गौमांसभक्षक प्रगतिशीलता

गौमांसभक्षक प्रगतिशीलता

गौमांसभक्षक प्रगतिशीलता

आज देश संक्रमण काल से गुजर रहा है। बदलाव का एक खाका बनता दिखाई पड़ रहा है। हैरत की बात यह है कि अभी तक बदलाव का पक्षधर रहा वर्ग इससे चिंतित दिखाई देता है, क्योंकि उन्हें लगता है भारत अपनी मूल विचार की ओर लौट रहा है। इसलिए देश में घट रही कुछेक घटनाओं को संचार माध्यमों के द्वारा विद्रुप तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। इसमें वे लोग काफी सक्रिध् दिखाई देते है जो स्वयं को प्रगतिशील कहलाने में गर्व महसूस करते हैं, किन्तु कभी वे प्रगति के पथ पर चले नहीं, अब प्रगति हो रही है तो उन्हें खल रही है। आज वे विरोध करने के लिए खड़े हो रहे हैं।
दुर्भाग्यवश, अभी तक ऐसे लोगों को सम्मानित किया गया जो वास्तव में सम्मान के हकदार थे ही नहीं। इन्होंने भारत के गौरवपूर्ण इतिहास को कायरता के इतिहास में बदलने का घृणित कार्य किया है। ऐसे सभी लोग अपना सम्मान वापस कर रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि गाय भारत के लोगों की पालनहार रही है। गाय हमारे लिए कल्पवृक्ष है, पारस पत्थर है। भारतीय समाज ने गाय से जो मांगा, वह उसे मिला। स्वास्थ्य मांगा तो मिला क्योंकि गाय के दूध में वे तत्व हैं जो मनुष्य के शरीर को प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। इसके दूध से बने पदार्थ शरीर को पुष्ट बनाते हैं। हमने गाय से भोजन मांगा तो वह भी मिला। गाय का गोबर खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है। गाय के मूत्रा में कीटनाशक शक्ति होने के कारण उसके प्रयोग से हमारे किसान रसायनमुक्त व बलवर्धक धान्य उत्पादन करते थे। परंतु प्रगतिशीलता के नाम पर आज उसी गाय को खाने को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इसलिए, आजकल गौवंश के मांस पर बड़ी चर्चा हो रही है। कुछ लोग बडे गर्व से स्वीकार कर रहे हैं कि वे गौमांस खाते हैं। कुछ लोग गौमांस की पार्टियां कर रहे है या पार्र्टी करने की बात कर रहे हैं। संचार माध्यमों ने ऐसा वातावरण बना दिया है जैसे, सारा भारत गौमांस के बिना जीवित ही नहीं रहेगा। परंतु ऐसे लोगों की संख्या अंगुली पर गिनी जा सकती है। इन गिने-चुने लोगों की राय पूरे देश की राय नहीं हो सकती। ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि गाय के प्रति सम्मान केवल आस्था पर आधारित नहीं था, बल्कि प्राचीन भारत में भारत की अर्थव्यवस्था में गाय की उपयोगिता का सबूत था। भारत के लोगों ने पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने में गाय की महत्ता को स्वीकार किया था।
गाय के गोबर का महत्व भारत का ग्रामीण और पिछड़ा माना जाने वाला समाज भली-भांति समझता था। एकमात्र गाय ही ऐसा प्राणी है जिसके मल यानी कि गोबर का घरों में पेंट की भांति लेपन करने में उपयोग किया जा सकता है और किया जाता रहा है। यही कारण भी था कि गोबर के महत्व को रेखांकित करने के लिए उसे पूजा पद्धति और कर्मकांड तक से जोड़ दिया गया था। परंतु हमारे पूर्वज मनिषियों को यह नहीं पता था कि इस देश में किसी समय इतनी अधिक सांप्रदायिक राजनीति चलेगी कि गोबर और गाय को कर्मकांड सो जोडऩा ही उसके काटे जाने का कारण बन जाएगा। आज देश में नासमझी और सांप्रदायिक कट्टरता की जो पराकाष्ठा देखी जा रही है, उसका सबसे बड़ा शिकार गाय ही हो रही है।
यही कारण है कि देश का बहुसंख्यक समाज गाय की हत्या किए जाने के विरोध में है। इसीलिए गौमांस खाने का प्रदर्शन करने वाले लोगों का विरोध किया जा रहा है। यदि ये वास्तव में प्रगतिशील लोग हैं तो इन्हें कम से कम गाय के आर्थिक महत्व पर ही ध्यान देकर गौहत्या का विरोध करना चाहिए था, परंतु वे सेकुलरवाद की आड़ में देश को बदनाम करने का घिनौना खेल खेल रहे हैं। ऐसे में भारतीयता के समर्थकों के लिए और भी चुनौतियां बढ़ जाती हैं।