बूंद बूंद की चिंता

बूंद बूंद की चिंता

जवाहरलाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अब जेठ का महीना आ गया है। तपती दोपहरी कितनी त्रासद होती है इस का अनुभव दिल्ली जैसे महानगरों में रहने वालों को होगा ही। लेकिन वर्षा का महत्त्व समझने वाले राजस्थान के लिए वर्षा से पहले की वह तपन, चाहे कितनी ही झुलसाने वाली क्यों न हो, आकाश से पानी बरसने की पूर्व सूचना ही होती है। राजस्थान में इसे ओमगोम कहते है, जब वहां रेतीली आंधियां आती हैं और शहरीकरण के प्रतीक नगरों का जन-जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। अनुपम मिश्र की पुस्तक राजस्थान की रजत बूंदें के अनुसार जेठ वहां त्रासद नहीं है। ‘मरुभूमि में जेठ को कोई नहीं कोसता। चरवाहे, ग्वाले जेठ के स्वागत में गीत गाते हैं और कबीर की षैली में साई को जैठ भेजने के लिए धन्यवाद देते हैं। जेठ महीनो भला आयो !’ वहां पानी का बरसना जीवनधारा का बरसना है और पालर पानी यानी बरसने वाले पानी की हर बूंद प्रसाद के समान है। कोई बूंद व्यर्थ न जाए, यही हर व्यक्ति का धर्म रहा है। प्राचीन भारत में पानी को संरक्षित रखने की संस्कृति का सजीव उदाहरण राजस्थान ही रहा है। जेठ ठीक तरह तपे नहीं, रेत के अंधड़ उठें नहीं तो जमानो (मौसम) अच्छा नहीं होता। प्राचीन भारत में पानी चाहे वर्षा का हो, चाहे भूमि के भीतर से निकले या तालाबों में खड़ा हो, सही ढंग से सम्भाला नहीं जाए तो वह नासमझ के हाथों में धन की तरह चार दिन रह कर कंगाली को ही जन्म देगा। पानी को संचित करना जहां धर्म था, वहीं वह एक अर्थशास्त्र भी था। भारत जैसे विशाल देश में कहीं पानी कम बरसता है तो कहीं बहुत अधिक बरसता है, कहीं मरु प्रदेश है तो कही झीलों और नदियों की प्रचुरता। स्वाभाविक है कि पानी का प्रबंधन अलग अलग प्रकार का होगा। प्रबंध के तौर तरीके भिन्न भिन्न होंगे लेकिन दर्शन तो एक ही है कि पानी को सम्भालना जन जीवन को सम्भालना होता है, उसे व्यर्थ जाने देना, जन जीवन को संकटग्रस्त करना है। स्वाभाविक है कि भारतीय समाज ने जल संरक्षण की बहुआयामी प्रबंधन षैली विकसित की थी।
वर्षा हमारे लिए जल का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत रहा है। वर्षा का पानी मुख्य तौर पर नदियों के रूप में भी बहता है। जहां प्रचुर मात्रा में नदी स्रोत उपलब्ध थे, वहां सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि नदी का अधिकतम उपयोग कैसे किया जाए। तटबंध भारत में कोई नई तकनीक नहीं है। नदियों को मर्यादाओं में बांधने की आवश्यकता सभ्यता के आदिम दौर से ही रही है। लेकिन तटों को बांधने का एक परिणम यह भी निकलता है कि वर्षा के पानी को स्वतंत्र रूप से बहने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। कुछ पानी बांधों के कारण ही गड्डों में भर जाता है। इस जल भराव के कारण ही कालांतर में दलदली भूमि का विकास होता है। इसलिए जल प्रबंधन का अर्थ केवल नदियों को मर्यादा में रखने के लिए बांधना ही नहीं, इसके कारण होने वाले जल भराव को भी समाज के लिए उपयोगी