दुगुनी नहीं, दसगुनी हो सकती है किसानों की आय

दुगुनी नहीं, दसगुनी हो सकती है किसानों की आय

जे पी शर्मा
संयुक्त निदेशक, प्रसार, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान
आज देश में किसानों की आय को दुगुना करने की बात हो रही है। परंतु हम देख रहे हैं कि पिछले कई वर्षों से किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा उपाय है जिसेस किसानों की आय को दुगुनी की जा सके? या फिर कम से कम उसे भूखा न मरना पड़े, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए? मेरे विचार में ऐसे ढेर सारे उपाय हैं।
किसानों की आय को दुगुना करना बिल्कुल संभव है, बल्कि मैं तो कहता हूँ कि इसे केवल दुगुना ही नहीं, कई गुना बढ़ाया जा सकता है। ऐसा करने के लिए आज की योजनाओं, विज्ञान की तकनीकियों और सफल किसानों के अनुभवों को किसान भाइयों को अपनाना होगा। इसके लिए मैं पाँच-सात बिंदुओं की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा। किसानों की आय को बढ़ाने का पहला तरीका तो यह होगा कि पैदावार बढ़ाई जाए। पैदावार बढ़ाने की संभावना तो कई राज्यों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा आदि कुछ ऐसे राज्य हैं जहाँ का उत्पादन स्तर कम है। उसे बढ़ाया जाए। परंतु यह ध्यान रखें कि पैदावार बढऩे से हमेशा आय नहीं बढ़ती। कई बार पैदावार बढऩे से आय घट भी जाती है। पैदावार अधिक हुई और मूल्य घट गया तो उसे हानि ही होगी। कई बार अधिक उत्पादन के कारण पैदावार को सड़कों पर फेंके जाने की घटनाएं भी सामने आती हैं।
इसलिए केवल पैदावार बढ़ाने से किसान की आय को बढ़ाना सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। दूसरा उपाय है खेती करने में आने वाली लागत को कम करना। इसके लिए ढेर सारी तकनीकी उपलब्ध है। लागत का पहला हिस्सा है जुताई। गाँवों में छह-छह आठ-आठ बार जुताई करना आम बात है। मुझे याद आता है कि जब मैं गाँव में था तो 16 बार तक जुताई की जाती थी। मटका गिरा कर देखा जाता था कि वह न फूटे, तभी खेत तैयार माना जाता था। अब शून्य जुताई की तकनीक आ गई है। खेत जोतना ही नहीं है। जैसे धान कटने के बाद जुताई करने से खेत की नमी घट जाती है। इसलिए उसे जोते बिना अगली बुवाई करें। इससे उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता। इस तकनीक से हरियाणा के मेवात, गुडग़ाँव आदि क्षेत्रों में सैंकड़ों एकड़ की खेती हो रही है। इससे भी लागत घटती है।
दूसरी तकनीक पानी के उपयोग की है। आमतौर पर खेत समतल नहीं होते, ऊँचे नीचे होते हैं। उनमें पानी भरने में समय लगता है और अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी बजाय छिड़काव पद्धति या फिर बूंद-बूंद पद्धति से सिंचाई की जा सकती है। इसमें पानी की खपत कम होती है। कई गाँवों में हमने देखा है कि बूंद-बूंद पद्धति या फिर छिड़काव की सुविधा नहीं होने पर किसानों ने मटके में छेद करके बूंद-बूंद टपकाने की व्यवस्था की है।
