बाहुबली : एक घायल सभ्यता का सिने रूपांतरण

बाहुबली : एक घायल सभ्यता का सिने रूपांतरण

विनय झा
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
बाहुबली फिल्म का कथानक काल्पनिक है। महाभारत के अपाहिज धृतराष्ट्र और दुष्ट दुर्योधन से लेकर 19वीं शती के पिण्डारी सहस्रों वर्षों की असम्बद्ध सी लगने वाली घटनाओं की खिचडी बनाकर राजामौली ने जो कुछ भी बनाया है उसे ऐतिहासिक फिल्म मानने में अधकचरे इतिहासकारों को एतराज होगा, किन्तु जिस प्रकार महाभारत में वेदव्यास जी ने करोडो वर्षों के इतिहास को एक ही ग्रन्थ में समेटने का कार्य किया उसी प्रयास को लघु स्तर पर राजामौली ने किया महानाट्य का सिने नाटक बनाकर। महाकाव्य तो आपने सुना होगा, महानाट्य सुना है?
सतही तौर पर कथानक काल्पनिक है, किन्तु इस कथानक के पीछे जो संस्कृति, जो इतिहास-दृष्टि और जो दर्शन है वह पूर्णतया ऐतिहासिक और प्रामाणिक है। कला तो कल्पना से ही निकलती है, किन्तु कल्पना जब सर्जनात्मक हो जाय तो जागती आँखों से भी जो न दिखे उस सच्चाई को उकेरकर सामने रख देती है। पश्चिम की अन्धी नकल करने वाली तथाकथित आधुनिक, अभिजात सभ्यता ने जिस भारतीय संस्कृति को कालीन के नीचे दबा दिया था, राजामौली ने उसे निकालकर बॉलीवुड के मुँह पर एक जोरदार तमाचा मारा है। एक डब की हुई फिल्म ने हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध नायकों, गायकों और गीतकारों का सहयोग लिए बिना और अश्लीलता से दूर रहकर भी बॉलीवुड के बॉक्स ऑफिस के चालू फॉर्मूलों को धराशायी कर दिया।
राजामौली ने बहुत पुण्य किये थे जिस कारण उनको अंत:प्रेरणा ने धोखा नहीं दिया और जिस इतिहास को खोजने में सारे विषविद्यालय (?) थक गए उसे फण्टासी के परदे पर दिखाने में वे सफल रहे। सहस्र वर्षों से घायल सभ्यता के घावों को भरकर उसके स्वस्थ रूप को सामने लाने का उद्योग किया। भविष्य के उस नवभारत का पथ प्रशस्त करने के लिए जो आजकल नवजागरण की अंगडाइयाँ ले रहा है। यह फिल्म उसी नवजागरण का हिस्सा है, कह रहा है — उठो सौ करोड बाहुबलियों, गाण्डीव सम्भालो और धर्म की रक्षा करो।
तकनीक के मामले में भी यह फिल्म हॉलीवुड के सबसे मँहगे फिल्मों समकक्ष है, बॉलीवुड के फिल्में तो इसके समक्ष कुछ भी नहीं हैं। केवल पैसा खर्च करने से अच्छी तकनीक नहीं मिलती, तकनीक के विशेषज्ञ और उन विशेषज्ञों के पारखी चाहिए। कैमरा हाथ में हो तो नौसिखिया भी फोटो खींच सकता है, किन्तु यथार्थ की हूबहू नकल करने वाले फोटो या वीडियो को कला नहीं कहा जाता, कला तो तब है जब नवीन तथा अपूर्व अर्थ की सर्जना होती है जिसे मीमांसा की भाषा में यज्ञ-फल कहा जाता है। ऐसी सर्जना में अक्सर भीतरी यथार्थ को सामने लाने के लिए बाहरी यथार्थ को कल्पना का सहारा लेकर नए सिरे से व्यवस्थित किया जाता है। बॉलीवुड के अधिकाँश सुपरहिट फिल्में भी इस मामले में बहुत पीछे हैं, वे तो प्रयास भी नहीं करते क्योंकि उनकी कल्पना फॉर्मूले पर चलती है, सर्जनात्मक नहीं होती।
