त्रिपुरारि भगवान शिव और बोडे का नियम

अभिनंदन शर्मा
लेखक भारतीय संस्कृति के अध्येता हैं।


तारकासुर नाम के एक दैत्य के तीन पुत्र थे, जिनके नाम तारकाक्ष, विद्युन्माली तथा कमलाक्ष थे। ये तीनों ही, शिव जी के भारी भक्त थे। तारकासुर की मृत्यु के बाद, उसके तीनो पुत्रों ने अमर होने के लिये, ब्रह्मा जी का घोर तप किया और ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने बताया कि भाई, अमर तो कोई हो नहीं सकता, मैं खुद ही अमर नहीं हूँ तो तुमको कैसे अमर कर दूं। कुछ और वरदान मांग लो। इन तीनों ने बहुत विचार करके अपने लिये तीन अलग अलग नगरों को माँगा, जिन्हें देवता भी न जीत सकें और कहा जब तक ये नगर अलग अलग रहेंगे, तब तक हमें कोई न मार सके और एक हजार साल में, एक बार ही वो नगर आपस में मिल सकते हों। एक असम्भव रथ पर चढ़कर और एक अनोखे बाण से ही हमारे पुरों का भेदन हो सके। हम सिर्फ शिव जी के हाथों ही मारे जायें, तब ही हमारी मृत्यु हो। उन्होंने दीर्घायु के लिये, ब्रह्मा जी से ऐसा दुर्लभ वर मांग लिया।
ब्रहमा जी ने तथास्तु कहते हुए मय दैत्य को ऐसे तीनो नगरों का निर्माण करने के लिए आज्ञा दी। ये मय दैत्य, वही है जो रावण का ससुर था और मयासुर के नाम से प्रसिद्ध था। जैसे देवताओं के रचनाकर्ता विश्वकर्मा थे ऐसे ही दैत्यों, असुरों के लिए, मयासुर अपनी माया से, निर्माण करता था। मय ने ऐसे तीन ग्रहों का निर्माण किया, जो 1000 साल में एक ही बार, मिलते थे। उनमें से एक नगर सोने का बना हुआ था, दूसरा चांदी का तथा तीसरा नगर लोहे का बना था। सोने का नगर तारकाक्ष का था, चांदी का कमलाक्ष का व लोहे का नगर विद्युन्माली का।

दैत्यों और देवताओं की शत्रुता के चलते, देवताओं ने, भगवान् विष्णु जी को आगे करते हुए, भगवान् शिव का स्तवन किया। भगवान् विष्णु ने जल में आधे खड़े होकर एक करोड़ बार रूद्र मन्त्र का जाप किया। भगवान् शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी को दर्शन दिया। ब्रह्मा जी ने शिव जी को प्रसन्न करते हुए कहा कि हे महादेव। आप हम सभी के राजा हैं, आपकी प्रजा, आज दैत्यों द्वारा भयभीत है। आप ब्राहमणों और अपनी प्रजा की रक्षा के लिए त्रिपुर का नाश कीजिये। आप देवताओं के सार्वभौम सम्राट हैं, ये श्रीहरि आदि देवगण तथा आपकी आज्ञा पालन करने वाले शक्र राजकार्य संभालने वाले मंत्री हैं। अन्य देवता भी आपके शासन के नियंत्रण में रहकर सदा अपने अपने कार्य में तत्पर रहते हैं।
ऐसी बात सुनकर शिव जी बोले – यदि आप मुझे देवताओं का सम्राट बतला रहे हैं तो मेरे पास उस पद के योग्य कोई ऐसी सामग्री तो है नहीं, जिससे मैं उस पद को ग्रहण कर सकूं; क्योंकि न तो मेरे पास कोई दिव्य रथ है, न उसके उपयुक्त कोई सारथि है और न संग्राम में विजय दिलाने वाले वैसे धनुष बाण ही हैं कि जिन्हें लेकर मैं मनोयोग पूर्वक संग्राम में उन प्रबल दैत्यों का वध कर सकूं। यों कह कर वो चुप हो गए। अपनी स्तुति से शिव जी को प्रसन्न न होते देख, देवता चिन्तित हो गए। विष्णु जी ने उनको आशा देते हुए कहा कि आप लोग क्यों दुखी हो रहे हो? ऐसा सुना जाता है कि कोई भी आराधना सुखसाध्य नहीं होती। पहले महान कष्ट झेलना पड़ता है, बाद में भक्त की दृढ़ता देखकर इष्टदेव अवश्य प्रसन्न होते हैं। अत: पहले ओम् का उच्चारण करके फिर नम: का प्रयोग करके, फिर शिवाय कहकर दो बार शुभम का उच्चार करे। उसके बाद दो बार कुरु का प्रयोग करके फिर शिवाय नम: ओम् जोड़ दे। ऐसा करने से जो मन्त्र बनेगा -ओम् नम: शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नम: ओम्। यदि तुम लोग पुन: इस मन्त्र का एक करोड़ जप करोगे तो शिव जी अवश्य तुम्हारा कार्य पूर्ण करेंगे। इसके बाद सभी देवता और श्रीहरि इस मन्त्र के जप में लग गए।

