पूरब में ही जन्मा था आधुनिक विज्ञान

पूरब में ही जन्मा था आधुनिक विज्ञान

जवाहर लाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
लाखों वर्ष पहले जब किसी मनुष्य ने नदी में पूरे पेड़ को बहते हुए देखा होगा तो उसे जिज्ञासा हुई होगी कि यह इतना मोटा पेड़ बह कैसे रहा है जबकि इससे हल्की वस्तुएं भी डूब जाती हैं। जिज्ञासा के ऐसे ही कई और प्रसंग भी उसके अनुभव में आए होंगे। कालांतर में ऐसे अनेक अनुभव लोगों को हुए होंगे। हजारों वषों के अनुभवों के पश्चात मानव को अलग अलग वस्तुओं और पदार्थों के सामान्य गुण-दोष समझ में आ गए होंगे। लेकिन इन अनुभवों का उपयोग अन्य मिलती जुलती पस्थितियों में करने का विवेक पैदा होने में भी उसे हजारों वर्ष लग गए होंगे। लकड़ी पानी में तैरती है और उस लकड़ी से नाव बनाई जा सकती हैं। तन को शीत से बचाने के लिए उसे ढंकना होता है, इन अनुभवों का अन्य स्थितियों में उपयोग करने की समझ के पश्चात समझदारी का जो स्तर विकसित होता है, उसी से आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ। जब वह इन अनुभवों कोे नियम या सिद्धान्त के रूप में परिवर्तित करने लगा तो वह वैज्ञानिक युग में प्रवेश करने लगा। लेकिन इस स्थिति तक पहुंचने में उसे पहले की तुलना से कई गुना अधिक समय लगा होगा क्योंकि यही काल उसके अपने शारीरिक और बौद्धिक परिवर्तन का भी काल था। वह स्वयं भी बदल रहा था, मनुष्य धीरे धीरे आधुनिक बन रहा था। प्राचीन काल में सभ्यताओं का बीजारोपण इसी तरह हुआ होगा।
आधुनिक युग को पश्चिमी विज्ञान युग कहते हैं क्योंकि माना जाता है कि विज्ञान और वैज्ञानिकता की धारणा पश्चिम से ही विकसित हुई। इसका मुख्य कारण यह है कि जिस काल में पश्चिम में विज्ञान पर काम होने लगा था और नए नियम और नई प्रणालियां बन रही थी, उस काल मंे पूर्व यानी भारत और चीन विदेशी आक्रंाताओं की गुलामी में चले गए थे और एक प्रकार के आरोपित अंधकार युग से गुजर रहे थे। साथ ही पश्चिमी देशों को यूरोप से बाहर जो थोड़ी बहुत जानकारी थी वह मध्य एशिया, फारस या ईरान की ही थी। इन राष्ट्रों की सभ्यताओं को यूरोपीय आक्रमणकारियों ने पहले ही पददलित कर दिया था। भारत तब भी उनके लिए दूर का कोई देश था जो सम्पन्न तो था लेकिन संगठित नहीं। इसलिए जब उन्होंने भारत जैसे देशों को अपने अधिकार में करने की चाल चली तो यह आवश्यक था कि वे यहां की सभ्यता को निम्न कोटि की साबित करते और अपनी सभ्यता को ही विकसित और आधुनिक घोषित करते। इसलिए यह धारणा थोपी गई कि भारत में विज्ञान नाम का कोई विचार कभी था ही नहीं। विज्ञान की बात तो अलग, वे तो यह भी मानने के लिए तैयार नही थे कि भारत में किसी प्रकार का कोई दार्शनिक विचार भी हुआ था। क्या यह सच है?
मानव आदिकाल से ही अपने आसपास के परिवेश में जिन गुत्थियों को समझने का प्रयास करता रहा है, वे इस धरती, प्रकृति और आकाश से जुड़ी प्रणालियां थीं। हजारों वर्षों के अध्ययन से हर सभ्यता के लोग इस से कुछ न कुछ लगातार ही सीखते रहे हैं और उसी के आधार पर उन समाजों की मान्यताएं भी बनती रहीं और व्यवस्थाएं भी। भारत इस अध्ययन और परीक्षण के दौर में कहां था?
