फेसबुक अल्गोरिथम काम कैसे करता है ?

फेसबुक अल्गोरिथम काम कैसे करता है ?

एडम मोस्सेरी (जो की फेसबुक न्यूज़ फीड के वी.पी. हैं) ने थोड़े समय पहले, 2017 के एफ.8 समिट में, फेसबुक अल्गोरिथम के बारे में समझाया था। अल्गोरिथम समझने के लिए सबसे आसान उन्हीं का नुस्खा याद आता है। किसी समस्या या गणित के सवाल को सुलझाने के लिए एक फ़ॉर्मूले, विधि-सूत्र का इस्तेमाल किया जाता है। अगर ऐसी किसी सवाल को बार-बार हल करना हो तो उसके लिए विधि को कंप्यूटर में प्रोग्राम के जरिये सेट किया जा सकता है। इस तरीके या सूत्र को अल्गोरिथम कहते हैं। इसे समझने के लिए मान लीजिये कि आप अपनी पत्नी के साथ रेस्तरां में जाते है और आर्डर करने का काम आपकी पत्नी आपके जिम्मे छोड़ देती है। अब आर्डर करना आपकी समस्या है जिसे सुलझाने के लिए आप मोटे तौर पर चार कदम उठाते हैं :

  • पहला कदम : आप मेन्यु में देखते हैं कि क्या क्या विकल्प मौजूद हैं।
  • दूसरा कदम : अपने पास मौजूद सारी जानकारी से उसे मिलाते हैं (जैसे, आपकी पत्नी को क्या पसंद है ? वो दिन के खाने का वक्त है, या रात का ? इस रेस्तरां में अच्छा क्या मिलता है ?)
  • तीसरा कदम : कुछ पूर्वानुमान लगाते हैं (जैसे खाने के बाद कुछ मीठा लेना आपकी पत्नी को पसंद आएगा ? कोई नया व्यंजन चुनना पसंद करेगी, मीठे-नमकीन ज्यादा मिर्च-मसालेदार यानि स्वाद के हिसाब से ?)
  • चौथा कदम : इस सारी जानकारी को मिलाकर आप अपनी पत्नी के लिए कुछ आर्डर करते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में आप अपने दिमाग में एक सेट अल्गोरिथम चला रहे हैं, जैसा आप कई बार फैसला लेने में हर रोज़ ही करते हैं। फेसबुक का अल्गोरिथम भी इसी तरह चार प्रक्रियाओं में ये तय करता है कि कौन सा कंटेंट आपके न्यूज़ फीड में दिखेगा और कौन सा नहीं दिखेगा।

फेसबुक का अल्गोरिथम जिन चार चरणों में कंटेंट को आपकी न्यूज़ फीड में ऊपर या नीचे डालता है वो भी कुछ ऐसे ही होते हैं :

  • इन्वेंट्री (Inventory) – रेस्तरां के मेन्यु में क्या क्या है ?
  • सिग्नल्स (Signals)– ये दोपहर के खाने का वक्त है या रात का ?(Is it lunch or dinner time?)
  • प्रेडिक्शन (Predictions) – उन्हें ये पसंद आएगा क्या ?
  • स्कोर (Score) – आर्डर करना

इन्वेंटरी

जब आप फेसबुक चलते हैं तो फेसबुक का अल्गोरिथम एक इन्वेंटरी, एक लिस्ट बनाता है जिस से ये तय किया जा सके कि आपको दिखाने के लिए उसके पास क्या क्या उपलब्ध है। आपके दोस्तों-रिश्तेदारों के सारे पोस्ट यहाँ रेस्तरां के मेन्यु की तरह अल्गोरिथम के लिस्ट पर होते हैं। जैसे आप मेन्यु देखेंगे वैसे ही वो इस लिस्ट को देखता है।

