दूर करें कमर का दर्द

डॉ. अनुराग विजयवर्गीय
लेखक आयुर्वेद चिकित्सक हैं।
यह एक प्रकार का आर्थराइटिस रोग है, जो कि रीढ़ की हड्डी में पैदा होता है। यह बहुत ही धीमी गति से बढ़ता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए जीर्ण रूप ले लेता है। बहुधा यह रोग पुरुषों में ही देखा जाता है। इस रोग की जब क्रमिक वृद्धि होती है, तो रीढ़ की हड्डी के स्पाइन में सूजन आ जाती है, परिणामस्वरूप रीढ़ की हड्डी के वर्टिब्रा आपस में संयोजित होकर परस्पर मिल कर जकड़ जाते हैं। आयुर्वेद में इस रोग की उत्पत्ति वात दोष के कारण होती है। कुछ आयुर्वेद विषेषज्ञों ने इस रोग का समावेष गंभीर वात-रक्त में किया है।
अर्वाचीन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस रोग का कारण अभी तक अज्ञात ही है। कुछ लोग इस रोग को आनुवांषिक मानते हैं।
लक्षण
लो बैक पेन
आरंभिक लक्षणों में प्रभावित जोड़ों में तेज दर्द एवं जकडऩ पैदा होना।
सवेरे के समय बहुत अधिक जकडऩ एवं दर्द की अनुभूतियां होना।
थकान महसूस करना।
भूख में कमी
रुक-रुक कर हलका बुखार आना।
पाचन तंत्र के विविध विकारों की उत्पत्ति होना।
गरदन, कंधों, घुटनों, टखनों के जोड़ों का भी प्रभावित होना।
पीडि़त व्यक्ति का स्थायी रूप से सामने की ओर झुकना इस रोग का अतिविशिष्ट निश्चयात्मक लक्षण है।
उपचार
इस रोग का उपचार करते समय चिकित्सकों का सारा ध्यान सूजन एवं दर्द को नियंत्रित करने पर ही होता है। हालांकि अर्वाचीन चिकित्सा पद्धति में बेहतरीन दर्द निवारक एवं सूजन को हटा देने वाली औषधियां सुलभ हैं, कुछ चिकित्सक स्टीराइड औषधियों का सेवन भी कराते हैं, लेकिन इन सब औषधियों के दुष्प्रभाव भयानक हैं।
आयुर्वेदिक उपचार
एक स्वानुभूत एवं अचूक उपचार, जिससे रोगी को अल्प समय में ही चमत्कारिक लाभ मिला है, प्रस्तुत है।
महावातविध्वंसन रस – 10 ग्राम
आरोग्यवर्धनी वटी – 20 ग्राम
वातगजांकुष रस – 10 ग्राम
त्रयोदषांग गूगल – 20 ग्राम
गोदंती भस्म – 10 ग्राम
इन समस्त औषधियों को एक साथ मिलाकर साठ पुडिय़ा बनालें। एक-एक पुडिय़ा सवेरे – सायं खाली पेट हलके गरम पानी के अनुपान के साथ सेवन करें। औषधि खाली पेट सेवन करने पर अधिक शीघ्र सुपरिणामों की प्राप्ति होती है। औषधि सेवन करने से पहले एवं बाद में आधा से एक घंटे तक आहार ग्रहण नहीं करें।
एक और विशिष्ट प्रयोग जो घर पर तैयार किया जा सकता है और काफी लाभकारी भी है। निम्न औषधियां एकत्र कर लें। कुछ तो रसोई में होती ही हैं, शेष पंसारी के यहां से मंगा लें।
हलदी-50 ग्राम, मेथी-50 ग्राम, सौंठ-50 ग्राम, अष्वगंधा-50 ग्राम, चोपचीनी-50 ग्राम, सफेद मिर्च-50 ग्राम, कलौंजी-50 ग्राम, अजवायन-50, ग्राम, हालू के बीज-50 ग्राम, खसखस-50 ग्राम
मीठा सुरंजान-50 ग्राम
इन सब औषधियों को अलग-अलग बारीक कूट-पीसकर छानलें। तत्पष्चात एक साथ मिलाकर किसी डिब्बे में सुरक्षित रखलें। यह चूर्ण एक से तीन ग्राम की मात्रा में सवेरे-सायं हलके गरम पानी के अनुपान से सेवन करें। गरम तासीर की औषधि होने के कारण ग्रीष्म काल में मात्रा रोगी की प्रकृति के अनुसार कम-ज्यादा की जा सकती है।
सेवन नहीं करें – दही, लस्सी, अचार, इमली, अमचूर, ठंडा पानी, आइसक्रीम, विविध शीतल पेय, फ्रीज का पानी, ठंडी हवा का सेवन, विविध फास्ट फूड, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ। मल-मूत्रादि के वेगों को भूलकर भी नहीं रोकें। ड्राइविंग एवं लम्बी यात्राएं हानिप्रद हैं। ऐसे रोगियों को रात के समय मूली, खीरा, चना, बेसन, कढ़ी, अरबी, राजमा, भिंडी इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। देर रात में किया गया भोजन भी नितांत हानिप्रद माना गया है।
सेवन करें – अदरक, सौंठ, लहसुन, केसर, कुलथी, प्याज, हलका गरम पानी, घी। इस रोग से पीडि़त व्यक्ति को लघु एवं सुपाच्य भोजन ग्रहण करना चाहिए।
योग एवं प्राणायाम
उत्तान पादासन, पश्चिमोत्तानासन, पवन मुक्तासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, द्रोणासन, चक्रासन, वक्रासन, कटिचक्रासन, मत्स्येन्द्रासन।
नाड़ी शोधन और भ्रामरी प्राणायाम
इस प्रकार के रागियों के बढ़े हुए वजन को नियंत्रित करना बहुत ही जरूरी होता है। कब्ज से बचना भी जरूरी है। अत्यधिक परिश्रम करना भी हानिप्रद माना गया है। ऐसे रोगी को पर्याप्त विश्राम करना चाहिए।