देवताओं की इस भक्ति को देखकर शिवजी पुन: प्रसन्न हुए और बोले – मैंने पहले जिस दिव्य रथ, सारथि, धनुष और उत्तम बाण को अंगीकार किया है, वो सब शीघ्र तैयार करो। विष्णु, तुम त्रिलोक के अधिपति हो; इसलिए तुम्हे चाहिए कि सम्राट के योग्य समस्त उपकरण प्रस्तुत कर दो। ऐसा सुनकर विश्वकर्मा ने शिव जी के लिये एक दिव्य स्वर्णरथ बनाया। उसके एक पहिये में बारहों सूर्य, अरे के रूप में स्थित थे और दूसरे पहिये में, चंद्रमा, अपनी सोलहों कलाओं के साथ, अरे के रूप में लगे हुए थे, वेद ही उसके अश्व थे। उस रथ के सारथि, स्वयं ब्रह्मा जी हुए। जैसे ही, शिव जी उस दिव्यरथ पर आरूढ़ हुए, उसके वेदरुपी अश्व सर के बल बैठ गये। पृथ्वी में भूकंप आ गया। सारे पर्वत डगमगाने लगे। शेषनाग शिवजी का भार ही नहीं उठा पाए। ये देखकर, भगवान् धरणीधर, नन्दीश्वर का रूप रखकर रथ के नीचे जाकर रथ को उठाने लगे किन्तु नन्दीश्वर भी महेश के उस उत्तम तेज को सहन न कर सके, अत: उन्होंने तत्काल ही पृथ्वी पर घुटने टेक दिए। भगवान् ब्रह्मा ने इसे देखकर शिवजी की आज्ञा से, हाथ में चाबुक लेकर घोड़ों को उठाकर उस श्रेष्ठ रथ को खडा किया। रथ पर आरूढ़ होकर शिवजी ने सभी देवताओं से कहा – सुरश्रेष्ठों। यदि तुम लोग सभी पशुओं का रूप रखकर, आधिपत्य मुझे प्रदान करोगे, तभी मैं उन असुरों का संहार करूँगा क्योंकि वे दैत्यश्रेष्ठ तभी मारे जा सकते हैं, अन्यथा उनका वध असम्भव है। तभी से महेश्वर का नाम पशुपति नाम विख्यात हो गया। उस समय शिवजी भयंकर रूप रखकर धनुष पर बाण चढ़ाकर, तीनो पुरों को देखने लगे किन्तु बहुत प्रयास के बाद भी, वो निशाना नहीं लगा पा रहे थे। अचानक आकाशवाणी हुई कि हे जगदीश्वर। जब तक आप गणेश जी की अर्चना नहीं कर लेंगे, तब तक ये ऐसे ही विघ्न पहुँचाते रहेंगे और आप इन तीनों त्रिपुरों का संहार नहीं कर पायेंगे। तब भगवान् शिव ने भद्रकाली को बुलाकर विधि विधान से विनायक की पूजा की, तब वो प्रसन्न हुए।

अनुकूल समय आने पर, तीनों पुरों के एक होने के कुछ समय पहले ही, विष्णु जी ने शिव जी से बाण का संधान करने का निवेदन किया ताकि वो घड़ी टाली न जा सके। ऐसा सोचकर भगवान् महादेव ने अपने धनुष की डोरी पर पाशुपतास्त्र नामक बाण का संधान किया। उस समय अभिजीत मुहूर्त चल रहा था। इस प्रकार पिनाक को धारण कर, शिवजी ने भगवान् विष्णु को अपना तीर बना कर, उन तीनो पुरों को उस समय पर, जब वो तीनो मिल गए संधान कर के नष्ट किया और तीनो असुरों का नाश किया और इसीलिए भगवान् शिव का एक नाम त्रिपुरारी पड़ा। (शिव पुराण, रूद्र संहिता पंचम खंड)

