बहुसंख्यक हिंदू उपेक्षित क्यों?

रामेश्वर प्रसाद मिश्र
लेखक प्रसिद्ध विचारक हैं।


जब भी हम हिंदू समाज और उसकी दशा पर चर्चा करते हैं, तो हम इंग्लैंड में हिंदुओं की दशा, अमेरिका में हिंदुओं की दशा, मुस्लिम राज्य में हिंदुओं की दशा पर चर्चा नहीं कर सकते। ठीक इसी प्रकार 1947 के बाद भारत में जो हो रहा है, उसका हिंदू समाज से सीधा रिश्ता नहीं है। न तो भारत में हिंदुओं का राज्य है, न भारत का कोई भी राजनीतिक दल हिंदू धर्म तथा हिंदू राज्य पद्धति पर श्रद्धा रखती है और न ही किसी भी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में यह कहा गया है कि भारत का मुख्य समाज हिंदू समाज है और हम उसका भी हितचिंतन करेंगे।
यह जानना इसलिए भी आवश्यक है कि आज विश्व में जितने भी समाज हैं, उनमें से एक भी समाज ऐसा नहीं है जो अगर बहुसंख्या में है तो वहां का राज्य उसके रिलीजियन या मजहब को अधिकृत संरक्षण नहीं देता हो।
धर्म तो कहीं है ही नहीं। ऑक्सफोर्ड की जो नई डिक्शनरी आई है, उसमें रिलीजियन और धर्म दोनों शब्दों की अलग-अलग प्रविष्टि है। यानी अंग्रेजी भाषा के लोगों ने दोनों शब्दों के अंतर को मान्य कर लिया है। तो विश्व के सभी राज्य अपने बहुसंख्यक समाज के रिलीजियन को अधिकृत संरक्षण देते हैं। उदाहरण के लिए, इंग्लैंड का राज्य वहाँ के प्रोटेस्टैंट ईसाइयत को अधिकृत कानूनी संरक्षण देता है। इसका अर्थ हुआ कि इंग्लैंड का जो भी राजा या रानी होंगे वे वहाँ के सबसे बड़े रिलीजियस प्रमुख होंगे और वे प्रोटेस्टैंट चर्च के सबसे बड़े संरक्षक होंगे और वे विधि और शिक्षा की समस्त संरचना प्रोटेस्टैंट ईसाइयत के अनुसार होगी। इसके बाद भी इंग्लैंड के शासकों को यह पता है कि उन्हें विश्व के साथ संबंध बनाकर रखना है, क्योंकि इंग्लैंड के अपने प्राकृतिक संसाधन इतने नहीं हैं कि उनके आधार पर वह जी सके, इसलिए उन्होंने हिंदुओं, मुसलमानों आदि अन्य मतावलम्बियों को सीमित मात्रा में कुछ अधिकार दिए हैं। परंतु इंग्लैंड की आधिकारिक स्थिति यही है कि वहाँ की शिक्षा, विधि और न्याय की अधिकृत संचालक प्रोटेस्टैंट ईसाइयत ही है।
यही स्थिति फ्रांस, जर्मनी आदि सभी यूरोपीय देशों की है। कहीं कैथोलिक चर्च को कानूनी संरक्षण है, कहीं प्रोटेस्टैंट चर्च को तो कहीं लूथेरियन चर्च को। यानी जो चर्च जहाँ बहुमत में है, उसे वहाँ कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसी प्रकार सभी इस्लामिक देशों में भी कुरान और हदीस को कानूनी मान्यता प्राप्त है। बौद्ध देशों में बौद्ध धर्म को कानूनी मान्यता प्राप्त है। भारत 1947 के बाद विश्व का अकेला ऐसा राज्य है, जो अपने बहुसंख्यकों के धर्म को कोई भी विधिक और राजकीय संरक्षण प्रदान नहीं करता। इसके विपरीत अल्पसंख्यक रिलीजियनों और मजहबों को विशेष संरक्षण देता है। यह भी भारत की सबसे अनोखी स्थिति है।
