प्रख्यात शायर सम्पादक एवं इस्लामिक मामलों के विशेषज्ञ श्री “तुफैल चतुर्वेदी”  एक सार्थक भूमिका के साथ  वैद्य गुरुदत्त  को स्मरण कर रहे हैं

सामान्य बात है कि व्यक्ति, संस्था, दल, क्लब, प्रतिष्ठान, समाज के विभिन्न अंग उन्नति करते हैं या अवनति को प्राप्त होते हैं। वह चौकन्ने होते हैं तो स्वयं अन्यथा गुणी जन तो अपेक्षा करते हैं कि वो इसकी छानफटक करें। आगे बढ़ना अथवा पीछे हटना अपने आप हो उठने वाली घटना तो नहीं होती। हम हिंदू सैकड़ों वर्षों से पददलित, पराधीन हुए। हमारे मंदिर, विश्व विद्यालय, शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय, दुर्ग नृशंसता से जलाये गए। हमारी संतानें ग़ुलाम, भोग दासी {Sax Slave} बना कर मध्यपूर्व के बाज़ारों में बेच दी गयीं। हमारा सम्मान, गौरव, वैभव, ऐश्वर्य धूल में मिला आख़िर क्यों ?

यह बहुत चिंताजनक, दुखद, दयनीय स्थिति है कि अभी तक इस महान सभ्यता के पतन की विस्तृत जाँच-पड़ताल नहीं हुई है। यदि यह कभी होगा तो स्वाभाविक है कि इसके कारणों पर बात होगी। विद्वान् लोग विभिन्न कोणों से प्रकाश डालेंगे, विभिन्न बातें कहेंगे मगर एक बात पर सबकी सहमति आएगी कि यह महान सभ्यता शतकों से बौद्धिक रूप से पिछड़ गयी थी। युद्ध तीर, तलवार, बंदूक़ से किसी मैदान में लड़े जाते हैं मगर युद्ध का नक़्शा दिमाग़ों में बनता है। कौन-कौन से शस्त्रों की टुकड़ियों का कब प्रयोग होगा, कौन सा दाँव कब चला जायेगा, हार-जीत किस तरह होगी, यह सब पहले दिमाग़ में सोचा जाता है तब धरती पर उतरता है।

हम पिछली कई शताब्दियों से अपने शत्रुओं की अपेक्षा इस कार्य में शिथिल पड़ गए थे। हमारे शत्रु हमसे योग्य थे। इस स्थित में जो बदलाव लगभग कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले 10 अप्रैल 1875 से आना प्रारम्भ हुआ। यह दिन पराधीन भारत के आँखें खोलने का दिन है और इस दिन मुंबई में आर्य समाज का प्रवर्तन हुआ। इसी दिन सैकड़ों वर्षों से दुंदुभि बजाते हुए इस्लाम और ईसाई मत की तथ्यात्मक छानफटक शुरू हुई। सैकड़ों साल से धर्म, राष्ट्र को नष्ट करते आ रहे अवैदिक और पापी मतों की पोल खोली जाने लगी।

यही वह कमी थी जिसके कारण इस महान सभ्यता का पतन हुआ था। विरोधी चिंतन की जांच-पड़ताल, अपनी कमियों को खोजना यानी बदलाव की रणनीति तैयार करना शुरू हुआ। यह जानना आवश्यक है और आश्चर्यचकित करता है कि 15 अगस्त 1947 को खंडित स्वतन्त्रता पाने से पहले उस काल के वृहद भारत में जितने भी सविनय अवज्ञा, अविनय लठैती, बम-रिवॉल्वर, हिन्दू महासभा, कांग्रेस, सोशलिज़्म आदि आंदोलन चल रहे थे। जितने भी बदलाव की बातें विभिन्न संस्थान कर रहे थे सब पर आर्य समाज के लोगों का वर्चस्व था।

कारण केवल यह था कि व्यक्तिगत स्वार्थ में फंसे लोगों की ऑंखें आर्य समाज ने खोल दीं और राष्ट्र-पुरुष अंगड़ाई ले कर सन्नद्ध हो गया। यह कार्य प्रारम्भ तो ऋषि दयानंद ने किया था मगर उनके बाद इस पौरुष को स्वामी श्रद्धानंद, पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, पंडित लेखराम आर्य, अचार रामदेव, पंडित भगवत दत्त, पंडित बुद्ध देव विद्यालंकार, वैद्य गुरुदत्त आदि ने सम्हाला। शास्त्रार्थ महारथियों की तो पूरी शृंखला खड़ी हो गयी। लगातार यह पाखंड खंडन होता रहे इसके लिए संस्थान बनाये गए।

इस कर्म में समय समाज पर जिनके कार्य ने सर्वाधिक प्रभाव डाला वह ” वैद्य गुरुदत्त * थे। दो सौ से अधिक उपन्यास, संस्मरण आदि उनकी लेखनी से निकले। धर्म, राष्ट्र, देश, राजनीति, दर्शन, संस्कृति यानी ज्ञान-विज्ञानं के सभी प्रमुख विषयों को उनकी लेखनी ने स्पर्श किया। उनका जीवन, लेखन भारत पौरुषवान बने, तेजस्वी बने, गौरवशाली बने इस लक्ष्य से प्रेरित था। सामान्य जन की खरी-खरी भाषा में तथ्यों का तीखा, चोखा निरूपण उनकी अपनी अनूठी शैली थी।

जब गाँधीवाद के ढोल बजाये जा रहे था, वैद्य गुरु दत्त इस ढोल की पोल ‘भारत गाँधी-नेहरू की छाया में’ ‘देश की हत्या’ जैसे दसों उपन्यासों में खोल रहे थे। स्वाभाविक था कि कांग्रेस ने उनके लेखन, पुस्तकों की पूरी तरह से अवहेलना की मगर उनको पढ़ने वाले लोग तैयार हो रहे थे। एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई। जिसने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद आदि नीतियों के विरोध में तार्किक मानस तैयार किया।

जनसंघ के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने राजनीति की तत्कालीन दुरावस्था में भी वैचारिक हस्तक्षेप किया। उनेक साथ राजनैतिक पद की दृष्टि से बड़े मगर वैचारिक दृष्टि से बौने कई लोगों ने षड्यंत्र कर उनको किनारे किया। राजनीति सर्पिणी होती है। इस नागिन ने वैद्य गुरुदत्त को भी डँसा। कोई दुःख न होता चूँकि यह राजनीति का स्वभाव है मगर उन्हें उनके साथ के लोगों ने डँसा, इसका दुःख है। एक तेजस्वी चिंतक डँसा गया मगर उनके कार्य की मृत्यु नहीं हुई। राष्ट्रवाद जीवित रहा। उनकी अवहेलना हुई मगर विचार दिलों पर राज करते रहे। उनके लेखन ने बड़े पैमाने पर राष्ट्रवादी चिंतक, लेखक उपजाये। आज जो राष्ट्रवाद का उभार दिखाई दे रहा है, उसकी नींव में वैद्य गुरुदत्त जी के साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। उनको नुकसान पहुँचाने वाले लोगों के ज़बरन बनाये गए झूठे योगदान को काल ने मार कर कूड़ेदान में कब का फेंक दिया।