दीनदयाल उपाध्याय का कृषि संबंधी चिंतन खूब बढ़ाएं अन्न, सबको मिले भोजन

डॉ. जितेंद्र बजाज
निदेशक, समाजनीति अध्ययन केन्द्र, चेन्नई


दीनदयाल जी का पर कृषि संबंधी विस्तृत समेकित विचार उनकी पुस्तक ‘भारतीय अर्थनीति—विकास की एक दिशा’ में हुआ है। इस पुस्तक में उन्होंने अपने समय की कृषि से जुडे समस्त विषयों का विस्तृत विश्लेषण किया है। कृषि भूमि क्या है? कृषिभूमि पर बढ़ते भार, जोत के स्वामित्व एवं अधिकतम जोत का निर्धारण, चकबंदी, भूमि—वितरण, सहकारी खेती, खेती उत्पादों का मूल्य निर्धारित एवं विपणन आदि संस्थागत प्रश्नों और खेती की पद्धति में अपेक्षित परिवर्तन, सिंचाई की व्यवस्था, भूक्षरण का प्रतिरोध, रासायनिक उर्वरक अथवा खाद का उपयोग, बैल अथवा ट्रैक्टर की सापेक्ष उपयोगिता, कृषि के लिए उपयुक्त उपकरण, उन्न्त बीजों की व्यवस्था, खेती की उत्पादकता में वृद्धि जैसे तकनीकी प्रश्नों पर विस्तृत चर्चा यहां हुई है। इन सब विषयों पर वे राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय तथ्यों एवं आंकड़ों को भारत की तात्कालिक स्थिति एवं भारतीय संस्कृति की मूल चेतना के परिप्रक्ष्य में रखते हुए गहन विचार करते हैं। इनमें से बहुत से प्रश्न अब समकालिक नहीं रहे, अनेक का किसी न किसी प्रकार का समाधान हो चुका है और अनेक अब भी विकट प्रश्न बने हुए हैं। पर उनके इस विस्तृत विश्लेषण से यह तो स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि में भारतीय जनजीवन एवं भारतीय अर्थनीति में कृषि का कैसा केंद्रीय स्थान था और कृषि के विषय में उन्होंने कितनी गहनता से जानने का प्रयास किया था। अब भारतीय राजनीति में कृषि के प्रति वैसी चिंता, वैसा आग्रह, नहीं रहा। भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में समसामयिक समस्याओं को देखने का आग्रह तो स्वतंत्रता के उपरांत की भारतीय राजनीति के कदाचित् पहले भी बहुत नहीं था, वह तो दीनदयाल उपाध्याय की अपनी विशेषता थी।
कृषि की प्रधानता
कृषि संबंधी उनके सर्व आयामी चिंतन के कुछ दीर्घकालीन मूलभूत आयामों का ही वर्णन हम यहां करेंगेे। इनमें सर्वप्रथम है, अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रधानता। भारतीय चिंतन में अर्थव्यवस्था का समानार्थक शब्द है — वार्ता। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य, ये तीनों ही वार्ता हैं, यह तीनों ही मुख्य आर्थिक कार्य हैं। अर्थनीति में दीनदयाल उपाध्याय इससे भी आगे जाते हुए कहते हैं कि ये तीनों कृषक के ही कार्य हैं। शुक्रनीति से वे वैश्य की निम्र परिभाषा देते हैं—
जो क्रय-विक्रय में कुशल हैं, पशुरक्षा तथा कृषि करते हैं, वे विश्व में वैश्य के नाते कीर्ति प्राप्त करते हैं। इस पर टिप्पणी करते हुए दीनदयाल उपाध्याय कहते हैं कि भारत में तो ”किसानी और व्यापार दोनों ही कार्य एक साथ रखे गये हैं, जबसे वैश्य ने केवल वाण्ज्यि ही अपने पास रख लिया तथा अपना दूसरा काम छोड़ दिया तबसे ही विषमता पैदा हो गई।”वास्तव में भारत की बहुत सी भाषाओं में कृषक के लिये व्यवसायी शब्द का ही उपयोग होता है, क्योंकि कृषि प्रमुख व्यवसाय है और अन्य सब व्यवसाय इसके अंतर्गत आ जाते हैं।
