झारखंड की सनातन परंपरा हराडीह

सुुधीर शर्मा
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।


बहुत दिन नहीं हुए हैं, जब देश में माँ दूर्गा और महिषासुर को लेकर एक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया था। देश के कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग विशेषकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्रियों का कहना था कि महिषासुर देश की स्थानीय निवासियों का प्रतिनिधि था जिसे आक्रमणकारी आर्यों की देवी दुर्गा ने मार डाला था। इसके लिए वे झारखंड की असुर जनजाति का उदाहरण देते थे कि वे महिषासुर के ही वंशज हैं। हालांकि पुराणों को मिथक मानने वाले इन कथित इतिहासकारों की प्रवंचना इस बात से ही स्पष्ट हो जाती है कि वे एक पौराणिक कथा का प्रयोग कर समाज में विद्वेष फैलाना चाहते थे, परंतु यदि हम झारखंड का ठीक से भ्रमण करें तो उनके लंगड़े झूठ की परतें और उघड़ जाती हैं। झारखंड में कदम-कदम पर देवी दुर्गा, भगवान शिव आदि की पूजा किये जाने के प्रमाण मिलते हैं। ऐसा ही एक प्रमाण है राँची के पास का एक गाँव हराडीह।
खुले मैदान में सैकड़ों नक्काशीदार पत्थर, छोटे-बड़े विभिन्न शैलियों के शिवलिंग और खंडित हो चुकी देवी की प्रतिमा, ये दृश्य किसी समय धनाढ्य सांस्कृतिक धरोहर के अवशेषों की गाथा कहती है। राँची-जमशेदपुर मार्ग पर राँची से करीब 64 किलोमीटर दूर तमाड़ प्रखंड अन्तर्गत काँची नदी के तट पर बसा हराडीह गाँव आज स्वयं को मानचित्र में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
अष्टभुजी (महिषमर्दिनी) और सोलहभुजी माँ दुर्गा (माँ वैष्णवी) की अद्वितीय प्रतिमा और पत्थरों की सिल्लियों से टिकाकर बनाये गए मंदिरों के अवशेष और सबसे महत्वपूर्ण यहाँ बहुतायत में मिलने वाले विभिन्न शैलियों के शिवलिंग इसे एक शक्तिस्थल के रूप में प्रसिद्धि दिलाते है। पुरातत्ववेताओं के अनुसार इन मंदिरों का कालखंड 6ठीं से 8वीं शताब्दी तक का रहा होगा। हाँलांकि ये स्थल अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अन्तर्गत एक संरक्षित स्थल है, फिर भी अबतक बृहद स्तर पर कोई शोधकार्य या खुदाई नहीं की गई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस क्षेत्र में हजारों की संख्या में शिवलिंग थे, घरों के नींव या कुँओं की खुदाई में अक्सर देवी की मूर्तियां या शिवलिंग निकलती थी, कई या तो खंडित हो गए और कईयों ने चुरा भी लिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा की गई खुदाई में कई पिलर, शिवलिंग और मंदिरों के गुंबद निकले है।
तमाड़ और आसपास का यह क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से कई मायनों में महत्वपूर्ण है, माँ दुर्गा की प्रतिमा और शिवलिंगों की बहुतायत यहाँ के जनजातीय आबादी के शिव और दुर्गा के उपासक होने की पुष्टि करते है। काले पत्थरों की दैवीय प्रतिमा और इन इलाकों से होकर गुजरने वाली नदियों में शिवलिंगों का मिलना इस बात का द्योतक है। राँची और इसके आसपास के इलाकों में भी कई नदी के तटों में 5वीं-6ठीं शताब्दी में नागवंशियों के द्वारा कई शिवलिंगों का निर्माण कराया गया था। इसके अवशेष आज भी स्वर्णरेखा नदी के चट्टानों में मिलते है। झारखंड में नागवंशी राजाओं के साक्ष्य भी प्रथम शताब्दी से ही मिलते है, ये पूरे देश में एकमात्र राजवंश है, जिनके वंशज आज भी जीवित है। प्रथम नागवंशी राजा फणिमुकुट राय के समय से ही तत्कालीन खुखरा प्रदेश या पुण्डरिक क्षेत्र (वर्तमान का झारखण्ड) शिव और पार्वती का उपासक रहा। नागवंशियों के राज में कई बार अपनी राजधानियां बदली गई, वे जहाँ भी गए वहाँ शिव, सूर्य और दुर्गा के मंदिरों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी मौजूद है।
