गौमूत्र बनाएगा कैंसरमुक्त भारत

पूनम नेगी
लेखिका स्वंतत्र पत्रकार हैं।


तकनीक व सुविधाओं की दृष्टि से जितने सक्षम हम आज हैं, उतने पहले कभी नहीं थे; मगर हमारी स्वार्थ लिप्सा ने हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य को जिस तरह ग्रहण लगाया है, वैसा भी अब से पहले नहीं था। आज समूचा प्रकृति चक्र बुरी तरह गड़बड़ा गया है। गहराते पर्यावरण प्रदूषण के कारण कीटनाशकों व रासायनिक उर्वरकों से बंजर होती धरती तथा वायु, जल और भोजन में तेजी से घुलते जा रहे विषाक्त तत्व, शराब व धूम्रपान तथा अनियमित दिनचर्या और तनाव व अवसाद के कारण कैंसर जैसी भयावह बीमारियों का प्रकोप आज काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। कैंसर एक ऐसी भयावह बीमारी है, जिसके इलाज की पूर्ण गारंटी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास भी नहीं है। ऊपर से बीते दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह चेतावनी कि 20वीं सदी की आश्चर्यजनक औषधियां एंटिबॉयोटिक्स वर्ष 2020 तक बेअसर हो जाएंगी; वाकई चिन्तित करने वाली है। ऐसे में देश दुनिया के चिकित्सा विज्ञानियों का ध्यान ऐलोपैथ से इतर दूसरी उपचार-पद्धतियों की ओर तेजी से आकृष्ट हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि लाइलाज कैंसर के इलाज में गौमूत्र व पंचगव्य चिकित्सा के नतीजों ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों को उम्मीद एक नई राह दिखायी है। इस दिशा में नागपुर (महाराष्ट्र) के देवलापुर गो विज्ञान अनुसंधान संस्थान की उपलब्धियां ध्यान देने योग्य हैं। संस्थान से जुड़े सुनील मानसिंघका संस्थान की चिकित्सीय शोध परियोजनाओं की उपलब्धियों जानकारी देते हुए कहते हैं कि गौमूत्र तथा पंचगव्य यानी गौदूग्ध (गाय का दूध), गौदधि (गाय का दही), गौघृत (गाय का घी), गौमुत्र (गाय का मूत्र), गोमय (गाय का गोबर) पर अनुसंधान से अद्भुत परिणाम मिले हैं। विभिन्न वैज्ञानिक परीक्षणों में साबित हो चुका है कि भारतीय नस्ल की स्वस्थ देशी गाय के मूत्र व पंचगव्य में मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की जबर्दस्त शक्ति निहित है। गौमूत्र में एंटीऑक्सिडेण्ट गुण होते हैं और यह फ्री रेडिकल्स पर प्रतिक्रिया के जरिये शरीर में उत्पन्न ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को सामान्य बनाता है। परीक्षण में यह भी साबित हुआ है कि गौमूत्र में क्षतिग्रस्त डीएनए की मर मत करने की शक्ति निहित है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि कीटनाशक मानव शरीर में जाकर डीएनए के विखण्डन के जरिये रक्त और ऊतकों के लि फोसाइट्स सेल्स को नष्ट कर देते हैं जबकि गौमूत्र इन लिम्फोसाइट्स को नष्ट होने से बचा कर कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकता है। मानसिंघका बताते हैं कि गौमूत्र के एंटीबायोटिक, एंटीफंगल, एंटी एलर्जी, एंटी सेप्टिक, बायो इनहान्सर व ऑक्सीडेटिव क्षति से डीएनए की सुरक्षा और एंटी-कैंसर एजेंट के गुणधर्मों के कारण अमेरिका व चीन से पांच पेटेंट हासिल हो चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस सहयोगी संगठन की यह बड़ी उपलब्धि हम सब भारतवासियों के लिए गर्व का विषय है।