साधन में परिवर्तित करना भी है। दलदल और झीलों के इस सिलसिले को प्राचीन भारतीय अस्वाभाविक नहीं मानते थे और इन जलभंडारों का समुचित उपयोग करने के तरीके विकसित करते रहते थे। दलदली भूमि और झीलों का उपयोग न केवल भूजल के स्तर को सुरक्षित रखने का एक साधन था अपितु जलोपज के विपुल भण्डार से स्थानीय समाज के लिए खाद्य पदार्थों की उपलब्धि भी हो जाती थी। तटबंध बनाने के बावजूद नदियों को मर्यादा में रखना हर बरसात में संभव नहीं रहता था, वे अपने तटों को लांघ ही जाती थी। इसलिए नदियों के साथ साथ तालाब या सर बनाने की तकनीक विकसित की गई। नदी घाटियों में सरों का यह सिलसिला नदी के अतिरिक्त पानी को अपने पास सुरक्षित रखने का एक सरल उपाय था। कई नदियों के किनारे तो सरों की लम्बी श्रृंखलाएं बनती थी। कुछ विद्वानों के अनुसार सरस्वती नदी का नाम सरसवती शब्द से विकसित हुआ था यानी सरों वाली नदी। तीसरा उपाय था नदियों का उदर षोधन। नदी एक प्राकृतिक संरचना है और हर प्रकार की प्राकृतिक संरचना चाहे मनुष्य हो, वन हो या नदियां, प्राकृतिक कारणों से ही उनकी गति में अवरोध आते रहते हैं। नदियों में पर्वतों से कट कर मिट्टी तल पर बैठ जाती है। कालांतर में वह इतनी हो जाती है कि नदी या तो तटों को लांघने पर विवश हो कर बाढ़ जैसे संकटों का कारण बनती है या मार्ग बदल देती है। समय समय पर नदियों से इस अनावश्यक मिट्टी को निकालना होता है जिसे आज की भाषा में ड्रजिंग कहते है। लेकिन प्राचीन समय में भी नदियो की सफाई का यह काम होता रहता था। राजतरंगिनी में राजा अवंतीवर्मन और ब्राह्मण सूर्या का वृतांत दिखाता है कि किस प्रकार हमारे समाज ने आधुनिक युग के आगमन से बहुत पहले ही कितनी कुशल ड्रजिंग की थी। इसके कारण कश्मीर घाटी को बाढ़ की विपदा से मुक्ति मिली और वितस्ता और सिंध नदियों को नियंत्रित करने से कई नए क्षेत्र भी पानी के नीचे से निकल आए। इनमें एक क्षेत्र आज सोपोर (सुयापुर) नाम से जाना जाता है।
ल्ेकिन जल प्रबंधन का कौशल तो वहां निखरता है जहां पानी ही कम बरसता हो। प्रचुरता में प्रबंधन तो बहुल को समेटने की कला है, प्रबंधन तो उसे कहते हैं जहां कण कण का, बूंद बूंद का महत्त्व हो। अभाव में भाव पैदा करना ही वास्तविक प्रबंधन होता है। हमारे देश में राजस्थान का विशाल मरू प्रदेश इस का उदाहरण है जहां बादल की हर गतिविधि पर समाज की दृष्टि होती है, उसकी हर छोटी बड़ी लीला का नाम और अर्थ होता है। बरसात में पानी की पहली बूंद का पहला नाम ही हरि रखा गया है। शायद महाभारत काल में भगवान कृष्ण के उस वरदान की स्मृति में जिसमें उन्होने कहा था कि भले ही पानी कम बरसे, पानी का अभाव इस क्षेत्र को कभी नही होगा। हरि की यह बूंद ही आगे जाकर मेघपुहुप यानी बादलों के पुष्प के नाम से जानी जाती है। स्वाभाविक है जिस वर्षा को समाज इतने प्यार और सम्मान से देखता है उसको व्यर्थ जाने देना वह पाप मानता है। जितने नाम बादलों और उससे बरसने वाली बूंदों के हैं उतने ही प्रकार जल को सहेज कर रखने के भी हैं। लेकिन इस जल प्रबंधन के लिए समाज ने किसी राजा की पहल की प्रतीक्षा नहीं की। समाज ने अपना ही एक कौशल विकसित किया जिसे अपना धर्म मान कर वह उस पर चलनेे लगा। राजस्थान में भले ही लगभग बीस राजे रहे हों और प्राय: आपस में लड़ते रहे हो, जल प्रबंधन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
