न्यूरोइंडोक्राइन कैंसर और आयुवेद

डॉ. भगवान सहाय
लेखक आयुर्वेद चिकित्सक हैं।


न्यूरोइंडोक्राइन ट्यूमर एक कम होने वाला रोग है और आयुर्वेद की पुस्तकों में इन व्याधियों का कोई सीधा वर्णन नहीं है। लेकिन यदि हम इसके लक्षणों और इसकी पैथोजेनेसिस को देखें तो पता चलता है कि इसमें हारमोनों विशेषकर सेरेटेनियन हारमोन का स्राव बढ़ जाता है। उसके बाद ही शेष लक्षण प्रकट होते हैं। इन लक्षणों में भी एक सामान्य बात यह है कि गति बढ़ती दिखती है, जैसे ट्यूमर बन रहा है तो कोशिकाओं का प्रजनन दर बढ़ रहा है, दूसरा लक्षण है डायरिया होना, हृदय गति का बढऩा आदि। ये सारे लक्षण शरीर में गति को बढ़ाने के हैं। इससे हमें यह पता चलता है कि वात दोष की वृद्धि हो रही है।
दूसरी बात, आम दोष भी बढ़ रहा है। यदि हम लंबे समय तक विरूद्ध आहार लेते हैं, तो उसके कारण शरीर में जो विषाक्त तत्व एकत्र होते हैं, वे शरीर में पड़े रहते हैं। कालांतर में वे आंतों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं और पूरे शरीर में फैल जाते हैं। इससे दोषी विष बनता है जिसे आयुर्वेद में आम दोष ही माना गया है। अपक्व अन्नरस ही विष के रूप में परिवर्तित होता है और लंबे समय तक बनते रहने से यही दोषी विष बन जाता है। इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखता, परंतु कुछ समय बाद इनका दुष्प्रभाव दिखने लगता है। मोटापा, कैंसर, मधुमेह आदि जीवनशैलीजन्य सभी रोग आमदोष के कारण बनने वाले दोषी विष के ही परिणाम हैं। आमदोष का मुख्य कारण विरूद्ध आहार है। आयुर्वेद में यदि हम ऐसे रोगियों की निदान करेंगे तो सबसे पहले आम की उत्पत्ति को ठीक करेंगे। आम की उत्पत्ति धातुओं की अग्नि के मंद होने से होती है। हमने खाना खाया और हमारी जठराग्नि मंद है तो खाना पचेगा नहीं और आंतों में पड़ा रहेगा। लंबे समय तक पड़े रहने पर उसका कीण्वन यानी फर्मेंटेशन होगा और उससे ज्वर, सिरदर्द, खाँसी आलस्य, डायरिया आदि रोग पैदा होंगे। फिर यह विष धीरे-धीरे शरीर में घुलने लगेगा और कोशिका के स्तर पर जाकर आम की उत्पत्ति करेगा। हमारे शरीर में सात धातुएं हैं – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र। इन सातों धातुओं की भी अपनी-अपनी अग्नियां होती हैं, जो उसका निर्माण करती हैं। वे अग्नियां मंद होने पर उस धातु की अपक्व धातु का निर्माण करती है, इससे आमधातु बनता है। जैसे आमयुक्तमांस धातु का निर्माण होने से शरीर में ग्रंथियां बनने लगती हैं।
न्यूरोइंडोक्राइन ट्यूमर भी आमजन्य ही है। यह अग्निमांद्य के कारण हो रहा है। हमारा विरूद्ध आहार और तनावयुक्त जीवन दोनों ही अग्निमांद्यता को बढ़ाते है। इसकी चिकित्सा के लिए, सबसे पहले आम का पाचन करेंगे। फिर अग्नियों को ठीक करेंगे। दूसरा, शोधन चिकित्सा की जाएगी। कोशिका के स्तर पर जो विष एकत्र हो रहा है, उसे पंचकर्म से निकाला जाएगा। पंचकर्म के बाद रसायन का सेवन करना चाहिए। ब्रह्म रसायन है, आमलकी रसायन है, अश्वगंधा रसायन है, कांचनार है, गुग्गुलु हैं। गौमूत्र का सेवन भी लाभप्रद रहेगा। वह रक्त के अम्लीयता को कम करेगा। इससे रोग को रोकने में लाभ होगा।
इस प्रकार मूलत: यह रोग आमजन्य है। आम जब वायु दोष से जुड़ता है तो इस प्रकार के लक्षण प्रकट होते हैं। यही आम जब धातुओं विशेषकर रक्त और मांस धातु के स्तर पर इस तरह की ग्रंथि और लक्षण प्रकट होते हैं। इसलिए नित्य व्यायाम करें, योग, प्राणायाम और ध्यान करें। सोंठ का सेवन करें। वह सर्वोत्तम आमपाचक है। एरंड तेल से विरेचन करके शरीर को विषमुक्त कर सकते हैं। हरड़ का लंबे समय तक प्रयोग करके भी शरीर को विषमुक्त किया जा सकता है। हरड़ को एरंड के तेल में भून लें और उसका प्रयोग करें। इससे कोशिका के स्तर तक शुद्धि होगी।
चिकित्सक के निर्देशन में पंचकर्म कराएं। शरीर की शुद्धि के बाद भविष्य में ऐसे रोग से बचने के लिए नियमित रूप से रसायनों का सेवन करना चाहिए। विरूद्ध आहार न लें। वात प्रधान आहार-विहार से भी बचें।