इसका अर्थ हुआ कि हिंदुओं ने अज्ञानता में या फिर स्वयं को असमर्थ मानकर राज्य को यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और एशिया के अन्य देशों जैसा भी बनाने की कोई भी इच्छा नहीं की। अभी तो इच्छा ही नहीं की, कोशिश करना तो दूर की बात है। इसलिए 1947 के बाद का भारतीय राज्य है, वह हिंदू राज्य नहीं है। भारत का कोई भी राजनीतिक दल हिंदू राजनीतिक दल नहीं है। संसार में जो विचार एकदम तिरस्कृत और बहिष्कृत हो गए, ऐसे समाजवाद, साम्यवाद को मानने वाले नमूना राजनीतिक दल भारत में हैं। तो फिर हिंदुत्व जोकि संसार में सबके आकर्षण का आज केंद्र है, बड़े-बड़े विज्ञानी इसे जानने का प्रयास कर रहे हैं, इसकी बात करते हैं, यहाँ हिंदुत्व को समझने के लिए घूमने आता है, उसे कोई राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में क्यों नहीं शामिल कर सकता? इसमें कोई भी बाहरी कारण नहीं है कि हिंदुत्व को कोई राजनीतिक दल उसका न्यायोचित अधिकार देने का प्रयास नहीं कर रहा है, इसके बाद भी किसी भी राजनीतिक दल ने अपने घोषणापत्र में हिंदुओं के साथ पिछले 70 वर्षों में जो अन्याय हुआ, उसका परिमार्जन करके उसे न्यायोचित राजनीतिक अधिकार दिलाने की बात कही ही नहीं है। इसलिए मैं जिस हिंदू समाज की बात कर रहा हूँ, वह आज का हिंदू समाज नहीं है. पिछले 70 वर्षों में जो भी इसमें विषमताएं और विकृतियां आई हैं, उसके लिए राज्य सीधे-सीधे दोषी है।
किसी मजहब या रिलीजियन को अधिकृत कानूनी संरक्षण देने का अर्थ यह नहीं होता कि इससे किसी पादरी या मौलवी को कोई ताकत मिल जाए। इसका वास्तविक अर्थ होता है कि शिक्षा और न्याय में वही मूल प्रमाण रहेगा। जबतक वह नहीं होता, तबतक यह नहीं माना जा सकता कि आपका राज्य है। केवल मत देने के अधिकार को शासन करने का अधिकार नहीं कहा जा सकता। वर्तमान भारत में कुछ राजनीतिक नेताओं ने मिल कर एक राजनीतिक दस्तावेज तैयार किया, जिसे हम संविधान कहते हैं। वह कहीं की नकल है या नहीं, इस प्रश्न को छोड़ भी दें, तो भी यह तो सही है कि यह एक राजनीतिक दस्तावेज है और इस राजनीतिक दस्तावेज के पीछे एक राजनीतिक विचारधारा है। स्टेट, पीपुल आदि के विषय में उसके निश्चित विचार हैं, और प्रत्येक राजनीतिक दल उस संविधान के प्रति शपथ लेता है, इसका मतलब यह हुआ कि भारत के सभी राजनीतिक दलों की मूल विचारधारा एक ही है, सिवाय सशस्त्र अभियान छेडऩे वाले कम्युनिस्टों के।
संविधान में न्यायपालिका और कार्यपालिका के अंगों का वर्णन है जिसे स्थायित्व प्राप्त है और उनके चयन में भारत के हिंदू या सामान्य नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है। तो केवल विधायिका में अपना प्रतिनिधि चुनना और वह भी ऐसी विधायिका जो संविधान से सीमित है। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के स्टेट लेजिस्लेचर को इससे अधिक अधिकार प्राप्त हैं जो भारत की संसद को हैं। तो ऐसी विधायिका जो पहले से ही एक राजनीतिक विचारधारा से शासित है जिसका नाम संविधान है, उसके 12-13 प्रतिनिधियों में से एक आप भेजते हैं तो इसे शासन करना नहीं कहते हैं।
पूरे संसार में कानून का मूल स्रोत परंपराएं और रिवाज होते हैं। भारत अकेला ऐसा राज्य है जिसमें कानून का प्राथमिक स्रोत हिंदू परंपराएं और रिवाज नहीं हैं। भारत में कानून का प्राथमिक स्रोत एंग्लोसैक्शन लॉ है और अंग्रेजी अदालतों के द्वारा जो निर्णय दिए गए, उन्हीं को परंपराएं और रिवाज मान लिया गया। इसलिए इस न्याय व्यवस्था का भी हिंदुओं से कोई संबंध नहीं है। हिंदू प्रथाओं और परंपराओं को इसमें विधिक स्थान प्राप्त नहीं है। हिंदू विधिक व्यवस्था में विभिन्न संस्थाओं को न्याय के अधिकार प्राप्त थे। जाति पंचायत, खाप पंचायत, ग्राम पंचायत आदि। आज देश में एंग्लोसैक्शन लॉ चलता है जो कि प्रोटेस्टैंट क्रिश्चियन लॉ ही तो है जिसे संसद ने अपनी पहली बैठक में मान्य कर लिया था। इसलिए भारत न्यायिक दृष्टि से प्रोटेस्टैंट ईसाई राज्य है।
