ज्योतिकराज देवज्ञ नीलकंठ ‘टोडरानंद’ के रचनाकार

फेसबुक पर डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
मध्य काल में जबकि संस्कृत के निबंध ग्रंथों को बढ़-चढ़कर रचा जा रहा था, काशी में एक ग्रंथ तैयार हुआ – टोडरानंद। यह ग्रंथ इतना बड़ा लिखा गया कि मानो महाभारत हो। क्योंकि इसके 80 हजार श्लोकों का प्रमाण है। अकबर के दरबारी टोडरमल्ल की आज्ञा से इस ग्रंथ को रचा गया और काशी विश्वनाथ की सन्निधि में तत्कालीन प्रसिद्ध पंडितों के समुदाय ने विशाल ग्रंथ भंडार से श्लोकों को उद्धृत करते-करते सौख्य-दर-सौख्य रचे।
इसके 22 सौख्य मिले हैं और यह ग्रंथ शाहजहांकालीन काशी निवासी कवीन्द्राचार्य के विशाल संग्रह की निधि था जिनके निधन के बाद वह संग्रह तो खुर्द बुर्द हो गया लेकिन बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह ने उस संग्रह की अधिकांश प्रतिलिपियां जिस किसी तरह अपने संग्रह में पहुंचाई और कई पांडुलिपियां लोगों ने तैयार कर करके अपनी हाथ-खरची कई सालों तक चलाई। तब फोटोकॉपी कहां होती थी? प्रति पेज या प्रति अक्षर लिखकर भुगतान लिया जाता था।
वर्ष 1572 ई. से लेकर 1585 ई. तक टोडरानंद के सौख्यों का प्रणयन हुआ और प्रत्येक सौख्य में टोडरमल्ल की प्रशस्ति लिखी गई। साथ ही उसके इस योगदान को इसलिए महत्वपूर्ण बताया गया कि वह मलेच्छ शासन रूप समुद्र में से शास्त्रों का उद्धार करने का आज्ञादाता था, ऐसे में टोडरमल्ल मानो दूसरा मत्स्यावतार हों। अबुल फजल को संभवतरू टोडरमल्ल से दुराव इसीलिए था कि वह भारतीय संस्कृति पर एक बृहद् विश्वकोश तैयार करवा रहा था। हालांकि यह ग्रंथ आज तक पूरा नहीं छप पाया। राजस्थान के बीकानेर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय ने इस दिशा में एक खास पहल की थी। वर्ष 1941 में महाराजा ने गंगा संस्कृत ग्रंथमाला आरंभ की और देश के तत्कालीन महत्वपूर्ण विद्वानों को इस ग्रंथमाला के संपादन से जोड़ा। प्रधान पणिक्कर ने विद्वान कुन्हनराज, प्रो. पी. एल. वैद्य, पांडुरंग वामन काणे जैसे कई नाम हैं जिन्हें बीकानेर न्यौत न्यौतकर महत्वपूर्ण ग्रंथों के संपादन का दायित्व दिया। वर्ष 1947 ई. में बनारस से पी एल वैद्य को भी बुलाया गया और टोडरानंद के संपादन का दायित्व दिया गया। वैद्य महोदय ने बड़ी मेहनत करके दो सौख्य संपादित किए रू 1. सर्ग सौख्य और 2. अवतार सौख्य। लेकिन, वैद्य इस उहा में पड़ गए कि जिस अवधि में टोडरमल्ल सबसे ज्यादा सैनिक अभियान और आर्थिक सुधार कार्य में लगा हुआ था, तो उसके लिए इस ग्रंथ का प्रणयन कैसे संभव हुआ होगा। वैद्य ने बहुत प्रयास कर एक पंक्ति खोज निकाली कि नीलकंठ ने इस ग्रंथ का एक ‘ज्योतिष सौख्य ‘ लिखा। हाल ही इस ग्रंथ की प्रतिलिपियों के कई पक्षों पर दृष्टिपात करते हुए मुझे भी इसके नीलकंठ के रचनाकार होने की मान्यता ही पुख्ता लगी और यही नहीं, इसकी पुष्टि नीलकंठ के पुत्रा गोविंद दैवज्ञ की मुहूर्तचिंतामणि पर पीयूषधारा टीका से भी होती है। गोविंद के पुत्रा माधव व चिंतामणि की स्वीकारोक्तियां भी मेरे लिए इस मान्यता की पुष्टिकारक हुईं। गोविंद ने तो एक बार नहीं, दर्जनों बार लिखा कि उसके पिता ने टोडरानंद की रचना की है। मेरे लिए एक महत्वपूर्ण मान्यता की पुष्टि में इतने प्रमाणों का मिलना बड़ा ही रोचक और कुतूहल का विषय है। और हां, यह नीलकंठ वही हैं जो विदर्भ के मातृपुर गांव से बनारस आकर बसे अनंत दैवज्ञ का पुत्रा था और अकबर के दरबार का प्रसिद्ध ‘ज्योतिकराय‘ जिसने सलीम के जन्म के अवसर पर कुंडली बनाकर अकबर को भेंट की तब ‘अकबरनामा‘ में उसका जिक्र तो किया गया लेकिन नाम नहीं दिया गया। हां, तब मौजूद चित्राकार ने इस प्रसंग का चित्रा जरूर बना दिया जिसमें नीलकंठ को दिखाया गया है। यह चित्रा अब लंदन में है। नीलकंठ ने कई पुस्तकें लिखीं। एक पुस्तक ‘दैवज्ञ वल्लभा‘ भी है। दिल्ली के एक तथाकथित विद्वान ने इस पुस्तक को वराहमिहिर की बताकर न केवल अनुवाद सहित छपवाया बल्कि उस पर शोध अध्ययन तक करवा दिया।