Bahubali2अधिकाँश लोग रूमानियत या रोमाण्टिसिज्म का अर्थ रोमांस मानते हैं किन्तु कला-समीक्षा के क्षेत्र में इसका अर्थ कल्पनाशीलता की ऐसी निर्बाध उडान जो किसी भी शास्त्र या कानून का बन्धन न माने और हृदय की भावनाओं के अनुसार बह निकलने के लिए सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हो। इस पूर्वपक्ष को सम्भालने वाला उत्तरपक्ष है शास्त्रीय या क्लासिकल कला जो परम्परा की कसौटी पर खरा उतरने वाले शाश्वत नियमों पर आधारित रहे। शास्त्रीय पक्ष कला की सनातन परम्परा पर आधारित नियम बनाता और लागू करता है ताकि कला अपने धर्म का त्याग न करे, तो रूमानी पक्ष सारे बन्धनों को तोडकर मानवीय मेधा को अनन्त में फैलने का विस्तार देता है जो शास्त्रों को भी नियमों में संशोधन करने के लिए विवश कर दे। एक पक्ष कला का धर्म है तो दूसरा पक्ष उसी धर्म का विस्तार है। दोनों द्वन्द्वों में सन्धि या संश्लेषण काव्य के क्षेत्र में जब होता है तो महाकाव्य कहलाती है।
महाकवि वह है जो अपनी निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति के कूपमण्डूकी स्तर से ऊपर उठकर गम्भीर समस्यायों से त्रस्त मानव जाति या राष्ट्र के हृत-स्पन्दनों को सम्प्रेषित करने में सक्षम हो और कलात्मक तरीके से राष्ट्र की मौलिक समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करे। महाकाव्य किसी राष्ट्र के जीवन में तभी उत्पन्न होता है जब राष्ट्र को उसकी अत्यन्त आवश्यकता होती है। जब राष्ट्र अपने अस्तित्व के लिए जूझता है और आगे पग बढ़ाने की नयी जमीन तलाशता है। निषाद के हाथों साथी के मारे जाने पर क्रौंच पक्षी के रूदन से हृदय व्यथित हो, दूसरे का दु:ख जब इस तरह अपना दु:ख लगे कि उसमें दूसरेपन का आभास तक न हो, तब कवि पैदा होता है और इस दुखानुभूति में सक्षम उस कवि का निजी अहम् जब राष्ट्र के विराट पुरुष में घुलकर विलीन हो जाय और राष्ट्र की समस्याओं एवं भावनाओं को निजी समस्याएं और निजी भावनाएँ स्वाभाविक रूप से अनुभूत करे तब महाकवि पैदा होता है। महाकवि अपने-आप नहीं टपकता, राष्ट्र का विराट पुरुष संकटों के घनीभूत होने पर उनके समाधान हेतु महाकवि, महानायक, महापुरुष पैदा कर देता है। आज भारत उसी मोड़ पर है, बहुत से महापुरुष शीघ्र ही आने वाले हैं। बाहुबली फिल्म में अनेक कलात्मक खामियाँ हैं, किन्तु उन सबके बावजूद यह फिल्म इस बात का संकेत है कि भारत का राष्ट्रपुरुष अब उठकर खड़ा होने के लिए बैचेन ही नहीं, लगभग सक्षम भी है। इस फिल्म को देखकर लगता है कि भारत के फिल्म उद्योग में केवल छद्म-सेक्युलर और धर्मविरोधी ही नहीं हैं, हिन्दू भी हैं।
इस फिल्म की एक मात्र खामी यह है कि सच्ची कला की कमी को तकनीक से पाटने का प्रयास किया गया है, यद्यपि तकनीक थोपी हुई नहीं लगती और आरम्भ से अन्त तक दर्शक को बान्धकर रखती है। हर निर्देशक गुरुदत्त तो नहीं बन सकता, और हर गुरुदत्त वेदव्यास नहीं बन सकता। बाहुबली का राजामौली बीच में कहीं है, किन्तु मुझे लगता है कि रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्यों को फिल्माने के लिए रामानन्द सागर से अधिक सक्षम राजामौली हैं।
कल्पना सर्जनात्मक तब बनती है जब कलाकार अपने भीतरी यथार्थ की अभिव्यक्ति का ईमानदार प्रयास करता है और इसकी चिन्ता नहीं करता कि इस प्रयास का दूसरे लोग कैसा भाव लगाएंगे। किन्तु जब किसी कृति का अस्तित्व दूसरों द्वारा मूल्यांकन पर टिका हो, जब यह खतरा हो कि आर्थिक असफलता मिलने पर फिल्म के निर्माता का पूरा जीवन बर्बाद हो सकता है, फिर भी वह बड़े बजट की महत्वाकांक्षी फिल्म प्रयोगवाद पर आधारित करे तो धन्यवाद का ही पात्र नहीं है बल्कि दर्शकों के सक्रिय सहयोग का भी हकदार है। इस प्रकार की फिल्में बनाने का सामथ्र्य और साहस राजामौली जैसे लोग भविष्य में भी करते रहें।