प्रकृति के बारे में हमारे साहित्य में पृथु को आदि राजा कहा गया है। राजा जैसी राजनैतिक संस्था, जो नियमों एवं कायदों से प्रतिबद्ध हो और जिसमें कर्तव्यों का भी उतना ही महत्त्व हो जितना अधिकारों का, पहली बार सामाजिक व्यवस्था का अंग बना होगा। लेकिन पृथु का महत्त्व केवल राजव्यवस्था के लिए ही नहीं है प्रकृति के प्रति समाज और शासन के व्यवहार की मर्यादा स्थापित करने के लिए भी है। पृथु और गाय के प्राचीन प्रसंग से दो बातें समझ में आती हैं। एक यह कि यह धरती एक गाय की तरह है जिसे पाला जाता है और उसके बदले में गाय को दुह कर हम कुछ दूध प्राप्त कर सकते हैं। दोहन शब्द का लोक व्यवहार में नया उपयोग शायद इसी प्रसंग से विकसित हो गया। शोषण और दोहन में मौलिक अंतर है। शोषण का अर्थ होता है चूसना, जैसे गन्ने को चूस कर हम कूड़े के ढेर पर फैंक देते हैं, उसमें शेष कुछ भी नहीं बच जाता। यह मौलिक सिद्धांत हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले जान लिया था कि प्राकृतिक सम्पदा का अगर दोहन हो तो उस का संरक्षण करना भी आवश्यक हैं। शोषण में यह बाध्यता नहीं है कि जिसका हम उपभोग कर रहे हैं वह बचा भी रहे। बीसवीं सदी में इसी बात पर सैंकड़ों विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट आई, हजारों सम्मेलन हुए और बार बार अपीलें जारी होती रहतीं हैं कि हमें प्राकृतिक साधनों का ऐसा उपयोग करना चाहिए जिसमें मूल साधन बचा रहे। इसे आज वे सस्टेनेबल ग्रोथ कहने लगे हेैं। यानी वह विकास जिसे लगातार जारी रखा जा सके। यह बात आज भी बहुत हद तक केवल पुस्तकों और प्रयोगशालाओं में विशेषज्ञों तक सीमित है, लेकिन हर घर मे इसका जीवित दृष्टांत तो भारत में ही गाय के रूप में रखा गया।
प्रकृति का उपयोग सामान्य खाद्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं होता। यह आवश्यक माना गया कि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए प्रकृति का कुछ भाग मनुष्य के अतिक्रमण से बाहर ही रखा जाए, उस पर साामान्यतः दोहन का नियम भी लागू न हो। हमारे पूर्वज जानते थे कि इस पूरी धरती के स्वास्थ्य को बचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग पर कहीं न कही कठोर प्रतिबंध लगाए जाने की आवश्यकता है। हम जानते थे कि प्रकृति में शायद ही कोई ऐसी वनस्पति हो जिसमें कोई न कोई औषधीय गुण न हो। हमारा चिकित्सा सिद्धांत इस बात पर टिका है कि प्रकृति में मनुष्य के हर रोग का उपचार करने की क्षमता है। औषधीय सामग्री के रूप में सारा वनस्पति जगत हमारे सामने उपलब्ध था लेकिन कुछ वनों को हमने मानव के हस्तक्षेप से मुक्त रखना आवश्यक समझा था। ऊंचे पर्वतों पर जो पेड़ उगते हैं, उनकी जलवायु के नियंत्राण में बहुत बड़ी भूमिका होती हैं ऐसे वनों को, जिनमें देवदारू, बांझ और भोजपत्रा जैसे पेड़ उगते हैं, देववन कहते हैं। यहां पड़ों के साथ छेड़छाड़ वर्जित किया गया था। वे अरण्य हैं। इसका केवल एक अपवाद था। कोई औषधी अगर केवल वहीं मिलती है तो उसे प्राप्त करने का अधिकार मनुष्य को था परंतु किसी आर्थिक प्रयोजन के लिए इन देववनों का प्रयोग नहीं हो सकता था। रोग निवारण सबसे महत्त्वपूर्ण कर्म माना गया जिसके लिए पक्ष, विपक्ष, वर्ण या जाति किसी प्रकार का बंधन नहीं था। जिस हिपोक्रिटिकल ओथ को आज अंतराष्ट्रीय रेड क्रास का मूल सि़द्धांत माना जाता है उसका दृष्टांत भारत में हजारों साल पहले बना था।