कुआं हम सबने सुना देखा हैं, लेकिन राजस्थान में इसकी भगनी कुईं भी होती है। दोनों में केवल लिंग का ही अंतर नहीं, स्वभाव ओैर कार्य का भी है। कुओं में तीस चालीस हाथ नीचे पानी आता था, लेकिन अक्सर खारा होता था। राजस्थान का बहुत सा भूभाग केवल रेतीला ही नहीं, नमकीन भी है। इसीलिए प्रदेश में कई नमक की झीले हैं जिनमें बाकायदा नमक की खेती होती है। लेकिन लोगों ने लम्बे अनुभव के बाद देखा कि कही कही वर्षा का पानी एकदम नीचे नहीं जाता। रेत में तो पानी तुरंत नीचे चला जाता है और यदि वह रुक रुक कर जा रहा है तो कहीं अड़चन है। कहीं-कहीं रेत की परत के नीचे खडिय़ा पत्थर की परतें होती हैं। ये परतें दूर दूर तक जाती हैं और जब वर्षा का जल नीचे आता है तो रेत के बदले पत्थर की परत मिलती है और उसे रुकना पडता है। यहां से पानी खारे जल में नहीं मिल पाता, मीठा ही रहता है। कुईं इसी पानी को समेटने के लिए बनाई जाती है।
ल्ेकिन जो पानी खेतों में नही, घरों में पड़ता है, उसका क्या होता है? आज रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर दिया जाने लगा है लेकिन राजस्थान के पानी की भंडारण कला उससे काफी आगे थी। यहीं कई प्रकार के नाम आते हैं, कुंड, कुंडी और टांका। कुंडी घरों में बनती है। पहले चूनेगारे से बना एक आंगन बनाया जाता है जिसमें थोड़ी ढाल हो। कुंडी बनाने में इतनी सावधानी बरती जाती है कि उसमें से एक बूंद पानी भी न रिसने पाए, जो कि आज की इंजीनियरिंग के लिए भी दुरुह काम है। कुंडी का मुंह ढंक कर रखा जाता है। प्राय: इसके ऊपर एक गुम्बद बनाया जाता है जोकि सुंदर लगे। कुछ कुंड बहुत बड़े होते हैं और गहरे भी, जिनसे पानी चरखी से ही निकाला जा सकता है। ये निजी भी हो सकते हैं और पंचायती भी। टांका छत के पानी को रोकने और सुरक्षित रखने के लिए होता है। टांके का आकार छत के आकार के अनुरूप ही होता है। प्राय: ये किसी कमरे या बैठक के नीचे होता है। कई कुंड और टांके इतने बड़े होते थे कि पचास हजार लीटर पानी समा सकता था। सब से आश्चर्यजनक खोजी विवेक तो खारी भूमि पर पडऩे वाले पानी को समेटने और खारा होने से रोकने में दिखता है। राजस्थान के उस क्षेत्र में जहां पानी ही नहीं भूमि भी खारी है, जहां नमकीन झीेलों के अतिरिक्त पानी का भण्डारण असंभव माना जाता था, लेकिन वहां भी कुछ तलाई बनाए गए थे जिनमें पानी खारा नहीं होता था। इन क्षेत्रों में भूमि की ऊपर वाली परतें ही खारी नहीं, खडिया पत्थर के नीचे ऊपर हर स्तर पर खारापन ही है। वहां भूमि से कुछ फीट ऊपर एक ऐसा ताल बनाया जाता है जिसमें वर्षा का पानी बिना खारी भमि से सम्पर्क के ही सीधे पड़े। वहीं उसे पूरे साल सुरक्षित रखा जाता है। न बाहर का पानी अंदर आ पाता है और न ताल की कोई बूंद बाहर रिसती है।