धर्मग्रंथों पर आधारित है भारतीय राजनीति भी

bali-sugriv1024आनंद कुमार
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
युद्ध शुरू होने के लिए शायद आपने दुंदुभी बजाये जाने की बात कभी सुनी-पढ़ी होगी। ऐसा माना जाता है कि ये दुंदुभी एक राक्षस था जिसमें हजार हाथियों का बल था। अपनी ताकत के घमंड में चूर इस राक्षस ने समुद्र को लड़ने के लिए ललकारा। लेकिन समुद्र ने लड़ने के बदले कहा कि तुम हिमवान के पास जाओ, वो ताकत में तुम्हारे टक्कर का है। तो दुंदुभी हिमवान के पास पहुंचा और उसे ललकारते हुए उसकी चट्टानों, उसके शिखर को तोड़ने लगा। हिमवान पर कई ऋषि तप करते थे, हिमवान लड़ता तो कईयों को परेशानी होती। हिमवान देवताओं की मदद करता था इसलिए उसने इंद्र के पुत्रा बाली से मदद मांगी। बाली आये, दुंदुभी से युद्ध हुआ। बाली इतने शक्तिशाली थे कि ना केवल उन्होंने दुंदुभी को मार गिराया, बल्कि उसका शव उठाकर एक योजन दूर फेंक दिया!
अगर आप वाल्मीकि रामायण देखते हैं तो राम के सुग्रीव से मिलने के इस प्रसंग को दोबारा गौर से पढ़िए। इसमें दो तीन चीज़ों पर आपका ध्यान जाएगा। एक तो ये कि कम्बंध (दनु) राम को हथियार छोड़ कर सुग्रीव से मिलने जाने कहता है। सुग्रीव के गुप्तचर पहले ही इलाके में राम लक्ष्मण को देख लेते हैं और फिर सुग्रीव हनुमान को जांच के लिए भेजते भी हैं।
यानि खबर रखने के लिए गुप्तचर, उस दौर में भी राजा अपने इलाके में रखते थे, कोई ऐसे ही मुंह उठाये प्रवेश नहीं कर जाता था। चूँकि राम को हथियार छोड़ कर जाने की सलाह पहले ही मिल गई थी इसलिए जब आप सुग्रीव से उनकी बात चीत देखेंगे तो वो कहते हैं कि अगर मेरे धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ी होती तो मैं अभी ही बाली का वध करता! इस बात पर सुग्रीव विश्वास ही नहीं कर पा रहा था। अपने शक की वजह दिखाने के लिए वो राम को ले जा कर दुंदुभी का कंकाल दिखाता है और बताता है कि इसे मारकर बाली ने एक योजन दूर फेंक दिया था। जब राम के लात मारने से वो कंकाल दस योजन दूर जा गिरता है तो सुग्रीव कहता है ये कंकाल तो पड़ा पड़ा सूख गया है इसलिए उतना वजनी नहीं रह गया। अब वो एक शाल का वृक्ष दिखा कर कहता है कि बाली इसके आर पार तीर मार सकता है। यहाँ राम धनुष उठाते हैं और उनका तीर सात शाल के वृक्षों को छेदकर वापिस उनके पास आ जाता है।
इसके बाद कहीं जा कर सुग्रीव को विश्वास होता है कि बाली मारा जा सकता है। इस पूरे समय जहाँ सुग्रीव बाली के ऊपर विजय पाने की बात कर रहा होता है वहीँ राम उसे मारने की बात कर रहे होते हैं। सुग्रीव यहाँ जय और उसके समानार्थक शब्द इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन राम यहाँ जय-पराजय नहीं, वध की बात कर रहे होते हैं। उस काल के नियमों के मुताबिक किसी और की पत्नी का अपहरण करने वाले का वध उचित दंड था। लेकिन भारत के बहुसंख्यक समाज की ही तरह, सुग्रीव उचित दंड के बारे में सोचने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। पहली बार जब बाली और सुग्रीव लड़े तो पहचान ना पाने के कारण राम ने तीर नहीं चलाया, लेकिन दूसरी बार लड़ते समय उन्होंने बाली को मार गिराया। यहाँ फिर गिरे हुए बाली और राम की बातचीत ध्यान देने लायक है। पूरे सर्ग में राम अपने लिए “मैं” का संबोधन, संस्कृत के एक वचन “अहम्” का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यहाँ बाली को मारने के दंड के समय वो “अहम्” नहीं कहते, खुद और लक्ष्मण दोनों के लिए “अवाम” भी नहीं कह रहे हैं, यानि द्विवचन नहीं है। वो “वयं” इस्तेमाल करते हैं। ये राज्य की ओर से दंड देने जैसा है, बहुवचन “हम” का संबोधन वो खुद के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। अब जब आप में से कई लोग रामलीला देख कर, रावण वध देख कर उठे हैं तो शब्दों का हेर फेर दिखाने के लिए ये उचित समय है। रावण या बाली का “वध” क्यों था, हत्या क्यों ना थी उसे भी याद रखने की कोशिश कीजिये।
सबसे बड़ा फर्क जो सिर्फ टीवी देख कर रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य समझने की कोशिश में आता है वो हम एक बार फिर याद दिला देते हैं। जिस सस्कृत काव्य में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की बात ना हो, वो महाकाव्य कहला ही नहीं सकता।
इसलिए ये ग्रन्थ सिर्फ धार्मिक ग्रन्थ हैं ऐसा कहकर आप सिर्फ किताब का एक चौथाई पढ़ रहे होते हैं। पूरा पढ़िए। अपराध और दंड के प्रसंग सिर्फ कर्म पर नहीं, उसके पीछे की इच्छा और चेष्टाओं के आधार पर भी तय होते हैं।