लोकजीवन में कृषि की इस प्रधानता का उल्लेख शास्त्रीय साहित्य में पुन: पुन: हुआ है। शान्तिपर्व के एक प्रारंभिक अध्याय में युधिष्ठिर को वार्ता एवं कृषि का महत्व समझाते हुए, भीष्म कहते हैं – कृषि, गोरक्षा एवं वाणिज्य तो इस लोक में प्रजा का जीवन ही हैं। आगे भीष्म कहते हैं— कहीं कृषक तुम्हारे असह्रा आहरण से पीडित हो राष्ट्र छोडकर तो नहीं जा रहे? निश्चय ही कृषक ही राजा का बोझ अपने कन्धों पर उठाते हैं और वही राष्ट्र में अन्य सब का भरण करते हैं। इस प्रकार कृषि के महत्व की बातें शान्तिपर्व में चलती ही जाती हैं।
दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में भी कृषि का वैसा ही मूलभूत स्थान है। अर्थव्यवस्था की प्राथमिकताओं का आकलन करते हुए वे कहते हैं कि ”रोटी, कपड़ा मकान, पढ़ाई और दवाई, ये पांच ऐसी आवश्यकताएं हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की पूर्ण होनी चाहिएं”, पर ”इन पांचों मौलिक आवश्यकताओं में भी ‘खाद्य’ एक ऐसी आवश्यकता है जिसके बिना प्राणिमात्र जीवित नहीं रह सकता। अन्न ही जीवन है। ऐसी कोई भी अर्थव्यवस्था जो पर्याप्त खाद्य की उपलब्धि नहीं करा सकती, टिक नहीं सकती।” और खाद्य का उत्पादन तो कृषि से ही होता है, ‘कृषि ही मानव के खाद्य का मुख्य सहारा है’। यह सब विचार करने के बाद वे इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि अर्थव्यवस्था में कृषि सर्वोपरि है। अर्थव्यवस्था में पहली प्राथमिकता कृषि की ही हो सकती है, दूसरा स्थान उद्योग का है, तीसरा वाणिज्य का और चौथा सर्विस सैक्टर का। आज भारत की अर्थव्यवस्था की प्राथमिकताएं इस क्रम के ठीक विपरीत है। सर्विस सैक्टर एवं वाणिज्य का सकल राष्ट्रीय उत्पादन में पहला स्थान है, उद्योग का द्वितीय स्थान है और कृषि अंतिम स्थान पर है। यह स्थिति कोई आज बनी हो ऐसा नहीं है। स्वतंत्रता के उपरांत के प्राथमिक वर्षों में ही यह क्रम स्थापित हो गया था। नेहरूवादी अर्थनीति में तो सेवाओं में नौकरियां देकर एक पर्याप्त बड़े मध्यमवर्ग की स्थापना करना ही राष्ट्रविकास का पर्याय मान लिया गया था। इस दृष्टि में सेवाओं के पश्चात् दूसरा स्थान उद्योग का आता था। कृषक की भूमिका सेवाओं एवं उद्योग में लगे लोगों के लिये अपना पेट काट कर अन्न और कच्चा माल देने की थी। दीनदयाल उपाध्याय के समय इस दृष्टिकोण की खुली चर्चा हुआ करती थी, इसका वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि ”कुछ लोगों का मत है कि किसानों को प्रारंभिक भार वहन करना चाएहए। जबरिया गल्ला वसूली, कच्चे और पक्के माल के दामों में अंतर तथा खेती में पट्टेदारी की ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे किसान अपना जीवनस्तर ऊपर उठाने की अपेक्षा अन्यों के लिए कृषि-सामग्री जुटाता और उन्हें आवश्यक बाजार प्रदान करता रहे।” पर दीनदयाल उपाध्याय का अपना स्पष्ट मत है कि ”यह तर्क भ्रममूलक है। …कृषि आय को बिना बढ़ाये उद्योगों को भी नहीं