मानसिघंका कहते हैं, सामान्य तौर पर कैंसर की आधुनिक चिकित्सा में रेडियोएक्टिव एलिमेन्ट प्रयोग में लाए जाते हैं। हमारे केन्द्र के तत्वावधान में हुई वैज्ञानिक शोधों से इस तथ्य की पुष्टि हुई है कि गौमूत्र में विद्यमान सोडियम, पोटेशियम, मैग्नेशियम, फास्फोरस, सल्फर जैसे तत्वों में से कुछ लवण विघटित होकर रेडियोएक्टिव एलिमेन्ट की तरह कार्य करने लगते है और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के साथ उनकी अनियन्त्रित वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण करते हैं। कैंसर को रोकने वाला प्रमुख तत्व करक्यूमिन भी गौमूत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। गौमूत्र को खास तौर पर कैंसररोधी प्राकृतिक एजेंट टैक्सॉल (पैक्लीटैक्सेल) को बढ़ाने में भी उपयोगी पाया गया है। साथ ही स्तन कैंसर के सेल लाइन एमसीएफ-7 के खिलाफ पैक्लीटैक्सेल की गतिविधियों को बढ़ाने में भी इसे प्रभावी पाया गया है। यही नहीं, ऑपरेशन के बाद बची कैंसर कोशिकाओं को भी गौअर्क नष्ट करता है। केन्द्र के गौविज्ञानी चिकित्सक सैकड़ों कैंसर रोगियों को स्वस्थ कर चुके हैं। इन रोगियों के सारी जानकारी संस्थान में उपलब्ध है, जिसे कोई भी यहां आकर देख सकता है। यह समूची जानकारी हमारे सेंटर की वेबसाइट (www.gauvigyananusandhan kendra) पर भी उपलब्ध है।
मानसिघंका के अनुसार गौमूत्र पर हुए इन अनुसंधानों से चिकित्सा विज्ञान में एक नये अध्याय का सूत्रपात हुआ है और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने गौमूत्र के बॉयो क्षमता बढाने वाले गुणों और कैंसर एवं क्षयरोगियों उपचार में इसकी उपयोगिता पर अमेरिका से पांच पेटेंट हासिल किये हैं। वैज्ञानिकों ने एंटीबायोटिक और एंटीबायोटिक के एंटीमिक्राबियल प्रभाव को बढ़ाने के लिए गाय मूत्र से ‘कामधेनु अर्क’ व कुछ अन्य दवाएं बनायी हैं। नेशनल इन्वाइरनमेंटल इंजीनियर रिसर्च इंस्टिट्यूट नीरी और गो विज्ञान अनुसंधान केंद्र ने इसे मिलकर तैयार किया है। नीरी के एक्टिंग डायरेक्टर तपन चक्रवर्ती के अनुसार रीडिस्टिल्ड काउ यूरिन डिस्टिलेट का उपयोग जैविक तौर पर नुकसानग्रस्त डीएनए को दुरुस्त करने में कारगर पाया गया है। इस कामधेनु गो-अर्क से व्यक्ति की प्रतिरक्षण क्षमता का स्तर बढ़ता है। साथ ही इससे मैक्रोफैगस को सक्रिय बनाने और उनकी बैक्टीरिया निगलने और नष्ट करने की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है। कामधेनु अर्क को अपने एंटीजीनोटॉक्सिटी गुणों के कारण तीसरी बार अमेरिकी पेटेंट हासिल हुआ है। मानसिंघका का कहना है कि गौमूत्र से तैयार ये अर्क जीनोटॉक्सिटी के खिलाफ काम करता है। इसके लिए हमने तीन मरीजों पर शुरुआती शोध किया था। इनमें से दो को गले और एक को गर्भाशय का कैंसर था। इनमें वरोदरा के रहने वाले 40 वर्षीय युवक तथा एक अमरावती की रहने वाली 29 वर्षीय महिला को 2 स्टेज का गले का कैसर था, दूसरी 47 साल की नागपुर की महिला को अंतिम स्टेज का गर्भाशय का कैंसर था। जिन्हें एलोपैथिक चिकित्सकों ने महज कुछ समय का जीवन बताकर डरा दिया था। ये तीनों 5,8 व 12 साल से केन्द्र पर गौमूत्र चिकित्सा से सामान्य जीवन जी रहे हैं। ऐसे सैकड़ों रोगियों का पूरी केस स्टडी व विवरण केन्द्र की पंजिका में दर्ज है।