सिग्नल्स

अपने पास मौजूद इस सारे डाटा (इन्वेंट्री) के आधार पर अब फेसबुक ये तय करने की कोशिश करता है कि आपको क्या पसंद आ सकता है। इसके लिए आपके ही भेजे संदेशों (सिग्नल) का इस्तेमाल किया जाता है। ये हज़ारों की संख्या में फेसबुक के पास मौजूद हैं, जैसे आपने पहले किसके लिखे पर लाइक-लव-एंग्री जैसी कोई प्रतिक्रिया दी थी। किसके लिखे को आप हमेशा पढ़ते हैं, उनकी वाल पर जाते हैं, फोटो-पोस्ट देखते हैं या कमेंट करते हैं। आप किस किस्म का फोन या कंप्यूटर इस्तेमाल कर रहे हैं, कौन सा ब्रौसेर (ओपेरा, क्रोम, यू.सी. जैसा) चला रहे हैं। दिन का कौन सा वक्त है और आपके इन्टरनेट की स्पीड क्या है ? धीमे इन्टरनेट वालों को कम विडियो दिखेंगे और लिखे हुए पोस्ट ज्यादा दिए जायेंगे। ऐसे फैसले सिग्नल्स के जरिये लिए जाते हैं।

प्रेडिक्शन

अब इन सिग्नल्स की मदद से फेसबुक पूर्वानुमान लगाना शुरू करता है, वो संभावनाएं जोड़कर देखता है कि किस चीज़ को लाइक किये जाने की ज्यादा संभावना है, किसे आप शायद शेयर करेंगे, किस कहानी को पढ़ने पर थोड़ा समय देंगे ? इन सबके आधार पर आपकी न्यूज़ फीड में क्या दिखेगा वो तय होता है। एक इन्सान के लिए ये लम्बी सी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इतना जोड़ कर फैसला लेने में कंप्यूटर को एक सेकंड का शायद दसवां हिस्सा भी ना लगे।

स्कोर

इन सारे पूर्वानुमानों और संभावनाओं को जोड़ने के बाद फेसबुक एक “रेलेवेंस स्कोर” (relevance score) निकालता है। ये एक संख्या होती है जिस से फेसबुक ये तय करता है कि आप किसी पोस्ट में कितनी रूचि लेंगे। यहाँ फेसबुक को पक्का पक्का कुछ भी नहीं पता है, वो सिर्फ आपके पुराने बर्ताव के आधार पर एक अनुमान लगा रहा होता है।

आपके लम्बे पोस्ट पर क्लिक करके उसे बड़ा करके पढ़ने की क्या संभावना है, किसी व्यक्ति के पोस्ट के लाइक पर क्लिक करने की क्या संभावना है, किस पोस्ट पर आप समय बिताएंगे – उसमें कमेंट पढ़ेंगे, क्लिक के जरीय वो लिंक अगर किसी स्पैम (spam) फर्ज़ीवाड़े वाली वेबसाइट पर ले जाता है तो उसे हटाना होगा, किसकी पोस्ट में अश्लीलता या अभद्रता या बदतमीजी जैसी शिकायतें आती हैं तो उसे हटाना होगा, कहाँ आप कमेंट करते हैं उसे रखा जाए। ऐसी चीज़ें जोड़कर फेसबुक का अल्गोरिथम पोस्ट आपकी न्यूज़ फीड में डालेगा।

आपके कंटेंट को दिखाने के लिए फेसबुक अल्गोरिथम कौन से ‘सिग्नल’ इस्तेमाल करता है ?

एडम के भाषण में से एक चीज़ ये भी समझ आती है कि फेसबुक का न्यूज़ फीड आप किस किस पेज या व्यक्ति को फॉलो करते हैं, कैसे प्रतिक्रिया देते हैं उसपर भी निर्भर करता है। आपकी जरूरतों, पसंद-नापसंद के हिसाब से सबसे अच्छा क्या होगा, फेसबुक बस यही अंदाजा लगाने की कोशिश करता है। कुछ ख़ास चीज़ें जिसपर फेसबुक की रैंकिंग निर्भर करती है वो ये हैं कि :

किसने पोस्ट किया है ?

  • उस व्यक्ति / पेज की पोस्ट की औसत दर क्या है ? (कितनी-कितनी देर में पोस्ट करता है)
  • पहले से उस व्यक्ति पर नकारात्मक प्रितिक्रियाएँ कितनी आई हैं ?

इंगेजमेंट (पोस्ट ने कितनी देर आपको व्यस्त रखा)

  • कंटेंट पर खर्च किया गया औसत समय
  • पहले से लोगों ने औसत कितना समय (और क्लिक, शेयर) लगाया है उस कंटेंट पर ?

ये कंटेंट कब पोस्ट किया गया था ?

  • क्या आपके मित्रों को पोस्ट में टैग किया गया है ?
  • क्या अभी अभी किसी मित्र ने उस पोस्ट पर कमेंट किया है ?

किस किस्म की कहानी है ?

