देश का पहला कन्या महाविद्यालय

Social_Kali_Krisha_Girls_High_Schoolफेसबुक पर आनंद कुमार
आमतौर पर भारत में राजनेताओं की चर्चा होती है, घोटालों की चर्चा होती है, गलती से कभी नीतियों की और कभी कभी सम-विषम संख्याओं की भी बात हो जाती है। जो विषय छूट जाता है उनमें एक प्रमुख विषय है शिक्षा। बिहार की शिक्षा व्यवस्था का लेट सेशन झेल कर तीन वर्ष का स्नातक कभी 5 कभी 7 साल में करने वाले लोग भी जब इसपर चुप्पी साधे रहते हैं, तब समझ में आता है कि भारत को आक्रमणकारी 1000 साल तक कैसे रौंदते रहे होंगे। यहाँ व्यक्तिगत भावना अक्सर सामाजिक हित से ज्यादा प्रबल हो जाती है।
ऐसा ही भावनाओं को उकसाने का मौका आज कई दल हित चिंतकों के लिए भी आया है। आज बहाना है शिक्षा पर बात करने का, विशेष तौर पर नारी शिक्षा पर बात करने का। कई लोग आज सावित्राी बाई फूले की जयंती मनाते और इसी बहाने अपने अपने राजनैतिक दलों के लिए वोट बैंक सुनिश्चित करने की कोशिश में जुटे दिखेंगे। मौके का फायदा उठकर ब्रिटिश शासन से अब तक की शिक्षा व्यवस्था पर भी बात हो सकती है।
तो जिस भारत को इंडिया नाम से जाना जाने लगा था उसमें लड़कियों के लिए पहला स्कूल पियरी चरण सरकार (जन्म 1823, मृत्यु 1875) ने शुरू किया। उस ज़माने में बारासात, कोलकाता के पास की एक जगह होती थी। सन 1847 में उन्होंने नबीन कृष्ण मित्रा और काली कृष्ण मित्रा नामक दो भाइयों की आर्थिक मदद से ये लड़कियों का स्कूल शुरू किया। आज यह स्कूल कालीकृष्ण गर्ल्स हाई स्कूल के नाम से जाना जाता है। यह ऋषि बंकिम चन्द्र रोड, बारासात, उत्तर 24 परगना में स्थित है। अभी इसमें सुबह के समय छोटी कक्षाओं के लिए और दिन के वक्त बड़ी कक्षाओं के लिए पढाई होती है। एक ब्रिटिश अफसर जॉन इलियट ने जब ये स्कूल देखा तो इसी से प्रेरित होकर कोलकाता में एक गर्ल्स स्कूल, सन 1849 में खोला। इस तरह बिना सरकारी मदद के खुलने और चलने वाला, भारतीय लोगों द्वारा स्थापित, कालीकृष्ण गर्ल्स हाई स्कूल, भारत का पहला लड़कियों का विद्यालय है।
इस स्कूल के खुलने के कुछ ही दिन बाद महात्मा ज्योतिराव फूले ने भी लड़कियों का स्कूल खोला। 1848 में बने इस स्कूल में उनकी पत्नी सावित्राीबाई फूले पहली महिला शिक्षिका थी। गुलामी के काल में ज्यादातर मंदिरों और मदरसों से चलने वाले शिक्षण संस्थान बंद करवा दिए गए थे, इसलिए इस दौर की ज्यादातर महिलाओं को उनके भाइयों या पति ने पढ़ाया था। इसी सिलसिले में बेगम रोकैया सखावत होसैन (जन्म 1880, मृत्यु 1932) का जिक्र भी होना चाहिए। उन्होंने पहले अपने भाई से और फिर अपने पति से लिखना पढ़ना सीखा और फिर लड़कियों को पढ़ाने लगी। इलाके के कट्टरपंथी मुल्लों को, लड़कियों का पढ़ना लिखना बिलकुल पसंद नहीं आया। लिहाज़ा बेगम रोकैया को उनके घर से निकाल बाहर किया गया। बिहार के भागलपुर इलाके से निकाले जाने के बाद वो कोलकाता गई और वहां लड़कियों के लिए फिर से स्कूल स्थापित किया। बेगम रोकैया ने उस दौर की महिलाओं और उनकी समस्याओं पर कई कहानियां भी लिखी हैं।
अब इनके जिक्र के बाद जरा देखते हैं कि इस मुद्दे को दल हित चिंतकों और राजनीतिज्ञों के हाथ में छोड़ने का नतीजा क्या हुआ। उस दौर में बंगाल और बिहार अलग अलग नहीं थे एक ही थे। तो बंगाल और बिहार में महिलाओं की साक्षरता दर कोई उत्साहवर्धक तो नहीं ही है, बिहार में तो लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मुफ्त साइकिल देने की योजना भी चलाई जाती है। महात्मा ज्योतिराव फूले ने एक नहीं, तीन विद्यालयों की स्थापना की थी। उन्ही में से एक में सावित्राी बाई फूले पढ़ाती थी। ये तीनो आज जीर्ण स्थिति में हैं और ऐसा ही चलता रहा तो जल्दी ही टूटेंगे।
अब गौर कीजिये कालीकृष्ण गर्ल्स हाई स्कूल पर। दलित या अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित ना होने के कारण, पहले लड़कियों के स्कूल के रूप में, कभी दल हित चिंतकों ने इस स्कूल का जिक्र करना भी जरूरी नहीं समझा। ये स्कूल अच्छा चलता है। ये स्कूल, लड़कियों की पढाई सुनिश्चित करने का अपना काम बदस्तूर जारी रखे हुए है।