प्रकृति के बारे में भारतीय विचार की वैज्ञानिकता के प्रमाण है। विश्व की सबसे पहली चिकित्सा प्रणाली का विकास भी यहीं हुआ। यहां से वह ईरान गई और फिर यूनान। अठारहवीं शताब्दी तक भारत में कई प्रकार की शल्य चिकित्सा प्रचलित थी। सोलहवीं शताब्दी में कुछ यूरोपीय लोग भारत आए तो उन्हें पता चला कि भारत के चिकित्सक कुछ ऐसी भी चिकित्सा करते जो विश्व में कहीं नहीं होती। आज जिसे प्लास्टिक सर्जरी कहते हैं वह काम यहां उस सदी में भी हो रहा था। अपने नाकनक्श को ठीक ठाक रखने के उत्सुक विदेशियों का तांता लगने लगा। नाक, कान, होंठ आदि के विकारो को सुधारने की चिकित्सा के लिए हजारों यूरोपीय सोलहवीं और सत्राहवीं शतब्दियों में भारत आए। मनोचिकित्सा के सिद्धातों का भी आरम्भ में आने वाले अंग्रेजो ने वर्णन किया है। स्वर्गीय धर्मपाल जी ने अठारहवीं सदी में भारतीय विज्ञान नामक पुस्तक में अनेक प्राचीन वैज्ञानिक प्रणालियों का उल्लेख किया है जो प्राचीन काल से अब तक चली आ रही थीं। खगोल विद्या में भास्कराचार्य जैसे वैज्ञानिकों की बहुत चर्चा होती है लेकिन लीलावती पहला ग्रंथ नहीं है जिसमें गणित के जटिल नियमों का उल्लेख हो। महत्त्वपूर्ण तो यह है कि गणना पर ही आधुनिक विज्ञान की सभी शाखाओं का दारोमदार होता हैं और गणना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंक है शून्य जिसका आविष्कार भारत में ही हुआ था। हर प्रकार के वैज्ञानिक कार्य में आज हजारों करोड़ तक की गिनती की आवश्कता होती है जो संभव नहीं होती अगर शून्य नहीं होता।
भारत में आज भी ऐसे इस्पात के नमूने मिलते हैं जिस पर शताब्दियों तक खुले आसमान के नीचे भी जंग नही लगता। मुसलमानों के आने से पहले तक इस इस्पात का निर्यात होता था। यूरोप के अनेक युद्धों में दमिशक (डेमसकस) की तलवार बहुत प्रसिद्व थी। इस तलवार का इस्पात भारत से ही जाता था। दिल्ली मे कथित अशोक स्तम्भ और देश के कई राज्यों में ऐसे ही स्तम्भों के खण्डित अवशेष आज भी इस उत्कृष्ट इस्पात के प्रमाण हैं। कुछ वर्ष पहले कुछ युवा वैज्ञानिकों को पता चला कि मध्य प्रदेश में आज भी आदिवासी लोहार ऐसा ही इस्पात बनाते हैं जिससे स्थानीय किसान अपने खेती के उपकरण बनवाते हैं।
युवा वैज्ञानिकांे ने उन आदिवासी लोहारों से सम्पर्क किया जो इस्पात तो बना सकते थे लेकिन यह नही जानते थे कि उस विशेष प्रकार को बनाने का सिद्धांत क्या है और न यह बता पाते हैं कि लोहा गलाने के लिए ईंधन के कितने प्रकार हैं और उनका क्या अनुपात होना चाहिए। मतलब यह कि वे सैद्धांतिक ज्ञान सदियों पहले खो चुके हैं, लेकिन परम्परा के रूप में इसे पुरखों की देन मान कर आज तक चलाते आ रहे हैं। उनकी इस रूढ़ि में भी आधुनिक विज्ञान की संभवनाएं छिपी हैं।
हमारी ज्ञान विज्ञान यात्रा में हजार वर्ष का अंतराल आया, जिसके कारण बहुत कुछ खो गया और बहुत कुछ अधूरा रह गया। लेकिन पृथ्वी और उस पर रहने वाले मनुष्य के जीवन में संतुलन बनाए रखने की मौलिक सोच में भारत आज भी औरों से आगे ही हैं।