धर्म की स्थापना से आएगा सुराज्य

एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में स्वामी विवेकानन्द जी के दिन दो सूत्रों की समानता दिखाई देती है, उनमें से एक है धर्म को ठेस पहुंचाए बिना समाज की उन्नति की जानी चाहिए, और दूसरी बात यह कि भारत में हरेक बात को धर्म की भाषा में कहा-सुना जाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि इंग्लैंड प्रत्येक चीज को पाउंड, शिलिंग,पेंस में बताता है तो भारत प्रत्येक बात को धर्म की भाषा में बोलता है। इन दो सूत्रों के कारण पं. दीनदयाल भारतीय राजनीति को एक निश्चित दिशा देने में सफल हुए और यही करते हुए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया।

इसी बात को प्रमाणित करने हेतु स्वामी जी ने हमें अपने अतीत से लेकर वर्तमान तक होने वाले उत्थान पतन का स्मरण कराते हुए कहा कि भारत युगों से कई जातियों के जीवन का रंगमंच रहा है। नियति चक्र के उसने न जाने कितने परिवर्तन देखे हैं। उसने एक के बाद दूसरे राज्य को, एक साम्राज्य के बाद दूसरे साम्राज्य को प्रकट होते, ऊपर उठते और फिर गिरकर मिट्टी में मिलते देखा है। मानवीय शक्ति, प्रभुत्व, ऐश्वर्य और धनराशि को अपने कदमों में लुढ़कते और न्योछावर होते देखा है। अनन्त विद्या, असीम शक्ति तथा अनेकों साम्राज्यों की विशाल समाधिभूमि – यह है प्राचीन भारत भूमि का परिचय ।

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन तो आज के सम्बन्ध में हो सकता है, किन्तु जब रामराज्य की बात होती है तो कहीं न कहीं श्री राम के राज्य को लेकर ही कही जाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने बालि को मारा था तो उद्देश्य था सुराज्य स्थापित करना, चाहे वह श्रीलंका में हो या अयोध्या में। महाभारत में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने भी सुशासन की स्थापना के लिए वे सारे काम किए जो सीधी रेखा में चलने वालों के लिए असहज हो सकते हैं। वह भी धर्म की पुन: स्थापना के लिए था यानि राज्य की बिगड़ी व्यवस्था को ठीक करने के लिए। आज धर्म को लेकर बड़ा हो—हल्ला मचाया जा रहा है किन्तु चाणक्य की नीति को सराहा जाता है। आचार्य चाणक्य का भी तो उद्देश्य केवल धर्म राज्य या रामराज्य या फिर सुराज्य स्थापित करना था। उन्होंने भी राजा नंद को मरवाने से लेकर सुमोहा की हत्या तक करवाया जो राज्यनीति के विरुद्ध था। चाणक्य का विरोध राज्य के महामंत्री राक्षस ने किया किन्तु चाणक्य को पता था कि अपने—अपने काल में विरोधी सभी के थे। आलोचनाएं सभी की होती हैं, जो आलोचनाओं से डरे बिना अपने कार्यसिद्धि में लगा रहता हैं उसे ही कर्मयोद्धा कहा जाता है। आज तक के सभी महापुरुषों ने अनेकों व्याधियों को पार करते हुए समाज सुधार के जिन कार्यों को उन्होंने प्रारम्भ किया था, उसे पूरा किया। भारत में ऐसे प्रेरणा पुरुषों की कमी नहीं है। केवल उनकी नीतियों को जानने सीखने की आवश्यकता है।

भारत के कथित तथा डिग्री होल्डर, पढ़े—लिखे लोग भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते हैं तो लगता है कि उसके दोषी वही पढ़े लिखे लोग हैं जो देश को विकसित और सुव्यवस्थित नहीं देखना चाहते, भारत को अराजक और अव्यवस्थित देखना चाहते हैं। भारत की जनता जो अपने अतीत से जुड़ी हुई है उसको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी में चाणक्य और चन्द्रगुप्त दोनों का सामुहिक स्वरूप दिखाई पड़ रहा है। अपनी सरकार की दूसरी पारी प्रारम्भ करते हुए उन्होंने कहा कि सबका साथ, सबका विकास,सबका विश्वास ही हमारी नीति है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर का निर्माण, गौ, रक्षा धारा 370, 35—ए तथा निर्मल गंगा जैसे अनेक मुद्दे हैं जो सबके विश्वास को जीतने के लिए आवश्यक हैं। यह अपेक्षा और विश्वास तो किया ही जाना चाहिए कि वर्तमान सरकार वर्षों से अपेक्षित इन कार्यों को अवश्य पूरा करेगी।