वर्तमान समय में कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर एंटीबोयाटिक दवाओं का स्वरूप बैक्टीरियोस्टेटिक होता है यानी वे बैक्टीरिया को मारती नहीं, सिर्फ उनकी बढ़ोत्तरी रोकती हैं। चिकित्सीय शब्दावली में बैक्टीरिया का अन्त शरीर के स्वयं के रक्षातन्त्र (फैगोसिटिक सिस्टम) के माध्यम से होता है। इसमें मैक्रोफैगस (रक्त के मोनोसाइट्स) की अहम भूमिका होती है। पिछले कुछ वर्षो में यह देखा गया है कि पर्यावरण प्रदूषण और भोजन में कीटनाशकों, भारी धातुओं, फंगल टॉक्सिन्स आदि की मौजूदगी के कारण इन मैक्रोफैगस की सक्षमता में भारी कमी आयी है। इसकी वजह खेती में रसायनों का भारी उपयोग और अनाज का संग्रह ठीक से न किया जाना है। मैक्रोफैगस की कार्यप्रणाली में अक्षमता के कारण एंटीबोयाटिक दवाएं बेअसर हो रही हैं; बैक्टीरिया में प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो रहा है तथा इन्फैक्शन पुन: सक्रिय हो रहे हैं। मानसिंघका के अनुसार केन्द्र के हाल के वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि गौमूत्र व्यक्ति की प्रतिरक्षण क्षमता के स्तर को बढ़ाता है। उससे मैक्रोफैगस को सक्रिय बनाने और उनकी बैक्टीरिया निगलने और नष्ट करने की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है।
यूं तो सनातन भारतीय संस्कृति में गौमूत्र का चिकित्सीय प्रयोग कोई नई बात नहीं है। वेदों और पुराणों के अलावा आयुर्वेद ग्रन्थों में इसके कई साक्ष्य मिलते हैं। प्राचीन भारत के चरक व सुश्रुत सरीखे महान आयुर्वेदाचार्यों ने अपनी संहिताओं में अर्बुद (कैंसर) के विषय विस्तृत जानकारी के साथ इस बीमारी के इलाज में गौमूत्र व पंचगव्य के सफल प्रयोगों के अनेक उल्लेख किये हैं। गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के चिकित्सकों ने इन्हीं प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थों के विशेष संदर्भों को अपनी शोध का आधार बनाया है। इसी आधार पर महाराष्ट्र सरकार ने संस्थान को 40 प्रकार की दवाएं तैयार करने की अनुमति दी है। गौआधारित उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए नागपुर में जल्द ही एक गौविज्ञान अस्पताल खोलने की भी योजना है।
उल्लेखनीय है कि नागपुर के इन गौविज्ञान अनुसंधान केंद्र सीएसआईआर, आईसीएआर, आईसीएमआर, और एनआईआरआई, त्वचा विज्ञान संस्थान, सीआईसीआर और कुछ पशु चिकित्सा, कृषि और फार्मेसी कॉलेजों के साथ-साथ एनआईटी के विभिन्न राष्ट्रीय शोध संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करता है। केंद्र वैज्ञानिक सेमिनार और सम्मेलनों का आयोजन करके अनुसंधान और विकास के संबद्ध क्षेत्रों में काम कर रहे कई वैज्ञानिकों के लिए संगोष्ठियों और कार्यशालाओं का आयोजन कर एक प्रेरक के रूप में भी कार्य करता है और छात्रों को उनके शोध कार्य के लिए सहायता और मार्गदर्शन भी करता है।