उराँव जनजाति झारखंड की प्राचीनतम जनजातियों में से एक है, जो स्वयं को वानरों के वंशज मानते है। इसी क्षेत्र में आंजनधाम नामक स्थान भी है, जिसे हनुमान का जन्मस्थान माना जाता है। कुड़ुख भाषा के लोकगीतों में शिव और पार्वती की बारम्बार चर्चा होती है। राज्य के गुमला जिले के अन्तर्गत ”सीरासीतानाले” सरना संप्रदाय का मूल स्थान मानते है, लोकगीतों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान (जलस्रोत जो आज भी मौजूद है) से शिव और पार्वती ने सृष्टि की रचना की थी। हराडीह के समान मंदिरों के गुंबदों के अवशेष भी इस स्थान से मिलते है। इसी स्थान से झारखण्ड की जनजातीय संस्कृति का प्रसार पूरे क्षेत्र में फैला। आंजनधाम, टांगीनाथ, दिवड़ी, हराडीह, सुंतियाबे, बाम्बलाडीह, नवरतनगढ़ जैसे जगहों में शिवलिंग, दुर्गा और सूर्य मंदिरों के अवशेष मिलते है। कुड़ुख भाषा के जानकार बताते है कि उराँव जनजाति का आधार ही शिव है। सिंगाबोंगा अर्थात सूर्य भगवान और अखरा में पेड़ो की पूजा यहाँ के समाज के आस्था का मुख्य केन्द्र रहा।
हराडीह की प्रतिमा और मंदिर की शैली प्रसिद्ध दिवड़ी मंदिर के जैसी ही है जिसकी प्रसिद्धि राँची-जमशेदपुर राजमार्ग के बगल में होने और हर क्रिकेट सीरीज खेलने के पहले भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के यहाँ आने के कारण काफी बढ़ी है। हाँलांकि दिवड़ी मंदिर में केवल एक ही सोलहभुजी माँ दुर्गा की प्रतिमा और मंदिर है, लेकिन हराडीह के मंदिर में सोलहभुजी और अष्टभुजी दोनों रूप में माँ दुर्गा की प्रतिमा है, लेकिन राजमार्ग से 14 किलोमीटर अंदर होने और सड़क की दयनीय स्थिति के कारण ये अ़िद्वतीय सांस्कृतिक धरोहर लोगों की पहुँच से दूर बना हुआ है। राज्य सरकार की उदासीनता और एएसआई की सुस्त चाल से ये अमूल्य धरोहर मिटने की राह पर है। हराडीह के पूरे क्षेत्र में इतिहास के कई रहस्य छिपे है, जो इस संपूर्ण क्षेत्र की सांस्कृतिक श्रेष्ठता को दर्शाती है, तमाड़ और आसपास का क्षेत्र हमेशा ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से कई रहस्यों को समेटे हुए है। कई मूर्तिया रखरखाव के अभाव में खंडित हो रहे है, किसी प्रकार का कोई सुरक्षा नहीं होने के कारण कई प्राचीन मूर्तियों की चोरी भी हो चुकी है। मैदानों में पुराने मंदिरों के बिखरे अवशेषों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है, कि यह क्षेत्र किसी काल में सांस्कृतिक रूप से कितना धनी रहा होगा। पास में बहने वाली काँची नदी की तट इस स्थल से करीब 200 मीटर की दूरी पर है, लेकिन पुराने सीढिय़ों के अवशेषों से मालूम पड़ता है, कि ये नदी कभी यहाँ स्थापित शिवलिंगों के चरण पखारती होगी। हाल में ही इसी क्षेत्र के परासी गांव में सोने का भंडार होने के पुष्टि हुई है। इसी गांव को पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष व खूँटी के सांसद कडिय़ा मुण्डा ने गोद लिया है, लेकिन आजतक न ही गांव का कोई विकास हुआ और न ही सोना निकालने की दिशा में कोई काम हुआ। अष्टभुजी माँ दुर्गा की प्रतिमा में माँ दुर्गा को महिषासुर का वध करते दिखाया गया है। इस मंदिर में करीब 2 फीट गुणा 3 फीट का ही द्वार है, जहाँ बहुत मुश्किल से कोई अंदर प्रवेश कर सकता है। यहाँ की पूजा स्थानीय पाहन के द्वारा की जाती है और इस मंदिर के सामने भैंसा या बकरे की बलि देने की प्रथा भी चली आ रही है।
वहीं सोलहभुजी माँ दुर्गा की प्रतिमा को माँ वैष्णवी के नाम से पुकारा जाता है। इस मंदिर को नए ढंग से विकसित किया गया है। यहाँ कर्मकांडीय तरीके से पूजा कराया जाता है, यहाँ किसी प्रकार की बलि नहीं दी जाती है। स्थानीय पुजारी अनिरूद्ध चकवर्ती बताते है, कि यह स्थान आस्था और साधना का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा था। पाहनों के द्वारा शिव, दुर्गा और सूर्य (सिंगाबोंगा) की पूजा की जाती थी। पाहनों की ये परंपरा आज भी चली आ रही है। चैत्र शुक्ल के द्वितीया को सरहुल मनाया जाता है, जिसमें पाहन को सूर्य और उसकी पत्नी को धरती मानकर उनकी पूजा की जाती है। ये दोनों मिलकर ही बारिश की भविष्यवाणी करते है।