इस कथा में भगवान शिव के पशुपति होने और उनके अद्भुत मन्त्र के अलावा हमें और क्या ज्ञात होता है, उस पर थोड़ा चिंतन करते हैं। इस कथा में यह ध्यान में आता है कि भगवान शिव ने किन्हीं तीन ग्रह समुच्चय का विध्वंस किया था। प्रश्न उठता है कि नौ ग्रहों के अतिरिक्त ये तीन ग्रह और कौन से हैं या थे। हमें यह पता होना चाहिए कि विज्ञानियों को सौरमंडल के ग्रहों का पता चलने के बाद भी क्षुद्रग्रहों की पट्टी का पता नहीं था। इसका पता उन्हें बोडे के नियम के बाद चला। इस नियम के अनुसार मंगल और वृहस्पति ग्रहों के बीच में एक ग्रह और होना चाहिए था। उन्होंने और अनुसंधान किया और तब उन्हें क्षुद्र ग्रहों की यह पट्टी मिली। एक जनवरी 1801 को सिलियस गुइसैप पियाजि ने सेरस नामक सबसे बड़े क्षुद्र ग्रह, जिसका व्यास 1000 किमी है, को देखा। इस सेरस की कक्षा मंगल और गुरु के मध्य उसी स्थान पर है, जिस स्थान पर ग्रह होना चाहिए था। इनके टुकड़ों में से ही कुछ धरती के वायुमंडल में भी प्रवेश कर जाते हैं और उल्का पिंडों यानी टूटते तारे के रूप में दिखाई देते हैं। इन उल्का पिंडों में पाए जाने वाले तत्वों की पहचान की गई है। अभी तक इनमें 52 तत्व पाए गए हैं, जिनमें सोना, चांदी और निकल और अल्युमिनियम प्रचुरता में हैं। साधारणतया भूमंडलीय शैल राशियों में स्वतंत्र धातु रूप में लोहा तथा निकल अत्यंत दुर्लभ होते हैं, किंतु उल्कापिंड़ों में धातुएँ शुद्ध रूप में बहुत प्रचुरता से तथा प्राय: अनिवार्यत: पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त कई ऐसे खनिज हैं, जो भूमडलीय शैलों में नहीं पाए जाते, पर उल्कापिंडों में मिलते हैं। इनमें से प्रमुख ओल्डेमाइट (कैल्सियम का सल्फाइड) और श्राइबेरसाइट (लोहे और निकल का फ़ॉसफ़ाइड) हैं।

वैज्ञानिकों के एक अति मान्य मत के अनुसार, इन क्षुद्र ग्रहों की उत्पत्ति एक ऐसे ग्रह से हुई, जो अब पूर्णतया विनष्ट हो गया है। इस विचार में यह कल्पना की जाती है कि आदि में संभवत: मंगल के आकार का एक ग्रह रहा होगा जो किसी दूसरे बड़े ग्रह के अत्यंत समीप आ जाने पर, अथवा किसी दूसरे ग्रह से टकराकर, विनष्ट हो गया, जिससे अरबों की संख्या में छोटे बड़े खंड बने जो उल्का रूप में खमंडल में विचर रहे हैं। यह नष्ट कैसे हुआ, इसके बारे में विज्ञानी अभी अंधेरे में हैं। शिवपुराण में इस ग्रह के बारे में पहले ही कहा गया है कि इसको शिव जी द्वारा नष्ट किया गया। फिर हमने त्रिपुर के बारे में और पढ़ा तो देखा कि उन्हें मुख्यत: सोना, चांदी और लौह धातु से बनाया गया था। आज के वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि सारे ग्रहों में केवल यही क्षुद्र ग्रह हैं, जिनमें शुद्ध अवस्था में लोहे के साथ-साथ सोना और चांदी भी प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं, जो अन्य किसी भी ग्रह में नहीं पाए जाते हैं। लौह धातु तो मिल भी जाती है, पर सोना और चांदी किसी भी ग्रह में अभी तक नहीं पाए गए हैं। ये भी आश्चर्य से कम नहीं है कि जनवरी 2018 में ही इस क्षुद्र ग्रह पर जीवन के संभावना की खोज भी की जा चुकी है और ये पक्का हो चुका है कि उस क्षुद्र ग्रह पर पानी की प्रचुर मात्रा और आर्गेनिक मैटर के होने से या तो कभी जीवन संभव रहा होगा अथवा भविष्य में संभव है। अर्थात् इन उल्कापिंडों पर जीवन के लक्षण भी खोजे जा चुके हैं, जो सौर मंडल के किसी और ग्रह में, पृथ्वी के अलावा अभी तक निश्चित तौर पर नहीं कहे जा सकते। यह बात भी शिवपुराण में उल्लिखित उन ग्रहों पर जीवन की सत्यता दर्शाता है।

अब बात फंसती है कि शिवपुराण के अनुसार, वहां तीन ग्रह होने चाहिए थे, जबकि बोडे के अनुसार वहां मात्र एक ही ग्रह की संभावना है। सोचिये, ऐसा कैसे संभव है? तो इसका जवाब ये है कि बोडे ने सही नियम दिया था और उसका ये कहना भी सही था कि मंगल और गुरु के बीच में एक ग्रह होना चाहिए। लेकिन क्या हो, यदि वहां एक ही ग्रह के दो उपग्रह हों? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वो जो त्रिपुर थे, उनमें से एक ग्रह रहा हो और बाकी दो उसके ही उपग्रह रहे हों। फिर से देखें, कथा में क्या लिखा है? तीनों के आपस में मिलने का अर्थ ये है कि तीनों एक सीध में आये हों, तब ही उनको नष्ट किया जा सकता था। तो तीनो के एक सीध में आने का क्या अर्थ हो सकता है कि, ग्रह और उसके दोनों उपग्रह, जब एक सीध में आयें, तब ही उनको मारा जा सके अन्यथा नहीं। इसका मतलब ये हुआ कि वहां एक ग्रह के साथ उसके दो उपग्रह भी रहे होंगे। इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। कम से कम हमारे शास्त्रों में तो ऐसा ही संकेत है।

(उपरोक्त कथा और उसका विश्लेषण, अघोरी बाबा की गीता, भाग 2 से लिया गया है।)