तीसरी बड़ी लागत होती है खाद की। आमतौर पर किसानों को पता नहीं होता कि उसके खेत में किस चीज की कमी है। किसान क्या करते हैं कि जब भी फसल कमजोर हुई कि यूरिया डाल दिया। यूरिया यानी नाइट्रोजन। इससे फसल तो बढ़ जाएगी, परंतु यूरिया का काम है हरित भाग को बढ़ाना, परंतु इससे उस दाने अच्छे नहीं होंगे। इससे आपकी लागत तो बढ़ गई, परंतु आपको उसका कोई लाभ नहीं हुआ। जमीन खराब हुई, वह अलग। खेतों में जो भी रासायनिक खाद हम डालते हैं, उसका प्रतिशत पानी के साथ जमीन में चले जाते हैं। इससे प्रदूषण होता है। पौधा बढ़ जाने से कई बार तेज हवा चलने पर फसल गिर जाती है। इससे भी किसान को नुकसान हो जाता है। इसलिए सरकार ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड की योजना निकाली है। मिट्टी की जाँच कराएं और उसमें जिसकी कमी है, केवल वही खाद डालें। एक और उपाय यह भी कर सकते हैं जैविक खाद का प्रयोग करें।
जैविक खाद के लिए गोबर गैस संयंत्र से निकलने वाली स्लरी का प्रयोग करना चाहिए। आमतौर पर गोबर गैस संयंत्र को प्रमुखत: गैस के लिए बनाया जाता है। चीन में हमारे यहाँ से अधिक संख्या में गोबर गैस संयंत्र हैं, परंतु वे इसका प्रमुख उपयोग स्लरी के लिए करते हैं। हम यह विचार कर रहे हैं कि इसका नाम ही बदल दें। इसे गोबर गैस संयंत्र की बजाय खाद-फैक्ट्री कहें। इससे इसकी स्लरी के उपयोग की ओर ध्यान जाएगा। कई इलाकों में किसानों में इसकी स्लरी को पानी में मिला कर उसका खेतों में छिड़काव करने की भी व्यवस्था की है। इससे इसका अधिक बड़े क्षेत्रफल में उपयोग हो पाता है।
गाँवों में गोबर बेकार हो रहा है। उसे एक स्थान पर एकत्र कर दिया जाता है। पहले उसे गड्ढे में एकत्र किया जाता था जिसे घूरा कहते थे। उस गड्ढे में वह सड़ता था। साल भर बाद उसे निकाल कर खेत में डाला जाता था। परंतु सड़क किनारे पड़ा गोबर का नाइट्रोजन निकल चुका होता है और वह सड़ता नहीं, इसलिए खाद नहीं बन पाता। उसे डालने से खेतों में दीमक की समस्या बढ़ जाती है। अब तो ऐसी तकनीकें आ गईं हैं कि इसे केवल डेढ़-दो महीनों में ही सड़ा कर खाद बनाया जा सकता है। इन तकनीकों का उपयोग करने से खाद में लगने वाली लागत को कम किया जा सकता है।
किसानों की आय को बढ़ाने का एक और तरीका हो सकता है अधिक गुणवत्ता का उत्पाद पैदा करना। कभी एक समय यह स्थिति थी कि हमें अपना पेट भरने की ही चिंता करनी थी। अब ऐसी स्थिति है कि पेट भरने के अलावा भी हमारे पास 60 करोड़ टन अनाज उपलब्ध है। इसलिए अब गुणवत्ता वाले उत्पाद की बात हो रही है। क्या हम अधिक पोषक अनाज पैदा कर सकते हैं? क्या हम ऐसा उत्पाद पैदा कर सकते हैं जिसमें आयरन अधिक हो? यह संभव है। ऐसे अनेक शोध हुए हैं और ऐसे अनेक उत्पाद उपलब्ध भी हैं। फिर जैविक उत्पाद हैं। देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो जैविक और अधिक गुणवत्ता वाले सामान के लिए अधिक पैसा खर्चने के लिए तैयार हैं। इसलिए गुणवत्तायुक्त उत्पादन से भी किसान अधिक कमाई कर सकते हैं। ऐसे अनेक किसान हैं जो दुगुनी कीमत पर अपना उत्पाद बेच रहे हैं।