  • क्या पेज या व्यक्ति की प्रोफाइल पूरी तरह बनाई गई है ? (उम्र, किस जगह का है, नौकरी-व्यवसाय, पसंद-नापसंद जैसी चीज़ें भरी थी प्रोफाइल बनाते समय ?)
  • क्या आपके किसी करीबी या करीबी मित्र के नजदीकी ने पोस्ट की है (सी फर्स्ट में कितनों ने रखा है वो भी ध्यान दिया जायेगा।)
  • क्या पोस्ट जानकारी से भरा, कोई महत्वपूर्ण सूचना का पोस्ट है ?

फेसबुक अल्गोरिथम कौन से पूर्वानुमान लगाता है ?

इतनी ढेर सारी जानकारी से लैस फेसबुक अल्गोरिथम को अच्छी तरह से पता है कि आपके मित्रों का दायरा कैसा है, आपने किन पेज को फॉलो कर रखा है, आपके ग्रुप्स में कैसी चर्चा होती है। अब इनके आधार पर वो पूर्वानुमान और अंदाजे लगाना शुरू करेगा। वो तय करता है कि :

  • आपके लाइक/रियेक्ट करने की संभावना है क्या ?
  • आप इस कहानी पर, पोस्ट पर, तस्वीर, विडियो पर कोई समय खर्च करेंगे ?
  • कमेंट और शेयर करने की संभावना है ?
  • आपको फायदा होता है ऐसी जानकारी से ?
  • किसी वायरस/स्पैम वाली साईट की तरफ तो नहीं ले जाता ये पोस्ट ?
  • क्या इसमें अश्लीलता या भावना आहत करने जैसा कुछ है ?

इन सबके नतीजे पर बना रेलेवेंस स्कोर उस पोस्ट का दिखाया जाना, या नहीं दिखाया जाना तय करेगा। ये आम तौर पर एक और दो के बीच की कोई 1.4 या 1.7 जैसी संख्या होगी। मान लीजिये कि 1.4 से जितनी बड़ी होगी आपकी न्यूज़ फीड में उतनी ही ऊपर दिखेगी।

अपने कंटेंट को फेसबुक अल्गोरिथम के अनुकूल कैसे बनाते हैं ?

मार्केटिंग- मीडिया के क्षेत्र में काम करने वाले लोग ही नहीं, आम लोग भी चाहते हैं कि उनकी फेसबुक पोस्ट ज्यादा से ज्यादा लोग देखें। उन्हें ज्यादा पढ़ा जाए, वो ज्यादा प्रसिद्ध हों। इस वजह से सिर्फ मार्केटिंग और मीडिया वालों के लिए ही नहीं सबके लिए फेसबुक अल्गोरिथम की ये मोटे तौर की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। जब सब कुछ ना कुछ व्यक्त कर रहे हों, तो आपकी अभिव्यक्ति पर ज्यादा लोगों का ध्यान कैसे जाए इसके लिए आपके पोस्ट को फेसबुक अल्गोरिथम के अनुकूल होना होगा। आप जिस पाठक, श्रोता या दर्शकों के वर्ग तक अपनी बात पहुँचाना चाहते हैं उनके लिए आपकी बात महत्वपूर्ण होनी चाहिए। ध्यान रखिये कि अट्ठारह की उम्र के लोगों को जो पसंद आएगा, वो पचपन के लोगों को पसंद नहीं होगा। आपको अपना वर्ग तय करना होगा और जैसे जैसे इस वर्ग के लिए आपके पोस्ट का महत्व बढ़ता है, वैसे वैसे आपकी फेसबुक पर प्रसिद्धी भी बढ़ेगी।

जैसे एक तरीका तो ये होता है कि आप कुछ विडियो पोस्ट करें। एक लम्बी सी पोस्ट पढ़ने में जहाँ लोगों को दो ढाई मिनट लगेंगे, वहीँ पांच मिनट के विडियो में वो ज्यादा समय आपकी वाल पर होगा। इस तरह आपकी वाल पर गुजरा औसत समय बढ़ जाता है। दोबारा लिखे हुए को पढ़ने पर आपकी गलतियाँ कम होंगी, जो लिंक दिए हैं वो सही और काम के होंगे। ज्यादा से ज्यादा लोग अगर लाइक, लव जैसी प्रतिक्रिया देते हैं तो भी आपकी रेटिंग बढती है। लाइक की तुलना में लव, लाफ जैसे रिएक्शन की रेटिंग ज्यादा होगी। अगर आपकी पोस्ट अक्सर अश्लीलता के लिए रिपोर्ट की जा रही है तो आपकी सभी पोस्ट की, सीधा प्रोफाइल की ही रेटिंग कम हो जाती है। ऐसे में आपकी पोस्ट कम लोगों को दिखेगी। ऐसी पोस्ट जिसे ज्यादा शेयर किया जा रहा है वो ज्यादा लोगों को दिखेगी, मतलब पचास के लगभग शेयर हों, तो पोस्ट कम से कम पांच हज़ार लोगों को नजर आने लगेगी।