यूरोप में विभिन्न विषयों जैसे कि अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन आदि के आज तक एक भी विशेषज्ञ ऐसे नहीं हुए हैं, जो चर्च द्वारा शिक्षित नहीं रहा हो। उदाहरण के लिए इंग्लैंड का मानविकी का एक भी विद्वान ऐसा नहीं है जो कुछ समय के लिए प्रोटेस्टैंट चर्च में पादरी न रहा हो। हमारे देश में कोई इस बात को बताता तक नहीं है। हम जब किसी को उद्धृत करते हैं तो यह नहीं बताते कि अमूक पादरी ने यह कहा है, हम केवल यह कहते हैं कि अमूक विद्वान ने कहा है। हमारी पूरी शिक्षा ही झूठ से भरी हुई है। विषमता देखिए, यूरोप में अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन आदि का एक भी प्रोफेसर नहीं है जो कुछ समय चर्च का पादरी या अंतेवासी न रहा हो, वहीं भारत में अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन आदि का एक भी प्रोफेसर नहीं है जो किसी हिंदू आश्रम में रहा हो। यह तो भारत में शर्त ही नहीं है कि किसी ने वेदांत की साधना की है या फिर सांख्य का अध्ययन किया है या किसी मठ में रहे हैं, इसलिए प्रोफेसर हैं। यूरोप में यह अनिवार्य है। इससे भिन्न होने की कल्पना ही वहाँ नहीं की जा सकती। इसलिए भी भारत में हिंदू शासन व्यवस्था द्वारा उपेक्षित है।
भारत में समाज और राज्य का संबंध भी परिभाषित नहीं है। यह स्थिति आसानी से सुधारी जा सकती है। इसके लिए भारत की संसद एक प्रस्ताव पारित कर सकती है कि भारत का राज्य भारतीय समाज की प्रतिनिधि संस्था है। यह करना सांसदों के अधिकार की बात है, इसके लिए पूरा संविधान बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है। इससे समाज को एक अधिकार मिल जाएगा, जो अभी प्राप्त नहीं है। यदि हम इंग्लैंड के लिए कहें कि वहाँ भी परिभाषित नहीं है तो उनके यहां तो लिखित संविधान भी नहीं है। लेकिन एक बार जब उन्होंने बहुसंख्यकों के रिलीजियन को आधार मान कर उसे विशेष संरक्षण दे दिया तो इससे राज्य और समाज का संबंध निश्चित हो गया।
अभी का संविधान क्या है? भारत के राज्य उसके अंग कैसे हों, इसके साथ-साथ वह नागरिकता की शर्तें भी वही बता रहा है। यानी भारतीय राज्य भारत के नागरिकों को नागरिकता देता है। समाज नाम की कोई चीज है ही नहीं, आपको नागरिकता भी राज्य दे रहा है। प्रश्न है कि राज्य को यह अधिकार किसने दिया? क्या उसे ईश्वर ने भेजा है? अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार भारतीय राज्य एक अवैध राज्य है, क्योंकि वह बताता ही नहीं है कि उसे वैधता किससे प्राप्त है। उसे वैधता प्राप्त होगी, बहुसंख्यकों के धर्म को अधिकृत कानूनी संरक्षण देने से या फिर यह परिभाषा देने से कि भारत का राज्य भारत के समाज की एक प्रतिनिधि संस्था है।
इसलिए मैं कहता हूँ कि 1947 के बाद की स्थितियों के लिए हिंदू धर्मशास्त्र बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हैं। वे एक किताब भर हैं, जिसे आप चाहें तो पढ़े, चाहे तो नहीं पढ़ें। जब आपके वेद शास्त्रों को कोई कानूनी स्थिति प्राप्त ही नहीं है, तो उन्हें आज की सामाजिक व्यवस्था के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।