दिसम्बर 1992 तक कभी भी यह ढंाचा जो टूटा है, वह मस्जिद के रूप में प्रयोग नहीं हुआ और इसे कभी भी बाबरी मस्जिद नहीं कहा गया अपितु जन्मभूमि मस्जिद ही कहा गया तथा कई बार यह रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद भी कहा गया। इसके पूर्व 19 जून 1950 को स्थानीय अदालत ने आदेश दिया था कि कोई भी व्यक्ति या कोई सरकारी कर्मचारी भी वहां पर चल रही पूजा अर्चना को किसी भी प्रकार से अवरूद्ध नहीं करेगा। मुसलमानों ने इसकी अपील सिविल जज के यहां की। अपील का निस्तारण करते हुये फैजाबाद के सिविल जज ने 15 मार्च 1953 को लिखा कि – कम से कम 1936 ईसवी से मुसलमानों ने इसे कभी भी मस्जिद की तरह इस्तेमाल नहीं किया और यहां कभी नमाज नहीं पढ़ी गयी जबकि दिसम्बर 1949 से हिंदू लोग यहां नियमित तौर से पूजा अर्चना कर रहे हैं।

इस प्रकार सभी ऐतिहासिक साक्ष्य श्री रामजन्भूमि पर एक भव्य मंदिर होने के पक्ष में और उस मंदिर को किसी समय तोड़े जाने के संबंध में तथा 17वीं या 19वीं शताब्दी में कभी वहां छल से कोई नमाज वगैरह पढ़ देने के संबंध में हैं। इस तरह उसे पवित्र जन्मस्थल में एक भव्य राममंदिर का निर्माण भारत के लोकतांत्रित गणराज्य में सहज स्वभाविक रूप से होना चाहिए।

भारत की वर्तमान में मुख्य समस्या है एक धर्मशून्य राज्य व्यवस्था। वर्तमान राज्य व्यवस्था इस अर्थ में धर्मशून्य है कि वह स्वयं में अपने ही द्वारा घोषित प्रतिमानों का निष्ठापूर्वक पालन नहीं करती। उदाहरण के लिये अल्पसख्यकों की संस्कृति और उनके मजहब या रिलीजन की रक्षा का प्रबंध शासन करता है परंतु बहुसंख्यकों के धर्म के संरक्षण का कोई भी प्रबंध नहीं करता। इसीलिये तो राम मंदिर जैसे सर्वमान्य धर्मसंबंधी केन्द्र को लेकर भी शासन निष्क्रिय है और उस पर अन्य पंथों के दावे होने देता है जबकि अल्पसंख्यकों के किसी भी केन्द्र पर बहुसंख्यकों का दावा जताने की अनुमति पंथनिरपेक्ष शासन के नाम पर नहीं देता। यह किसी पंथनिरपेक्ष शासन का लक्षण नहीं है अपितु अल्पसंख्यक सापेक्ष और धर्मविरोधी शासन का लक्षण है। यदि भारत का राज्य अपने कर्तव्य का पालन निष्पक्षता से करने का निश्चय कर ले तो भव्य राममंदिर की प्रतिष्ठा सहज ही हो जायेगी। इसलिये धर्मनिष्ठ और न्यायनिष्ठ राज्य तथा भव्य राममंदिर परस्पर सम्बद्ध हैं।