जितनी जल्दी शेयर हो रही है उस से भी रैंकिंग बढती है, जैसे घंटे भर में पचास शेयर होने वाली पोस्ट की रैंकिंग, दो दिन में पचास शेयर वाली पोस्ट से ज्यादा होगी। अगर आपकी पोस्ट में कोई ऐसी जानकारी है जिसे ज्यादा लोग शेयर करना चाहेंगे तो वो ज्यादा चलेगी। जैसे किसी परीक्षा के रिजल्ट की लिंक तेजी से फैला सकते हैं, कभी कभी किसी मैच का स्कोर कई लोग देखना चाहेंगे, चुनावी नतीजों पर बात की जा सकती है। रेसिपी, कोई हेंडीक्राफ्ट या घरेलु नुस्खे कई महिलाएं शेयर करेंगी इसकी संभावना ज्यादा होती है। इनका ख़याल रखकर आप अपनी पोस्ट की रैंकिंग ऊपर कर सकते हैं। इस सिलसिले में एक और चीज़ होती है समय और नियमित होना। जैसे अगर आप हर सुबह एक लेख नौ बजे के लगभग पोस्ट करें और कोई हर रोज़ पोस्ट तो करे, मगर अलग अलग समय पर, तो नियमित समय वाली पोस्ट की रैंकिंग उपर होगी। अगर लगातार एक ही क्षेत्र के, एक ही लिंग के (महिला/पुरुष), एक ही उम्र सीमा के लोग आपकी पोस्ट पर आ रहे हैं तो उस उम्र सीमा, या क्षेत्र के ज्यादा लोगों को आपकी पोस्ट दिखने लगेगी।

क्या नहीं करना ?

सबसे पहले तो आप ये समझ लीजिये कि जहाँ आप अकेले हैं, वहां फेसबुक पूरी एक कंपनी है। एक व्यक्ति अकेला सौ दो सौ इंजिनियर, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर, एनालिस्ट और डिज़ाइनर्स की टीम से नहीं निपट सकता। तो चतुराई दिखाने का प्रयास ज्यादातर नाकाम भी होगा और ब्लैकलिस्ट भी। इसलिए ध्यान रखिये :

  • धोखा देने वाली चीज़ें पोस्ट मत कीजिये। (ऐसे लिंक जो वायरस, स्पैम फैलाते हों, किसी तरह डाटा चुराने का प्रयास करते हों, उनसे दूर रहिये।)
  • फेसबुक पर प्रोफाइल बनाते वक्त ही आपने कुछ टर्म्स एंड कंडीशन पर हामी भर दी है। उस वक्त शायद उसे नहीं देखा होगा, अब एक बार उन शर्तों को पढ़ लीजिये।

और अंत में

ये फेसबुक के अल्गोरिथम का थ्योरी वाला हिस्सा है। इसके साथ ही कई चीज़ें हैं जो आपको अभ्यास से धीरे धीरे समझनी होंगी। यहाँ सबसे जरूरी चीज़ ये समझना भी है कि ऐसे विषयों पर हिंदी में नहीं लिखा जाता। (मेरे अलावा शायद ही किसी ने लिखा हो।) इसलिए आपको कई चीज़ें अंग्रेजी में पढ़कर सीखनी होंगी। समय बीतने के साथ सोशल मीडिया एक नए संवाद के माध्यम की तरह उभरा है। ये यहीं रहने वाला है, किसी ना किसी बदलते स्वरुप में ये अब होगा ही, समाप्त नहीं होगा। जैसे संवाद के माध्यम की तरह लिखना, बोलना और पढ़ना सीखा जाता है वैसे ही इसे भी पढ़कर आज नहीं तो कल सीखना होगा। समय के साथ बदलते रहिये, कोई और चाहे ना भी सिखाये तो खुद ही सीखते रहिये।

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