टिकाया जा सकता। किसान अपनी बचत के बदले में जितनी अधिक औद्योगिक वस्तुएं खरीद सकेगा उतना ही अधिक लोगों को कृषि से इतर पेशों में काम मिल सकेगा।” आगे वे कहते हैं कि कृषि से ”बाजार के लिए अतिरिक्त उत्पाद प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय है कृषि की पैदावार बढाना। जब कृषक अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पन्न करेगा तथा उसे अपना जीवन-स्तर ऊँचा उठाने के निमित्त औद्योगिक माल की आवश्यकता होगी तो कृषि और उद्योग दोनों एक दूसरे के पूरक हो सकेंगे।”
कृषि एवं कृषक का शोषण कर उद्योगों के लिए स्थान बनाने के नेहरूवादी मत अथवा कृषि एवं कृषक को प्राथमिकता देकर, उनकी आय बढ़ाकर, उद्योगों के लिये भूमि तैयार करने के दीनदयाल उपाध्याय के मत के बीच बहुत समय तक भारत में ही नहीं, अन्य विकासशील देशों में भी वाद-विवाद चलता रहा। समय पाकर बहुत से देश कृषि के संबंध में दीनदयाल उपाध्याय वाले मत पर पहुंचे, कृषि उत्पाद और कृषक की आय में वृद्धि को उन्होंने राष्ट्र-विकास का पहला सोपान माना। ऐसे अधिकतर देश अब कृषि एवं उद्योग दोनों में ही भारत से आगे हैं। भारत में अर्थव्यवस्था नेहरूवादी दृष्टिकोण पर ही चलती रही। आज प्रतिव्यक्ति अन्न-उत्पादन के मापदण्ड पर विश्व के प्रमुख देशों और अपने समकक्ष रहे प्राय: सब विकासशील देशों की अपेक्षा बहुत पीछे हैं और यही पिछड़ापन उद्योग एवं विकास के अन्य पहलुओं में भी दिखायी देता है। दीनदयाल उपाध्याय ने कृषिसंबंधी अपनी इस नीति का प्रतिपादन 1958 में किया था। यदि उस समय देश कृषि को प्राथमिकता देने की दिशा में चल निकला होता तो आज निश्चित ही भारत विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होता । भारत की अर्थव्यवस्था में स्थापित नेहरूवादी प्राथमिकताओं को पलटने और कृषि को सबसे ऊपर नहीं तो उद्योग एवं सेवाक्षेत्र के समकक्ष प्राथमिकता देने की बात तो पहली बार पिछले सामान्य चुनाव में दीनदयाल उपाध्याय की जनसंघ के उत्तराधिकारी दल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी से ही सुनी गयी है। इतने दशकों बाद भी यदि देश उनके दिखाये मार्ग पर चल निकलता है, कृषि विकास को राष्ट्रनिर्माण के प्रथम सोपान के रूप में देखने लगता है, तो यह राष्ट्र के लिए श्रेयस्कर ही होगा।

उच्चकृषि एवं अदेवमातृका कृषि
दीनदयाल उपाध्याय केवल कृषि को प्रथम प्राथमिकता देने और कृषि की पैदावार बढाने की बात ही नहीं करते, अर्थनीति में वे इसके लिए उपयुक्त उपायों पर भी विचार करते हैं। उन्नत बीजों की आवश्यकता पर बल देते हैं, अच्छे औजारों की उपलब्धि की बात करते हैं। रासायनिक उर्वरकों एवं जैविक खाद के सम्यक संतुलित उपयोग की बात करते हैं। आज शुद्ध जैविक खेती की बहुत चर्चा होती है। पर दीनदयाल उपाध्याय तो सिद्धांत और व्यवहार को सर्वदा इकट्ठा लेकर चलते हैं। इसलिये वे रासायनिक उर्वरकों का निषेध नहीं करते अपितु ‘उपयुक्त एवं योग्य मात्रा में खाद एवं उर्वरक का उपयोग’ करने की बात कहते हैं। उर्वरकों का उपयोग ‘गोबर आदि की खाद के साथ मिलाकर सीमित मात्रा में करने’ की बात कहते हैं। आज भी खेती से ऊँची पैदावार पाने का विज्ञानसम्मत ढंग यही माना जाता है ।
