पशु ऊर्जा के सफल प्रयोग


गुड्डा भैया के नाम से प्रसिद्ध विवेक चतुर्वेदी पहले एक व्यवसायी थे परंतु बाद में किसान बन गए। उन्होंने वर्ष 2004 से खेती करना प्रारंभ किया। वे चाहते थे कि खेती को लाभकारी बनाया जाए और गाँवों से शहरों की ओर पलायन को रोका जाए। इसके लिए उन्होंने खेती की लागत को न्यूनतम करने और उत्पादन को अधिकाधिक बढ़ाने के प्रयोग किए। सजग दृष्टि और रचनाधर्मी स्वभाव के कारण उन्होंने सामान्य ज्ञान पर आधारित तकनीकों का उपयोग करते हुए अनेक सरल उपकरणों का अनुसंधान किया। पेटेंट के समर्थक नहीं होने के कारण उन्होंने उनका पेटेंट नहीं कराया। हालांकि वे कहते हैं कि पेटेंट कराना काफी समय और श्रमसाध्य कार्य है और इससे उपकरणों की लागत भी बढ़ जाती है। यदि उपकरण मंहगे हो जाएं और किसान उसे खरीद ही न सकें तो फिर इनके अनुसंधान का मूल उद्देश्य ही पूरा नहीं होता।
खेती की भारतीय परंपरा के अनुसार विवेक चतुर्वेदी पशु ऊर्जा को खेती का एक अनिवार्य अंग मानते हैं। कानपुर से 20 कि.मी. दूरी पर स्थित अपने खेतों में उन्होंने पशुओं की सहायता से ही शून्य लागत खेती के सफल प्रयोग किए हैं। उनके पास वर्तमान में गिर और साहीवाल नस्ल के संकर की 24 गाएं हैं। पशु ऊर्जा के उपयोग से उन्होंने एक बहुउपयोगी बैलचालित पम्प बनाया है। इसे बनाने में उनके दो मित्रों सुल्तान असलम और पुरुषोत्तम लाल शर्मा ने उनकी सहायता की। इस पम्प को दो बैलों से चलाया जाता है। इसमें किसी तरह का ईंधन या बिजली का उपयोग नहीं किया जाता। गियर बाक्स को इस प्रकार से लगाया गया है कि इसके उपयोग से पानी निकाला जा सकता है, चारा काटा जा सकता है, थ्रेशिंग और मोविंग भी की जा सकती है। पम्प केवल एक घंटे में डेढ़ सौ फीट नीचे से 25 हजार लीटर पानी निकालने में सक्षम है। इनका निर्यात अफ्रीका के देशों में भी किया जा रहा है।
विवेक चतुर्वेदी ने अपने खेतों में गोबर गैस संयंत्र भी लगा रखा है। इससे उन्हें रसोई गैस भी मिलती है और साथ ही खेतों के लिए अत्यंत लाभकारी खाद भी। इन्होंने अपने संयंत्र पर एक बैलून की जैसा कवर लगा रखा है जो गैस बनने पर फूल जाता है। इससे गैस की बर्बादी नहीं होती। उनके गाँव में देश के अन्य गाँवों की ही भांति बिजली की समस्या बनी रहती थी। इसके समाधान के लिए उन्होंने बायोमॉस गैसीफायर स्थापित किया। इस छोटे बिजली उत्पादन संयंत्र से 60 कि.वॉट से लेकर 500 कि.वॉट तक की बिजली पैदा की जा सकती है। इसमें भूसा, ढैंचा आदि स्थानीय रूप से उपलब्ध जैवीय कचड़े से चलाया जा सकता है। विवेक चतुर्वेदी का मानना है कि इससे न केवल बिजली के मामले में आत्मनिर्भर गाँवों का निर्माण किया जा सकता है, बल्कि इससे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन भी लाया जा सकता है। यह बिजली काफी सस्ती भी पड़ती है जिससे किसानों को प्रसंस्करण में लागत कम आएगी और उन्हें अपने उत्पाद का अधिकतम मूल्य मिल सकेगा। विवेक चतुर्वेदी किसानों को एक और अनुपम अनुसंधान साइथ के उपयोग की भी सलाह देते हैं। यह उपकरण गेंहू तथा अन्य फसलों की कटाई के लिए बनाया गया है। इससे किसान की कटाई की क्षमता दस गुणा बढ़ जाती है। हालांकि यह उपकरण कनाडा के अलेक्जेंडर विदो द्वारा बनाया गया है, परंतु यह भारतीय किसानों के लिए भी काफी उपयोगी है। यह इतना हल्का है कि महिलाएं भी इसका सरलता से उपयोग कर सकती हैं। यह काफी सस्ता भी है जिससे मंझोले और छोटे किसान भी इसे खरीद सकते हैं। साइथ का ब्लेड 15 वर्षों तक खराब नहीं होता।
पशु ऊर्जा और मानव ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने वाले इन उपकरणों के प्रचार के लिए विवेक चतुर्वेदी ने एक कंपनी भी बनाई है विकल्प। यह एक स्वावलंबी कंपनी है और इसका उद्देश्य किसानों को सस्ते और उपयोगी उपकरण उपलब्ध कराना है। विकल्प द्वारा और भी कई उपकरणों का अनुसंधान किया जा रहा है। उदाहरण के लिए एक उपकरण है एसआरआई सीड्स ड्रिब्बलर जो कि धान की एसआरआई से खेती के लिए बनाई गई है। एसआरआई तकनीक धान की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है, परंतु इसमें काफी परिश्रम करना पड़ता है, परंतु इस उपकरण की सहायता से किसान एक एकड़ खेत में स्वयं ही बिना किसी परिश्रम के बीजों की बुवाई कर सकता है। इससे बीज भी 70 प्रतिशत तक कम लगते हैं और उपज दुगुनी होती है।
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