किसान की आय बढ़ाने का एक और उपाय है फसल को नष्ट होने से बचाना। हमारे देश में उत्पादन में वृद्धि की दर केवल 3-4 प्रतिशत है, परंतु बर्बाद होने की दर अनाज में 15-20 प्रतिशत और सब्जी तथा फल में यह 40 से 45 प्रतिशत तक चला जाता है। बर्बादी कई स्तर पर होती है। फसल कटने के बाद बारिश आ जाने से, भंडारण में बर्बाद होता है और फिर परिवहन में बर्बादी होती है। इस प्रकार किसान जितनी पैदावार को बढ़ा नहीं पाता, उतना वह फसल की बर्बादी को सहन करने के लिए अभिशप्त होता है। यदि वह इस बर्बादी को कम कर सके तो बिना किसी लागत के आपनी आय को बढ़ा सकेगा। सरकार का भी इस ओर ध्यान गया है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय पहले कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आता था, उसे एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया गया है। सरकार का भी जोर है प्रसंस्करण और भंडारण पर। इन दोनों उपायों से बिना लागत लगाए और बिना उत्पादन बढ़ाए लाभ कमाया जा सकता है।
किसान की आय को बढ़ाने का एक और उपाय है खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन। हमारे देश में मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण किसान के स्तर पर होता ही नहीं है। ब्राजील, मलेशिया, अमेरिका जैसे अन्य देशों में किसान के स्तर पर ही अधिकांश मूल्य संवर्धन हो जाता है। मलेशिया में तो 85 प्रतिशत तक मूल्य संवर्धन का काम किसान के स्तर पर ही हो जाता है। हमारे देश में मूल्य संवर्धन का काम किसान के स्तर पर शून्य है और संस्थाओं के स्तर पर सात प्रतिशत और सब्जियों के मामले में केवल दो प्रतिशत है। इससे दो नुकसान हैं। पहला तो उत्पाद की बर्बादी होती है। सेब को एक महीने ही रख सकते हैं, परंतु उसके जूस को कई महीने रखा जा सकता है। इससे उसकी बर्बादी समाप्त हो जाती है। दूसरा नुकसान यह है कि अच्छे दाम नहीं मिलते। उदाहरण के लिए यदि टमाटर अधिक हो गए तो उसका मूल्य गिर जाता है। परंतु यदि उसका केचप बना लिया जाए तो वह अधिक समय तक रह सकता है और कई गुणा अधिक मूल्य पर बिकता है। इसी प्रकार अन्य उत्पादों का भी मामला है। इसमें काफी अधिक संभावना है।
प्रसंस्करण के बाद उसके मार्केटिंग में भी हम कमजोर हैं। किसान तो मार्केटिंग में और भी पीछे है। उदाहरण के लिए हल्दी है। पाँच किलो हरी हल्दी को सुखा लिया जाए तो एक किलो पाउडर बनता है। पाँच किलो हल्दी अधिक से अधिक 40 रूपये की होती है, लेकिन उसका पाउडर हो गया दो सौ रुपये किलो। यह तकनीक तो किसानों के पास है कि हल्दी का पाउडर कैसे बनाया जाए परंतु उसे बाजार तक कैसे ले जाया जाए, यह सहयोग उसे नहीं मिल पाता। इसलिए अब इस पर भी सामूहिक मार्केटिंग पर जोर बढ़ा है। सरकार भी इस पर ध्यान दे रही है। खेती को व्यवसाय बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
अनेक किसानों ने सामूहिक मार्केटिंग का लाभ भी उठाया है। बुलंदशहर में कर्नल देशवाल हैं। वे पीली गाजर की खेती करते हैं। वे दिल्ली बेचने आए, परंतु यहाँ उन्हें ठीक मूल्य नहीं मिला। वे वापस चले गए। फिर उन्होंने किसानों को संगठित किया। आज उसके आजपास के छह सौ हेक्टेयर में सभी किसान केवल पीली गाजर की खेती करते हैं। सारी बड़ी बड़ी कंपनियां उनसे खरीद रही हैं और वे अपने उत्पाद का मूल्य स्वयं तय करते हैं। आज कर्नल देशवाल को कैरोट किंग कहा जाता है। ऐसे और भी ढेर सारे उदाहरण हैं।