पर खेती में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान तो सिंचाई का है। सिंचाई पर अर्थनीति में बहुत विस्तार से विचार हुआ है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय बात है कि कृषि को ‘अदेवमातृका’ बनाने की बात कह कर दीनदयाल उपाध्याय सिंचाई के विषय को भारत की चिरंतन परंपरा के साथ जोड़ देते हैं। भारत में सिंचाई की परंपरा बहुत पुरानी है। भारतीय सभ्यता में प्राचीन काल से राजाओं एवं समस्त प्रजा से यह अपेक्षा रही है कि वे कुंओं, तालों, वापियों एवं नालों—नहरों आदि का समुचित प्रबंध एवं सरंक्षण करते रहें, कृषि को कभी वर्षा की स्वाभाविक न्यूनाधिकता पर निर्भर न रहने दें, कृषि को मात्र दैव के सहारे न छोड़ें, उसे सर्वदा अदेवमातृका बनाये रखें।
महाभारत के सभापर्व में जब नारदमुनि युधिष्ठिर को मिलने इंद्रप्रस्थ आते हैं, तब वे राष्ट्र के विभिन्न पक्षों के कुशल—मंगल की ओर युधिष्ठिर का ध्यान आकृष्ट करते हुए उनसे कृषि के संरक्षित एवं सुव्यवस्थित होने के विषय में विशेष विस्तार से पूछते हैं। इस संदर्भ में नारद मुनि कहते हैं— तुम्हारे राज्य के सभी भागों में खेतों की सिंचाई के लिए विशाल तडाग तो बना दिये गये हैं न? ये सब तडाग जल से परिपूर्ण तो रहते हैं? कहीं कृषि मात्र वर्षा के जल पर तो निर्भर नहीं? खेती को देवमातृका तो नहीं छोड़ दिया गया?”आगे वे कहते हैं — कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे राज्य के कृषक अन्न अथवा बीज में कष्ट पा रहे हों। ऐसी स्थिति में तुम उन पर अनुग्रह कर एक प्रतिशत ब्याज पर ऋण तो दिया करते हो न?”
वाल्मीकीय रामायण में भरत श्रीराम को मिलने जब चित्रकूट पहुंचते हैं तब श्रीराम उनसे कोशल राज्य के कुशलक्षेम के विषय में वैसे ही विस्तृत प्रश्न पूछते हैं जैसे नारदमुनि सभापर्व में युधिष्ठिर से पूछ रहे हैं और श्रीराम के प्रश्नों में भी कृषि को अदेवमातृका बनाए रखने की बात आती है। यह पूरा संदर्भ इतना सुंदर एवं अर्थगर्भित है कि यहां इसका कुछ लंबा उद्धरण देना समुचित लगता है। राम भरत से पूछते हैं—
”रघुकुल के भरत! जिस अपने कोशल देश में शत—शत चैत्यस्थान हैं, जो सुव्यवस्थित बस रहे असंख्य जनों से आकीर्ण है, अनेक देवस्थान, प्रपात एवं तडाग जिसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, जहां के नर—नारी सदैव प्रसन्न रहे हैं, सामाजिक उत्सवों से जो सदा सुशोभित होता रहता है, जो कृषि करने में समर्थ पशुओं से भरा-पूरा है, जहां हिंसा वर्जित है, जहां खेती मात्र वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहती, जिस रम्य देश में हिंसक पशु प्रवेश नहीं कर पाते, जहां किसी प्रकार का भय नहीं रहता, जो विभिन्न प्रकार की खानों से सुशोभित है, जहां पापी मनुष्य कदापि नहीं रहा सकते और जो हमारे पूर्वजों से सर्वदा सुरक्षित रहा है, ऐसा अपना कोशल देश भरत! सुख—समृद्धि से सम्पन्न तो है? वहां सब सुखपूर्वक रह रहे हैं न?