बताते चलें कि सीएसआरआर, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, जी.बी.पंत विश्वविद्यालय, पंतनगर और भारतीय पशु-चिकित्सा अनुसंधान संस्थान सहित विभिन्न प्रयोगशालाओं और गैर-सरकारी संगठनों के कई वैज्ञानिक गौमूत्र के विभिन्न औषधीय गुणों पर अनुसंधान कर रहे हैं। इन अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि एंटीबॉयोटिक के साथ गौमूत्र-पान करने से रोगाणुओं में प्रतिरोध क्षमता विकसित नहीं होती। गौमूत्र आर-फैक्टर को अवरुद्ध कर देता है। आर-फैक्टर एंटीबैक्टीरियल प्रतिरोध के विकास के लिए जि मेदार बैक्टीरिया के प्लैज्मिड जेनोम का हिस्सा है।
सीएसआइआर की लखनऊ स्थित प्रयोगशाला केंद्रीय औषधीय और सुगंधित पौध संस्थान (सीमैप) के वैज्ञानिक डॉ महेन्द्र पी दारोरकर के मुताबिक कैंसर के इलाज के लिए होने वाली कीमोथेरेपी कैंसर सेल को तो खत्म करती हैं लेकिन उसके साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा होते हैं और यह दवा काफी महंगी भी होती है। उन्होंने कहा ने नागपुर के गो विज्ञान अनुसंधान केंद्र के साथ मिल कर हमने गौमूत्र की उपयोगिता को वैज्ञानिक तरीके से साबित किया है। डॉ. दारोरकर कहते हैं कि सीमैप (लखनऊ) के प्रयोगशाला विश्लेषणों में पाया गया कि एक स्वस्थ गाय के मूत्र में नाइट्रोजन, सल्फर, फॉस्फेट, सोडियम, मैंगनीज, कार्बोलिक एसिड, आयरन, सिलिकॉन, क्लोरीन, मैग्नीशियम, साइट्रिक, टाइट्रिक व सक्सेनिक एसिड तथा कैल्सियम, विटामिन ए, बी, सी, डी, ई, मिनरल्स, लैक्टोस, एन्जाइम्स, क्रेटिनिन, हॉर्मोन्स और गोल्ड एसिड्स जैसे जीवाणुरोधी व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। परीक्षण में यह भी साबित हुआ है कि गौविज्ञान केन्द्र में गौमूत्र से निर्मित कामधेनु अर्क कैंसर के संक्रमण रोकने वाले बायोएक्टिव मोलेक्यूल की गतिविधियों को बढ़ाने में काफी कारगर है। शुरुआती शोधों में सामने आया है कि गौमूत्र के अर्क साथ कैंसर की दवा की खुराक देने पर दवा ज्यादा असरदार साबित हुई। दारोरकर का कहना है कि यदि गौमूत्र पर हो रहे अगले शोध सफल रहे तो बोन मैरो और स्तन कैंसर को रोगियों को काफी राहत मिल सकेगी।

पंचगव्य कैंसर अस्पताल, दिल्ली
कैंसर रोगियों की आशा
पंचगव्य उपचार पद्धति कैंसर रोगियों की चिकित्सा में काफी कारगर साबित हो रही है। यह कहना है गोधाम पंचगव्य आयुर्वेदिक चिकित्सालय के मुख्य सलाहकार अतुल सिंघल का। डॉ. सिंघल का कहना है कि भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा पंचगव्य के इलाज को मान्यता मिलने के बाद से न सिर्फ देशभर के लोगों का रुझान इस ओर तेजी से बढ़ रहा है, वरन नए-नए शोध भी हो रहे हैं ताकि कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से भारत को मुक्त किया जा सके। डा. सिंघल बताते हैं कि प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में देशी गाय को बेहद अनमोल बताया गया है। पंचगव्य यानी भारतीय नस्ल की देशी गाय के दूध, दही, घी, मक्खन, गोबर और गौमूत्र के संतुलित सम्मिश्रण को आयुर्वेद में अमृत की संज्ञा दी गई है। हमारे यहां कैंसर चिकित्सा में पंचगव्य के अर्क में तुलसी, आवंला, गिलोय, हल्दी, हरसिंगार, सहजन, बथुआ और चौलाई जैसी जड़ी बूटियों का मिश्रण मिलाकर रोग के अनुसार मरीज की चिकित्सा की जाती है।
