बात दही भात की

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जवाहर लाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
किसी दक्षिण भारतीय ढाबे में बहुत लोग दही भात खाते हुए दिख जाते हैं। दक्षिण के राज्यों में यह आम बात है। दही चावल उत्तर भारत में भी खाया जाता है, लेकिन कुछ विषेष अवसरों पर जैसे पेट भारी हो या खराब हो। लेकिन दोनों बातों में कोई विरोधाभास नहीं है। भारत में प्राचीन काल से दही को दस्त रोकने का इलाज माना जाता है। कई तरह की बीमारियों के लिए इससे लोगों ने अनेक तरह के व्यंजन बनाए हैं, जैसे कढ़ी या छींट, लस्सी या दही में पकाया गया पतला भात। लेकिन क्या चावल के ये गुण आधुनिक चिकित्सा में भी मान्य है? क्या चिकित्सा विज्ञान ने पता लगाया है कि इन दावों में कितना दम है? यदि इन दावों में दम है तो वे क्या कारण हैं जिनसे चावल या दही मिल कर या अलग-अलग रह कर विभिन्न रोगों का उपचार कर सकते हैं?
अनुभव में तो यही आता है कि आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सक बेचारे चावल के कई दुर्गणों को तो गिनाते हैं, परंतु इसके गुणों के बारे में या तो वे जानते नहीं हैं या जानबूझकर अनजान बनते हैं। आज कल तन का ताप घटे न घटे, तन का भार घटाने का बड़़ा बाजार विकसित हो गया है। और बेचारे चावल को सबसे बड़ा गुनहगार माना जाता है। अमेरिका के ड्यूक विष्वविद्यालय मेडिकल सेंटर के वाल्टर केंपनर ने उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारियों के लिए एक राइस डाइट बनाया। उस समय डाक्टर केंपनर को नहीं पता था कि इससे जो सफलता उन्हें मिल रही है, उसके पीछे कारण क्या है? कौन से वैज्ञानिक तत्व हैं जो ऐसा करते हैं? दूसरे विज्ञानी मानते थे कि चावल केवल दूसरे सोडियम बढ़ाने वाले तत्वांे को रोक भर लेता है और रोगी का भार कम करता है। इन कारणों से ही उसका रक्तचाप कम हो जाता है। यह 1940 की बात थी, लेकिन कुछ साल पष्चात यह भी पता लगा कि चावल की भूसी के कारण अंतड़ियों के कैंसर को रोकना संभव है। वर्ष 1981 में तो जापान की एक कम्पनी ने आंतरिक गांठ (ट्यूमर) का उपचार करने के लिए दो औषधियों का पेंटंट करवाया। इनका विकास चावल की भूसी से निकाले गए एक रसायन से किया गया था।
छोटे बच्चों को डायेरिया से बचाने के लिए चावल का प्रयोग तो शताब्दियों से होता रहा है। बांग्लादेष में बच्चों में डायेरिया का रोग अक्सर महामारी का रूप धारण करता रहा है। लेकिन कुछ वर्षों से इसको काबू करने का एक नुस्खा चिकित्सा अधिकारियों के हाथ लगा है। और यह कारगर नुस्खा और कुछ नही, चावल के पानी से बनी एक औषधि ही है। डायरिया रोग के लिए बने अंतर्राष्ट्रीय संस्थान ने चावल और नमक को विषेष अनुपात में मिला कर इसे तैयार किया है। दस्त के लिए चावल का उपयोग भारत और उसके आसपास के सभी देषों में पारंपरिक उपचार के रूप में इस्तेमाल तो पुराना है लेकिन चावल गुर्दें की भी कई बीमारियों का इलाज है, यह नई बात है। इसमें चावल की भूसी को काफी लाभदायक पाया गया है। गुर्दें में पत्थर बनने की प्रक्रिया को रोकने के लिए भूसी का नियमित प्रयोग होना आवष्यक है। लेकिन इन अनुसंधानों के बावजूद यह मानना होगा कि चावल जितना महत्त्वपूर्ण खाद्य है उस मात्रा में इस पर आधुनिक विज्ञान का ध्यान कम ही गया है। जिन देषों में यह आम लोगों का खाना है वहां भी इस पर वैज्ञानिक अनुसंधान पर्याप्त नही हुआ है।
