देश की आत्मा है संस्कृत

देश की आत्मा है संस्कृत

किसी भी राष्ट्र व समाज को उसकी अपनी मिट्टी, अपनी परम्परा, भाषा एवं साहित्य से समझा जा सकता है, क्योंकि ये सभी तत्व उसके अस्तित्व के रक्षक एवं संवर्धक होते है। उनकी पहचान भी इन्ही तत्वों से होती है। यदि उसकी पहचान को समाप्त करना हो तो इन्हीं तत्वों पर आघात करना चाहिए। यही तत्व वहां के समाज का मन तैयार करते हैं। यही उसके राष्ट्रवाद का परिचय कराता है, क्योंकि राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं होता उसके लिए भू के अतिरिक्त वहां की संस्कृति तथा समाज की भी भागीदारी होती है। भूमि का आत्मतत्व संस्कृति है, संस्कृति का वहां का साहित्य होता है। साहित्य भी वह जो उसकी अपनी मूल भाषा में लिखित हो। आयातित भाषा में लिखा साहित्य वहां की संस्कृति का वाहक नहीं हो सकता और न ही वह उसकी प्राणरूप रक्षा कर सकता है। इसीलिए प्रत्येक राष्ट्र का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व होता है क्योंकि उसके तत्व भिन्न होते है।
भारत के विषय में यदि विचार करते है तो बाहरी रूप में हमे कुछ भ्रम पैदा होता है कि भारत को विविधाताओं का देश कहा गया। भारत को एक उपमहाद्वीप के रूप में प्रचारित किया। उसके बारे में कहा गया कि यह अनेक संस्कृतियों का सम्मिश्रण है, अन्त में यहां तक कहा गया कि इस राष्ट्र का अभी निर्माण हो रहा है। अंग्रेजों ने इसको एक करने का उपक्रम किया। यहां की कोई एक भाषा नहीं है। इसलिए यह अनेक राष्ट्रों का समूह है।यह भ्रामक प्रचार अनेक स्तर पर अनेक रूपों को किया गया। इस प्रचार का आधार थे बाह्य तत्व। शरीर के अनेक अवयव हैं, सभी के पृथक आकार-प्रकार और कार्य हैं। तो क्या इसे अनेक शरीरों को समूह कहा जा सकता है या अनेकता में एकता के दर्शन कराने वाला कहा जा सकता है? शरीर अंगों की पृथक आकृतियों के बाद भी केवल एक शरीर ही होता है। वह शरीर या अंगों का समूह नही कहलाता है। एक और महत्वपूर्ण बात जो शरीर को जीवन्तता प्रदान करती है, वह है आत्मतत्व । यह आत्मतत्व शरीर के प्रत्येक अंगों को गति देता है जीवन्त रखता है।
इसी प्रकार किसी भी राष्ट्र को जीवित रखने का कार्य वहां की संस्कृति करती है जो कि समाज की परम्पराओं, भाषा व साहित्य में प्राप्त होती है। ये परम्परायें, भाषा और साहित्य उस राष्ट्र की संस्कृति का परिचय कराते हैं। यह संस्कृति ही उस राष्ट्र की आत्मा है। भाषाएं तथा बोलियां, खान—पान, आचार-विचार पृथक होने पर भी सांस्कृतिक विरासत एक है। इसीलिए उत्तर से गंगोत्री का जल दक्षिण में रामेश्वर में महादेव के अभिषेक के लिए जाता है। देश के चारों दिशाओं में स्थापित चार धामों की यात्रा करना देश के प्रत्येक नागरिक की उसके जीवन की अप्रतिम इच्छा रखता है। इस देश की परम्पराओं एवं मान्यताओं को हमारी सांस्कृतिक विरासत के रूप में भारतीय साहित्य में संजोकर रखने का कार्य जिस भाषा ने किया है, वह भाषा भारत की एकात्मता के दर्शन कराती है। वह भाषा है संस्कृत। संस्कृत एक भाषा मात्र न होकर भारत की संस्कृति की संवाहिका है। इसी ने इस देश को राष्ट्र के रूप में एकात्मता प्रदान की है। यह भाषा ही भारत की आत्मा है। इसने भारत राष्ट्र को जीवन्तता प्रदान की है। यही भाषा हमारी पहचान करती है। अपनी भाषा और राष्ट्र के प्रति अभिमान ही जीवित समाज की पहचान है।
जिसकों न निज भाषा तथा निजराष्ट्र का अभिमान है।
वह नर नहीं पशु निरा और मृतक समान है।।