इस पर शोध करने वाले वैद्य भरत देव मुरारी का कहना है कि यदि कैंसर की शुरुआती दशा में मरीज उनके पास आ जाते है तो कई मामलों में निश्चित तौर पर कैंसर को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। डॉ. सिंघल के मुताबिक दिल्ली के पंजाबी बाग (शिवाजी पॉर्क) इलाके के इस गोधाम पंचगव्य आयुर्वेदिक कैंसर अस्पताल में पंचगव्य चिकित्सा पद्धति से बड़ी संख्या में कैंसर के मरीजों का इलाज किया जा चुका है। खास बात यह है कि वे चिकित्सा के लिए संस्था की गऊशाला में तैयार किया गया पंचगव्य ही इस्तेमाल करते हैं ताकि इसकी शुद्धता पर पूरा विश्वास रहे। इस चिकित्सालय में देश के दूर-दराज के इलाकों से लेकर विदेश तक से अनेक मरीज इलाज कराने आते रहते हैं। ट्रस्ट द्वारा संचालित इस चिकित्सालय की सराहना आईआईटी के वैज्ञानिक और अखिल भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा संस्थान (एम्स) के डॉक्टर भी कर चुके हैं। इस चिकित्सालय में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को एक अनुशासित परिवेश में रखा जाता है। रोगियों की पूरी दिनचर्या चिकित्सा प्रणाली के अनुसार चलती है। मरीजों को भोजन चिकित्सालय में ही दिया जाता है जिसे वैद्य जी की देखरेख में तैयार किया जाता है।
चिकित्सालय के प्रमुख वैद्य भरत देव मुरारी बताते हैं कि दो साल पहले हरियाणा के हिसार जिले से एक महिला कैंसर का इलाज कराने यहां आई थी। वह महिला अनुवांशिक कैंसर की बीमारी से पीडि़त थी। महिला की मां और नानी को भी कैंसर था। शादी के बाद जब महिला गर्भवती नहीं हो पाई तो उसकी उच्चस्तरीय जांच से कैंसर के शुरूआती लक्षणों का पता चला। ऐलापैथी में उक्त महिला का इलाज बहुत खर्चीला था। गोधाम पंचगव्य आयुर्वेदिक कैंसर अस्पताल में उस महिला न सिर्फ सफल इलाज हुआ वरन वह मां भी बनी। अब अगला प्रयास है कि उसकी यह वंशानुगत बीमारी भी यहीं रुक जाए।
डॉ. सिंघल का कहना है कि देशी गाय के पंचगव्य का लेप रेडिएशन का विकल्प साबित हुआ है तथा गौमूत्र कीमोथेरेपी का हानि रहित विकल्प। कैंसर का एलोपैथिक इलाज काफी लंबा, खर्चिला और कष्टदायक है। ऐसे में पंचगव्य कैंसर रोगियों के लिए एक वरदान की तरह सामने आ रहा है। अच्छी बात यह हैं कि पंचगव्य से इलाज को लेकर देशभर में लोगों की धारणा बदल रही है। पंचगव्य की दवाईयों के प्रति लोगों का भरोसा भी कायम हो रहा है। यह इस बात का परिचायक हैं कि देश प्राचीन आयुर्वेदिक पद्धति की तरफ लौट रहा है। ट्रस्ट के शंकर दास बंसल बताते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिकों की शोधों में भी पंचगव्य से बनी दवाइयां काफी कारगर पायी गयी हैं। हालांकि पंचगव्य चिकित्सा को लोकप्रिय बनाने के लिए भारत सरकार आगे आ रही है लेकिन इस दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है।