भारत में लगभग साढ़े पांच सौ प्रजातियों के चावल पाए जाते हैं। उनमें कुछ तो लगभग लुप्त हो चुकीे हैं और शेष भी खतरे के दायरे में आ गई हैं। आधुनिकीकरण की दौड़ में हमने चावल की प्रजातियों का बहुत बड़ा जीन बैंक गंवा दिया है। हर प्रजाति की अपनी विषेषता रहती है और औषधीय गुणों में भी हर प्रजाति की गुणवत्ता अलग ही होती है। जिन्हें हम पर्वों के लिए उपयुक्त चावल मानते हैं उनकी औषधीय विषेषताओं के कारण ही यह धारणा बनी है। सांवा जैसे आदिम युग के चावलों की तुलना में नए बासमती और महंगे चावलों की औषधीय विषेषताए बहुत कम होती है। अमेरिका और कनाडा में भी आदिवासियों की शारीरिक सुदृढ़ता के पीछे इसी प्रकार का चावल हुआ करता था जो स्वाभाविक रूप से ही उगता था और हमारे सावां जैसा ही होता है। इसलिए जब दक्षिण में दही भात का चलन आरम्भ हुआ होगा तो उसके पीछे भी यही अनुभव रहा होगा कि दोनांे के मिलान से सर्वसाधारण को एक सहज प्राप्य और सुपाच्य आहार उपलब्ध होता है।
चावल की तुलना में दही, जिसे पष्चिम में योगर्ट कहा जाता है, पर अधिक ध्यान गया है। दरअसल दही का रिष्ता बाइबल के एक नायक से जुड़ जाने के कारण इस खाद्य पर पष्चिमी विज्ञानियों का ध्यान जाना स्वाभाविक भी था। अब्राहम प्राचीन यहूदी दौर के बड़े नायक थे। बताया जाता है कि देवदूत ने ही स्वयं उन्हें बताया था कि दही दीर्घ आयु की औषधि है। घुम्मकड़ यहूदियों के लिए दही का महत्त्व तो था ही क्योंकि बनजारों के लिए दूध को सम्हाल कर रखना संभव नहीं होता, उसको मक्खन, पनीर और दही में बदलकर इस्तेमाल करने की मजबूरी रहती थी। इसलिए दही विभिन्न कालखण्डों में मानव जाति का लोकप्रिय भोजन रहा है। लेकिन यह भी तब तक परंपराओं के बल पर ही चलता रहा जब तक कि पिछली सदी में पास्चर इन्सटिट्यूट के डाक्टर इलियास मैचनिकोफ ने अपने अनुसंधान के आधार पर इसे दिल के रोगों और आम कमजोरी के लिए रामबाण औषधि घोषित नहीं कर दिया।
दूध को दही में परिवर्तित करने वाले बैक्टीरिया लैक्टोबैसिली के कारण ही उसका विषेष स्वाद होता है। यही बच्चांे में दस्त और पेट के अन्य रोगों को रोकने का काम करता है। यात्राओं के दौरान कुछ लोगों को डायेरिया की षिकायत होती है, इसका कारण एक विषेष प्रकार का रोगाणु ई.कोली होता है। ताजा दही इसका प्रभावी इलाज माना जाता है।
कुछ विज्ञानियों का दावा है कि दही में सामान्य बैक्टीरिया रोधी दवाओं की तुलना में बैक्टीरिया मारक क्षमता अधिक होती है। नेबरास्का विष्वविद्यालय के डाक्टर क्षेम साहनी का सुझाव है कि दही को खाद्य के रूप ही इस्तेमाल करना बेहतर है क्योंकि इससे औषधियां खाने की नौबत ही नहीं आएगी। दही की इसी विषेषता के कारण बाजार में तरह तरह के योगर्ट आ गए हैं, परंतु इनमंे सभी कारगर औषधियांे का काम करें ही, यह तय नहीं है। बाजार में उपलब्ध इस तरह के योगर्ट को डाक्टर साहनी वास्तविक नहीं ‘एसिडिफाइड योगर्ट’ यानी तेजाबी दही कहते हैं।