परंपरागत ज्ञान से ही होगा विकास

परंपरागत ज्ञान से ही होगा विकास

गत इक्कीस जून को विश्व योग दिवस पर दुनिया भर में योग दिवस मनाया गया। लगभग 150 देशों ने बढ़चढ़ कर इसे उत्सव के रूप में मनाया, सर्वत्र उत्सव का हर्षोल्लास था। यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि निश्चित तौर पर इसके दूरगामी परिणाम होंगें। भारत ही वह देश है जहां कल्पवृक्ष, कामधेनु और पारस पत्थर की लोग बात करते है। जब कल्पवृक्ष की बात करते हैं तो यह समझना चाहिए सभी वृक्ष कल्पवृक्ष हैं क्योंकि वे फल देते है, आक्सीजन यानि जीवन देते हैं, छाया देते हैं, वर्षा का कारण बनते हैं, जिससे धन धान्य की उपज होती है। दूर तक सोचते जाइए वह सब कुछ मिलता है जो एक व्यक्ति को चाहिए। अब हम कामधेनु की बात करते है तो वही सब कुछ मिलता है जो एक स्वस्थ सम्पन्न जीवन जीने के लिए होना चाहिए। इसलिए हर भारतीय गाय कामधेनु है और वृक्ष कल्पवृक्ष हैं। ऐसी वैश्विक संकल्पनाएं जिनका भौतिक आधार होता है उनका उद्देश्य सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय होता है।
अन्तर्रिक्ष का एक उल्कापिण्ड पृथ्वी को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है, पृथ्वी की एक करवट सबकुछ समाप्त कर सकती है तूफान अपने वेग से बड़ी से बड़ी चीजों को धराशायी कर देता है। अति वर्षा हो या अल्पवर्षा पृथ्वी के जन जीवन को अव्यवस्थित कर सकती है। इसलिए इनकी शान्ति आवश्यक है। इन सबके शान्त रहने की प्रार्थना हमारी दिनचर्या का हिस्सा रहा है, यह हमारे पूर्वजों की अलौकिक एवं अद्भुत देन है। इस प्रकार का वैश्विक चिन्तन भारत की धरोहर है।
आधुनिक शोध के नाम पर पारम्परिक भारतीय विज्ञान को दरकिनार करने का षड्यंत्र भारत में योजनाबद्ध ढंग से किया जा रहा है। इसके कारण आज देश विपन्नता से ग्रस्त है। आज बड़े परिमाण में रासायनिक खेती के कारण होने वाले रोगों से सारा देश परेशान है। जबकि प्राचीन भारत में गोबर की खाद खेतों में अधिक अन्न उत्पादन के लिए प्रयोग में लाई जाती थी। रासायनिक खाद के प्रयोग ने यहां के खेतों की उर्वरक क्षमता को नष्ट कर दिया है। आज फिर खेतों की मिट्टी खराब होने के बाद गोबर के खाद की बात की जा रही है।
इसीप्रकार पहले गाय के घी को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया और रिफाइन्ड तेल खाने की वकालत की गई। पर इसके कारण लोगों को अनेक घातक बीमारियों ने घेर लिया। अब फिर से कहा जा रहा है कि गाय का घी हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। इसी प्रकार से नमक को आयोडीन नमक बनाकर बेचा गया और अब उसी पारम्परिक साधारण नमक को स्वास्थ्य के लिए अच्छा कहा जा रहा है। इससे एक बात तो तय है कि भारत में हमारा रहन- सहन और खान-पान वर्षों के अनुभव से प्राप्त परिणामों के आधार पर तय किया गया था। जिन प्रामाणिक परम्पराओं को आधुनिकता के नाम पर ध्वस्त करने कि कोशिश की जा रही है उन्हें अबतक प्राप्त परिणामों के आधार पर बचाने की तथा उन्हें प्रचारित करने की आवश्यकता है।
माननीय प्रधानमन्त्री ने योग को लेकर जिस प्रकार से वैश्विक पहल की है, उसी प्रकार से आयुर्वेद में वर्णित प्रकृति परीक्षण और आहार-विहार के पालन के लिए भी पहल करेंगे तो इससे न केवल देश का विकास होगा, बल्कि विश्व का भी बड़ा कल्याण होगा।