कोशल देश का यह वर्णन ही वास्तव में राम राज्य की व्याख्या है और इसमें अवेदमामृका कृषि का केन्द्रीय स्थान है। कृषि को अदेवमातृका बनाये रखने के भारतीय सभ्यता के इस सनातन आदेश को स्वीकार कर भारतीय परंपरा के सब राजा सर्वदा सिंचाई की उचित व्यवस्था करने को प्रयत्न करते रहे हैं। सिंचाई नीति के संदर्भ में अदेवमातृका शब्द का उपयोग कर दीनदयाल उपाध्याय आज की नीति को उस पुरातन उच्च परंपरा से जोड़ते हुए आज के भारतीय राज्य को उस परंपरा का वाहक बने रहने के उत्तरदायित्व का स्मरण करवाते हैं।
कृषिसंबंधी दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन का सार यही है कि वे भारत की सनातन परंपरा के अनुरूप अर्थव्यवस्था में कृषि को प्रधानता देते हैं और राज्य से सब प्रकार से उत्तम, उन्नत एवं अवेदमातृका सिंचित कृषि की व्यवस्था करने की अपेक्षा रखते है।

सबके लिए भोजन
दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में कृषि का ऐसा विशेष महत्व इसलिये भी है क्योंकि उनके अनुसार खाद्य मानव मात्र की पहली आवश्यकता है और ‘कृषि ही मानव के खाद्य का मुख्य सहारा है’। कृषि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वे इतने आतुर इसीलिए हैं क्योंकि वे मानते हैं कि भोजन तो सबको मिलना ही चाहिए। एकात्म मानववाद पर अपने चौथे भाषण में वे अपना वह सुपरिचित नारा देते हैं— ‘कमाने वाला खिलाएगा’ और ‘जन्मा सो खाएगा’। दीनदयाल उपाध्याय इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि ”खाने का अधिकार जन्म से प्राप्त होता है। कमाने की पात्रता शिक्षा से आती है। समाज में जो कमाते नहीं वे भी खाते हैं। बच्चे, बूढ़े, रोगी, अपाहिज सबकी चिंता समाज को करनी पड़ती है। प्रत्येक समाज इस कर्तव्य का निर्वाह करता है। मानव की सामाजिकता और संस्कृति का मापदण्ड इस कर्तव्य के निर्वाह की तत्परता ही है। इस कर्तव्य के निर्वाह की क्षमता पैदा करना ही अर्थशास्त्र का काम है।”
सब जानते हैं कि दीनदयाल उपाध्याय को सबको काम उपलब्ध करवाने पर भी बहुत आग्रह था। परन्तु वे खाने के अधिकार को काम करने के अवसर अथवा कर्तव्य के साथ नहीं जोड़ते। वे स्पष्ट करते हैं कि हमारा लक्ष्य ‘कमाने वाला खायेगा’नहीं अपितु ‘खाने वाला कमायेगा’ ही हो सकता है। हम अपनी अर्थव्यवस्था ऐसी बनायें जिसमें प्रत्येक खाने वाले को काम का अवसर मिल पाये, ‘प्रत्येक स्वस्थ एवं सवय व्यक्ति के लिए अपनी गृहस्थाश्रम की आयु में जीविकोपार्जन की व्यवस्था’ हो पाये। पर खाने का अधिकार काम के अवसर पर निर्भर नहीं है। खाना तो सबको मिलना ही है। सबको खाना उपलब्ध करवाना तो मानव की सामाजिकता एवं संस्कृति का मापदण्ड है। कृषि का ऐसा गहन महत्व इसीलिए है कि अच्छी कृषि के बिना कोई समाज सामाजिकता एवं संस्कृति के इस मूल मापदण्ड पर पूरा नहीं उतर सकता।
सबको भोजन उपलब्ध करवाने का दीनदयाल उपाध्याय का यह आग्रह भी भारतीय संस्कृति के अधिष्ठान से ही आता है। भारतीय चिंतन में समाज में अन्न के प्राचूर्य को बहुत महत्व दिया गया है और साथ ही यह अनुल्लंघनीय अनुशासन निश्चित किया गया है कि अपने आसपास के सब मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों की क्षुधा को शांत करने के बाद ही गृहस्थ के लिए स्वयं भोजन करना धर्मसम्मत है। अन्नवाहुल्य एवं अन्न के सर्वसुलभ वितरण के इन दोनों अनुशासनों का भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में वर्णन हुआ है।
तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है — अन्नं बहु कुर्वीत। तद्व्रतम्। अर्थात् खूब अन्न पैदा करो, यह व्रत है, अनुल्लंघनीय अनुशासन है। आगे कहा गया है, घर-द्वार पर आये किसी याचक को अन्न से तृप्त किए बिना न लौटाए, यह व्रत है। आगे उपनिषद् वाक्य है, इसलिए किसी न किसी प्रकार से प्रचुर अन्न प्राप्त करें और बहुमात्रा में अन्न पका कर घोषणा करें कि प्रचुर अन्न प्रस्तुत है, सब आएं और इस अन्न का उपभोग करें। दीनदयाल उपाध्याय अन्नबाहुल्य के इसी अनुशासन के आधार पर खड़े होकर कृषि संबंधी विचार करते दिखते हैं।
दीनदयाल उपाध्याय का ‘कमाने वाला खिलायेगा’ का नारा भी ऐसे ही सनातन शास्त्रीय निर्देशों पर आधारित है। स्वयं खाने से पहले अन्य सबको खिलाने की बात भारतीय साहित्य में बहुत स्थानों पर आती है। इसका सबसे विस्तृत वर्णन कदाचित् मनुस्मृति में हुआ है। इस स्मृति के तीसरे अध्याय के प्राय: तीन सौ श्लोकों में गृहस्थ के लिए स्वयं भोजन करने से पूर्व अन्य सब को खिलाने के पञ्चमहायज्ञ नाम के विधान का निर्देश हुआ है। इस विधान का समापन करते हुए मनु कहते हैं — देवों, ऋषियों, पितरों, भूतों एवं मनुष्यों को विधिपूर्वक अन्न समर्पण करने के पश्चात् बचे शेष अन्न का ही उपभोग करना गृहस्थ के लिये उपयुक्त है। जो गृहस्थ केवल अपने लिये ही भोजन पकाते हैं, वे भोजन का नहीं पाप का ही उपभोग करते हैं, क्योंकि सज्जनों के लिये तो पञ्चमहायज्ञ के अवशिष्ट अन्न का भोग करने का ही विधान है। और इस अध्याय के अंत में मनु इस प्रकार के अनुशासित गृहस्थ को अपना आशीर्वाद देते हुए कहते हैं— तुम नित्य विघस एवं अमृत का उपभोग करने वाले बनो। अन्यों को खिलाने के पश्चात् बचा शेष अन्न ही विघस होता है और यज्ञ का अवशिष्ट अन्न निश्चय ही अमृत होता है।

उपसंहार
इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय के अन्य सब विषयों पर चिंतन के समान ही उनका कृषिसंबंधी चिंतन भारतीय संस्कृति के सुदृढ़ अधिष्ठान एवं समसामयिक व्यावहारिकता के दो स्तंभों पर खड़ा है। वे अपने राजनैतिक दल के लिए समसामयिक कृषि—नीति का निर्धारण कर रहे हैं, पर ऐसा करते हुए वे सतत सनातन शास्त्रीय शब्दावलि एवं विचारों को उपयोग करते दिखायी देते हैं। इस सुदृढ़ आधार पर वे एक ऐसी अर्थव्यवस्था की कल्पना करते हैं जिसमें कृषि की प्राथमिकता होगी, कृषि उन्नत एवं अति—उपजाऊ होगी, कृषक की आय निरंतर बढती जायेगी, समृद्ध कृषि के आधार पर उद्योग एवं सेवाक्षेत्र समृद्ध होंगे और अन्न बाहुल्य के इस वातावरण में सबको भोजन उपलब्ध करवाने के किसी भी समाज के मूल धार्मिक एवं आर्थिक दायित्व का समुचित निर्वाह होता चला जायेगा।
कृषि संबंधी ये विचार सनातन भी हैं और समसामयिक भी हैं। अब कदाचित् समय आ गया है जब भारत दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिखाए इस मार्ग पर चलने के लिए उद्यत है। अन्य मार्गों को छोडकर कृषि की प्राथमिकता और अन्न—बाहुल्य एवं अन्न के सर्वसुलभ वितरण के इस मार्ग पर हम चलने लगेंगे तो भारत के विराट के जागरण का, राष्ट्रीय चिति के, भारतीय संस्कृति के, आलोक में राष्ट्रनिर्माण का उनका स्वप्र सहज ही साकार होने लगेगा।